Bagiya Ki ABC

Bagiya Ki ABC ❤️ बगिया की ABC ❤️
मिट्टी से सेहत तक — हर पौधे की बात।
🌿आसान और जैविक तरीके से🌼
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वर्तमान के एआई (AI) युग में बहुत-सी चीज़ें हमें आकर्षित करती हैं, लेकिन यह समझ पाना हमेशा आसान नहीं होता कि उनमें कितना ...
18/09/2025

वर्तमान के एआई (AI) युग में बहुत-सी चीज़ें हमें आकर्षित करती हैं, लेकिन यह समझ पाना हमेशा आसान नहीं होता कि उनमें कितना सत्य है। ऐसा ही एक रोचक प्रश्न मेरे पाठक श्री मनोज सरैया जी ने किया। अपराजिता की विभिन्न किस्मों और उनकी वास्तविकता को लेकर। आज का यह लेख इसी विषय पर आधारित है कि वास्तव में अपराजिता की कितनी प्रमाणित किस्में मौजूद हैं।

🌿 अपराजिता Clitoria ternatea एक सुन्दर, पूजनीय और औषधीय गुणों से भरपूर लता है। इसके फूल अपनी विलक्षणता और रंगों की विविधता के कारण बागवानी प्रेमियों को विशेष रूप से आकर्षित करते हैं। लेकिन अक्सर इसके अलग-अलग रंगों को लेकर अनेक भ्रांतियाँ देखी जाती हैं, जिनका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिलता। कुछ जगहों पर हाइब्रिड या ग्राफ्टिंग के प्रयोग अवश्य किए जाते हैं, किंतु असली किस्मों से इतर इनका प्राकृतिक अस्तित्व स्वीकार्य नहीं है।

🌸 अपराजिता के असली रंग और किस्में

1) नीली अपराजिता जिसके 3 प्रकार और दो विशेषता है।

🔸 गहरा नीला – सबसे आम और प्रसिद्ध किस्म।
🔸 नीला-सफेद मिश्रित – पंखुड़ी नीली होती है और बीच में सफेद धब्बा/शेड रहता है।
🔸 हल्का नीला / आसमानी – हल्का व स्लेटी नीला रंग।

🔹 प्रत्येक नीली किस्म में सिंगल पंखुड़ी और डबल पंखुड़ी दोनों रूप मिलते हैं।

2) सफेद अपराजिता जिसके 2 प्रकार और दो विशेषता है।

🔸 सफेद – दूधिया सफेद रंग।
🔸 क्रीम-सफेद – ऑफ-व्हाइट शेड।

🔹 इसमें भी सिंगल पंखुड़ी और डबल पंखुड़ी वाले फूल मिलते हैं।

🔑 निष्कर्ष
अपराजिता के नीला (गहरा, हल्का, बाईकलर) सफेद (शुद्ध या क्रीम) केवल असली रंग है। बाकी सभी रंग सिर्फ भ्रम हैं। ये फोटोशॉप का भ्रम होते हैं।

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#अपराजिता

यह समस्या अक्सर बागवानी प्रेमियों को होती है कि नर्सरी में पौधा तो सुंदर ताज़ा-तंदुरुस्त दिखता है, लेकिन घर लाने के कुछ ...
18/09/2025

यह समस्या अक्सर बागवानी प्रेमियों को होती है कि नर्सरी में पौधा तो सुंदर ताज़ा-तंदुरुस्त दिखता है, लेकिन घर लाने के कुछ दिन बाद ही धीरे-धीरे कमजोर होकर सूखने लगता है। इसके पीछे क्या कारण है यह हम समझ नही पाते हैं और बार बार नए पौधे लाते रहते हैं। पौधों के खराब होने के पीछे कई कारण होते हैं और नर्सरी वालों के "सीक्रेट" भी होते हैं। आइये इसे विस्तार से समझते हैं।

🔹 नर्सरी से लाया पौधा क्यों नहीं चलता?

