Sunil Sharma astrology

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ये जो साधारण सलवार सूट वाली महिला है न ? ये लगभग 7 हजार करोड़ रुपए की मालकिन हैये जो पेंट शर्ट पहने अंकल हैं न ? ये ब्रि...
14/09/2023

ये जो साधारण सलवार सूट वाली महिला है न ? ये लगभग 7 हजार करोड़ रुपए की मालकिन है

ये जो पेंट शर्ट पहने अंकल हैं न ? ये ब्रिटेन के प्रधानमंत्री हैं

अक्षरधाम मंदिर गए ऋषि सुनक व अक्षरा मूर्ति सुनक की ये तस्वीरें उन छपरी लौंडे-लौंडियों को अवश्य देखनी चाहिए जो मंदिर के नियमों का मजाक उड़ाते हुए कहते हैं कि - My life my rules... My body my choice...

हजारों करोड़ की संपत्ति के साथ ब्रिटेन में रहते हुए भी अपने संस्कार नहीं भूले
लेकिन
हमारे देश के युवा गांव से निकलर जम्मू दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु आते ही अपने संस्कार, मर्यादा और धर्म के साथ ही औकात भूल जाते हैं.

कितने भी आधुनिक हो जाओ लेकिन संस्कार, सभ्यता और मर्यादा को मत त्यागो

सनातन को ब्रिटेन के ऋषि नमन कर रहे हैं🙏❣️🚩

यह 15 मंत्र जो हर हिंदू को सीखना और बच्चों को सिखाना चाहिए।1. Mahadevॐ त्र्यम्बकं यजामहे,सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ,उर्वारु...
13/09/2023

यह 15 मंत्र जो हर हिंदू को सीखना और बच्चों को सिखाना चाहिए।

1. Mahadev

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे,
सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ,
उर्वारुकमिव बन्धनान्,
मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् !!

2. Shri Ganesha

वक्रतुंड महाकाय,
सूर्य कोटि समप्रभ
निर्विघ्नम कुरू मे देव,
सर्वकार्येषु सर्वदा !!

3. Shri hari Vishnu

मङ्गलम् भगवान विष्णुः,
मङ्गलम् गरुणध्वजः।
मङ्गलम् पुण्डरी काक्षः,
मङ्गलाय तनो हरिः॥

4. Shri Brahma ji

ॐ नमस्ते परमं ब्रह्मा,
नमस्ते परमात्ने ।
निर्गुणाय नमस्तुभ्यं,
सदुयाय नमो नम:।।

5. Shri Krishna

वसुदेवसुतं देवं,
कंसचाणूरमर्दनम्।
देवकी परमानन्दं,
कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम।

6. Shri Ram

श्री रामाय रामभद्राय,
रामचन्द्राय वेधसे ।
रघुनाथाय नाथाय,
सीताया पतये नमः !

7. Maa Durga

ॐ जयंती मंगला काली,
भद्रकाली कपालिनी ।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री,
स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु‍ते।।

8. Maa Mahalakshmi

ॐ सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो,
धन धान्यः सुतान्वितः ।
मनुष्यो मत्प्रसादेन,
भविष्यति न संशयःॐ ।

9. Maa Saraswathi

ॐ सरस्वति नमस्तुभ्यं,
वरदे कामरूपिणि।
विद्यारम्भं करिष्यामि,
सिद्धिर्भवतु मे सदा ।।

10. Maa Mahakali

ॐ क्रीं क्रीं क्रीं,
हलीं ह्रीं खं स्फोटय,
क्रीं क्रीं क्रीं फट !!

11. Hanuman ji

मनोजवं मारुततुल्यवेगं,
जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठं।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं,
श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥

12. Shri Shanidev

ॐ नीलांजनसमाभासं,
रविपुत्रं यमाग्रजम ।
छायामार्तण्डसम्भूतं,
तं नमामि शनैश्चरम् ||

13. Shri Kartikeya

ॐ शारवाना-भावाया नम:,
ज्ञानशक्तिधरा स्कंदा ,
वल्लीईकल्याणा सुंदरा।
देवसेना मन: कांता,
कार्तिकेया नामोस्तुते ।

14. Kaal Bhairav ji

ॐ ह्रीं वां बटुकाये,
क्षौं क्षौं आपदुद्धाराणाये,
कुरु कुरु बटुकाये,
ह्रीं बटुकाये स्वाहा।

15. Gayatri Mantra

ॐ भूर्भुवः स्वः,
तत्सवितुर्वरेण्यम्
भर्गो देवस्य धीमहि
धियो यो नः प्रचोदयात् ॥

परिवार और बच्चों को भी सिखायें ।।

राधे राधे - जय श्री कृष्ण 🙏
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 #कुशा_कि_उत्पति_कहा_से_हुईकुश / कुशा (दर्भ) एक घास है।  अत्यन्त पवित्र होने के कारण इसका एक नाम पवित्री भी है। इसके सिर...
13/09/2023

