11/06/2026
😎 देखो भाई, सीधा सीन ये है कि MSCI (Morgan Stanley Capital International) की टॉप लिस्ट, चाहे वो ग्लोबल ऑल कंट्री वर्ल्ड इंडेक्स (ACWI) हो या फिर इमर्जिंग मार्केट्स (EM) का टॉप-10/50 का ब्रैकेट, उसमें से इंडिया की पब्लिक का बाहर होना कोई छोटा-मोटा लोचा नहीं है। इसका सीधा मतलब ये है कि दुनिया भर के जो बड़े-बड़े फिरंगी इन्वेस्टर्स (FIIs) हैं, वो इस वक्त "थीमैटिक पैसा" फेंक रहे हैं, और उनका सबसे बड़ा नशा बन चुका है AI और सेमीकंडक्टर चिप्स। अपने इंडिया के शेर जैसे Reliance Industries (जो खिसक कर 109वें स्पॉट पर आ गया है) या HDFC Bank और Bharti Airtel, ये सब डोमेस्टिक इकॉनमी, बैंकिंग और टेलीकॉम के दम पर भौकाल मचाते हैं। लेकिन ग्लोबल मार्केट में इस समय तबाही सिर्फ वो मचा रहा है जो AI की वेव पर तैर रहा है। ताइवान की TSMC (अकेले 1.85 ट्रिलियन डॉलर से ऊपर) और साउथ कोरिया की Samsung या SK Hynix जैसी चिप बनाने वाली हैवीवेट कंपनियों ने पूरे मार्केट का वॉल्यूम और लिक्विडिटी अपनी तरफ खींच लिया है। अपना सीन ये है कि अपन तगड़े तो हैं, पर ग्लोबल इन्वेस्टर्स के लिए इस वक्त "AI का कोई डायरेक्ट पत्ता" अपने पास नहीं है, जिसकी वजह से अपना वेटेज MSCI EM इंडेक्स में गिरकर करीब 10.87% के 6 साल के लो पर आ चुका है।
अब पब्लिक सोचेगी कि क्या अपना मार्केट एकदम ठप हो गया? तो सुनो बॉस, ऐसा बिल्कुल नहीं है, ये गेम पूरी तरह "फ्री-फ्लोट मार्केट कैपिटलाइजेशन" और ग्लोबल ट्रेंड्स का है। ताइवान का पूरा इंडेक्स उठाकर देखोगे तो उसमें लगभग 88% हिस्सा सिर्फ आईटी और टेक का है, और अकेले TSMC उनके इंडेक्स का 57% दबाकर बैठी है। अपने इंडिया का मार्केट एकदम फैला हुआ (Diversified) है, जहाँ बैंकिंग 29% है, बाकी कंजम्पशन और रिलायंस जैसे धंधे हैं। यहाँ कोई एक कंपनी पूरे देश का मार्केट अकेले सिर पर लेकर नहीं घूमती, जो कि लॉन्ग-टर्म के लिए सेफ गेम है। लेकिन शॉर्ट-टर्म में सीन ये हुआ है कि साल 2026 की शुरुआत से विदेशी मालदारों (FIIs) ने इंडियन मार्केट से लगभग 26.4 बिलियन डॉलर का तगड़ा माल बाहर निकाला है। वजह? उन्हें लग रहा है कि इंडिया के जो आईटी सर्विस वाले बड़े भाई लोग हैं (जैसे TCS, Infosys), वो AI के आने से कहीं पीछे न छूट जाएं, इसलिए टेक क्रैश के डर से उन्होंने वहां से 36% से ज्यादा पैसा निकाल लिया और उसे ले जाकर ताइवान और कोरिया के चिपमेकर्स के गल्ले में डाल दिया😂। इसके ऊपर से जो यूएस-इजरायल और ईरान का कट्टा-बैर चल रहा है, उससे क्रूड ऑयल महंगा हुआ और इंडिया जैसी 90% एनर्जी इम्पोर्ट करने वाली कंट्री की हवा थोड़ी टाइट हो गई, जिससे GDP ग्रोथ का फोरकास्ट भी 7% के नीचे आ गया।
तो पब्लिक बात की गहराई ये है कि इंडिया की बड़ी कंपनियों का लिस्ट में न होना हमारी औकात कम होना नहीं, बल्कि हमारे धंधे का तरीका अलग होना दर्शाता है। हम एक "डोमेस्टिक-ड्रिवन और स्ट्रक्चरल ग्रोथ" की कहानी हैं, जो धीरे-धीरे मज़बूती से बढ़ती है, जबकि दुनिया इस वक्त AI के सट्टे और मोमेंटम ट्रेड में अंधी हो रखी है। मोतीलाल ओसवाल और मॉर्गन स्टेनली के बड़े शातिर लोग भी यही बोल रहे हैं कि हम इस वक्त "ग्लोबल पार्टी" का हिस्सा नहीं हैं क्योंकि हमारे पास Nvidia की टक्कर का या ChatGPT जैसा कोई तगड़ा मॉडल नहीं है और न ही हम चिप्स बनाते हैं। लेकिन जैसे ही ये AI का गुब्बारा थोड़ा शांत होगा और दुनिया को वापस ग्राउंड रियलिटी समझ आएगी, तो इंडिया का जो मजबूत मैन्युफैक्चरिंग और लेबर प्रोडक्टिविटी का बेस है, वो वापस फिरंगियों को खींच लाएगा। अभी के लिए ताइवान और साउथ कोरिया मार्केट वैल्यू में हमसे आगे निकलकर $5 ट्रिलियन का क्लब छू चुके हैं और हमारा NSE खिसक कर 7वें नंबर पर आ गया है, पर ये सिर्फ एक फेज है। जब लिक्विडिटी का ये तूफान थमेगा, तब समझ आएगा कि असली फंडामेंटल किसके पास हैं और लंबी रेस का घोड़ा कौन है।😂