• मिट्टी का फर्क – नर्सरी वाले पौधे हल्की और पोषक तत्वों से भरपूर मिक्स मिट्टी (कोकोपीट, परलाइट, वर्मीकम्पोस्ट आदि) में लगाते हैं, जो नमी रोकती है। घर की मिट्टी अक्सर भारी या हर पौधें के अनुरूप नही होती है।

• अत्यधिक दवाइयों का प्रयोग – पौधे को चमकदार और हरा-भरा दिखाने के लिए नर्सरी वाले नियमित रूप से बूस्टर, फफूंदनाशक और कीटनाशक प्रयोग करते हैं। जैसे ही ये सप्लाई रुकती है, पौधा कमजोर पड़ जाता है।

• ग्रोथ हार्मोन और का इस्तेमाल – पौधे को तुरंत हरा-भरा दिखाने के लिए ग्रोथ हार्मोन दिया जाता है। इससे पौधा सुंदर फूलो और फल से भरा होता है। पर सप्लाई रुकने पर कमजोर पड़ जाता है।

• शेड और नियंत्रित वातावरण – नर्सरी में पौधे ग्रीन नेट और पौधौं की छांव के साथ मे नियंत्रित तापमान उचित नमी में रहते हैं। घर पर अचानक वातावरण बदलने से पौधा स्ट्रेस में आ जाता है।

• ट्रांसप्लांट शॉक – ऐसी परिस्थिति में अचानक गमला बदलते ही पौधा शॉक लगने के कारण ग्रोथ रोक देता हैं।

🔸 नर्सरी वालों की खाद का "सीक्रेट"

• तुरंत असर देने वाले बूस्टर – जैसे NPK (20-20-20), यूरिया या लिक्विड फर्टिलाइज़र।
• मिट्टी में लगातार नमी बनाए रखने वाला कोकोपीट/वर्मी कम्पोस्ट।
• फफूंदनाशक + कीटनाशक मिक्स – ताकि पौधा बीमार न दिखे।
• ग्रोथ हार्मोन / माइक्रो न्यूट्रिएंट्स स्प्रे – पत्तियां बड़ी, हरी और चमकदार दिखाने के लिए।
• पौधा विशेष के अनुसार मिट्टी और खाद का मिश्रण।

✅ नर्सरी से पौधा लाए तो क्या करें?

1) पौधा चुनते समय
• कोशिश करें कि पौधा थोड़ा पुराना (कम से कम 6 महीने) और जमी-जमाई जड़ों वाला लें।
• मध्यम आकार का, थोड़ा पुराना पौधा चुनें – ज्यादा टिकाऊ होता है।
• बहुत छोटे पौधे अक्सर ट्रांसप्लांट शॉक झेल नहीं पाते।
• पत्तों पर चमक या दवा की गंध हो तो समझें हाल ही में स्प्रे हुआ है। थोड़ा नैचुरल दिखने वाला पौधा लें।

2) घर लाने के बाद पहला सप्ताह
• पौधे को नर्सरी वाले बैग/गमले में ही रखें। तुरंत रिपोट न करें।
• नई जगह की रोशनी और वातावरण से धीरे-धीरे ताल-मेल बनाने दें।
• सीधी धूप में न रखें, पहले छांव या आंशिक धूप में रखें।
सिर्फ जरूरत के अनुसार हल्का पानी दें।

3) 10–15 दिन बाद
• अब पौधे को नए गमले में शिफ्ट करें।
• मिट्टी का मिश्रण – 40% बगीचे की मिट्टी + 30% गोबर/वर्मी कम्पोस्ट + 20% रेत/कोकोपीट + 10% नीम खली/केक। या पौधा विशेष मिट्टी तैयार करें।
• रीपॉटिंग के बाद पौधे को 2–3 दिन छांव में रखें।

4) खाद और देखभाल
• प्रारंभ में कोई रासायनिक खाद न दें।
• ह्यूमिक एसिड, सीवीड, नीम खली या छाछ का पानी जैसे हल्के जैविक घोल से पौधे को पोषण दें।
• जब पौधा नई पत्तियां निकालने लगे तब हर 20–25 दिन में हल्की खाद दें।

5) कीट/रोग से बचाव
• नीम तेल का स्प्रे हर हफ्ते में एक बार करें।
• पौधे को शाम को गीला न करें, वरना फफूंद लग सकती है।

