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ये है इंदौर मेरी जान!
21/08/2026

ये है इंदौर मेरी जान!

कोई बता सकता है इसका क्या मतलब है?ऐसी स्थिति में चलना चाहिए या रुकना चाहिए?इंदौर के ही एक चौराहे का फोटो है।            ...
21/08/2026

कोई बता सकता है इसका क्या मतलब है?
ऐसी स्थिति में चलना चाहिए या रुकना चाहिए?

इंदौर के ही एक चौराहे का फोटो है।

इंदौर: स्मार्ट सिटी के दावों के बीच बढ़ती बदहालीइंदौर को देश के सबसे स्वच्छ और बेहतर शहरों में गिना जाता है। स्वच्छता के...
20/08/2026

इंदौर: स्मार्ट सिटी के दावों के बीच बढ़ती बदहाली

इंदौर को देश के सबसे स्वच्छ और बेहतर शहरों में गिना जाता है। स्वच्छता के मामले में इंदौर ने निश्चित रूप से अपनी एक अलग पहचान बनाई है। लेकिन पिछले कुछ समय से शहर की तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी तेजी से सामने आ रहा है—टूटी सड़कें, जगह-जगह खुदाई, बढ़ती गंदगी, बिगड़ता ट्रैफिक और कानून-व्यवस्था को लेकर बढ़ती चिंता।
सवाल यह नहीं है कि इंदौर में समस्याएं क्यों हैं। किसी भी बड़े शहर में समस्याएं होना स्वाभाविक है। असली सवाल यह है कि समस्याओं के समाधान की गति इतनी धीमी क्यों है और जवाबदेही तय क्यों नहीं होती?
सड़कें विकास का रास्ता हैं या परेशानी का?
इंदौर की सड़कों पर चलना कई इलाकों में चुनौती बनता जा रहा है। कहीं सड़कें टूट चुकी हैं, कहीं निर्माण के बाद मरम्मत अधूरी है और कहीं किसी विभाग द्वारा की गई खुदाई लंबे समय तक नागरिकों के लिए परेशानी बनी रहती है।
बारिश के दौरान समस्या और गंभीर हो जाती है। गड्ढों में पानी भर जाता है और वाहन चालकों के लिए यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि सड़क कहां खत्म होती है और गड्ढा कहां शुरू होता है।
सड़क निर्माण पर करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। फिर भी यदि कुछ ही समय बाद सड़क दोबारा टूट जाए तो सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या निर्माण की गुणवत्ता की जिम्मेदारी किसी की है?
सफाई की पहचान पर भी सवाल
इंदौर ने स्वच्छता के क्षेत्र में देशभर में मिसाल कायम की है। लेकिन केवल कचरा उठाना ही स्वच्छ शहर की पहचान नहीं हो सकता।
फुटपाथों पर अतिक्रमण, सड़कों के किनारे जमा कचरा, निर्माण सामग्री और जगह-जगह फैली अव्यवस्था शहर की सुंदरता को प्रभावित करती है।
एक शहर तभी वास्तव में स्वच्छ कहा जा सकता है जब उसकी सड़कें, फुटपाथ, बाजार, नाले और सार्वजनिक स्थान भी व्यवस्थित और साफ दिखाई दें।
ट्रैफिक: बढ़ता शहर, घटती व्यवस्था
इंदौर तेजी से फैल रहा है। आबादी बढ़ रही है, वाहनों की संख्या बढ़ रही है और शहर के कई प्रमुख मार्गों पर ट्रैफिक का दबाव लगातार बढ़ रहा है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या हमारी ट्रैफिक व्यवस्था उसी गति से आधुनिक हो रही है?
कई जगह पार्किंग की समस्या है, कहीं अतिक्रमण है, कहीं सड़क की चौड़ाई कम है और कहीं यातायात नियमों का पालन करवाने में व्यवस्था कमजोर दिखाई देती है।