#कुशा_कि_उत्पति_कहा_से_हुई
कुश / कुशा (दर्भ) एक घास है। अत्यन्त पवित्र होने के कारण इसका एक नाम पवित्री भी है। इसके सिरे नुकीले होते हैं।

भारत में हिन्दू लोग इसे पूजा /श्राद्ध में काम में लाते हैं। श्राद्ध -तर्पण विना कुशा के सम्भव नहीं हैं।

कुशा की उत्पत्ति....महर्षि कश्यप की दो पत्नियां थीं। एक का नाम कद्रू था और दूसरी का नाम विनता। कद्रू और विनता दोनों महार्षि कश्यप की खूब सेवा करती थीं। महार्षि कश्यप ने उनकी सेवा-भावना से अभिभूत हो वरदान मांगने को कहा।

कद्रू ने कहा, मुझे एक हजार पुत्र चाहिए। महार्षि ने ‘तथास्तु’ कह कर उन्हें वरदान दे दिया।
विनता ने कहा कि मुझे केवल दो प्रतापी पुत्र चाहिए। महार्षि कश्यप उन्हें भी दो तेजस्वी पुत्र होने का वरदान देकर अपनी साधना में तल्लीन हो गए।

कद्रू के पुत्र सर्प रूप में हुए, जबकि विनता के दो प्रतापी पुत्र हुए। किंतु विनता को भूल के कारण कद्रू की दासी बनना पड़ा।

विनता के पुत्र गरुड़ ने जब अपनी मां की दुर्दशा देखी तो दासता से मुक्ति का प्रस्ताव कद्रू के पुत्रों के सामने रखा। कद्रू के पुत्रों ने कहा कि यदि गरुड़ उन्हें स्वर्ग से अमृत लाकर दे दें तो वे विनता को दासता से मुक्त कर देंगे। गरुड़ ने उनकी बात स्वीकार कर अमृत कलश स्वर्ग से लाकर दे दिया और अपनी मां विनता को दासता से मुक्त करवा लिया।

यह अमृत कलश ‘कुश’ नामक घास पर रखा था, जहां से इंद्र इसे पुन: उठा ले गए तथा कद्रू के पुत्र अमृतपान से वंचित रह गए। उन्होंने गरुड़ से इसकी शिकायत की कि इंद्र अमृत कलश उठा ले गए। गरुड़ ने उन्हें समझाया कि अब अमृत कलश मिलना तो संभव नहीं, हां यदि तुम सब उस घास (कुश) को, जिस पर अमृत कलश रखा था, जीभ से चाटो तो तुम्हें आंशिक लाभ होगा।

कद्रू के पुत्र कुश को चाटने लगे, जिससे कि उनकी जीभें चिर गई इसी कारण आज भी सर्प की जीभ दो भागों वाली चिरी हुई दिखाई पड़ती है, किंतु ‘कुश’ घास की महत्ता अमृत कलश रखने के कारण बढ़ गई और भगवान विष्णु के निर्देशानुसार इसे पूजा कार्य में प्रयुक्त किया जाने लगा।

पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने वराह रूप धारण कर समुद्रतल में छिपे महान असुर हिरण्याक्ष का वध कर दिया और पृथ्वी को उससे मुक्त कराकर बाहर निकले तो उन्होंने अपने बालों को फटकारा। उस समय कुछ रोम पृथ्वी पर गिरे। वहीं कुश के रूप में प्रकट हुए।

कुश ऊर्जा की कुचालक है। इसलिए इसके आसन पर बैठकर पूजा-वंदना, उपासना या अनुष्ठान करने वाले साधन की शक्ति का क्षय नहीं होता। परिणामस्वरूप कामनाओं की अविलंब पूर्ति होती है।

वेदों ने कुश को तत्काल फल देने वाली औषधि, आयु की वृद्धि करने वाला और दूषित वातावरण को पवित्र करके संक्रमण फैलने से रोकने वाला बताया है।

कुश का प्रयोग पूजा करते समय जल छिड़कने, ऊंगली में पवित्री पहनने, विवाह में मंडप छाने तथा अन्य मांगलिक कार्यों में किया जाता है।

इस घास के प्रयोग का तात्पर्य मांगलिक कार्य एवं सुख-समृद्धिकारी है, क्योंकि इसका स्पर्श अमृत से हुआ है।

हिंदू धर्म में किए जाने वाले विभिन्न धार्मिक कर्म-कांडों में अक्सर कुश का उपयोग किया जाता है।

इसको उखाड़ते समय सावधानी रखनी पड़ती है कि यह जड़ सहित उखड़े और हाथ भी न कटे।

कुशल शब्द इसीलिए बना...."ऊँ हुम् फट" मन्त्र का उच्चारण करते हुए

उत्तराभिमुख होकर कुशा उखाड़नी चाहिए।

पुरातन समय में गुरुजन अपने शिष्यों की परीक्षा लेते समय उन्हें कुश लाने का कहते थे। कुश लाने में जिनके हाथ ठीक होते थे उन्हें कुशल कहा जाता था अर्थात उसे ही ज्ञान का सद्पात्र माना जाता था।

