20/08/2026
इंदौर: स्मार्ट सिटी के दावों के बीच बढ़ती बदहाली
इंदौर को देश के सबसे स्वच्छ और बेहतर शहरों में गिना जाता है। स्वच्छता के मामले में इंदौर ने निश्चित रूप से अपनी एक अलग पहचान बनाई है। लेकिन पिछले कुछ समय से शहर की तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी तेजी से सामने आ रहा है—टूटी सड़कें, जगह-जगह खुदाई, बढ़ती गंदगी, बिगड़ता ट्रैफिक और कानून-व्यवस्था को लेकर बढ़ती चिंता।
सवाल यह नहीं है कि इंदौर में समस्याएं क्यों हैं। किसी भी बड़े शहर में समस्याएं होना स्वाभाविक है। असली सवाल यह है कि समस्याओं के समाधान की गति इतनी धीमी क्यों है और जवाबदेही तय क्यों नहीं होती?
सड़कें विकास का रास्ता हैं या परेशानी का?
इंदौर की सड़कों पर चलना कई इलाकों में चुनौती बनता जा रहा है। कहीं सड़कें टूट चुकी हैं, कहीं निर्माण के बाद मरम्मत अधूरी है और कहीं किसी विभाग द्वारा की गई खुदाई लंबे समय तक नागरिकों के लिए परेशानी बनी रहती है।
बारिश के दौरान समस्या और गंभीर हो जाती है। गड्ढों में पानी भर जाता है और वाहन चालकों के लिए यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि सड़क कहां खत्म होती है और गड्ढा कहां शुरू होता है।
सड़क निर्माण पर करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। फिर भी यदि कुछ ही समय बाद सड़क दोबारा टूट जाए तो सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या निर्माण की गुणवत्ता की जिम्मेदारी किसी की है?
सफाई की पहचान पर भी सवाल
इंदौर ने स्वच्छता के क्षेत्र में देशभर में मिसाल कायम की है। लेकिन केवल कचरा उठाना ही स्वच्छ शहर की पहचान नहीं हो सकता।
फुटपाथों पर अतिक्रमण, सड़कों के किनारे जमा कचरा, निर्माण सामग्री और जगह-जगह फैली अव्यवस्था शहर की सुंदरता को प्रभावित करती है।
एक शहर तभी वास्तव में स्वच्छ कहा जा सकता है जब उसकी सड़कें, फुटपाथ, बाजार, नाले और सार्वजनिक स्थान भी व्यवस्थित और साफ दिखाई दें।
ट्रैफिक: बढ़ता शहर, घटती व्यवस्था
इंदौर तेजी से फैल रहा है। आबादी बढ़ रही है, वाहनों की संख्या बढ़ रही है और शहर के कई प्रमुख मार्गों पर ट्रैफिक का दबाव लगातार बढ़ रहा है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या हमारी ट्रैफिक व्यवस्था उसी गति से आधुनिक हो रही है?
कई जगह पार्किंग की समस्या है, कहीं अतिक्रमण है, कहीं सड़क की चौड़ाई कम है और कहीं यातायात नियमों का पालन करवाने में व्यवस्था कमजोर दिखाई देती है।
अगर शहर की आबादी और वाहन लगातार बढ़ रहे हैं तो भविष्य की ट्रैफिक व्यवस्था के लिए आज से योजना क्यों नहीं बनाई जाती?
अपराध और कानून-व्यवस्था
शहर के नागरिकों के लिए सड़क और सफाई जितने महत्वपूर्ण हैं, उतनी ही महत्वपूर्ण उनकी सुरक्षा भी है।
जब चोरी, लूट, मारपीट, नशे से जुड़े अपराध या अन्य आपराधिक घटनाओं की खबरें लगातार सामने आती हैं तो आम नागरिक के मन में स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है—क्या हमारा शहर वास्तव में सुरक्षित है?
कानून-व्यवस्था केवल पुलिस की जिम्मेदारी नहीं मानी जा सकती। इसके लिए प्रशासन, स्थानीय निकाय, जनप्रतिनिधियों और समाज—सभी की भूमिका होती है।
लेकिन अंततः नागरिक यह जानना चाहता है कि उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है और किसी गंभीर घटना के बाद जवाबदेही किसकी तय होगी?
आखिर जवाबदेह कौन है?
इंदौर की समस्याओं को केवल सरकार की नाकामी कहना शायद पूरी तस्वीर नहीं होगी। नगर निगम, पुलिस, प्रशासन, विकास प्राधिकरण, लोक निर्माण विभाग और अन्य एजेंसियों की अपनी-अपनी जिम्मेदारियां हैं।
लेकिन नागरिक के लिए यह फर्क मायने नहीं रखता कि सड़क किस विभाग की है या कचरा किस एजेंसी को उठाना है।
उसके लिए शहर एक ही है—इंदौर।
वह टैक्स देता है, नियमों का पालन करता है और बदले में एक सुरक्षित, साफ-सुथरा और व्यवस्थित शहर चाहता है।
इसलिए जरूरत सिर्फ घोषणाओं की नहीं, बल्कि जवाबदेही की है।
हर टूटी सड़क के लिए जिम्मेदार अधिकारी कौन है?
हर अधूरे काम की समयसीमा क्या है?
हर बड़े ट्रैफिक जाम का समाधान क्या है?
शहर में बढ़ते अपराधों पर प्रशासन की रणनीति क्या है?
और सबसे महत्वपूर्ण—इन सवालों के जवाब जनता को कौन देगा?
इंदौर को सिर्फ पुरस्कार नहीं, बेहतर व्यवस्था चाहिए
इंदौर की उपलब्धियों पर गर्व होना चाहिए। लेकिन उपलब्धियों का मतलब यह नहीं कि कमियों पर सवाल पूछना बंद कर दिया जाए।
बल्कि जिस शहर ने देश को स्वच्छता का मॉडल दिया है, उससे अपेक्षाएं भी ज्यादा होंगी।
इंदौर को सिर्फ स्मार्ट सिटी के बोर्ड और विज्ञापन नहीं चाहिए। उसे स्मार्ट प्लानिंग, बेहतर सड़कें, सुचारु ट्रैफिक, प्रभावी सफाई व्यवस्था और सुरक्षित वातावरण चाहिए।
जनता को यह जानने का अधिकार है कि उसके शहर के विकास पर खर्च होने वाला पैसा कहां जा रहा है और उसके बदले उसे क्या मिल रहा है।
क्योंकि लोकतंत्र में सवाल पूछना विरोध नहीं है।
सवाल पूछना नागरिक का अधिकार है और जवाब देना सरकार की जिम्मेदारी।
आज जरूरत किसी एक राजनीतिक दल को कटघरे में खड़ा करने से ज्यादा इस बात की है कि इंदौर की शहरी व्यवस्था को लेकर एक गंभीर सार्वजनिक बहस शुरू हो।
क्योंकि आखिरकार सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि “इंदौर कितना स्मार्ट है?”
सवाल यह है—
“क्या इंदौर का आम नागरिक भी अपने शहर की व्यवस्था से उतना ही संतुष्ट है, जितना उसके विज्ञापनों में दिखाई देता है?”
विवेक सिंह चौहान
मालवा डायलॉग