15/04/2026
नरसिंहपुर के बेटे और उनकी माँ इस सराहनीय कार्य के लिए सभी को साधुवाद इंसानियत का दीया
एक बुजुर्ग माँ और समाज का धर्म
✍️समीर खान, नरसिंहपुर.
📓दुनिया जिसे तरक्की कहती है, कभी-कभी वही इंसान के काल का कारण बन जाती है। मध्यप्रदेश के नरसिंहपुर जिले से एक ऐसी ही हृदय विदारक खबर आई, जिसने आधुनिकता के शोर और मानवीय संवेदनाओं के बीच के द्वंद्व को उजागर कर दिया। नरसिंहपुर के पूर्व पार्षद सूरज साहू एक ऐसा नाम जो मिलनसारिता और सेवा के पर्याय थे, वह आज हमारे बीच नहीं रहे। विडंबना देखिए कि जिस शोर-शराबे (डीजे) को हम खुशी का प्रतीक मानते हैं, उसी के दुष्प्रभाव ने 1 अप्रैल 2026 को इस कर्मठ युवा के हृदय की गति रोक दी। सूरज चले गए, और पीछे छोड़ गए अपनी 75 वर्षीय वृद्ध माँ, श्रीमती मुन्नी बाई को। मुन्नी बाई के जीवन की सांध्यबेला अब अंधेरी कोठरी के समान हो गई है। दो वर्ष पूर्व ही छोटे बेटे कृष्णकांत को नियति ने छीन लिया था, और अब सूरज भी डूब गया। आज वह बुजुर्ग माँ एक किराए के मकान में अकेलेपन और अभावों से जूझ रही हैं। सहारा के नाम पर उनके पास केवल एक सरकारी वृद्धावस्था पेंशन है, जो आज के समय में ऊँट के मुँह में जीरा के समान है। कहते हैं कि जब उम्मीद की आख़िरी लौ बुझने लगती है, तब समाज का सामूहिक हृदय ही प्रकाश बनकर उभरता है और इसी रौशनी से जगमगाते माँ कर्मा के वंशजों ने इस बार केवल उपदेश नहीं दिए, बल्कि धर्म के सच्चे मर्म को जीकर दिखाया। नरसिंहपुर के साहू समाज के युवाओं ने जब मुन्नी बाई की दयनीय स्थिति देखी, तो उनके भीतर की मानवता जाग उठी। उन्होंने संकल्प लिया कि इस बूढ़ी माँ को बेसहारा नहीं होने देंगे। इंसानियत का यह जज्बा किसी आंदोलन से कम न था। युवाओं ने स्वजातीय बंधुओं से संपर्क साधा और देखते ही देखते 35,915 रुपये की राशि एकत्रित कर ली। बीते मंगलवार को जब समाज के इन बेटों ने यह राशि मुन्नी बाई के कांपते हाथों में सौंपी, तो वह केवल कागजी नोट नहीं थे, बल्कि वह विश्वास था जो कहता है कि इंसान अभी जिंदा है। साहू समाज का यह कार्य हमें संदेश देता है कि सामूहिक शक्ति की छोटी-छोटी बूंदों से घड़ा भरता है। समाज का हर व्यक्ति यदि थोड़ा योगदान दे, तो किसी का जीवन बच सकता है। धर्म केवल मंदिरों मस्जिदों में नहीं, बल्कि मुन्नी बाई जैसी बेसहारा माताओं की सेवा में बसता है। सूरज साहू तो लौटकर नहीं आएंगे, लेकिन उनके समाज ने यह सुनिश्चित किया है कि उनकी माँ की आँखों में अब बेबसी के आँसू न हों। यह राशि भले ही एक आर्थिक मदद हो, लेकिन इसके पीछे का जज्बा करोड़ों की संपत्ति से भी बड़ा है।
इंसानियत की यह मशाल जलती रहे, तभी हम खुद को सभ्य समाज कहने के अधिकारी हैं।
🙏नरसिंहपुर के साहू समाज को उनकी इस संवेदनशीलता के लिए कोटि-कोटि नमन🙏