6) पौधा लगाने के बाद
• पौधा लगाने के पहले और बाद में ज्यादा खाद न प्रयोग करें।
• हर पौधे की प्रजाति (धूप/छांव/मिट्टी/पानी की जरूरत) को समझें और उसी हिसाब से दें।
• गमले में पौधा नीचे न दबाए और मिट्टी को दबा-दबा कर भी न भरे।
• पौधा लगाने के समय एप्सम साल्ट जरूर प्रयोग करें।
• ड्रैनेज होल का ध्यान रखे।

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अक्सर कर अज्ञानता वश पूजा और सजावट में उपयोग किए गए फूल कचरे में चले जाते हैं। क्योंकि हम इन्हें बेकार मानकर फेंक देते ह...
17/09/2025

अक्सर कर अज्ञानता वश पूजा और सजावट में उपयोग किए गए फूल कचरे में चले जाते हैं। क्योंकि हम इन्हें बेकार मानकर फेंक देते हैं, लेकिन थोड़ी समझदारी से काम लेने पर यही बासी फूल मिट्टी के लिए अमृत बन सकते हैं। फूलों में प्राकृतिक रूप से मौजूद तत्व जैसे फॉस्फोरस, पोटैशियम और सूक्ष्म पोषक तत्त्व पौधों की वृद्धि और खिलने की क्षमता को बढ़ाते हैं। बासी फूलों से खाद बनाना न केवल फ्री का पोषण स्रोत है बल्कि यह वेस्ट मैनेजमेंट का भी शानदार तरीका है। इससे जैविक कचरा कम होता है और पौधों को शुद्ध, जैविक और सुरक्षित खाद मिलता है। खासकर फूलों वाले पौधे, जो लगातार पोषण मांगते हैं, इस तरह की खाद से अधिक स्वस्थ और लंबे समय तक खिले रहते हैं।

🌼 बासी फूलों से खाद बनाने का तरीका

🔹 फूल इकट्ठा करें – मुरझाए या बासी फूलों को अलग-अलग जमा करें। इनमें माला, पंखुड़ियाँ, पत्तियाँ सब शामिल हो सकती हैं।
🔹 प्लास्टिक या चमकीले कपड़े/धागे वाले हिस्से को अलग कर दें, सिर्फ जैविक हिस्सा ही इस्तेमाल करें।
🔹 कटाई करें – फूलों के छोटे-छोटे टुकड़े कर लें।
🔹 कम्पोस्ट ड्रम में डालें – अब फूलों को किसी गड्ढे, बड़े गमले या ड्रम में डालें।
🔹 ऊपर से थोड़ा सूखा पत्ता, मिट्टी और अगर उपलब्ध हो तो गोबर या पुरानी खाद डालें।
🔹 नमी बनाए रखें – हफ्ते में 1–2 बार हल्का पानी छिड़कें ताकि खाद सूखी न रहे।
🔹 चाहें तो फूलों में गुड़ का पानी या बायोएंजाइम भी मिला सकते हैं, इससे सड़न तेज़ होगी।
🔹ई 40–60 दिनों में ये फूल काले-भूरे रंग की, बिना बदबू वाली, मुलायम खाद में बदल जाएंगे।

✅ वैकल्पिक तरीका :-

🔹 यह भी कर सकते है। जैसे: फूलो में सरसों खली का पाउडर 1:10 के अनुपात में मिला कर पानी का स्प्रे करके फिर से मिला कर 15 से 20 दिन के लिए छाया में कपड़े से ढक कर रखदे। भुरभुरी खाद तैयार हो जाएगी।

✅ सावधानी :-
गीले फूलों को सीधे बंद ड्रम में न डालें, पहले 1–2 घंटे छाया में सुखाकर डालें ताकि दुर्गंध और कीड़े न लगें।

✅ लाभ :-

🔸 फेंके जाने वाले फूलों का वेस्ट मैनेजमेंट हो जाता है।
🔸 पौधों को फॉस्फोरस और पोटैशियम की अच्छी मात्रा मिलती है, जिससे फूल और फलन बेहतर होता है।
🔸 मिट्टी की उर्वरता और नमी बनाए रखने की क्षमता बढ़ती है।
🔸मिट्टी में सूक्ष्मजीवों की संख्या बढ़ती है, जिससे पौधे कम बीमार पड़ते हैं।
🔸पौधों की जड़ें मजबूत होती हैं और वे मौसम के बदलाव झेल पाते हैं।
🔸 गार्डन की मिट्टी में केंचुओं की संख्या बढ़ती है, जो प्राकृतिक टिलिंग करते हैं।