कुश ऊर्जा का कुचालक है। इसीलिए सूर्य व चंद्रग्रहण के समय इसे भोजन तथा पानी में डाल दिया जाता है जिससे ग्रहण के समय पृथ्वी पर आने वाली किरणें कुश से टकराकर परावर्तित हो जाती हैं तथा भोजन व पानी पर उन किरणों का विपरीत असर नहीं पड़ता।

पांच वर्ष की आयु के बच्चे की जिव्हा पर शुभ मुहूर्त में कुशा के अग्र भाग से शहद द्वारा सरस्वती मन्त्र लिख दिया जाए तो वह बच्चा कुशाग्र बन जाता है।

कुश से बने आसन पर बैठकर तप, ध्यान तथा पूजन आदि धार्मिक कर्म-कांडों से प्राप्त ऊर्जा धरती में नहीं जा पाती क्योंकि धरती व शरीर के बीच कुश का आसन कुचालक का कार्य करता है।

कुशा से बनी अंगूठी पहनकर पूजा /तर्पण के समय पहनी जाती है जिस भाग्यवान् की सोने की अंगूठी पहनी हो उसको जरूरत नहीं है। कुशा प्रत्येक दिन नई उखाडनी पडती है लेकिन अमावाश्या की तोडी कुशा पूरे महीने काम दे सकती है और भादों की अमावश्या के दिन की तोडी कुशा पूरे साल काम आती है। इसलिए लोग इसे तोड के रख लते हैं।

👉दस प्रकार के होते हैं कुश

शास्त्रों में दस प्रकार के कुशों का वर्णन मिलता है-
कुशा, काशा यवा दूर्वा उशीराच्छ सकुन्दका।
गोधूमा ब्राह्मयो मौन्जा दश दर्भा, सबल्वजा।।
यानि कुश, काश , दूर्वा, उशीर, ब्राह्मी, मूंज इत्यादि

कोई भी कुश अमावस्या को उखाड़ी जा सकती है और उसका घर में संचय किया जा सकता है।

लेकिन इस बात का ध्यान रखना बेहद जरूरी है कि हरी पत्तेदार कुश जो कहीं से भी कटी हुई ना हो , एक विशेष बात और जान लीजिए कुश का स्वामी केतु है लिहाज़ा कुश को अगर आप अपने घर में रखेंगे तो केतु के बुरे फलों से बच सकते हैं।

कौन सा कुश उखाड़ेंं

कुश उखाडऩे से पूर्व यह ध्यान रखें कि जो कुश आप उखाड़ रहे हैं वह उपयोग करने योग्य हो। ऐसा कुश ना उखाड़ें जो गन्दे स्थान पर हो, जो जला हुआ हो, जो मार्ग में हो या जिसका अग्रभाग कटा हो, इस प्रकार का कुश ग्रहण करने योग्य नहीं होता है।

शास्त्रों में में अमावस्या तिथि का स्वामी पितृदेव को माना जाता है. इसलिए श्राद्धकर्म मे, त्रयोदशी संस्कार मे पितरों की तृप्ति के लिए तर्पण, दान-पुण्य कुशा के द्वारा किया जाता है
आचार्य जितेंद्र

04/09/2023

#विद्यार्थियों के बहुत उपयोगी
विद्यार्थियों को आठ बातों से बचना चाहिए --
काम, क्रोध, लोभ, स्वाद, शृङ्गार, खेल, अति निद्रा और अति सेवा लेना ।
विद्यार्थी में पाँच गुण आवश्यक हैं --
कौए जैसा प्राप्त करने का प्रयास, बगुले जैसा ध्यान, कुत्ते जैसी निद्रा, थोड़ा भोजन और आवश्यकता से अधिक न बोलना (शिक्षा के लिए गृह का त्याग) ।
विद्या प्राप्ति में छः प्रकार के विघ्न हैं --
जुआ खेलना, पुस्तकों की सजावट करना, नाटक(फिल्में) देखना, स्त्री, आलस्य और निद्रा ।।
जिस प्रकार भवन निर्माण के लिए सुदृढ नींव की आवश्यकता होती है, ठीक उसी प्रकार से प्रारम्भिक जीवन में ब्रह्मचर्य की भी आवश्यकता है ।।
पुस्तक में लिखी हुई विद्या सिद्धि देने वाली नहीं होती, गुरुमुख से अधिकारी शिष्य को प्राप्त विद्या ही फलवती होती है । सुनील शास्त्री

कामक्रोधौ तथा लोभं
स्वादुशृङ्गारकौतुकम् ।
अतिनिद्राsतिसेवा च
विद्यार्थी ह्यष्ट वर्जयेत् ।। .....
काकचेष्टा बको ध्यानं
श्वाननिद्रा तथैव च ।
अल्पाहारी मितभाषी (गृहत्यागी)
विद्यार्थी पञ्चलक्षणम् ।। ....
द्यूतं पुस्तकशुश्रूषा
नाटकासक्तिरेव च ।
स्त्रियस्तन्द्रा च निद्रा च
विद्याविघ्नकराणि षट् ।।
तथा च ---
प्रासादस्य विनिर्माणे मूलभित्तिरपेक्षते ।
तथैव जीवनस्यादौ ब्रह्मचर्यमपेक्षते ।।
पुस्तके लिखिता विद्या नैव सिद्धिप्रदा नृणाम् ।
गुरुं विना हि विद्यायां नाधिकारः कथञ्चन ।।
सुनील शास्त्री
प्रश्न नहीं स्वाध्याय करें।

