18/08/2025
💔 “खून से मेरा चेहरा ढक गया था, मेरे बाल जल रहे थे… और वही आग मेरी एकमात्र रौशनी थी।”
ग़ज़ा की 19 वर्षीय तस्नीम की यह फुसफुसाहट सुनकर रूह काँप उठती है।
तस्नीम कभी किताबों में खोई रहने वाली एक आम छात्रा थी। तवजीही (फ़लस्तीन की हाई स्कूल परीक्षा) की तैयारी कर रही थी, स्कॉलरशिप और यूनिवर्सिटी उसके सपनों में थीं। लेकिन 10 अक्टूबर 2023 की रात 2:30 बजे बानी सुहैला में बमबारी ने उसकी दुनिया उजाड़ दी।
उसकी बहन हदील की मौत हो गई, उसके पिता अदली बरका अगले ही हमले में शहीद हो गए। और तस्नीम की आँखों की रौशनी भी लपटों में समा गई।
🚨 एक आँख हमेशा के लिए चली गई, दूसरी आँख भी हर दिन बुझती जा रही है।
⚠️ ग़ज़ा के शिक्षा मंत्रालय के मुताबिक़ अब तक:
15,553 स्कूल छात्र शहीद हो चुके हैं।
1,111 यूनिवर्सिटी छात्र अपनी जान गंवा चुके हैं।
25 हज़ार से अधिक छात्र घायल, हज़ारों स्थायी रूप से अपंग हो गए।
फिर भी तस्नीम ने हार नहीं मानी।
हर बार विस्थापन में – बानी सुहैला से रफ़ाह और फिर देर अल-बला – उसने अपनी किताबें सीने से लगाकर साथ उठाईं।
डॉक्टरों ने कहा कि पढ़ने से उसकी आँखें और बिगड़ सकती हैं। लेकिन तस्नीम ने जवाब दिया –
📖 “मेरी किताबें ही मेरी आख़िरी उम्मीद हैं।”
आज तस्नीम एक टेंट में रहती है। दर्द, अंधेरा और ग़म उसका पीछा नहीं छोड़ते। लेकिन उसके हाथों में अब भी किताबें हैं।
क्योंकि किताबें उसके लिए सिर्फ़ इंक और पेपर नहीं – बल्कि मलबे के बीच ज़िंदगी से लड़ने का एलान हैं।
🌍 तस्नीम की पुकार है:
“जंग ख़त्म हो। हम भी जीना चाहते हैं, पढ़ना चाहते हैं। मेरी आँखें मत छीनो – यह मेरी पूरी ज़िंदगी हैं।”