✅ खाद के उपयोग के तरीक :-

🔹 तैयार खाद को 15–20% अनुपात में गमले की मिट्टी में मिलाएँ।
🔹 फूलों वाले पौधों, सब्ज़ियों और पत्तेदार पौधों पर हल्की परत ऊपर बिछाकर भी दे सकते हैं।
🔹 तरल खाद चाहें तो इस तैयार खाद की 1 मुट्ठी को 1 लीटर पानी में भिगोकर 24 घंटे बाद पौधों में डालें।

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आप का क्या अनुभव है?
17/09/2025

आप का क्या अनुभव है?

कई बार हम देखते हैं कि हमारे पौधों में पत्तियाँ अचानक पीली पड़ने लगती हैं। जो कि हरकिसी के लिए चिंता का विषय बन जाता है।...
16/09/2025

कई बार हम देखते हैं कि हमारे पौधों में पत्तियाँ अचानक पीली पड़ने लगती हैं। जो कि हरकिसी के लिए चिंता का विषय बन जाता है। कभी गर्मी में, तो कभी बरसात में, तो कभी सर्दियों में, किसी भी मौसम में ये समस्या आजाती हैं।इसके हर मौसम में अलग-अलग कारण हो सकते हैं, जिनको सही देखभाल से समय रहते हल किया जा सकता है। आइये विस्तार से कारण और उनके समाधान के बारे में जानते हैं।

🔎 संभावित कारण

🔸 अत्यधिक पानी और जलभराव – बरसात में या बार-बार अधिक मात्रा में पानी देने से मिट्टी में हवा का संचार बंद हो जाता है जिससे जड़ें सड़ने लगती हैं। जोकि कई बार पत्तियों के पिला होने का कारण बनता है।
🔸 तेज़ तेज धूप और गर्मी – गर्मियों में मौसम में जब अधिक वाष्पीकरण और पानी की कमी से पौधा जूझता है तो कमजोर होकर पीली पत्तियाँ गिराने लगता है।
🔸 पोषक तत्वों की कमी – लापरवाही के कारण जब हम पौधों को समय से खाद नही देते हैं तो पोषक तत्वों की कमी से पौधें तनाव में आकर पत्तियां पीली करके गिरा देते हैं।
🔹 नाइट्रोजन की कमी → पुरानी पत्तियाँ पीली।
🔹 आयरन की कमी → नई पत्तियाँ पीली, नसें हरी।
🔹 मैग्नीशियम की कमी → पत्ती बीच से पीली, किनारे हरे।
🔸 फफूंद व जड़ सड़न – अधिक नमी वाली मिट्टी में फंगस तेजी से फैलता है जिससे पत्तियां पीली पड़ने लगती है।
🔸 कीट हमला – एफिड्स, माइट्स या व्हाइटफ्लाई रस चूसकर पत्तियों को निष्क्रिय कर देते हैं जिससे पत्तियों का रंग बिगाड़ जाता हैं। बाद में यही पत्तियां पीली होकर गिरने लगती है।
🔸 मौसमी पत्तझड़ – गुलाब, पपीता, नीम, अमरूद जैसे पेड़-पौधे समय-समय पर अपनी पुरानी पत्तियाँ गिराते हैं। जोकि एक मौसमी घटना हैं।
🔸 धूप की कमी (खासतौर पर सर्दियों में) – दिन छोटे पर और ठंड अधिक पड़ने से प्रकाश संश्लेषण सही से नहीं हो पाता हैं। जिससे पौधें कमजोर होकर पत्तियां गिरा देते हैं।
🔸 ठंडी हवाएँ/पाला – सर्दियों में पत्तियाँ पाला पड़ने से जलकर और ठंडी हवा से सुष्क होकर पीली पड़ जाती हैं।