02/07/2023

।।पुजारी ब्राह्मणों की वास्तविक स्थिति... #धर्म_बचाएं_या_घर।।
आज बहुत कष्ट हुआ।
एक आदरणीय एक अन्य शहर के बहुत ही ऊंचे विद्वान हैं। एक मंदिर के प्रधान पुजारी हैं।
आज शाम के समय उनसे भेंट हुई। पूर्व में कई बार उन्होंने मुझे कई बार बुलवाया था लेकिन समयाभाव के चलते मैं न जा सका।
मिलने पर यथोचित अभिवादन हुआ। बातचीत में उन्होंने मुझसे अपनी आर्थिक स्थिति की दयनीय दशा के बारे में रोते हुए कहा -
, बिटिया घर में सयानी हो गयी है। परन्तु हालात इतने तंग हैं कि लगता है कि बोझ तले आत्महत्या कर लूं।'
मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा कि शहर के अत्यंत प्रसिद्ध मंदिर के प्रधान पुजारी के पास आर्थिक तंगी??

पूंछने पर बताया कि मंदिर के पूरे कोष पर ( ट्रस्टियों) का कब्जा है। केवल 5 हजार रुपये मासिक वेतन है। स्पष्ट निर्देश है कि पुजारियों को पैसा न दें, बल्कि दानपात्र में दे। पूरा पैसा कमेटी समितिके बीच मे चला जाता है। यदि कोई भक्त अपनी मर्जी से देता भी है तो सीसीटीवी से देखने पर वापस मांगा जाता है। हर पल किसी दूसरे को रख देने की धमकी दी जाती रहती है। बाहर तो मंदिर के नाम पर बहुत प्रतिष्ठा है, लेकिन घर मे दाने दाने को मोहताज हैं। समझ में नही आता मैं क्या करूँ।

उनके इस स्थिति पर मैं निःशब्द हो गया।
लेख पुराना है,, लेकिन सत्य,, यथार्थ है!!
अनर्गल प्रलाप से
Sunil Shastri
प्रश्न नही चिंतनीय ओर विचारणीय काल है।

।। वेदसार शिव स्तवः   स्तोत्रम् ।।पशूनां पतिं पापनाशं परेशं गजेन्द्रस्य कृत्तिं वसानं वरेण्यम।जटाजूटमध्ये स्फुरद्गाङ्गवा...
15/05/2023

।। वेदसार शिव स्तवः स्तोत्रम् ।।
पशूनां पतिं पापनाशं परेशं गजेन्द्रस्य कृत्तिं वसानं वरेण्यम।
जटाजूटमध्ये स्फुरद्गाङ्गवारिं महादेवमेकं स्मरामि स्मरारिम।।

महेशं सुरेशं सुरारातिनाशं विभुं विश्वनाथं विभूत्यङ्गभूषम्।
विरूपाक्षमिन्द्वर्कवह्नित्रिनेत्रं सदानन्दमीडे प्रभुं पञ्चवक्त्रम्।।

गिरीशं गणेशं गले नीलवर्णं गवेन्द्राधिरूढं गुणातीतरूपम्।
भवं भास्वरं भस्मना भूषिताङ्गं भवानीकलत्रं भजे पञ्चवक्त्रम्।

शिवाकान्त शंभो शशाङ्कार्धमौले महेशान
शूलिञ्जटाजूटधारिन्।
त्वमेको जगद्व्यापको विश्वरूप: प्रसीद प्रसीद प्रभो पूर्णरूप।।

परात्मानमेकं जगद्बीजमाद्यं निरीहं निराकारमोंकारवेद्यम्।
यतो जायते पाल्यते येन विश्वं तमीशं भजे लीयते यत्र विश्वम्।

न भूमिर्नं चापो न वह्निर्न वायुर्न चाकाशमास्ते न तन्द्रा न निद्रा।
न गृष्मो न शीतं न देशो न वेषो न यस्यास्ति मूर्तिस्त्रिमूर्तिंतमीड।

अजं शाश्वतं कारणं कारणानां शिवं केवलं भासकंभासकानाम्।
तुरीयं तम:पारमाद्यन्तहीनं प्रपद्ये परं पावनं द्वैतहीनम।

नमस्ते नमस्ते विभो विश्वमूर्ते नमस्ते नमस्ते चिदानन्दमूर्ते।
नमस्ते नमस्ते तपोयोगगम्य नमस्ते नमस्ते श्रुतिज्ञानगम्।।

