"Jainaagam"

"Jainaagam" श्री सम्यक दर्शन-ज्ञान-चारित्राय नमः
देव शास्त्र गुरु के सच्चे स्वरूप को मानना व उनका ही प्रचार करना

"Jainaagam" 🙏 श्री शान्तिनाथ भगवान के  ज्ञान कल्याणक महामहोत्सव की  शुभकामनाएं - पौष शुक्ल दशमी  - 29 दिसम्बर 2025
28/12/2025

"Jainaagam" 🙏 श्री शान्तिनाथ भगवान के ज्ञान कल्याणक महामहोत्सव की शुभकामनाएं - पौष शुक्ल दशमी - 29 दिसम्बर 2025

28/12/2025

"Jainaagam" ♦️ क्रिसमस - करोड़ो अंडों का उपयोग केक
बनाने के लिए किया जाता हैं , शराब की पार्टी
और मूक पशुओं का माँस भोजन के रूप में
♦️ क्या आप इसे तब भी शांतिदूत कहे जाने
वाले के जन्मदिवस के रूप मनाये जाने वाले दिन
के रूप में स्वीकार करते हैं
♦️ इतनी हिंसा वो भी किसी शांतिदूत के जन्म
के दिन में....जबकि वो शांतिदूत भी इन सब
का सेवन करते हो
♦️ विचारना , सही और अच्छा लगे तो सब
को भेजना , न की इसकी बधाई देना

"Jainaagam" 💥 सोनगढ़ के आज सुबह 28.12.2025 पूज्य गुरुदेवश्री कानजी स्वामी का  'नाटक समयसार' पर CD प्रवचन का सारांश दिया ...
28/12/2025

"Jainaagam" 💥 सोनगढ़ के आज सुबह 28.12.2025 पूज्य गुरुदेवश्री कानजी स्वामी का 'नाटक समयसार' पर CD प्रवचन का सारांश दिया गया है:

🔥 *श्री नाटक समयसार (प्रवचन नं. 102) - सम्पूर्ण सारांश*

🍁१. *आत्मा अनुभव की विधि (आरंभिक चरण)*

👉 • *शरीर से भिन्नता:* आत्मा का अनुभव करने की पहली विधि यह है कि दृष्टि को शरीर से भिन्न करना चाहिए। सर्वप्रथम स्थूल (औदारिक) शरीर से, और फिर अंदर के सूक्ष्म शरीरों (*तेजस और कार्मण*) से भी आत्मा को जुदा मानना चाहिए।

👉 • *सुबुद्धि का विलास:* आठ कर्मों की उपाधि और उनसे होने वाले भावों से भी आत्मा भिन्न है। यहाँ तक कि जो बुद्धि की चतुराई या पुण्य-पाप के विकल्प हैं (जिसे 'सुबुद्धि का विलास' कहा गया है), उन्हें भी अपने स्वरूप से भिन्न जानना चाहिए।

👉 • *अखंड प्रभु:* इन सब भेदों से पार, अंदर *'प्रभु चेतन बिराजत अखंड रूप'* है। शुभ ज्ञान के प्रमाण से उसी का विचार करके उसी में मग्न हो जाना—यही धर्म की और सम्यक दर्शन पाने की विधि है।

🍁 *२. गुरु और स्वावलंबन ("तू तारा था")*

👉 • *स्वयं का गुरु:* जगत में कोई किसी का कार्य नहीं कर सकता। गुरुदेवश्री कहते हैं—*"तू तारा था"* अर्थात *"तू स्वयं अपना गुरु था।"* जब जीव अपनी अंदर की समझ से आत्मा को पकड़ता है, तब वह स्वयं गुरु बनता है; बाहरी गुरु तो मात्र व्यवहार हैं।

👉 • *जग का साक्षी:* "तेरे घट में जग बसे, ताने तेरो राज"—ज्ञानी के ज्ञान में पूरा जगत झलकता है, परंतु वह जगत का कर्ता नहीं है। पर-द्रव्य की हार-जीत से उसका कोई सम्बन्ध नहीं है।