✅ समाधान और बचाव

🔹 सिंचाई सही रखें – केवल तब पानी दें जब मिट्टी की ऊपरी 2–3 इंच परत सूख जाए। बरसात और सर्दियों में पानी कम दें।
🔹 अच्छी जल निकासी – गमले में ड्रेनेज होल ज़रूर रखें और मिट्टी को हल्का-भुरभुरा रखें।
🔹 पौधों को धूप दिखाए – गर्मियों में दोपहर की तेज धूप से बचाएँ और सर्दियों में सुबह से ही पूरे दिन की धूप दें। बारिश में जब भी मौसम खुला हो पौधो को खुले में रखे।
🔹 खाद व पोषण दें – महीने में 1 बार वर्मीकम्पोस्ट या गोबर की खाद दें। नाइट्रोजन की कमी पर हल्की तरल खाद जैसे गुड़ का पानी, बायोएंजाइम आदि दें। आयरन की कमी पर फेरस सल्फेट का छिड़काव करें।
🔹 कीट और फंगस नियंत्रण – नीम तेल, लहसुन–मिर्च का घोल (जरूरत हो तो ट्राइकोडर्मा मिला कर) या साबुन का पानी का स्प्रे करें।
🔹 ठंडी हवाओं से बचाएँ – पौधों को पाले और उत्तर दिशा की हवा से बचाकर धूप वाली जगह रखें। ज़रूरत हो तो जूट या प्लास्टिक शीट से थोड़ा कवर करें।
🔹 स्वाभाविक पत्तझड़ – अगर समय के साथ पुरानी पत्तियाँ पीली होकर गिर रही हैं और साथ ही नई कोंपलें निकल रही हैं, तो यह सामान्य है, कुछ न करें।

👉 संक्षेप में कहें तो, पत्तियों का पीला पड़ना हमेशा बीमारी का संकेत नहीं होता। कई बार यह हमारी गलतियों या सिर्फ मौसम का असर और प्राकृतिक प्रक्रिया होती है। लेकिन अगर समय पर कारण पहचाना जाए और उचित देखभाल की जाए, तो पौधा फिर से हरा-भरा हो सकता है।

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कंटेनर गार्डनिंग हो या खेती  #गुड़ को एक प्राकृतिक और प्रभावी जैविक सुधारक के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। प्राचीन ...
15/09/2025

कंटेनर गार्डनिंग हो या खेती #गुड़ को एक प्राकृतिक और प्रभावी जैविक सुधारक के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। प्राचीन काल से ही कृषि में गुड़ का उपयोग पौधों की वृद्धि और कीट नियंत्रण के लिए होता आया है। गुड़ मिट्टी में लाभदायक सूक्ष्मजीवों को बढ़ाता है ✅ और रासायनिक खादों/कीटनाशकों पर निर्भरता घटाता है।

🔹 गुड़ के लाभ
🔸 गुड़ में कैल्शियम, मैग्नीशियम, आयरन और पोटैशियम जैसे सूक्ष्म पोषक तत्व होते हैं।
🔸 यह एफ़िड्स, चींटियों, रूट नॉट नेमाटोड्स और हानिकारक कवक को रोकने में मदद करता है।
🔸 मिट्टी में सूक्ष्मजीवों की संख्या और सक्रियता बढ़ाता है।
🔸 पौधों को पोषक तत्व बेहतर तरीके से सोखने में मदद करता है।
🔸 पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता और वृद्धि दोनों में सुधार करता है।

🔹 गुड़ खाद के रूप में क्यों काम करता है?

🔸 इसमें प्राकृतिक शर्करा (ग्लूकोज व सुक्रोज) होती है, जो लाभकारी बैक्टीरिया व फफूंद के लिए ऊर्जा स्रोत का काम करती है।
🔸 यह जैविक खाद और कम्पोस्ट में मिलकर नाइट्रोजन फिक्सिंग बैक्टीरिया को सक्रिय करता है।
🔸 मिट्टी का माइक्रोबियल बैलेंस सुधारता है और मिट्टी की उर्वरता बढ़ाता है।

🔹 गुड़ के उपयोग के तरीके
1) जैविक खाद के रूप में

• सामग्री: 200g गुड़ + 10L पानी + 1kg गोबर खाद/वर्मी कम्पोस्ट
• विधि:
🔸 गुड़ को पानी में घोलें और 24 घंटे छायादार स्थान पर रखें।
🔸 फिर गोबर/वर्मी कम्पोस्ट मिलाकर पौधों की जड़ों में डालें।
• लाभ:
🔸 मिट्टी में जैविक गतिविधि बढ़ती है।
🔸 पौधों की जड़ों को अधिक पोषण मिलता है।