प्रभो शूलपाणे विभो विश्वनाथ महादेव शंभो महेश त्रिनेत्।
शिवाकान्त शान्त स्मरारे पुरारे त्वदन्यो वरेण्यो न मान्यो न
गण्य:।

शंभो महेश करुणामय शूलपाणे गौरीपते पशुपते पशुपाशनाशिन्।
काशीपते करुणया जगदेतदेक-स्त्वंहंसि पासि विदधासि महेश्वरोऽसि।

त्वत्तो जगद्भवति देव भव स्मरारे त्वय्येव तिष्ठति जगन्मृड विश्वनाथ।
त्वय्येव गच्छति लयं जगदेतदीश लिङ्गात्मके हर चराचरविश्वरूपिन।
इति श्रीमच्छंकराचार्यविरचितो वेदसारशिवस्तवः संपूर्णः ॥

27/04/2023

विवाह के पश्चात बिना पीछे पलटे, अपने पीछे की ओर चावल, पैसे उछालकर विदा होती है बेटी। इसका तात्पर्य यह है कि वह लक्ष्मी स्वरूपा, अपने साथ मायके का सौभाग्य नही ले जा रही है।
लेकिन आजकल के लोग विवाह घर की बजाय होटल व रिसाॅर्ट में करने का फैशन बना लिया है।
इसलिये सौभाग्य घर की बजाय होटल व रिसाॅर्ट पर
ज्यादा बरस रहा है। कटु सत्य। बाकी सुख में और दुःख में, आनंद और कष्ट में, हमें हर जीव के प्रति वेसी ही भावना रखनी चाहिए जेसी हम अपने प्रति रखते हैं।
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24/04/2023

27 नक्षत्रको वैदिक मन्त्र :--

1 अश्विनी नक्षत्र वेद मंत्र:==ॐ अश्विना तेजसाचक्षु: प्राणेन सरस्वतीवीर्य्यम वाचेन्द्रो बलेनेन्द्रायदद्युरिन्द्रियम । ॐ अश्विनी कुमाराभ्यो नम: ==5000

2 भरणी नक्षत्र वेद मंत्र:==ॐ यमाय त्वाङ्गिरस्वते पितृिमते स्वाहा स्वाहा धर्माय स्वाहा धर्मपित्रे । 10000

3 कृतिका नक्षत्र वेद मंत्र:===ॐ अयमग्नि सहस्रीणो वाजयस्य शान्ति (गुं) वनस्पति: मूर्द्धा कबोरयीणाम् । अग्नये नम: 10000

4 रोहिणी नक्षत्र वेद मंत्र: ===ॐ ब्रहमजज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद्विसीमत: सूरुचे वेन आवय: सबुधन्या उपमा अस्यविष्ठा: सतश्चयोनिमसतश्चविध:I ॐ ब्रहमणे नम: ====5000

5 मृगशिरा नक्षत्र वेद मंत्र:====ॐ सोमोधनु (गुं) सोमाअवंतुमाशु (गुं) सोमवीर: कर्मणयंददाती यदत्यविदध्य (गुं) सभेयमपितृ श्रवणयोम। ॐ चन्द्रमसे नम: । 10000

6 आर्द्रा नक्षत्र वेद मंत्र:===ॐ नमस्ते रूद्र मन्यवSउतोत इषवे नम: बाहुभ्यामुतते नम: । ॐ रुद्राय नम: ==10000

7 पुनर्वसु नक्षत्र वेद मंत्र:===ॐ अदितिद्योरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता: स पिता स पुत्र: विश्वेदेवा अदिति: पंचजना अदितिजातिमादितिर्रजनित्वम । ॐ आदित्याय नम: ।==10000

8 पुष्य नक्षत्र वेद मंत्र: ===ॐ बृहस्पते अतियदर्यौ अर्हाद द्युमद्विभाति क्रतमज्जनेषु । यदीदयच्छवस ॠत प्रजात तदस्मासु द्रविणम धेहि चित्रम । ॐ बृहस्पतये नम: ।===10000

9 अश्लेषा नक्षत्र वेद मंत्र:===ॐ नमोSस्तु सर्पेभ्योये के च पृथ्विमनु:। ये अन्तरिक्षे यो देवितेभ्य: सर्पेभ्यो नम: । ॐ सर्पेभ्यो नम:====10000

10 मघा नक्षत्र वेद मंत्र:===ॐ पितृभ्य: स्वधायिभ्य स्वधानम: पितामहेभ्य: स्वधायिभ्य: स्वधानम: । प्रपितामहेभ्य स्वधायिभ्य स्वधानम: अक्षन्न पितरोSमीमदन्त:पितरोतितृपन्त पितर:शुन्धव्म । ॐ पितरेभ्ये नम: ।===10000

11 पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र वेद मंत्र:===ॐ भगप्रणेतर्भगसत्यराधो भगे मां धियमुदवाददन्न: । भगप्रजाननाय गोभिरश्वैर्भगप्रणेतृभिर्नुवन्त: स्याम: । भगाय नम: ।==10000