अगर शहर की आबादी और वाहन लगातार बढ़ रहे हैं तो भविष्य की ट्रैफिक व्यवस्था के लिए आज से योजना क्यों नहीं बनाई जाती?
अपराध और कानून-व्यवस्था
शहर के नागरिकों के लिए सड़क और सफाई जितने महत्वपूर्ण हैं, उतनी ही महत्वपूर्ण उनकी सुरक्षा भी है।
जब चोरी, लूट, मारपीट, नशे से जुड़े अपराध या अन्य आपराधिक घटनाओं की खबरें लगातार सामने आती हैं तो आम नागरिक के मन में स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है—क्या हमारा शहर वास्तव में सुरक्षित है?
कानून-व्यवस्था केवल पुलिस की जिम्मेदारी नहीं मानी जा सकती। इसके लिए प्रशासन, स्थानीय निकाय, जनप्रतिनिधियों और समाज—सभी की भूमिका होती है।
लेकिन अंततः नागरिक यह जानना चाहता है कि उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है और किसी गंभीर घटना के बाद जवाबदेही किसकी तय होगी?
आखिर जवाबदेह कौन है?
इंदौर की समस्याओं को केवल सरकार की नाकामी कहना शायद पूरी तस्वीर नहीं होगी। नगर निगम, पुलिस, प्रशासन, विकास प्राधिकरण, लोक निर्माण विभाग और अन्य एजेंसियों की अपनी-अपनी जिम्मेदारियां हैं।
लेकिन नागरिक के लिए यह फर्क मायने नहीं रखता कि सड़क किस विभाग की है या कचरा किस एजेंसी को उठाना है।
उसके लिए शहर एक ही है—इंदौर।
वह टैक्स देता है, नियमों का पालन करता है और बदले में एक सुरक्षित, साफ-सुथरा और व्यवस्थित शहर चाहता है।
इसलिए जरूरत सिर्फ घोषणाओं की नहीं, बल्कि जवाबदेही की है।
हर टूटी सड़क के लिए जिम्मेदार अधिकारी कौन है?
हर अधूरे काम की समयसीमा क्या है?
हर बड़े ट्रैफिक जाम का समाधान क्या है?
शहर में बढ़ते अपराधों पर प्रशासन की रणनीति क्या है?
और सबसे महत्वपूर्ण—इन सवालों के जवाब जनता को कौन देगा?
इंदौर को सिर्फ पुरस्कार नहीं, बेहतर व्यवस्था चाहिए
इंदौर की उपलब्धियों पर गर्व होना चाहिए। लेकिन उपलब्धियों का मतलब यह नहीं कि कमियों पर सवाल पूछना बंद कर दिया जाए।
बल्कि जिस शहर ने देश को स्वच्छता का मॉडल दिया है, उससे अपेक्षाएं भी ज्यादा होंगी।
इंदौर को सिर्फ स्मार्ट सिटी के बोर्ड और विज्ञापन नहीं चाहिए। उसे स्मार्ट प्लानिंग, बेहतर सड़कें, सुचारु ट्रैफिक, प्रभावी सफाई व्यवस्था और सुरक्षित वातावरण चाहिए।
जनता को यह जानने का अधिकार है कि उसके शहर के विकास पर खर्च होने वाला पैसा कहां जा रहा है और उसके बदले उसे क्या मिल रहा है।
क्योंकि लोकतंत्र में सवाल पूछना विरोध नहीं है।
सवाल पूछना नागरिक का अधिकार है और जवाब देना सरकार की जिम्मेदारी।
आज जरूरत किसी एक राजनीतिक दल को कटघरे में खड़ा करने से ज्यादा इस बात की है कि इंदौर की शहरी व्यवस्था को लेकर एक गंभीर सार्वजनिक बहस शुरू हो।
क्योंकि आखिरकार सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि “इंदौर कितना स्मार्ट है?”
सवाल यह है—
“क्या इंदौर का आम नागरिक भी अपने शहर की व्यवस्था से उतना ही संतुष्ट है, जितना उसके विज्ञापनों में दिखाई देता है?”