2) गुड़ + छाछ का उपयोग

• सामग्री: 200g गुड़ + 2L छाछ + 10L पानी
• विधि:
🔸 गुड़ और छाछ को पानी में मिलाएं।
🔸 2–3 दिन छोड़ दें ताकि बैक्टीरिया सक्रिय हो जाएं। 🔸 फिर पौधों की जड़ों में डालें।
• लाभ:
🔸 हानिकारक फफूंद व कीटों को दूर करता है।
🔸 लाभकारी बैक्टीरिया की संख्या बढ़ती है।
🔸 फसल की वृद्धि तेज होती है।

3) गुड़ + जैविक खाद का मिश्रण

• सामग्री: 200g गुड़ + 500ml पानी + 10kg गोबर खाद/वर्मी कम्पोस्ट
• विधि: घोल बनाकर खाद में मिलाएं और मिट्टी में डालें।
• लाभ: मिट्टी की उर्वरता और उत्पादन क्षमता बढ़ती है।

4) ग्रोथ प्रमोटर

• विधि: 1L पानी में 100g गुड़ मिलाकर पौधों की जड़ों में डालें।
• लाभ: पौधे तेजी से बढ़ते हैं।

5) जैविक कीटनाशक

• विधि: 1L पानी + 50g गुड़ + 10ml नीम का तेल मिलाकर स्प्रे करें।
• लाभ: कीटों को दूर रखता है और पौधों को रोगों से बचाता है।

6) फोलियर स्प्रे

• विधि:
🔸 1L पानी में 20g गुड़ रातभर घोलें।
🔸 सुबह पौधों की पत्तियों पर स्प्रे करें।
• लाभ: पत्तियों को सीधा पोषण मिलता है।

गुड़ पौधों की वृद्धि, मिट्टी की उर्वरता और कीट नियंत्रण में अत्यंत उपयोगी है। यह एक सरल, सस्ता और प्राकृतिक विकल्प है, जिससे कंटेनर गार्डनिंग को और भी जैविक व सुरक्षित बनाया जा सकता है।

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15/09/2025

हरसिंगार मे फूल नही आरहे क्या करे | Harsingar Main phool Nahi Aarahe | Harsingar Plant Not Flowering
Your Queries:-
mere harsingar me phool nahi aa raha
harsingar parijat plant blooming
why My Harsingar plant is not flowering

ग्रामीण समाज में टिटहरी या टिटूड़ी को प्रकृति का मौसम विभाग कहा जाता है। माना जाता है कि यह पक्षी अपने व्यवहार और अंडे द...
13/09/2025

ग्रामीण समाज में टिटहरी या टिटूड़ी को प्रकृति का मौसम विभाग कहा जाता है। माना जाता है कि यह पक्षी अपने व्यवहार और अंडे देने की जगह से आने वाले मौसम का संकेत पहले ही दे देता है। कई बार इसके अनुमान विज्ञान से भी ज्यादा सटीक साबित हुए हैं।

🌱टिटहरी और मानसून के संकेत🌱

इस साल भी टिटहरी ने कई जगह ऊँचाई पर, यहाँ तक कि मकानों की छत पर अंडे दिये। सोशल मीडिया पर भी ऐसे अनेक फोटो देखे गए। लोकविश्वास के अनुसार।

🔹 अगर टिटहरी 4 अंडे दे तो लगभग 4 महीने तक बारिश होने की संभावना रहती है।

🔹 ऊँचाई वाली जगह पर अंडे देना अच्छे मानसून का संकेत है।

🔹 यदि छत पर अंडे दे तो माना जाता है कि पानी से तबाही और बाढ़ जैसी स्थिति बन सकती है।

🔹 टिटहरी जिस खेत में अंडे देती है, वह खेत कभी खाली नहीं रहता और वहाँ अच्छी फसल होती है।

