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“मुझे देखो, कहां खून निकला है? न तो मेरे हाथ टूटे हैं, न पैर... मेरा बेटा ही मेरे लिए सब कुछ है। गलती मेरी थी कि मैंने उ...
13/08/2026

“मुझे देखो, कहां खून निकला है? न तो मेरे हाथ टूटे हैं, न पैर... मेरा बेटा ही मेरे लिए सब कुछ है। गलती मेरी थी कि मैंने उसके पैसे खर्च कर दिए। वह जैसा भी है, मेरा बेटा है।”

सरेराह बेटे की बेरहमी का शिकार हुई 75 वर्षीय बुजुर्ग मां की ये पंक्तियां ममता और बेबसी की वो दास्तान हैं, जो हर किसी को सोचने पर मजबूर कर देती हैं।

8 अगस्त को जबलपुर के रांझी इलाके में बेटे द्वारा मां को बाल पकड़कर घसीटने और थप्पड़ मारने का वीडियो वायरल हुआ था। इसके बाद जब पुलिस आरोपी बेटे को पकड़ने पहुंची तो बुजुर्ग मां खुद थाने पहुंच गईं और पुलिस के सामने हाथ जोड़कर बेटे पर कार्रवाई न करने की गुहार लगाने लगीं।

2 हजार रुपए खर्च होने पर हुआ था विवाद

रांझी की अशोक बिहार कॉलोनी में रहने वाली मित्रा विश्वकर्मा (75) अपने दो बेटों प्रमोद और राजू के साथ रहती हैं। बेटा राजू धार्मिक आयोजनों (रामायण पाठ) में जाकर काम करता है। उसने मां को संभालकर रखने के लिए करीब 6,000 रुपए दिए थे।

बुजुर्ग मित्रा अपने ससुराल चली गई थीं, जहां बस के किराए और मोबाइल रिचार्ज में 2,000 रुपए खर्च हो गए। शनिवार को जब वह घर लौटीं तो पैसे खर्च होने की बात पर बेटा राजू आपा खो बैठा और उसने सड़क पर ही मां के साथ मारपीट शुरू कर दी।

थाने पहुंची बुजुर्ग मां मित्रा विश्वकर्मा ने पुलिस को बताया कि यह उनके बेटे को फंसाने और उनका मकान हड़पने की साजिश है। मित्रा के मुताबिक, पड़ोस के कुछ लोग चाहते हैं कि हम घर खाली कर भाग जाएं। 15 साल से परेशान किया जा रहा है। वीडियो बनाकर वायरल किया गया, ताकि राजू जेल चला जाए। राजू ने बस मेरी साड़ी पकड़कर खींची थी, उसने मुझे नहीं मारा। मैं उसके खिलाफ कोई एफआईआर या बयान नहीं दूंगी। मां ने यह भी बताया कि पिछले साल ठंड के मौसम में भी पड़ोसियों ने शिकायत कर दी थी, तब वे अपने बेटे को बचाने के लिए रात भर थाने में बैठी रही थीं।

टीआई बोले- महिला बेटे को बचाने के लिए बयान नहीं दे रही

रांझी थाना प्रभारी उमेश गोल्हानी ने बताया कि वायरल वीडियो को बेहद गंभीरता से लेते हुए पुलिस टीम जांच में जुटी थी। सोमवार को बुजुर्ग महिला थाने आईं और स्पष्ट कह दिया कि वे अपने बेटे पर कोई कार्रवाई नहीं चाहतीं। पुलिस ने उन्हें कार्रवाई के लिए मनाने और शिकायत दर्ज कराने की काफी कोशिश की, लेकिन उन्होंने बयान देने से साफ इनकार कर दिया।

फिलहाल, पुलिस ने महिला की बातें रिकॉर्ड में ले ली हैं, लेकिन बुजुर्ग से सार्वजनिक रूप से मारपीट को गलत मानते हुए आरोपी बेटे राजू की तलाश जारी रखी है