विवेक सिंह चौहान
मालवा डायलॉग

Vinod Kambli to Vaibhav Suryavanshi
18/08/2026

Vinod Kambli to Vaibhav Suryavanshi

18/08/2026

From Vinod Kambli to Vaibhav Suryawanshi

18/08/2026

भारतीय क्रिकेट के ‘खब्बू’ सितारों का दौर

भारतीय क्रिकेट में इस समय कई ऐसे चमकते सितारे हैं, जिन्होंने बाएं हाथ की बल्लेबाजी को एक नई पहचान दी है। अभिषेक शर्मा, ईशान किशन, यशस्वी जायसवाल, वैभव सूर्यवंशी, तिलक वर्मा, शिवम दुबे, ऋषभ पंत, रिंकू सिंह, देवदत्त पडिक्कल और साई सुदर्शन जैसे खिलाड़ियों की लंबी फेहरिस्त देखकर लगता है कि भारतीय क्रिकेट पर इन दिनों ‘खब्बू’ बल्लेबाजों का राज है।
दिलचस्प बात यह है कि भारतीय क्रिकेट में बाएं हाथ के बल्लेबाजों की इतनी बड़ी संख्या पहले कभी देखने को नहीं मिली। एक दौर ऐसा भी था, जब भारतीय टीम में बाएं हाथ का बल्लेबाज ढूंढना मुश्किल होता था। खासकर 1980 के दशक में भारतीय बल्लेबाजी लगभग पूरी तरह दाएं हाथ के खिलाड़ियों पर निर्भर थी।
1983 का विश्व कप भले ही आपने न देखा हो, लेकिन उस पर बनी फिल्म ने उस दौर की भारतीय क्रिकेट टीम की तस्वीर करोड़ों लोगों के सामने जरूर रख दी है। उस समय भारतीय टीम में बाएं हाथ के बल्लेबाज गिने-चुने ही थे। अजीत वाडेकर भारतीय क्रिकेट के शुरुआती प्रमुख बाएं हाथ के बल्लेबाजों में शामिल रहे। बाद में डब्ल्यू. वी. रमन भी टीम में आते-जाते रहे, लेकिन वे लंबे समय तक भारतीय बल्लेबाजी का स्थायी चेहरा नहीं बन सके।
फिर 1990 के दशक की शुरुआत में भारतीय क्रिकेट में एक ऐसा खब्बू आया, जिसने अपनी बल्लेबाजी से पूरे देश को दीवाना बना दिया। नाम था—विनोद कांबली।
कांबली ने 1991 में पाकिस्तान के खिलाफ अपना वनडे पदार्पण किया और 1993 में टेस्ट क्रिकेट में कदम रखा। टेस्ट क्रिकेट की शुरुआत के बाद इंग्लैंड और जिम्बाब्वे के खिलाफ लगातार दो दोहरे शतक लगाकर उन्होंने दुनिया को अपने आगमन का ऐलान कर दिया। उनकी आक्रामक बल्लेबाजी और जबरदस्त प्रतिभा ने उन्हें देखते ही देखते भारतीय क्रिकेट का नया सितारा बना दिया।
कांबली की बल्लेबाजी में एक अलग ही आकर्षण था। उन्होंने भारत की ओर से बेहद कम पारियों में 1000 टेस्ट रन पूरे कर अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। उस दौर में न जाने कितने बच्चों ने उन्हें देखकर बाएं हाथ से बल्लेबाजी करना शुरू कर दिया था। क्रिकेट के मैदान पर कांबली का आत्मविश्वास और आक्रामक अंदाज युवाओं के लिए प्रेरणा बन गया था।
लेकिन जिस करियर की शुरुआत इतनी धमाकेदार हुई थी, वह उतनी ही जल्दी ढलान पर भी चला गया।
1996 विश्व कप का वह सेमीफाइनल कौन भूल सकता है? कोलकाता के ईडन गार्डन्स में श्रीलंका के खिलाफ मिली हार के बाद कांबली की आंखों से बहते आंसू आज भी भारतीय क्रिकेट की सबसे भावुक तस्वीरों में शामिल हैं। उस हार के बाद कांबली को ही कहीं न कहीं बलि का बकरा बना दिया गया, जबकि उस विश्व कप में सचिन तेंदुलकर के बाद कांबली भारत के सबसे सफल बल्लेबाजों में शामिल थे।