🔹 यदि वह अंडे न दे या गड्ढे में दे तो उस साल अकाल या कम बारिश का डर रहता है।

🌱लोकमान्यताएँ और रोचक तथ्य🌱

🔸 टिटहरी खुले मैदान में अंडे दे तो वर्षा सामान्य रहती है।

🔸 इसकी आवाज़ “टिट-टिट-टिट” को अक्सर बारिश आने का संकेत माना जाता है।

🔸 यह रात में भी चौकन्नी रहती है और खतरे को भाँपकर जोर से आवाज़ करती है, इसलिए इसे प्रकृति का प्रहरी भी कहा जाता है।

🔸 किसानों का मानना है कि टिटहरी जिस खेत में घोंसला बनाती है, वहाँ की मिट्टी अधिक उपजाऊ होती है।

🔸 यह पक्षी अपने अंडों की सुरक्षा के लिए मौसम का अनुमान पहले से लगा लेता है, इसीलिए इसे प्रकृति का मौसम विभाग कहा जाता है।

🔸 कहा जाता है कि कुरुक्षेत्र को छोड़कर देश में कहीं भी टिटहरी मृत अवस्था में नहीं मिलती। यह भी उसकी एक रहस्यमयी विशेषता है।

🌱विज्ञान और प्रकृति🌱

जब विज्ञान और मौसम विभाग अस्तित्व में नहीं थे, तब लोग ऐसे ही प्राकृतिक संकेतों पर भरोसा करते थे। आज भी कई बार वैज्ञानिक भविष्यवाणी गलत साबित हो जाती है, जबकि टिटहरी का संकेत सच निकलता है। हाल ही में हिमाचल की बाढ़ में कुत्ते ने पहले ही खतरे का आभास करा दिया था और लोगों की जान भी बचाई थी।

इसलिए कहा जाता है कि प्रकृति अपने ढंग से हमें संकेत देती रहती है। फर्क इतना है कि हम उन्हें समझना और मानना भूलते जा रहे हैं।

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मेरा ये गुडहल का पौधा कैसा लग रहा?
13/09/2025

मेरा ये गुडहल का पौधा कैसा लग रहा?

क्या आपको एडेनियम पौधों पर लेख के माध्यम से किसी विषय पर जानकारी चाहिए? #एडेनियम
13/09/2025

क्या आपको एडेनियम पौधों पर लेख के माध्यम से किसी विषय पर जानकारी चाहिए?

#एडेनियम

तुलसी भारतीय घर-आँगन की शोभा ही नहीं, बल्कि आस्था और स्वास्थ्य दोनों का प्रतीक मानी जाती है। अक्सर बागवानी प्रेमी बड़े उ...
12/09/2025

तुलसी भारतीय घर-आँगन की शोभा ही नहीं, बल्कि आस्था और स्वास्थ्य दोनों का प्रतीक मानी जाती है। अक्सर बागवानी प्रेमी बड़े उत्साह से तुलसी लगाते हैं, लेकिन कुछ महीनों बाद पौधा मुरझाने या सूख जाने लगता है। हैरानी की बात यह है कि यह समस्या केवल गर्मी में ही नहीं, बल्कि सर्दी और बरसात जैसे हर मौसम में सामने आती है। इसी कारण कई लोग यह प्रश्न पूछते हैं कि आखिर तुलसी बार-बार क्यों सूख जाती है। दरअसल इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं, मौसम का प्रभाव, मिट्टी की गुणवत्ता, खाद-पानी का संतुलन और आसपास का वातावरण। यदि इन बातों पर थोड़ी सी सावधानी बरती जाए तो तुलसी लंबे समय तक हरी-भरी और जीवंत बनी रह सकती है।

🌿 धार्मिक / सांस्कृतिक दृष्टि से :-

कुछ लोग मानते हैं कि तुलसी का बार-बार सूखना घर में नकारात्मक ऊर्जा से है और यह अशुभ संकेत होता है। परंतु धार्मिक ग्रंथों में इसे इस रूप में कहीं नहीं बताया गया हैं। तुलसी स्वयं बहुत पवित्र मानी जाती है, और उसका सूखना प्राकृतिक कारणों से ही होता है।

📌 अर्थात :
◆ धार्मिक ग्रंथों में तुलसी का सूखना “अशुभ है” ऐसा प्रत्यक्ष प्रमाण श्लोक/संदर्भ में कही भी नहीं है।
◆ यह लोकपरंपरा और बाद के टीकाकारों की व्याख्या है, जिसने इसे अशुभता से जोड़ दिया है। जबकि यह एक सामान्य घटना है।