🍁 *३. ज्ञानी की दृष्टि: 'मैं कर्ता नहीं'*

👉 • *अबंध स्वरूप:* ज्ञानी वस्तु-व्यवस्था को जानता है। वह जानता है कि *"मैं कर्म-बंध का कर्ता नहीं हूँ"* (Karm bandh ko kartar nahi)। वह अपने को 'अबंध स्वरूप प्रभु' अनुभव करता है।

👉 • *भेद-विज्ञान की क्रिया:* ज्ञानी की मुख्य क्रिया 'भेद-विज्ञान' है। वह पुद्गल कर्म और अपने आत्मिक धर्म को बिल्कुल *'निराला'* (अलग) मानता है। संसार का मूल कारण 'अशुद्ध राग भाव' है, जिसका नाश 'शुद्ध अनुभव' से होता है।

🍁 *४. दृष्टांत: महाबलवान पुरुष और वृक्ष (The Verse)*

👉 • *दोहा:* प्रवचन में एक महत्वपूर्ण छंद आता है: "जैसे कोऊ मानुस अजान महाबलवान, खोदी मूल वृक्ष को उखारे गही बांह सो।"

👉 • *सिद्धांत:* जैसे कोई अनजान किन्तु *महाबलवान पुरुष* वृक्ष को ऊपर-ऊपर से (पत्ते/टहनियां) नहीं काटता, बल्कि उसे *'जड़-मूल'* से खोदकर, अपनी भुजाओं के बल से पूरा उखाड़ फेंकता है, वैसा ही पराक्रम ज्ञानी का है।

👉 • *जड़ पर वार:* ज्ञानी कर्म रूपी *'विष-वृक्ष'* (Vish-Vriksh) के पत्ते नहीं तोड़ता, बल्कि भेद-विज्ञान के बल से *'मोह' (अज्ञान)* रूपी मूल जड़ को उखाड़ देता है।

🍁 *५. सूर्य और अंधकार (केवलज्ञान का उदय)*

👉 • *सविता (सूर्य):* जैसे *सूर्य* के उगते ही अंधकार को भगाना नहीं पड़ता, वह स्वयं नष्ट हो जाता है; वैसे ही जब अंतर में भेद-विज्ञान और मतिज्ञान की निर्मलता होती है, तो मोह का अंधकार मिट जाता है।

👉 • *केवलज्ञान:* *"जगे ज्योति केवल प्रधान"*—जब स्वरूप की एकाग्रता सधती है, तो केवलज्ञान रूपी सूर्य प्रकाशमान होता है, जिसमें एक समय में लोकालोक झलकता है।

🍁 *६. धर्म का वेग और एकाग्रता*

👉 • *मूसलाधार बारिश:* एक बार आत्मा की दशा प्रगट हो जाए, तो *"धर्म का उदय रोके न।"* जैसे मूसलाधार बारिश को कोई रोक नहीं सकता, वैसे ही मोक्ष मार्ग में बढ़ा हुआ जीव रुकता नहीं है। वह "पुद्गल माही लुके ना" (शरीर में छुपता नहीं), वह मोक्ष लेकर ही रहता है।

👉 • *चक्रवर्ती का दृष्टांत:* जैसे चक्रवर्ती राजा भोजन करते समय ६ खंड का राज-काज भूलकर केवल स्वाद में तन्मय हो जाता है, वैसे ही ज्ञानी स्वरूप के अनुभव में तन्मय होकर विकल्पों को भूल जाता है।

🍁 *७. सिद्ध और निगोद (भिन्नता का सिद्धांत)*

👉 • *सह-अस्तित्व:* सिद्धशिला पर जहाँ *सिद्ध भगवान* हैं, वहीं अनंत *निगोद के जीव* और कर्म वर्गणाएं भी ठसाठस भरी हैं। फिर भी, सिद्ध भगवान को कर्म का बंध नहीं होता।

