03/04/2020
जब भी मिलता है सुबह शाम
वो बस यही कहता हैं
बाबू! हमें अपने घर पहुँचा दो
बैठे रहतें हैं इंतज़ार में कि गाड़ी आएगी
खाना लाएगी
पाँच पूड़ी जिनके बीच में आलू की बेमसाला सब्ज़ी
वो जाता है गाड़ी तक बेमन से
खीज जाता है भीतर से
सुबह का खाना दोपहर में
और रात का खाना घने अंधेरे में खाते है
हर रोज़ पूड़ी? बाबू जी कभी लाओ ना चावल भात भी
मैं ठहर जाता हूँ ठिठक जाता हूँ
बोलता कुछ नहीं बस बोल देता हूँ
हाँ लाएँगे
गाड़ी आगे बढ़ जाती है
और वो चिल्ला कर कहता है
बाबू जी ! हमें अपने घर पहुँचा दो!
-khaniq
Khan Iqbal