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स्कोल्ड्स ब्राइडल' (Scold's Bridle) की है, जिसे 'गॉसिप्स ब्राइडल' (Gossip's Bridle) या हिंदी में 'कलहकार की लगाम' भी कहा...
17/04/2026

स्कोल्ड्स ब्राइडल' (Scold's Bridle) की है, जिसे 'गॉसिप्स ब्राइडल' (Gossip's Bridle) या हिंदी में 'कलहकार की लगाम' भी कहा जा सकता है। यह 16वीं और 17वीं शताब्दी के दौरान इंग्लैंड, स्कॉटलैंड और यूरोप के कुछ हिस्सों में सजा देने का एक क्रूर उपकरण था।
​यहाँ इसके बारे में विस्तार से जानकारी दी गई है:
​1. यह क्या था?
​यह लोहे का बना एक पिंजरे जैसा मुखौटा होता था जिसे सिर पर पहनाया जाता था। इसमें लोहे की एक पट्टी (Curb-plate) होती थी जो मुँह के अंदर जीभ के ऊपर रखी जाती थी।
​2. यह सजा किसे और क्यों दी जाती थी?
​लक्षित समूह: यह सजा मुख्य रूप से महिलाओं के लिए थी।
​कारण: उन महिलाओं को यह पहनाया जाता था जिन्हें समाज "कलहकारी" (Scolds), बहुत ज्यादा बोलने वाली, चुगली करने वाली या अपने पति/अधिकारियों से बहस करने वाली मानता था।
​मौन रहने की सजा: मुँह के अंदर की लोहे की पट्टी जीभ को दबा देती थी, जिससे महिला के लिए बोलना असंभव हो जाता था। कुछ पट्टियों में नुकीले कांटे भी होते थे, जिससे अगर महिला बोलने की कोशिश करती, तो उसकी जीभ कट जाती थी।
​3. सामाजिक अपमान (Public Humiliation)
​यह केवल शारीरिक दर्द के लिए नहीं, बल्कि मानसिक प्रताड़ना और सार्वजनिक अपमान के लिए इस्तेमाल किया जाता था:
​तस्वीर में आप मुखौटे के ऊपर एक घंटी (Bell) देख सकते हैं। जब महिला को यह पहनाकर सड़क पर घुमाया जाता था, तो घंटी बजती थी जिससे आसपास के लोगों का ध्यान उसकी ओर आकर्षित हो और वे उसका मजाक उड़ा सकें।
​अक्सर महिला का पति या कोई अधिकारी उसे जंजीर से बांधकर पूरे शहर में घुमाता था।
​4. इसका बनावट और प्रतीक
​भयानक चेहरा: कई मुखौटों को जानवरों या डरावने चेहरों जैसा बनाया जाता था (जैसा कि आप फोटो में देख सकते हैं) ताकि पहनने वाली महिला 'राक्षसी' या 'अजीब' दिखे।
​नियंत्रण का प्रतीक: यह उस समय के पितृसत्तात्मक समाज का प्रतीक था, जहाँ महिलाओं की आवाज को दबाने और उन्हें "अनुशासन" में रखने के लिए ऐसे हिंसक तरीके अपनाए जाते थे।
​5. अंत
​समय के साथ मानवाधिकारों की समझ बढ़ने और कानून में बदलाव के कारण, 19वीं शताब्दी तक इसका उपयोग पूरी तरह बंद हो गया। आज ये उपकरण केवल संग्रहालयों (Museums) में इतिहास के काले पन्नों की याद दिलाने के लिए रखे गए हैं।
​संक्षेप में: यह मध्यकालीन युग का एक अत्यंत दमनकारी उपकरण था जिसका उपयोग महिलाओं को चुप कराने और उन्हें सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा करने के लिए किया जाता था।

Sir के लिए एक like तो बनता है ❣️
17/04/2026

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15-year-old Vaibhav Suryavanshi unleashes pure destruction! 🔥Get every update up to 2 balls faster than TV — download th...
30/03/2026

