28/12/2025
"Jainaagam" 💥 सोनगढ़ के आज सुबह 28.12.2025 पूज्य गुरुदेवश्री कानजी स्वामी का 'नाटक समयसार' पर CD प्रवचन का सारांश दिया गया है:
🔥 *श्री नाटक समयसार (प्रवचन नं. 102) - सम्पूर्ण सारांश*
🍁१. *आत्मा अनुभव की विधि (आरंभिक चरण)*
👉 • *शरीर से भिन्नता:* आत्मा का अनुभव करने की पहली विधि यह है कि दृष्टि को शरीर से भिन्न करना चाहिए। सर्वप्रथम स्थूल (औदारिक) शरीर से, और फिर अंदर के सूक्ष्म शरीरों (*तेजस और कार्मण*) से भी आत्मा को जुदा मानना चाहिए।
👉 • *सुबुद्धि का विलास:* आठ कर्मों की उपाधि और उनसे होने वाले भावों से भी आत्मा भिन्न है। यहाँ तक कि जो बुद्धि की चतुराई या पुण्य-पाप के विकल्प हैं (जिसे 'सुबुद्धि का विलास' कहा गया है), उन्हें भी अपने स्वरूप से भिन्न जानना चाहिए।
👉 • *अखंड प्रभु:* इन सब भेदों से पार, अंदर *'प्रभु चेतन बिराजत अखंड रूप'* है। शुभ ज्ञान के प्रमाण से उसी का विचार करके उसी में मग्न हो जाना—यही धर्म की और सम्यक दर्शन पाने की विधि है।
🍁 *२. गुरु और स्वावलंबन ("तू तारा था")*
👉 • *स्वयं का गुरु:* जगत में कोई किसी का कार्य नहीं कर सकता। गुरुदेवश्री कहते हैं—*"तू तारा था"* अर्थात *"तू स्वयं अपना गुरु था।"* जब जीव अपनी अंदर की समझ से आत्मा को पकड़ता है, तब वह स्वयं गुरु बनता है; बाहरी गुरु तो मात्र व्यवहार हैं।
👉 • *जग का साक्षी:* "तेरे घट में जग बसे, ताने तेरो राज"—ज्ञानी के ज्ञान में पूरा जगत झलकता है, परंतु वह जगत का कर्ता नहीं है। पर-द्रव्य की हार-जीत से उसका कोई सम्बन्ध नहीं है।
🍁 *३. ज्ञानी की दृष्टि: 'मैं कर्ता नहीं'*
👉 • *अबंध स्वरूप:* ज्ञानी वस्तु-व्यवस्था को जानता है। वह जानता है कि *"मैं कर्म-बंध का कर्ता नहीं हूँ"* (Karm bandh ko kartar nahi)। वह अपने को 'अबंध स्वरूप प्रभु' अनुभव करता है।
👉 • *भेद-विज्ञान की क्रिया:* ज्ञानी की मुख्य क्रिया 'भेद-विज्ञान' है। वह पुद्गल कर्म और अपने आत्मिक धर्म को बिल्कुल *'निराला'* (अलग) मानता है। संसार का मूल कारण 'अशुद्ध राग भाव' है, जिसका नाश 'शुद्ध अनुभव' से होता है।
🍁 *४. दृष्टांत: महाबलवान पुरुष और वृक्ष (The Verse)*
👉 • *दोहा:* प्रवचन में एक महत्वपूर्ण छंद आता है: "जैसे कोऊ मानुस अजान महाबलवान, खोदी मूल वृक्ष को उखारे गही बांह सो।"
👉 • *सिद्धांत:* जैसे कोई अनजान किन्तु *महाबलवान पुरुष* वृक्ष को ऊपर-ऊपर से (पत्ते/टहनियां) नहीं काटता, बल्कि उसे *'जड़-मूल'* से खोदकर, अपनी भुजाओं के बल से पूरा उखाड़ फेंकता है, वैसा ही पराक्रम ज्ञानी का है।
👉 • *जड़ पर वार:* ज्ञानी कर्म रूपी *'विष-वृक्ष'* (Vish-Vriksh) के पत्ते नहीं तोड़ता, बल्कि भेद-विज्ञान के बल से *'मोह' (अज्ञान)* रूपी मूल जड़ को उखाड़ देता है।
🍁 *५. सूर्य और अंधकार (केवलज्ञान का उदय)*
👉 • *सविता (सूर्य):* जैसे *सूर्य* के उगते ही अंधकार को भगाना नहीं पड़ता, वह स्वयं नष्ट हो जाता है; वैसे ही जब अंतर में भेद-विज्ञान और मतिज्ञान की निर्मलता होती है, तो मोह का अंधकार मिट जाता है।
👉 • *केवलज्ञान:* *"जगे ज्योति केवल प्रधान"*—जब स्वरूप की एकाग्रता सधती है, तो केवलज्ञान रूपी सूर्य प्रकाशमान होता है, जिसमें एक समय में लोकालोक झलकता है।
🍁 *६. धर्म का वेग और एकाग्रता*
👉 • *मूसलाधार बारिश:* एक बार आत्मा की दशा प्रगट हो जाए, तो *"धर्म का उदय रोके न।"* जैसे मूसलाधार बारिश को कोई रोक नहीं सकता, वैसे ही मोक्ष मार्ग में बढ़ा हुआ जीव रुकता नहीं है। वह "पुद्गल माही लुके ना" (शरीर में छुपता नहीं), वह मोक्ष लेकर ही रहता है।
👉 • *चक्रवर्ती का दृष्टांत:* जैसे चक्रवर्ती राजा भोजन करते समय ६ खंड का राज-काज भूलकर केवल स्वाद में तन्मय हो जाता है, वैसे ही ज्ञानी स्वरूप के अनुभव में तन्मय होकर विकल्पों को भूल जाता है।
🍁 *७. सिद्ध और निगोद (भिन्नता का सिद्धांत)*
👉 • *सह-अस्तित्व:* सिद्धशिला पर जहाँ *सिद्ध भगवान* हैं, वहीं अनंत *निगोद के जीव* और कर्म वर्गणाएं भी ठसाठस भरी हैं। फिर भी, सिद्ध भगवान को कर्म का बंध नहीं होता।
👉 • *सिद्धांत:* एक ही क्षेत्र में रहने पर भी आत्मा और कर्म का स्वभाव अत्यंत भिन्न है। वे एक-दूसरे को स्पर्श नहीं करते।
🍁 *८. सम्यक दर्शन और ४ पुरुषार्थ (निष्कर्ष)*
👉 • *परिभाषा:* *राग, द्वेष और मोह का अभाव* ही सम्यक दर्शन है। जब तक जीव मानता है कि "मैं पर का कुछ कर सकता हूँ," तब तक सम्यक दर्शन नहीं होता।
👉 • *मुनिराज की दशा:* मुनिराज (साधु) 'प्रमाद' (लापरवाही) से रहित होकर सावधान चलते हैं, इसलिए हिंसा होने पर भी उन्हें बंध नहीं होता। बंध का कारण 'अशुद्ध उपयोग' (राग भाव) है, न कि बाह्य क्रिया।
👉 • *फल:* सम्यक दर्शन ही *'धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष'*—इन चारों पुरुषार्थों का दाता है। यह आत्मा की सच्ची श्रद्धा है। विपरीत मान्यता (कि मैंने दया पाली, मैंने मारा) ही अज्ञान है, जिसे छोड़ना चाहिए।