04/08/2026
एक अधिवक्ता की सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि जब वह कोई जमानत याचिका माननीय न्यायालय के समक्ष बहस करने के उद्देश्य से लेकर के आता है तो यह सुनिश्चित नहीं होता है की कितनी बातें बताई जाएं और कितनी बातें रोकी जाए बहस कैसे की जाए.
यह कोई कला नहीं है ना ही इस विषय पर किसी भी ग्रंथ में कोई प्रथा वर्णित है लेकिन इतना तय है कि जब भी न्यायालय के समक्ष बहस करने के उद्देश्य से खड़े हो तो सबसे पहले अपनी ही याचिका में अपना ही विरोध करते हुए प्रश्न करें और जब अपना ही विरोध करते हुए आप प्रश्न करेंगे तो आपको याचिका से ही उत्तर मिल जाएगा
फेसबुक के मेसेंजर बॉक्स में इस तरीके की रिक्वेस्ट बहुत आती है कि कल मेरी पहली जमानत याचिका सूचीबद्ध है। सच कहूँ तो थोड़ा घबराया हुआ हूँ। समझ नहीं आ रहा कि बहस कहाँ से शुरू करूँ घबराहट हो रही है.
मेरा मानना है घबराहट अच्छी बात है। इसका मतलब है कि तुम अपने मुकदमे को गंभीरता से ले रहे हो। लेकिन एक बात याद रखो—जमानत की बहस कानून की धाराएँ गिनाने का मंच नहीं है। यह न्यायाधीश के मन में उठ रहे प्रश्नों का उत्तर देने की कला है।
यह जानना आवश्यक है कि न्यायाधीश के मन में आखिर कौन-कौन से प्रश्न चलते हैं?
यही तो एक अच्छे अधिवक्ता और साधारण अधिवक्ता में अंतर होता है। जब न्यायाधीश फाइल खोलता है, तो वह सबसे पहले यह नहीं सोचता कि आरोपी को जेल भेजना है या छोड़ना है। वह स्वयं से कुछ प्रश्न पूछता है।
पहला प्रश्न—क्या प्रथम दृष्टया अभियोजन का मामला बनता है?
तुम्हें रिकॉर्ड से बताना होगा कि एफआईआर, केस डायरी या चार्जशीट में क्या कमियाँ हैं और अभियोजन की कहानी कहाँ कमजोर पड़ती है। यदि प्रथम दृष्टया मामला ही संदिग्ध है, तो यह जमानत के पक्ष में महत्वपूर्ण परिस्थिति है।
अब अगर प्रथम दृष्टया मामला बनता हो, तब?
तब बहस वहीं समाप्त नहीं होती। न्यायाधीश का दूसरा प्रश्न होता है—
अपराध कितना गंभीर है और अधिकतम सजा क्या है?
गंभीर अपराध में न्यायालय अधिक सतर्क रहेगा। इसलिए केवल यह कहना कि "मुवक्किल निर्दोष है" पर्याप्त नहीं है। तुम्हें यह भी दिखाना होगा कि परिस्थितियाँ जमानत के पक्ष में क्यों हैं।
अगर सवाल आया कि जांच पूरी हो चुकी हो तो क्या उससे फर्क पड़ता है?
इसका बहुत असर पड़ता है। यदि चार्जशीट दाखिल हो चुकी है, तो न्यायाधीश यह सोचता है कि अब आरोपी की निरंतर हिरासत की आवश्यकता क्या है। यदि जांच पूरी हो चुकी है और अभियोजन का अधिकांश साक्ष्य सुरक्षित है, तो यह तुम्हारे पक्ष का महत्वपूर्ण तर्क बन सकता है।
अक्सर न्यायाधीश कहते हैं कि आरोपी गवाहों को प्रभावित कर सकता है। इसका उत्तर कैसे दें?
यही सबसे महत्वपूर्ण भाग है। न्यायाधीश की सबसे बड़ी चिंता न्यायिक प्रक्रिया की सुरक्षा होती है। इसलिए स्पष्ट रूप से बताओ कि आरोपी का कोई ऐसा आचरण नहीं है जिससे यह लगे कि वह गवाहों को धमकाएगा, साक्ष्यों से छेड़छाड़ करेगा या मुकदमे में बाधा डालेगा। यदि आवश्यक हो तो यह भी कहो कि अदालत जो भी उचित शर्त लगाएगी, आरोपी उनका पालन करेगा।
अगला प्रश्न जो न्यायाधीश महोदय के मन में चलता है फरार होने की आशंका का क्या?
न्यायाधीश यही देखता है कि क्या आरोपी का स्थायी निवास है, परिवार है, समाज से जुड़ाव है, और क्या पहले कभी न्यायालय से भागा है। यदि भागने की संभावना नहीं है, तो यह विश्वास अदालत के सामने स्थापित करना तुम्हारा दायित्व है।
यदि मेरे मुवक्किल का कोई आपराधिक इतिहास न हो?
यह अवश्य बताओ। और यदि इतिहास हो, तो उसे छिपाओ मत। उसका सही संदर्भ दो। न्यायालय तथ्यों की पारदर्शिता की अपेक्षा करता है।
यदि सह-आरोपी को जमानत मिल चुकी हो?
तब समानता (Parity) का सिद्धांत उठाओ। लेकिन पहले यह सुनिश्चित कर लो कि दोनों की भूमिका वास्तव में समान है। केवल जमानत आदेश दिखा देना पर्याप्त नहीं है।
लंबे समय से जेल में रहने का क्या महत्व है?
यदि मुकदमा शीघ्र समाप्त होने की संभावना नहीं है और आरोपी लंबे समय से विचाराधीन कैदी है, तो यह एक महत्वपूर्ण परिस्थिति है। न्यायालय व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निष्पक्ष न्यायिक प्रक्रिया—दोनों के बीच संतुलन बनाता है।
अब जब भी आप सवाल करते हैं कि सर, बहस का सबसे महत्वपूर्ण मंत्र क्या है?
तो मेरा जवाब यही है बहस करते समय स्वयं से पूछो—
"क्या मैंने न्यायाधीश की हर संभावित चिंता का उत्तर दे दिया है?"
यदि उत्तर "हाँ" है, तो समझो कि तुमने प्रभावी बहस की है।
याद रखो, जमानत की बहस में आवाज़ ऊँची करने से प्रभाव नहीं पड़ता, बल्कि तथ्यों की स्पष्टता, कानून की सही समझ और न्यायालय के प्रति संतुलित प्रस्तुति प्रभाव छोड़ती है।
याद रखो जमानत माँगना केवल यह कहना नहीं है कि "मेरे मुवक्किल को छोड़ दीजिए", बल्कि न्यायालय को यह विश्वास दिलाना है कि उसकी रिहाई से न्यायिक प्रक्रिया पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।
और एक बात हमेशा याद रखना—
एक सफल जमानत बहस वह नहीं होती जिसमें अधिवक्ता सबसे अधिक बोलता है; बल्कि वह होती है जिसमें न्यायाधीश के मन में उठने वाले हर कानूनी प्रश्न का उत्तर रिकॉर्ड और कानून के आधार पर क्रमबद्ध ढंग से दे दिया जाता है। यही प्रभावी अधिवक्ता की पहचान है।
Advocate Ashok Jonwal
Rajasthan High Court Jaipur
083879 31881