👉 • *सिद्धांत:* एक ही क्षेत्र में रहने पर भी आत्मा और कर्म का स्वभाव अत्यंत भिन्न है। वे एक-दूसरे को स्पर्श नहीं करते।

🍁 *८. सम्यक दर्शन और ४ पुरुषार्थ (निष्कर्ष)*

👉 • *परिभाषा:* *राग, द्वेष और मोह का अभाव* ही सम्यक दर्शन है। जब तक जीव मानता है कि "मैं पर का कुछ कर सकता हूँ," तब तक सम्यक दर्शन नहीं होता।

👉 • *मुनिराज की दशा:* मुनिराज (साधु) 'प्रमाद' (लापरवाही) से रहित होकर सावधान चलते हैं, इसलिए हिंसा होने पर भी उन्हें बंध नहीं होता। बंध का कारण 'अशुद्ध उपयोग' (राग भाव) है, न कि बाह्य क्रिया।

👉 • *फल:* सम्यक दर्शन ही *'धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष'*—इन चारों पुरुषार्थों का दाता है। यह आत्मा की सच्ची श्रद्धा है। विपरीत मान्यता (कि मैंने दया पाली, मैंने मारा) ही अज्ञान है, जिसे छोड़ना चाहिए।

28/12/2025

"Jainaagam" 🙏 प. पू. गुरुदेवश्री

"Jainaagam" 💥 सोनगढ़ के  27.12.2025 पूज्य गुरुदेवश्री कानजी स्वामी का  'नाटक समयसार' पर CD प्रवचन का सारांश दिया गया है:...
28/12/2025

"Jainaagam" 💥 सोनगढ़ के 27.12.2025 पूज्य गुरुदेवश्री कानजी स्वामी का 'नाटक समयसार' पर CD प्रवचन का सारांश दिया गया है:

🍁 *प्रवचन का मुख्य विषय: भेद ज्ञान और अंतरात्मा*

🍁• *भेद ज्ञान की परिभाषा*: आत्मा आनंद और ज्ञान स्वरूप है। पुण्य-पाप के शुभ-अशुभ विकल्पों (राग) और शरीर से अपने आपको भिन्न अनुभव करना ही 'भेद ज्ञान' है। यही धर्म की पहली सीढ़ी है।

🍁• *अंतरात्मा और बहिरात्मा में अंतर*:
◦ अंतरात्मा: जो जीव अपने शुद्ध, ध्रुव, अनंत आनंद और ज्ञान स्वभाव को दृष्टि में रखकर अनुभव करता है, वह अंतरात्मा (सम्यक दृष्टि) है। वह मानता है कि राग और पुण्य-पाप उसका स्वरूप नहीं हैं।
◦ बहिरात्मा: जो जीव शरीर, वाणी, मन और पुण्य-पाप के भावों (दया, दान, पूजा) को अपना मानता है और सोचता है कि इनसे धर्म होगा, वह बहिरात्मा (मिथ्यादृष्टि) है।

🍁• *सच्चा साधु और धोबी की उपमा*:
◦ प्रवचन में अंतरात्मा को 'धोबी' कहा गया है। जैसे धोबी कपड़े का मैल धोकर साफ़ करता है, वैसे ही भेद ज्ञानी जीव 'भेद ज्ञान' रूपी साबुन से आत्मा के राग-द्वेष रूपी मैल को धो डालता है और अपनी शुद्धता प्रकट करता है।
◦ सम्यक दृष्टि जीव समता रस (वीतरागता) के द्वारा अपने आत्म-वस्त्र को निर्मल करता है।

🍁• *भेद ज्ञान के पाँच प्रमुख दृष्टांत*: गुरुदेवश्री ने आत्मा को शरीर और राग से भिन्न अनुभव करने की प्रक्रिया को समझाने के लिए पाँच उदाहरण दिए हैं:

