27/08/2026
आरक्षण की समाप्ति नहीं, जातिवाद की समाप्ति — तभी बनेगा समरस और विकसित भारत
संकल्प — प्रदीप कुमार निरंजन
मैं, प्रदीप कुमार निरंजन, आज यह संकल्प लेता हूँ कि भारत में केवल आरक्षण की समाप्ति की बात करना पर्याप्त नहीं है। यदि वास्तव में हम एक ऐसे भारत का निर्माण करना चाहते हैं, जहाँ समरसता, समरूपता, समानता और सामाजिक न्याय स्थापित हो, तो सबसे पहले हमें जातिवाद की मानसिकता को समाप्त करने का प्रयास करना होगा।
भारत की पहचान सदियों से विविधताओं में एकता की रही है। यहाँ अनेक जातियाँ, भाषाएँ, धर्म, संस्कृतियाँ और परंपराएँ हैं। यह विविधता हमारी शक्ति है, लेकिन जब यही विविधता जातिगत भेदभाव, ऊँच-नीच और सामाजिक दूरी का कारण बन जाती है, तब यह राष्ट्र की प्रगति में बाधा बनती है।
आरक्षण को केवल राजनीतिक या सामाजिक सुविधा के रूप में देखने के बजाय उसके ऐतिहासिक संदर्भ को समझना आवश्यक है। भारतीय समाज में लंबे समय तक अनेक समुदायों को शिक्षा, सम्मान, अवसर और सामाजिक भागीदारी से वंचित रखा गया। संविधान निर्माताओं ने इसी ऐतिहासिक असमानता को कम करने के लिए विशेष प्रावधानों की व्यवस्था की। इसलिए आरक्षण पर चर्चा करते समय सामाजिक न्याय और समान अवसर के मूल उद्देश्य को समझना आवश्यक है।
लेकिन हमारा अंतिम लक्ष्य केवल आरक्षण व्यवस्था को बनाए रखना या समाप्त करना नहीं होना चाहिए। हमारा वास्तविक लक्ष्य ऐसा समाज बनाना होना चाहिए जहाँ किसी व्यक्ति की पहचान उसकी जाति से नहीं, बल्कि उसके चरित्र, कर्म, प्रतिभा, योग्यता और मानवीय मूल्यों से हो।
जातिवाद केवल कानून से समाप्त नहीं होगा; इसके लिए मानसिकता बदलनी होगी। हमें अपने परिवारों, विद्यालयों, संस्थानों और समाज में बच्चों को यह सिखाना होगा कि कोई भी मनुष्य जन्म से बड़ा या छोटा नहीं होता। सम्मान सभी के लिए समान होना चाहिए। विवाह, मित्रता, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक संबंधों में जातिगत पूर्वाग्रहों को धीरे-धीरे समाप्त करना होगा।
सच्ची समानता का अर्थ यह नहीं कि सभी लोगों की परिस्थितियाँ पहले से समान मान ली जाएँ; बल्कि इसका अर्थ है कि प्रत्येक व्यक्ति को आगे बढ़ने के लिए न्यायपूर्ण अवसर और सम्मान मिले। जब शिक्षा की गुणवत्ता, रोजगार के अवसर, आर्थिक क्षमता और सामाजिक सम्मान में व्यापक असमानताएँ कम होंगी, तब आरक्षण जैसी सकारात्मक नीतियों की आवश्यकता और स्वरूप पर भी अधिक न्यायपूर्ण तथा तथ्यपरक चर्चा संभव होगी।
हमें ऐसा भारत बनाना है जहाँ किसी बच्चे से यह न पूछा जाए कि वह किस जाति का है, बल्कि यह पूछा जाए कि वह जीवन में क्या बनना चाहता है। जहाँ किसी की सफलता पर उसकी जाति नहीं, उसकी मेहनत दिखाई दे। जहाँ किसी व्यक्ति का सम्मान उसके जन्म से नहीं, उसके कर्म से निर्धारित हो।
समरस भारत का निर्माण किसी एक वर्ग के विरुद्ध खड़े होकर नहीं, बल्कि सभी वर्गों को साथ लेकर ही संभव है। हमें जाति के आधार पर नफरत नहीं, बल्कि समान नागरिकता की भावना विकसित करनी होगी। हमें संविधान के मूल्यों—न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता—को अपने व्यवहार में उतारना होगा।
विकसित भारत केवल ऊँची इमारतों, बड़ी अर्थव्यवस्था और आधुनिक तकनीक से नहीं बनेगा। विकसित भारत तब बनेगा, जब देश का प्रत्येक नागरिक स्वयं को सम्मानित, सुरक्षित, सक्षम और समान अवसरों का अधिकारी महसूस करेगा।
इसलिए मेरा संकल्प है—
“आरक्षण की समाप्ति नहीं, पहले जातिवाद की समाप्ति हो।
जाति नहीं, योग्यता और मानवता हमारी पहचान हो।
भेदभाव नहीं, बंधुता हमारा संस्कार हो।
असमानता नहीं, समान अवसर हमारा लक्ष्य हो।
और समरस, न्यायपूर्ण एवं विकसित भारत हमारा सामूहिक स्वप्न हो।”
यही सोच भारत को केवल आर्थिक रूप से नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक रूप से भी विकसित राष्ट्र बनाएगी।
— प्रदीप कुमार निरंजन
संकल्प: जातिवाद-मुक्त, समरस और विकसित भारत
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