कांबली के बाद भारतीय टीम एक बार फिर मुख्यतः दाएं हाथ के बल्लेबाजों से भर गई।
फिर आया एक और खब्बू, जिसने भारतीय क्रिकेट की दिशा ही बदल दी—सौरव गांगुली।
गांगुली ने अपने शुरुआती टेस्ट मैचों में ही शतक लगाकर अपनी जगह पक्की कर ली। आगे चलकर वे भारतीय टीम के कप्तान बने और भारतीय क्रिकेट के सबसे प्रभावशाली खिलाड़ियों में अपना नाम दर्ज कराया। उनके बाद युवराज सिंह और गौतम गंभीर जैसे बाएं हाथ के बल्लेबाज भारतीय क्रिकेट के स्वर्णिम दौर का हिस्सा बने।
युवराज और गंभीर दोनों ने भारत को दो विश्व कप जिताने में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 2007 के टी-20 विश्व कप और 2011 के वनडे विश्व कप में इन दोनों खब्बू बल्लेबाजों की भूमिका किसी से छिपी नहीं है।
लेकिन आज की तस्वीर कुछ अलग है।
कुछ साल पहले तक भारतीय टीम में एक-दो बाएं हाथ के बल्लेबाज नजर आते थे। आज स्थिति ऐसी है कि कई बार टीम में दाएं हाथ के बल्लेबाज ही एक-दो दिखाई देते हैं, जबकि बाएं हाथ के बल्लेबाजों की पूरी फौज मौजूद है। और खास बात यह है कि इनमें से अधिकांश केवल संख्या बढ़ाने के लिए टीम में नहीं हैं, बल्कि मैच का रुख अकेले बदलने की क्षमता रखते हैं।
वैभव सूर्यवंशी इस नई पीढ़ी के सबसे चमकदार सितारों में दिखाई देते हैं। ईशान किशन भी धीरे-धीरे एक परिपक्व और प्रभावशाली मैच विनर की पहचान बना रहे हैं। टेस्ट क्रिकेट में यशस्वी जायसवाल ने अपनी बल्लेबाजी से अलग मुकाम बनाया है।
टी-20 क्रिकेट में तिलक वर्मा, रिंकू सिंह और शिवम दुबे जैसे खिलाड़ी मैच फिनिश करने की जिम्मेदारी संभालते दिखाई देते हैं। वहीं अभिषेक शर्मा जैसे युवा बल्लेबाज आक्रामक क्रिकेट की नई परिभाषा लिख रहे हैं। ऋषभ पंत ने तो बाएं हाथ की बल्लेबाजी को टेस्ट क्रिकेट में ही एक अलग आक्रामक अंदाज दे दिया है।
यानी कांबली से शुरू हुई एक कहानी गांगुली, युवराज और गंभीर से होती हुई आज एक पूरी पीढ़ी तक पहुंच चुकी है।
भारतीय क्रिकेट में ‘खब्बू’ बल्लेबाजों का यह दौर केवल संख्या का बदलाव नहीं है। यह भारतीय क्रिकेट की बल्लेबाजी संस्कृति में आए बड़े परिवर्तन की कहानी भी है। आज के ये बाएं हाथ के बल्लेबाज आक्रामक हैं, आत्मविश्वासी हैं और सबसे बड़ी बात—मैच का रुख बदलने की क्षमता रखते हैं।
कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि भारतीय क्रिकेट की बल्लेबाजी का भविष्य इन ‘खब्बू’ सितारों के हाथों में काफी सुरक्षित नजर आता है। जिस तरह से नई पीढ़ी लगातार सामने आ रही है, उसे देखकर इतना तो तय है कि आने वाले वर्षों में भारतीय क्रिकेट के आसमान पर बाएं हाथ के इन सितारों की चमक और बढ़ने वाली है।

विवेक सिंह चौहान
मालवा डायलॉग्स

18/08/2026

An Angry Common Man

'आपकी गली का नामकफटाफट बताओ अगर आपकी गली की सड़क को इंदौर नगर निगम ने बक्स दिया है।
16/08/2026

'आपकी गली का नामक
फटाफट बताओ अगर आपकी गली की सड़क को इंदौर नगर निगम ने बक्स दिया है।

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