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1️⃣5️⃣ years old, 1️⃣5️⃣-ball fifty 🤯🔥 Vaibhav Sooryavanshi rewrites the record books for RR 💜
30/03/2026

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🚨 ‘धुरंधर-2’ पर पुलिस अफसर का बड़ा रिएक्शन! 🇮🇳🔥ASP अनुज चौधरी पहुंचेसाथी पुलिसकर्मियों के साथ फिल्म देखने —और जो कहा… वो...
29/03/2026

🚨 ‘धुरंधर-2’ पर पुलिस अफसर का बड़ा रिएक्शन! 🇮🇳🔥

ASP अनुज चौधरी पहुंचे
साथी पुलिसकर्मियों के साथ फिल्म देखने —

और जो कहा… वो साफ संदेश है 👇

👉 “ये फिल्म
सच्चे देशभक्तों के लिए है”

👉 “जो देश को
सब कुछ मानते हैं”

👉 “इसमें
जाति-धर्म की कोई बात नहीं”

👉 “ये सिर्फ
राष्ट्र प्रेम की कहानी है”

यानी साफ —

जो लोग इसे प्रोपेगेंडा बता रहे थे…
उनके लिए ये जवाब है।

और असली बात यही —

देशभक्ति को
राजनीति के चश्मे से मत देखो…

क्योंकि जब कहानी
देश के लिए जीने वालों की हो…

तो वो फिल्म नहीं —

जज्बा बन जाती है। 🔥🇮🇳

क्या लगता है कौन जीतना चाहिए ❓
29/03/2026

क्या लगता है कौन जीतना चाहिए ❓

संकटमोचन हनुमान जी के चरणों में हाजरी  देखकर अनदेखा ना करें 🙏राधे राधे🙏🔱Jammu and Kashmir’s armless archer and Paralympi...
01/01/2026

संकटमोचन हनुमान जी के चरणों में हाजरी देखकर अनदेखा ना करें 🙏

राधे राधे🙏🔱
Jammu and Kashmir’s armless archer and Paralympics medallist Sheetal Devi edged out quadruple amputee Payal Nag of Odisha to win the gold in a much-anticipated clash of the Khelo India Para Games on Sunday.

In the battle between two teenagers, defending champion Sheetal came from behind to successfully bag her second gold medal of the Games at the Jawaharlal Nehru Stadium.

Pitted against the 17-year-old Payal, Sheetal, 18, triumphed 109-103 in their compound open final match.

Current Issue:
Payal lost all four limbs due to electrocution when she was a child, and she now shoots with prosthetic legs.

The sunny conditions in the national capital did not deter the competitive spirit of the archers, as 40-year-old Rakesh Kumar and 30-year-old Jyoti Baliyan also won gold medals in their respective events.

Jharkhand’s Vijay Sundi beat Haryana’s Vikas Bhakar 6-4 in the men’s recurve open gold medal match, while Haryana’s Pooja won the women’s recurve open gold after defeating Maharashtra’s Rajshri Rathod 6-4.

All eyes were on the women’s compound gold medal match between Sheetal and Payal.

Sheetal started with scores of 8 and 7, while Payal began with double 10s. However, Payal lost the upper hand in the third round, shooting a 7 for the first time, while Sheetal returned to her consistent best of 9s.
and 10s. The deciding fifth round saw Sheetal clinching the gold.

"Firstly, Payal played very well in the final, and with her continuous hard work, she will definitely get a medal for India soon. Personally, I am grateful for all the blessings bestowed by Mata Rani that I won my second gold medal at the Khelo India Para Games," Sheetal told SAI Media.

The soft-spoken Payal spoke about the technical aspects of the sport in her first Khelo India Para Games.

"Earlier, I used to shoot arrows with two devices in my prosthetic legs, but now I’m shooting with just one leg. It was difficult to adjust, but I still reached the final despite the discomfort, and there were also a lot of windy conditions today. But I am happy to have competed in the final and to have won the silver,"

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मीणा चौक
Jaipur
302022

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