08/03/2026
रमज़ान का पवित्र महीना बरकतों और रहमतों का महीना है। इस्लाम में माना जाता है कि इस दौरान अल्लाह अपने बंदों की दुआएं बहुत जल्दी कुबूल फरमाता है।
यहाँ कुछ खास वक्त दिए गए हैं जब दुआ कुबूल होने की संभावना सबसे ज्यादा होती है:
1. इफ्तार के समय (Iftar Time)
इफ्तार से ठीक पहले का समय बहुत कीमती होता है। हदीस के अनुसार, रोज़ेदार की दुआ इफ्तार के वक्त रद्द नहीं की जाती। उस समय की गई दुआ सीधी अल्लाह तक पहुँचती है।
2. सहरी और तहज्जुद का वक्त (Tahajjud & Suhoor)
रात के आखिरी पहर (सहरी का समय) में अल्लाह पहले आसमान पर आता है और पुकारता है कि— "है कोई जो मुझसे मांगे और मैं उसे अता करूँ?" इस वक्त की गई तौबा और दुआ ज़रूर कुबूल होती है।
3. लैलतुल-क़द्र (Laylat al-Qadr)
रमज़ान की आखिरी 10 रातों में से जो विषम रातें (21, 23, 25, 27, 29) होती हैं, उनमें से एक 'शब-ए-कद्र' होती है। यह रात हज़ार महीनों से बेहतर है। इसमें मांगी गई हर जायज़ दुआ कुबूल होती है।
4. अज़ान और इक़ामत के बीच
अज़ान होने और नमाज़ शुरू होने (इक़ामत) के बीच का जो समय होता है, वह दुआ की कुबूलियत के लिए बेहतरीन माना जाता है।
5. जुमे का दिन (Friday)
रमज़ान का जुमा (Friday) आम दिनों के जुमे से भी ज्यादा अफ़ज़ल है। जुमे के दिन एक ऐसी घड़ी आती है (अक्सर असर और मग़रिब के बीच) जब मांगी गई दुआ खाली नहीं जाती।
6. कुरान की तिलावत के बाद
रमज़ान में कुरान मुकम्मल करने या तिलावत करने के बाद की गई दुआओं में बहुत असर होता है।
एक छोटा सा मशविरा: दुआ मांगते समय अपना पूरा दिल अल्लाह की तरफ लगाएं, पहले अल्लाह की हम्द (तारीफ) करें, नबी (स.अ.व) पर दरूद भेजें और फिर पूरी शिद्दत के साथ अपनी हाजत रखें।