03/06/2026
CBSE OSM विवाद: अच्छे इरादे, खराब अमल की मिसाल
सीबीएसई ने छात्रों की सुविधा के लिए एक नई व्यवस्था शुरू की थी, ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) यानी डिजिटल मूल्यांकन। उत्तर पुस्तिकाओं को स्कैन करके कंप्यूटर पर चेक करने की यह व्यवस्था अच्छी सोच वाली थी। लेकिन मई 2026 में जब इसे लागू किया गया, तो कई गंभीर समस्याएं सामने आईं। यह विवाद हर मंत्रालय के लिए सबक है अच्छे इरादे भी खराब क्रियान्वयन से उल्टा असर कर सकते हैं।
पुरानी व्यवस्था की समस्या
पहले सीबीएसई हर साल लाखों उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन पूरी तरह हाथ से करता था। इसमें कई दिक्कतें थीं:
देश भर में इतनी सारी पुस्तिकाएं भेजना और वापस लाना बहुत बड़ी लॉजिस्टिक समस्या थी।
परीक्षक सही अंक देते थे, लेकिन जोड़ने में गलती हो जाती थी।
री-इवैल्यूएशन के लिए आवेदन करने पर प्रक्रिया धीमी, कागजी और अपारदर्शी होती थी।
इन समस्याओं को हल करने के लिए CBSE ने डिजिटल मूल्यांकन की ओर कदम बढ़ाया।
OSM प्रणाली क्या है?
OSM में उत्तर पुस्तिकाओं को स्कैन किया जाता है, डिजिटल इमेज बनाई जाती है और परीक्षक कंप्यूटर पर चेक करते हैं। अंक अपने आप जुड़ जाते हैं। इससे लॉजिस्टिक की परेशानी खत्म होती है और जोड़ने की गलतियां नहीं होतीं।
CBSE ने 2014-15 में इसका पायलट प्रोजेक्ट किया था, लेकिन इंफ्रास्ट्रक्चर कमजोर होने से इसे आगे नहीं बढ़ाया गया। 2026 में बेहतर इंटरनेट और क्लाउड सुविधाओं के साथ इसे पूरे देश में लागू करने का फैसला लिया गया। मकसद सही था, छात्रों की जिंदगी आसान बनाना।
मई 2026 में क्या हुआ?
री-इवैल्यूएशन के लिए स्कैन कॉपी मांगने पर छात्रों को बड़ा झटका लगा। कई स्कैन कॉपी में उनके लिखे जवाब नहीं थे। कुछ पेज गायब थे, कुछ दूसरे छात्रों के जवाब दिख रहे थे।
यह बात सोशल मीडिया पर तेजी से फैली। जिन छात्रों का कॉलेज एडमिशन इन्हीं अंकों पर निर्भर था, उनके लिए यह भविष्य का संकट बन गया।
इसके अलावा पोर्टल पर तकनीकी समस्याएं आईं, लॉगिन नहीं हो रहा था, सर्वर डाउन हो रहा था, पेमेंट फेल हो रहा था। स्कैन धुंधली या कटी हुई थीं। एक साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ ने OSM से जुड़े पोर्टल में कमजोरी बताई (हालांकि CBSE ने इसे टेस्ट एनवायरनमेंट बताया)।
असली समस्या कहां थी?
अगस्त 2025 में CBSE ने इस काम के लिए टेंडर जारी किए। पहले दो टेंडर में कोई कंपनी क्वालिफाई नहीं कर पाई। तीसरे टेंडर में शर्तें आसान कर दी गईं:
स्कैन रेजोल्यूशन 300 DPI से घटाकर 200 DPI कर दिया गया।
रोबोटिक स्कैनिंग को अनिवार्य नहीं किया गया।
ठेका सबसे कम बोली लगाने वाली कंपनी Coempt Edu Teck (पहले Globarena Technologies) को मिला, हैदराबाद की यह कंपनी लगभग 24.75 रुपये प्रति उत्तर पुस्तिका पर बोली लगाई। TCS ने 65 रुपये बोली लगाई थी। सरकारी नियम के अनुसार सबसे कम बोली वाले को ठेका देना अनिवार्य है।
CBSE की दो बड़ी गलतियां
वेंडर की क्षमता नहीं चेक की गई, CBSE ने यह नहीं देखा कि यह कंपनी 99 लाख उत्तर पुस्तिकाओं जैसे विशाल काम को संभाल पाएगी या नहीं। आलोचक बताते हैं कि Globarena को 2019 के तेलंगाना इंटरमीडिएट परीक्षा विवाद में जांच का सामना करना पड़ा था।L1 बोली प्रणाली की यह सबसे बड़ी कमजोरी है सरकार को सबसे सस्ती बोली वाले को काम देना पड़ता है, भले ही शक हो कि वह काम नहीं कर पाएगा।
एक साथ पूरे देश में लागू कर दिया, इतना बड़ा बदलाव बिना पायलट प्रोजेक्ट के सीधे पूरे देश में कर दिया गया। बेहतर होता अगर पहले दिल्ली जैसे एक जोन में पायलट किया जाता, सफल होने पर धीरे-धीरे बाकी जगहों पर लागू किया जाता।
मुख्य सबक
डिजिटल मूल्यांकन का विचार गलत नहीं था। यह आगे की सोच वाला कदम था। लेकिन जब लाखों छात्रों का भविष्य दांव पर हो, तो सिर्फ अच्छा विचार काफी नहीं। जरूरत है कड़ी टेस्टिंग, पारदर्शी प्रक्रिया, मजबूत तैयारी और छात्रों का भरोसा जीतने की।
शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की जरूरत नहीं लगती, क्योंकि उनके इरादे गलत नहीं थे।
अब क्या किया जाए?
निर्दोष छात्रों से माफी मांगें।
री-इवैल्यूएशन की प्रक्रिया जल्द से जल्द पूरी करें।
सुनिश्चित करें कि सरकार की इस गलती से किसी छात्र को यूनिवर्सिटी एडमिशन में कोई समस्या न हो।
इस घटना से सीख लेकर भविष्य में ऐसी गलतियां न दोहराएं।