👉 1. *रजोशोधक (धूल धोने वाला)*: जैसे एक जौहरी धूल (रज) को धोकर उसमें से सोने के कण अलग कर लेता है, वैसे ही ज्ञानी कर्म और शरीर रूपी धूल से भिन्न अपने चैतन्य स्वरूप को पहचान लेता है।
👉 2. *अग्नि (पावक)*: जैसे अग्नि पत्थर (अयस्क) को जलाकर उसमें से शुद्ध सोना (कनक) अलग निकाल लेती है, वैसे ही ज्ञानी अपनी ज्ञान-अग्नि से राग को जलाकर शुद्ध आत्मा का अनुभव करते हैं।
👉 3. *कतक फल (निर्मली)*: जैसे गंदे पानी में कतक फल (फिटकरी जैसा पदार्थ) डालने से मैल नीचे बैठ जाता है और निर्मल जल अलग हो जाता है, वैसे ही भेद ज्ञान से आत्मा राग रूपी मैल को अलग कर देता है।
👉 4. *दधि मंथन (दही बिलोना)*: जैसे दही को मथने वाला छाछ को छोड़कर मक्खन (माखन) निकाल लेता है, वैसे ही ज्ञानी जीव शरीर और विकल्पों को छोड़कर आनंद रूपी मक्खन का अनुभव करता है।
👉 5. *राजहंस*: जैसे राजहंस मिले हुए दूध और पानी में से केवल दूध पी लेता है और पानी छोड़ देता है, वैसे ही धर्मी जीव ज्ञान स्वरूप को ग्रहण करता है और जड़/राग को छोड़ देता है।

🍁• *धर्म का वास्तविक स्वरूप*:
◦ दया, दान, व्रत और भक्ति के परिणाम 'पुण्य' हैं, 'धर्म' नहीं। पुण्य से पवित्रता नहीं आती। धर्म राग के त्याग और शुद्ध आत्मा के अनुभव से होता है।
◦ पैसे खर्च करने से धर्म नहीं होता। पैसा और शरीर जड़ हैं, जबकि आत्मा चेतन है। पैसे से धर्म मानना मिथ्यात्व है।

🍁• *मिथ्यात्व ही सबसे बड़ा पाप*:
◦ अपने निज स्वरूप (सच्चिदानंद) को भूलकर, शरीर और राग की क्रियाओं को "मैं करता हूँ" या "यह मेरा है" मानना ही मिथ्यात्व है और यही संसार का मूल कारण (आस्रव) है।
◦ इस विपरीत मान्यता को छोड़ना और अपने निर्विकल्प निज पद में स्थिर होना ही मोक्ष का मार्ग है।

🍁• *निष्कर्ष*: ज्ञानी जीव जानते हैं कि 'मैं ज्ञान और आनंद का प्रकाश हूँ'। वे 'पर-गुण' (शरीर, राग, पुण्य-पाप) और 'स्व-गुण' (ज्ञान, दर्शन) में भेद करके, पर का त्याग करते हैं और निज स्वरूप में ही लीन रहते हैं|

27/12/2025

🚩 श्री राजगृही जी दि. जैन सिध्ध क्षेत्र

27/12/2025

VC ji

"Jainaagam"💥 सोनगढ़ के 26.12.2025 के प्रवचन में से पूज्य गुरुदेवश्री कांजी स्वामी द्वारा 'नाटक समयसार' पर दिए गए प्रवचन ...
27/12/2025

"Jainaagam"💥 सोनगढ़ के 26.12.2025 के प्रवचन में से पूज्य गुरुदेवश्री कांजी स्वामी द्वारा 'नाटक समयसार' पर दिए गए प्रवचन (नंबर 053) का संक्षिप्त सारांश :

🍁 *प्रवचन का मुख्य सार*: इस प्रवचन का केंद्रीय विषय यह है कि पुण्य (शुभ भाव) और पाप (अशुभ भाव) दोनों ही आत्मा के लिए बंधन हैं। ज्ञानी जीव इन दोनों से भिन्न अपने शुद्ध चैतन्य स्वरूप को पहचानता है।