🌿 तुलसी के सूखने के प्रमुख कारण :-

🔸 बार बार बदलता मौसम और तापमान :
🔹 15°C से कम या 40°C से ऊपर तापमान में तुलसी कमजोर होकर सूखने लगती है।
🔹 सर्दियों में ठंडी हवा और कोहरे से पत्तियाँ झुलस जाती हैं, वहीं गर्मियों में तेज़ धूप और लू से पौधा मुरझा जाता है।

🔸 मिट्टी की गुणवत्ता :
🔹 बहुत भारी, चिपचिपी या पानी रोकने वाली मिट्टी में जड़ें दम घुटने से सर्दी और बारिश में सड़ जाती हैं।
🔹 बहुत रेतीली मिट्टी में नमी नही टिकती, जिससे पौधा गर्मी में सूख जाता है।

🔸 पानी का असंतुलन :
🔹 तुलसी की जड़े अधिक घनी और पतली होती हैं। अधिक पानी देने पर जड़ सड़न और फफूंद लग जाती है।
🔹 कम पानी मिलने पर पत्तियाँ पीली होकर गिरने लगती हैं।
🔹 गमले में सही ड्रेनेज होल न होने पर पानी ठहर जाता है, जो तुलसी के लिए सबसे खतरनाक है।

🔸 खाद और पोषण :
🔹 पोषक तत्वों की कमी होने पर तुलसी लंबे समय तक नही टिकती है।
🔹 केवल रासायनिक खाद पर निर्भरता भी जड़ों को नुकसान पहुँचा सकती है।
🔹 कच्ची खाद का प्रयोग मिट्टी में कीट उत्पन्न कर देता है।

🔸 जलवायु और वातावरण :
🔹 बहुत छाँव या बंद जगह (जैसे घर के अंदर खिड़की से दूर) में यह टिक नहीं पाती।

🔸 कीट और रोग :
🔹 सफेद मक्खी, एफिड्स और माइट्स जैसे कीट तुलसी को कमजोर कर देते हैं।
🔹 पाउडरी मिल्ड्यू और फफूंद रोग बरसात में ज्यादा दिखाई देते हैं।

🔸गलत गमले का चुनाव :
🔹 स्थान के अनुसार गमला न चुनना। गर्म स्थान पर प्लास्टिक तो नमी वाले स्थान पर सिरेमिक का चुनाव।
🔹 अधिक छोटा या बड़े गमले का चुनाव

✨ क्या करें?

🔹 तुलसी को रोज़ हल्का पानी दें। बरसात और सर्दियों में ज़रूरत कम होती है, इसलिए 5–7 दिन के अंतराल पर ही पानी दें।
🔹 पानी हमेशा तभी दें जब ऊपर की 1 इंच मिट्टी सूखी मिले। ज़्यादा पानी सबसे बड़ा नुकसान करता है। कम टीडीएस का पानी ही प्रयोग करें
🔹 मिट्टी हल्की, भुरभुरी और अच्छी जलनिकासी वाली रखें, ताकि जड़ें स्वस्थ रहें।
🔹 हर 20–30 दिन में थोड़ी जैविक खाद जैसे वर्मी कम्पोस्ट या अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर खाद डालें।
🔹 महीने में 1 बार पत्तियों पर हल्की लिक्विड फर्टिलाइज़र स्प्रे जैविक तरल खाद भी कर सकते हैं।
🔹 तुलसी को धूप ज़रूर दें। धूप कम मिलने से पौधा कमजोर होकर जल्दी सूख जाता है।
🔹 गर्मियों में बहुत तेज़ धूप हो तो दोपहर में हल्की छांव जैसे ग्रीन नेट या पेड़ की छांव दें।
🔹 सर्दियों में तुलसी को ऐसी जगह रखें जहाँ धूप मिले और ठंडी हवा/कोहरे से बचाव हो।
🔹 तुलसी के लिए गमला कम से कम 8–12 इंच का होना चाहिए।
🔹 यदि पौधा सूखने लगे तो नई शाखा से कटिंग लगाकर पुनः रोपाई कर दें। इससे नई तुलसी आसानी से तैयार हो जाती है।

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#तुलसी

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