12 उत्तराफालगुनी नक्षत्र वेद मंत्र:==ॐ दैव्या वद्धर्व्यू च आगत (गुं) रथेन सूर्य्यतव्चा । मध्वायज्ञ (गुं) समञ्जायतं प्रत्नया यं वेनश्चित्रं देवानाम । ॐ अर्यमणे नम: ।==5000

13 हस्त नक्षत्र वेद मंत्र:==ॐ विभ्राडवृहन्पिवतु सोम्यं मध्वार्य्युदधज्ञ पत्त व विहुतम वातजूतोयो अभि रक्षतित्मना प्रजा पुपोष: पुरुधाविराजति । ॐ सावित्रे नम:===5000

14 चित्रा नक्षत्र वेद मंत्र:===ॐ त्वष्टातुरीयो अद्धुत इन्द्रागी पुष्टिवर्द्धनम । द्विपदापदाया: च्छ्न्द इन्द्रियमुक्षा गौत्र वयोदधु: । त्वष्द्रेनम: । ॐ विश्वकर्मणे नम: ।===5000

15 स्वाती नक्षत्र वेद मंत्र:===ॐ वायरन्नरदि बुध: सुमेध श्वेत सिशिक्तिनो युतामभि श्री तं वायवे सुमनसा वितस्थुर्विश्वेनर: स्वपत्थ्या निचक्रु: ।ॐ वायव नम: ==5000

16 विशाखा नक्षत्र वेद मंत्र:===ॐ इन्द्रान्गी आगत (गुं) सुतं गार्भिर्नमो वरेण्यम । अस्य पात घियोषिता । ॐ इन्द्रान्गीभ्यां नम: ।==10000

17 अनुराधा नक्षत्र वेद मंत्र:==ॐ नमो मित्रस्यवरुणस्य चक्षसे महो देवाय तदृत (गुं) सपर्यत दूरंदृशे देव जाताय केतवे दिवस्पुत्राय सूर्योयश (गुं) सत । ॐ मित्राय नम:===10000

18 ज्येष्ठा नक्षत्र वेद मंत्र:==ॐ त्रातारभिंद्रमबितारमिंद्र (गुं) हवेसुहव (गुं) शूरमिंद्रम वहयामि शक्रं पुरुहूतभिंद्र (गुं) स्वास्ति नो मधवा धात्विन्द्र: । ॐ इन्द्राय नम: ।==5000

19 मूल नक्षत्र वेद मंत्र:===ॐ मातेवपुत्रम पृथिवी पुरीष्यमग्नि (गुं) स्वयोनावभारुषा तां विश्वेदैवॠतुभि: संविदान: प्रजापति विश्वकर्मा विमुञ्च्त । ॐ निॠतये नम:==5000

20 पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र वेद मंत्र:==ॐ अपाघ मम कील्वषम पकृल्यामपोरप: अपामार्गत्वमस्मद यदु: स्वपन्य-सुव: । ॐ अदुभ्यो नम: ।==5000

21 उत्तराषाढ़ा नक्षत्र वेद मंत्र:==ॐ विश्वे अद्य मरुत विश्वSउतो विश्वे भवत्यग्नय: समिद्धा: विश्वेनोदेवा अवसागमन्तु विश्वेमस्तु द्रविणं बाजो अस्मै ।==10000

22 श्रवण नक्षत्र वेद मंत्र:==ॐ विष्णोरराटमसि विष्णो श्नपत्रेस्थो विष्णो स्युरसिविष्णो धुर्वोसि वैष्णवमसि विष्नवेत्वा । ॐ विष्णवे नम: ।==10000

23 धनिष्ठा नक्षत्र वेद मंत्र:==ॐ वसो:पवित्रमसि शतधारंवसो: पवित्रमसि सहत्रधारम । देवस्त्वासविता पुनातुवसो: पवित्रेणशतधारेण सुप्वाकामधुक्ष: । ॐ वसुभ्यो नम: ।==10000

24 शतभिषा नक्षत्र वेद मंत्र:==ॐ वरुणस्योत्त्मभनमसिवरुणस्यस्कुं मसर्जनी स्थो वरुणस्य ॠतसदन्य सि वरुण स्यॠतमदन ससि वरुणस्यॠतसदनमसि । ॐ वरुणाय नम: ।==10000

25 पूर्वभाद्रपद नक्षत्र वेद मंत्र:==ॐ उतनाहिर्वुधन्य: श्रृणोत्वज एकपापृथिवी समुद्र: विश्वेदेवा ॠता वृधो हुवाना स्तुतामंत्रा कविशस्ता अवन्तु ।

ॐ अजैकपदे नम:।==5000

26 उत्तरभाद्रपद नक्षत्र वेद मंत्र:==ॐ शिवोनामासिस्वधितिस्तो पिता नमस्तेSस्तुमामाहि (गुं) सो निर्वत्तयाम्यायुषेSत्राद्याय प्रजननायर रायपोषाय ( सुप्रजास्वाय ) । ॐ अहिर्बुधाय नम: । ==1000

27 रेवती नक्षत्र वेद मंत्र:==ॐ पूषन तव व्रते वय नरिषेभ्य कदाचन । स्तोतारस्तेइहस्मसि । ॐ पूषणे नम: । ==10000 ,, कृष्णभक्त

तपाईको जीवनमा नक्षत्रको प्रभाव कस्तो हुन्छ ?

चन्द्रमाको एउटा नक्षत्रलाई २७ नक्षत्रमा विभाजन गरिएको छ, त्यसैले आफ्नो कक्षामा घुम्दा चन्द्रमाले प्रत्येक नक्षत्रबाट घुम्नुपर्छ। तपाईको जन्मको समयमा चन्द्रमा जुन नक्षत्रमा रहनेछ, त्यो तपाईको जन्म नक्षत्र हुनेछ। तपाईको वास्तविक जन्म नक्षत्र निर्धारण भएपछि तपाईको बारेमा धेरै सटीक भविष्यवाणी गर्न सकिन्छ। तपाईंको नक्षत्रहरूको सही गणना र व्याख्याको साथ, तपाईंले जीवनमा अवसरहरूको फाइदा उठाउन सक्नुहुन्छ। त्यसैगरी, विभिन्न उपायले आफ्ना धेरै प्रकारका दोष र नकारात्मक असरबाट पनि छुटकारा पाउन सकिन्छ। नक्षत्रलाई रंग, प्रतीक, देवता र राशि पत्थरसँग पनि मिलाउन सकिन्छ।

गण्डमूल नक्षत्र,,,,अश्विनी,अश्लेषा,मघा,मुल र रेवती ! यी छ नक्षत्रहरूलाई गण्डमूल नक्षत्र भनिन्छ। जब यो नक्षत्र बच्चा जन्मेको २७ दिन पछि फेरि आउँछ, तब जन्मेको बच्चा मातापिता आदिका लागि अशुभ नहोस् भनेर शान्ती हुन्छ गर्नुपर्छ ।

शुभ नक्षत्र,,, रोहिणी, अश्विनी, मृगशिरा, पुष्य, हस्त, चित्र, उत्तराभाद्रपद, उत्तराषाढ, उत्तरा फाल्गुनी, रेवती, श्रवण, धनिष्ठ, पुनर्वसु, अनुराधा र स्वाति शुभ नक्षत्रहरू हुन्! यी नक्षत्रमा गरिएका सबै कामहरू पूरा हुन्छन्!
मध्यम नक्षत्र, पूर्वा फाल्गुनी, पूर्वाषाढा, पूर्वा भाद्रपद, विशाखा, ज्येष्ठ, अार्द्रा, मूल र शतभिषा मध्यम नक्षत्रहरू हुन्! तिनीहरूले सामान्य कार्यहरू गर्न सक्छन्, विशेष कार्यहरू होइन!

अशुभ नक्षत्र, भरणी, कृतिका, माघा र अश्लेषा नक्षत्र अशुभ ! यिनमा कुनै पनि शुभ कार्य गर्न वर्जित ! यी नक्षत्रहरू भवनहरू भत्काउने, कतै आगो लगाउने, विस्फोट गराउने जस्ता क्रूर र भयंकर प्रकृतिका कार्यहरूका लागि शुभ मानिन्छन्।

पञ्चक नक्षत्र,,,,धनिष्ठ,शतभिषा,पूर्वाभाद्रपद,उत्तरभाद्रपद र रेवती ! यी पाँच नक्षत्रलाई पञ्चक नक्षत्र भनिन्छ ! घरको तापक्रम, यात्रा, घरको ताप, घरको छत, काठ जम्मा गर्ने जस्ता अादि शुभ कार्यहरू यस नक्षत्रमा गर्नु हुँदैन।

अपूज्यायत्र पूज्यंते पूजनीयो न पूज्यते।त्रीणि तत्र भविष्यन्ति दारिद्र्यं मरणं भयम्।।( #शिवमहापुराण_रूद्रसंहिता_सतीखंड ३५...
20/04/2023

अपूज्यायत्र पूज्यंते पूजनीयो न पूज्यते।
त्रीणि तत्र भविष्यन्ति दारिद्र्यं मरणं भयम्।।
( #शिवमहापुराण_रूद्रसंहिता_सतीखंड ३५/९)
जहां अपूज्य की पूजा होती है, और पूज्य की की पूजा नहीं होती, वहाँ दरिद्रता​, मरण और भय -- ये तीनों अवश्य होंगे।

आपके शैव-शाक्त, वैष्णव, वेदांत इत्यादि स्थापित पीठों के अतिरिक्त जितने भी नचैये भांड कथावाचक, स्वत: बिना किसी गुरु के बुद्धत्व प्राप्त स्वघोषित भगवान, भानुमति के कुनबे से उधार ली गई गुरू परंपरा के स्वघोषित सिद्ध, हिमालय के गुप्त सिद्धों के शातिर दूकानदार चेले और किसी संत की सेवा में रहे ऐसे टुच्चे चेले जिन्हें संत ने दुत्कार के भगाया और ये संत के महासमाधि के बाद स्वयं को संत घोषित करने लगे, सभी #अपूज्य की श्रेणी में आते हैं।

मनमानी वेदव्याख्या से उद्भूत नालायक मंडलियों के अनुयायी बनकर अपनी भावी पीढ़ी के सर्वनाश की भूमिका न लिखें।

असहमति है तो ब्लॉक कीजिए या जो इच्छा हो कीजिए।अंधेरों की आस्था का ठेकेदार नहीं हूँ मैं। यत्र तत्र आए दिन उदित हो रहे कथित दिव्य विभूतियों और उनके पीछे-पीछे बन रहे नवोदित संप्रदायों पर आघात अगर अधर्म है तो यही सही।

सनातन का व्यवसायीकरण और भांडों नचैयों को संतत्व ही यदि हिंदुत्व रह गया है तो मैं हिंदू नहीं हूँ।

जिसे असहमति है .... नमस्कार।
अज्ञेय सुनील शास्त्री
प्रश्न नहीं स्वाध्याय करें

श्रीकृष्ण को श्राप से बचाने के लिए सुदामा ने स्वीकारी थी उम्रभर की दरिद्रता........!! # # # # # # # # # # # # # # # # # ...
20/04/2023

श्रीकृष्ण को श्राप से बचाने के लिए सुदामा ने स्वीकारी थी उम्रभर की दरिद्रता........!!
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एक ब्राह्मणी थी जो बहुत गरीब निर्धन थी. भिक्षा माँग कर जीवन यापन करती थी. एक समय ऐसा आया कि पाँच दिन तक उसे भिक्षा नहीं मिली वह प्रति दिन पानी पीकर भगवान का नाम लेकर सो जाती थी. छठवें दिन उसे भिक्षा में दो मुट्ठी चना मिले . कुटिया तक पहुँचते-पहुँचते रात हो गयी. ब्राह्मणी ने सोंचा अब ये चने रात मे नही खाऊँगी प्रात:काल वासुदेव को भोग लगाकर तब खाऊँगी . यह सोंचकर ब्राह्मणी ने चनों को कपड़े में बाँधकर रख दिया और वासुदेव का नाम जपते-जपते सो गयी .
ब्राह्मणी के सोने के बाद कुछ चोर चोरी करने के लिए उसकी कुटिया मे आ गये.
इधर उधर बहुत ढूँढा चोरों को वह चनों की बँधी पोटली मिल गयी चोरों ने समझा इसमे सोने के सिक्के हैं इतने मे ब्राह्मणी जग गयी और शोर मचाने लगी . गाँव के सारे लोग चोरों को पकड़ने के लिए दौडे. चोर वह पोटली लेकर भागे. पकड़े जाने के डर से सारे चोर संदीपन मुनि के आश्रम में छिप गये. (संदीपन मुनि का आश्रम गाँव के निकट था जहाँ भगवान श्री कृष्ण और सुदामा शिक्षा ग्रहण कर रहे थे)
गुरुमाता को लगा की कोई आश्रम के अन्दर आया है गुरुमाता देखने के लिए आगे बढ़ी। चोर डर गये और आश्रम से भागे ! भागते समय चोरों से वह पोटली वहीं छूट गयी. इधर भूख से व्याकुल ब्राह्मणी ने जब जाना ! कि उसकी चने की पुटकी चोर उठा ले गये तो ब्राह्मणी ने श्राप दे दिया कि ” मुझ दीनहीन असहाय के जो भी चने खायेगा वह दरिद्र हो जायेगा ”
उधर प्रात:काल गुरु माता आश्रम मे झाडू लगाने लगी झाडू लगाते समय गुरु माता को वही चने की पोटली मिली। गुरु माता ने पोटली खोल के देखी तो उसमे चने थे. सुदामा जी और श्रीकृष्ण जंगल से लकड़ी लाने जा रहे थे.
गुरु माता ने वह चने की पुटकी सुदामा जी को दे दी. और कहा बेटा ! जब वन मे भूख लगे तो दोनों लोग यह चने खा लेना . सुदामा जी जन्मजात ब्रह्मज्ञानी थे. ज्यों ही चने की पुटकी सुदामा जी ने हाथ मे लिया त्यों ही उन्हे सारा रहस्य मालूम हो गया.
सुदामा जी ने सोंचा ! गुरु माता ने कहा है यह चने दोनों लोग बराबर बाँट के खाना. लेकिन ये चने अगर मैने त्रिभुवनपति श्री कृष्ण को खिला दिये तो सारी सृष्टि दरिद्र हो जायेगी. मै ऐसा नही करुँगा मेरे जीवित रहते मेरे प्रभु दरिद्र हो जायें मै ऐसा कदापि नही करुँगा. मै ये चने स्वयं खा जाऊँगा लेकिन कृष्ण को नही खाने दूँगा और सुदामा जी ने सारे चने खुद खा लिए. दरिद्रता का श्राप सुदामा जी ने स्वयं ले लिया. लेकिन अपने मित्र श्री कृष्ण को एक भी दाना चना नही दिया.।।
......जय राधे राधे राधे राधे.....

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