🍁• *मिथ्यात्व और कर्तापन का भ्रम*: अज्ञानी जीव मानता है कि "मैं पैसेवाला हूँ" या "मैं दुखी हूँ," जबकि यह सब कर्मों का खेल है। इसी प्रकार, दया, दान, व्रत और पूजा जैसी शुभ क्रियाओं में "मैंने किया" या "यह मेरा कर्तव्य है" ऐसा अहंकार करना मिथ्यादृष्टि (अज्ञान) है, क्योंकि आत्मा इन क्रियाओं का कर्ता नहीं है.

🍁• *चांडालिनी के दो पुत्रों का सिद्धांत*: गुरुदेवश्री ने पुण्य और पाप की समानता समझाने के लिए 'चांडालिनी के दो पुत्रों' का उदाहरण दिया। जैसे एक पुत्र ब्राह्मण बन गया (सदाचारी) और दूसरा चांडाल रहा (दुराचारी), लेकिन दोनों की उत्पत्ति (जाति) एक ही है। उसी प्रकार, शुभ भाव (पुण्य) और अशुभ भाव (पाप) दोनों 'विभाव' (अज्ञान/मोह) रूपी माँ के पुत्र हैं और दोनों आत्मा को संसार में फंसाने वाले हैं.

🍁• *सोने और लोहे की बेड़ी*: संसार में भटकाने के लिए पाप 'लोहे की बेड़ी' है और पुण्य 'सोने की बेड़ी' है। ज्ञानी पुरुष जानते हैं कि दोनों बंधन हैं, इसलिए वे पुण्य और पाप दोनों में से किसी की भी अभिलाषा (इच्छा) नहीं करते.

🍁• *अग्नि बनाम शीतल चंद्रमा*: शुभ और अशुभ दोनों भाव 'आकुलता' (बेचैनी) पैदा करने वाले हैं, इसलिए वे 'अग्नि' समान हैं। इसके विपरीत, भगवान आत्मा का स्वभाव शांत और 'शीतल चंद्रमा' जैसा है। ज्ञानी अग्नि (राग) को छोड़कर अपने शीतल स्वरूप की शरण लेते हैं.

🍁• *सच्चा धर्म (वीतराग मार्ग)*: धर्म बाहरी क्रियाओं (जैसे उपवास या यात्रा) में नहीं है, क्योंकि वे राग हैं। सच्चा धर्म तब होता है जब जीव पुण्य-पाप के विकल्पों से अपनी दृष्टि हटाकर अपने 'ज्ञानानंद स्वभाव' (शुद्ध आत्मा) में एकाग्र होता है। यही मोक्ष का मार्ग है.

🍁 निष्कर्ष: ज्ञानी के लिए अमीर होना या गरीब होना, प्रशंसा मिलना या अपमान होना—यह सब 'जड़' (पुद्गल) का खेल है। उनका लक्ष्य केवल अपने ध्रुव, अतीन्द्रिय आनंद स्वरूप आत्मा में लीन होना है|
🙏🏻🙏🏻

26/12/2025

Shri Jainaagam

26/12/2025

"Jainaagam" 🔶 कब मैं अलौकिक वृत्ति धरूँगा : मुनि बनने की भावना : 🔶 बाल ब्र. पं. श्री रवीन्द्र जी 'आत्मन्' द्वारा रचित

26/12/2025

उन्नाव गैंग * pe पीड़िता आज भी संघर्ष मे ं है, और Rope का Gava दोषी राहत में।

यह सिर्फ एक केस नहीं, यह हर बेटी की लड़ाई है।

श्री महावीर स्वामी दिगम्बर जैन परमागम मंदिर : स्वर्णपुरी गुजरात
26/12/2025

श्री महावीर स्वामी दिगम्बर जैन परमागम मंदिर : स्वर्णपुरी गुजरात

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