28/10/2024
क्या है दीपावली पौराणिक महत्व?
भारतीय त्योहारों में दीपावली एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण पर्व है, यह त्योहार युगों-युगों से मनाया जा रहा है। दीपावली से जुड़े कई ऐसे तथ्य हैं जो इतिहास के पन्नों में अपना विशेष स्थान बना चुके हैं। अतः धार्मिक दृष्टि से इस पर्व का अपना ऐतिहासिक महत्व भी है। दीपावली पर्व का पौराणिक महत्व हमें दिवाली की कथाओं में मिलता है:-
सतयुग की कथा-
सर्वप्रथम तो यह दीपावली सतयुग में ही मनाई गई, जब देवताओं और दानवों ने मिलकर समुद्र मंथन किया, इस महाअभियान से- "ऐरावत, चंद्रमा, उच्चैश्रवा, परिजात, वारुणी, रंभा आदि 14 रत्नों के साथ हलाहल विष भी निकला और अमृत घट लिए धन्वंतरि भी प्रकट हुए।" इसी वजह से स्वास्थ्य के आदिदेव धन्वंतरि की जयंती से दीपोत्सव का पांच दिवसीय महापर्व कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी अर्थात धनतेरस से आरम्भ होता है। तत्पश्चात इसी महामंथन से देवी महालक्ष्मी जन्मीं और सारे देवताओं द्वारा उनके स्वागत में प्रथम दीपावली मनाई गई।
त्रेतायुग की कथा-
त्रेतायुग भगवान श्री राम के नाम से अधिक पहचाना जाता है। महा बलशाली रावण को पराजित कर 14 वर्ष वनवास में बिताकर राम के अयोध्या आगमन पर सारी नगरी दीपमल्लिकाओं से सजाई गई और यह पर्व अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक दीप-पर्व बन गया।
द्वापर युग की प्रथम कथा-
द्वापर युग श्री कृष्ण का लीलायुग रहा और दीपावली में दो महत्त्वपूर्ण आयाम और जुड़ गए पहली घटना श्री कृष्ण के बचपन की है। श्री कृष्ण ने इंद्रपूजा का विरोध कर गोवर्धन पूजा का क्रांतिकारी निर्णय क्रियान्वित कर स्थानीय प्राकृतिक सम्पदा के प्रति सामाजिक चेतना का शंखनाद किया और गोवर्धन पूजा के रूप में अन्नकूट की परम्परा बनी। कूट का अर्थ है पहाड़। अन्नकूट अर्थात भोज्य पदार्थों का पहाड़ जैसा ढेर अर्थात उनकी प्रचुरता से उपलब्धता। वैसे भी कृष्ण-बलराम कृषि के देवता हैं। उनकी चलाई गई अन्नकूट परम्परा आज भी दीपावली उत्सव का अंग है। यह पर्व प्रायः दीपावली के दूसरे दिन प्रतिपदा को मनाया जाता है।
द्वापर युग की द्वितीय कथा-
दूसरी घटना श्री कृष्ण के विवाहोपरांत की है। नरकासुर नामक राक्षस का वध एवं अपनी प्रिया सत्यभामा के लिए पारिजात वृक्ष लाने की घटना दीपोत्सव के एक दिन पूर्व अर्थात रूप चतुर्दशी से जुड़ी है। इसी वजह से इसे नरक चतुर्दशी भी कहा जाता है। अमावस्या के तीसरे दिन भाईदूज को इन्हीं श्री कृष्ण ने अपनी बहिन द्रौपदी के आमंत्रण पर भोजन करना स्वीकार किया और बहन ने जब भाई से पूछा- क्या बनाऊं? क्या जीमोगे? तो जानते हो, कृष्ण ने मुस्कराकर क्या कहा? बहन कल ही अन्नकूट में ढेरों पकवान खा-खाकर पेट भारी हो चला है इसलिए आज तो मैं केवल खिचड़ी खाऊंगा।समस्त संसार के स्वामी श्री कृष्ण ने यही तो संदेश दिया था कि- "तृप्ति भोजन से नहीं, भावों से होती है। प्रेम पकवान से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। दीपावली के इस शुभ अवसर पर मैं आपको आपके जीवन में सफलता, सौभाग्य, और खुशियाँ प्राप्त होने की शुभकामनाएं देता हूँ यह त्योहार आपके जीवन में प्रकाश और खुशियों की बारिश लेकर आए दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं।