15/10/2026
₹55 Crore के कथित Rice Scam में अब तक क्या हुआ? सरकार से सवाल, FCI की जवाबदेही और ACB के स्वतः संज्ञान पर निगाहें
जम्मू। जम्मू-कश्मीर में सरकारी खाद्यान्न की खरीद और उसके कथित व्यावसायिक इस्तेमाल को लेकर उठे सवाल एक बार फिर चर्चा में हैं। जम्मू संवाद ने 17 अगस्त को प्रकाशित अपनी रिपोर्ट में लगभग ₹55 करोड़ मूल्य के चावल से जुड़े मामले को उठाया था। उस रिपोर्ट में FCI से चावल की खरीद, J&K Agro की भूमिका, वितरण और निजी व्यापारिक Traders तक चावल पहुंचने के आरोपों पर सवाल किए गए थे।
अब इस मामले में एक बड़ा सवाल यह है कि पुरानी रिपोर्ट में उठाए गए सवालों पर संबंधित विभागों और एजेंसियों ने क्या कदम उठाए? क्या खरीद से लेकर अंतिम वितरण तक के रिकॉर्ड का मिलान किया गया? क्या कोई विभागीय जांच या ऑडिट हुआ? और क्या इस मामले में कोई कार्रवाई की स्थिति सार्वजनिक की गई?
जम्मू संवाद की पुरानी रिपोर्ट में दावा किया गया था कि जनता के लिए रियायती दरों पर खरीदे गए चावल के वितरण और बिक्री को लेकर गंभीर सवाल हैं। रिपोर्ट में पंजाब के व्यापारी अमन मित्तल का भी उल्लेख था और आरोप लगाया गया था कि AGRO के आधार पर FCI से चावल की खरीद के बाद उसे ट्रकों के जरिए मिलों तक बेचा गया। इन आरोपों की पुष्टि संबंधित खरीद, परिवहन, भुगतान और प्राप्ति के रिकॉर्ड से होना आवश्यक है। संबंधित पक्षों का जवाब भी इस मामले की पूरी तस्वीर सामने लाने के लिए महत्वपूर्ण है।
1.28 करोड़ किलो चावल का हिसाब आखिर कहां है?
इस मामले में पहले सामने आए आंकड़ों के मुताबिक, लगभग 1,28,190 क्विंटल यानी करीब 1.28 करोड़ किलोग्राम चावल की खरीद का मुद्दा उठाया गया था। पहले की पड़ताल में ₹2,320 प्रति क्विंटल की खरीद दर और चावल के संभावित बाजार मूल्य को लेकर भी चर्चा हुई थी।
लेकिन इस मामले की असली तस्वीर केवल खरीद की कीमत से सामने नहीं आएगी। इसके लिए यह जानना जरूरी है कि कुल कितना चावल खरीदा गया, कहां रखा गया, किस तारीख को किस गोदाम से निकला, किस वाहन से भेजा गया और आखिरकार किस संस्था, मिल या लाभार्थी तक पहुंचा।
यदि पूरा चावल निर्धारित योजना के तहत वितरित किया गया, तो वितरण रजिस्टर, स्टॉक रिकॉर्ड और लाभार्थियों से संबंधित दस्तावेज सामने आने चाहिए। यदि किसी हिस्से की बिक्री या किसी अन्य उद्देश्य के लिए आपूर्ति हुई, तो उसका आदेश, कानूनी आधार और भुगतान का रिकॉर्ड भी स्पष्ट होना चाहिए।
सवाल सीधा है—खरीद का रिकॉर्ड मौजूद है, तो चावल के अंतिम इस्तेमाल का पूरा हिसाब भी सार्वजनिक होना चाहिए।
FCI की भूमिका पर भी सवाल
इस मामले में भारतीय खाद्य निगम यानी FCI से भी जवाब मांगा जाना चाहिए। यदि चावल किसी सरकारी योजना या निर्धारित उद्देश्य के तहत रियायती दर पर उपलब्ध कराया गया था, तो खरीद की शर्तें और संबंधित एजेंसी की जिम्मेदारियां क्या थीं?
क्या FCI ने चावल जारी करने के बाद आवश्यक दस्तावेज प्राप्त किए? क्या खरीदने वाली एजेंसी से उपयोग प्रमाणपत्र या स्टॉक का हिसाब मांगा गया? क्या किसी कथित अनियमितता की सूचना मिलने पर रिकॉर्ड का सत्यापन किया गया? और यदि जांच या कार्रवाई हुई है, तो उसकी वर्तमान स्थिति क्या है?
जम्मू संवाद की 17 अगस्त की रिपोर्ट में FCI से इन्हीं सवालों पर जवाब मांगा गया था। अब यह स्पष्ट होना चाहिए कि संबंधित अधिकारियों ने इन सवालों पर क्या कार्रवाई की।
यदि कोई जांच नहीं हुई, तो इसकी वजह क्या है? और यदि जांच हुई है, तो उसके निष्कर्ष सार्वजनिक क्यों नहीं किए गए हैं? इन सवालों पर FCI का आधिकारिक पक्ष सामने आना जरूरी है।
Omar सरकार और J&K Agro से जवाबदेही की मांग
यह मामला केवल खरीद और बिक्री का नहीं, बल्कि सरकारी संस्थाओं की निगरानी और जवाबदेही का भी है। J&K Agro की भूमिका, खरीद प्रक्रिया और चावल के अंतिम इस्तेमाल से जुड़े रिकॉर्ड की जांच किए बिना पूरे मामले की वास्तविक तस्वीर सामने नहीं आ सकती।
जम्मू-कश्मीर सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि क्या इस मामले में कोई विभागीय जांच, विशेष ऑडिट या स्टॉक वेरिफिकेशन कराया गया है। क्या संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा गया? क्या किसी अनियमितता की शिकायत पर कार्रवाई की गई? और यदि कोई जांच लंबित है, तो उसकी स्थिति क्या है?
जम्मू संवाद की पुरानी रिपोर्ट में तत्कालीन प्रबंधन से जुड़े अधिकारियों का भी उल्लेख था। ऐसे में यह पता लगाना जरूरी है कि खरीद, वितरण और निगरानी से जुड़े निर्णय किस स्तर पर लिए गए और प्रत्येक अधिकारी की निर्धारित जिम्मेदारी क्या थी।
हालांकि, केवल किसी अधिकारी का पद पर होना या किसी निर्णय-प्रक्रिया का हिस्सा होना अपने आप में दोष का प्रमाण नहीं है। जिम्मेदारी का निर्धारण संबंधित दस्तावेजों और जांच के निष्कर्षों के आधार पर ही होना चाहिए।
क्या ACB लेगी स्वतः संज्ञान?
अब इस मामले में जम्मू-कश्मीर एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) की भूमिका को लेकर भी सवाल उठता है।
जब सरकारी खाद्यान्न की खरीद और उसके कथित व्यावसायिक इस्तेमाल को लेकर दस्तावेजों के आधार पर सवाल उठाए जा रहे हैं, तो क्या ACB उपलब्ध तथ्यों का स्वतः संज्ञान लेकर प्रारंभिक जांच करेगी?
क्या यह पता लगाया जाएगा कि खरीद से लेकर परिवहन, भंडारण और अंतिम डिलीवरी तक के रिकॉर्ड आपस में मेल खाते हैं या नहीं? क्या किसी स्तर पर सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग, पद के गलत इस्तेमाल या भ्रष्टाचार के प्रथमदृष्टया संकेत मिलते हैं?
यदि उपलब्ध सामग्री से किसी संज्ञेय अपराध के संकेत मिलते हैं, तो संबंधित कानून और प्रक्रिया के तहत जांच की जा सकती है। ACB के स्वतः संज्ञान की संभावना और आवश्यक प्रक्रिया पर अंतिम स्थिति एजेंसी के अधिकार क्षेत्र तथा उपलब्ध तथ्यों पर निर्भर करेगी।
क्या ACB किसी औपचारिक शिकायत का इंतजार करेगी, या उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर खुद पहल करेगी?
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मामले की निष्पक्ष जांच से ही पता चल सकता है कि कहीं कोई अनियमितता हुई भी है या नहीं। बिना जांच किसी व्यक्ति या संस्था को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा।
MD की सेवानिवृत्ति से पहले क्या होगी कार्रवाई?
इस मामले में प्रबंधन की जवाबदेही को लेकर भी सवाल उठाए जाने चाहिए। यदि संबंधित MD या किसी अन्य जिम्मेदार अधिकारी की सेवानिवृत्ति नजदीक है, तो क्या उससे पहले खरीद, स्टॉक और वितरण से जुड़े रिकॉर्ड की जांच की जाएगी?
क्या सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि संबंधित फाइलें, स्टॉक रजिस्टर, परिवहन दस्तावेज और निर्णयों से जुड़े रिकॉर्ड सुरक्षित रहें? यदि किसी अधिकारी का कार्यकाल समाप्त हो जाता है, तो क्या संभावित अनियमितताओं की जांच और जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया जारी रहेगी?
यहां एक तथ्य की पुष्टि आवश्यक है: पुरानी रिपोर्ट में संदेश शर्मा को पूर्व MD के रूप में उल्लेखित किया गया था। इसलिए वर्तमान MD की पहचान और सेवानिवृत्ति की तारीख की आधिकारिक पुष्टि के बिना किसी व्यक्ति के जल्द सेवानिवृत्त होने का दावा नहीं किया जाना चाहिए।
लेकिन व्यापक सवाल कायम है—यदि जांच जरूरी है, तो उसे समय पर शुरू करने और रिकॉर्ड सुरक्षित रखने में देरी क्यों होनी चाहिए?
क्या इस मामले में मिलीभगत हुई? जांच से ही खुलेगा सच
लगातार उठते सवालों के बीच यह पूछना स्वाभाविक है कि क्या खरीद, परिवहन, भंडारण या बिक्री की प्रक्रिया में किसी स्तर पर मिलीभगत हुई थी। लेकिन इस समय इसे साबित तथ्य के रूप में पेश नहीं किया जा सकता।
इसका पता लगाने के लिए खरीद आदेश, भुगतान रिकॉर्ड, ट्रक नंबर, डिस्पैच चालान, गोदामों के स्टॉक रजिस्टर, प्राप्ति दस्तावेज और अंतिम बिक्री या वितरण का मिलान जरूरी है।
यदि दस्तावेजों में अंतर सामने आता है, तो संबंधित अधिकारियों और निजी पक्षों की भूमिका की जांच होनी चाहिए। यदि सभी लेन-देन नियमों के मुताबिक हुए हैं, तो संबंधित एजेंसियों को दस्तावेजों के साथ अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
जम्मू संवाद ने अपनी पुरानी रिपोर्ट में पंजाब के व्यापारी अमन मित्तल का पक्ष जानने की कोशिश किए जाने का भी उल्लेख किया था। इस मामले में किसी भी व्यक्ति या संस्था के बारे में अंतिम निष्कर्ष निकालने से पहले उनका पक्ष और संबंधित रिकॉर्ड दोनों सामने आना जरूरी है।
जम्मू संवाद के पांच सीधे सवाल
* लगभग 1.28 करोड़ किलोग्राम चावल की खरीद और अंतिम इस्तेमाल का पूरा हिसाब कहां है?
* क्या J&K Agro और जम्मू-कश्मीर सरकार ने इस मामले में कोई जांच या ऑडिट कराया?
* क्या FCI ने खरीद की शर्तों, वितरण और कथित व्यावसायिक इस्तेमाल की जांच की?
* क्या ACB उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर स्वतः संज्ञान लेकर प्रारंभिक जांच करेगी?
* यदि कोई अनियमितता सामने आती है, तो संबंधित अधिकारियों और अन्य जिम्मेदार पक्षों की जवाबदेही कैसे तय होगी?
निष्कर्ष: जवाब जरूरी है, आरोपों की निष्पक्ष जांच भी
₹55 करोड़ के कथित चावल मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सार्वजनिक हित से जुड़े सवालों का जवाब दस्तावेजों और आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर दिया जाए। जम्मू संवाद की पुरानी रिपोर्ट में उठाए गए सवालों पर क्या कार्रवाई हुई, यह स्पष्ट होना चाहिए।
सरकार, J&K Agro, FCI और ACB—सभी से यह जानना जरूरी है कि इस मामले में अब तक क्या कदम उठाए गए हैं। यदि कोई जांच नहीं हुई है, तो संबंधित एजेंसियों को उपलब्ध तथ्यों की समीक्षा करनी चाहिए। यदि जांच हुई है, तो उसकी स्थिति और निष्कर्ष उचित प्रक्रिया के तहत सार्वजनिक किए जाने चाहिए।
जनता के नाम पर खरीदे गए खाद्यान्न का हिसाब मिलना चाहिए। सवालों का जवाब भी और, यदि अनियमितता हुई है, तो उसकी निष्पक्ष जांच भी।
जम्मू संवाद इस मामले में संबंधित पक्षों का जवाब लेने और दस्तावेजों के आधार पर पड़ताल जारी रखने की मांग करता है। सरकार और संबंधित एजेंसियों का पक्ष मिलने पर उसे भी इस रिपोर्ट में शामिल किया जाएगा ।