19/11/2020
मगध अपने स्वाभिमान से समझौता नहीं किया और मिथिलांचल पांच किलों चावल और एक हजार रुपया पर अपने स्वाभिमान को गिरवी लगा दिया इस पोस्ट को लेकर काफी प्रतिक्रियाएँ आयी है जिसमें कई तीखी प्रतिक्रिया भी है मैंने क्यों लिखा आज इस पर खुलकर अपनी बात रख रहा हूं आप अपनी बात भी खुल कर रख सकते हैं बढ़िया बहस होनी चाहिए बहस से कुछ ना कुछ सार्थक बातें निकल कर सामने आएगी ।
कहने को भारत एक संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य है लेकिन हकीकत क्या है हमारे पीएम और सीएम नमक से लेकर प्लेन तक का भाड़ा तय करते हैं, इतना ही नहीं क्या पढ़ना कैसे पढ़ना है कहां पढ़ना ,क्या खाना है क्या नहीं खाना ,क्या नहीं करना है इस स्तर तक हमारे जीवन में इनका हस्तक्षेप है ये शक्ति राजा को भी प्राप्त नहीं था ।
लेकिन सवाल यह है कि लोकतांत्रिक देश में ये शक्ति इनको मिलती कहां से हैं उसी एक वोट से जो हमारे आपके प्राथमिकता में सबसे निम्न स्तर है ।
अब मैं सीधे विषय वस्तु पर आ जाते हैं लॉकडाउन के दौरान भारत के अन्य हिस्सों से सबसे अधिक प्रवासी मजदूर बिहार लौटे थे उनमें से सबसे अधिक मजदूर मिथिलांचल में लौटे थे ।
सरकार के आंकड़ों को ही ले तो 40 लाख मजदूर लौटा था जिसमें 30 लाख मजदूर मिथिलांचल से ही है। सड़कों पर पैदल चलते हुए मरने कि जितनी भी खबरें आई सारे के सारे इन्ही इलाकों से था।
जिस वीडियो और तस्वीर को देखकर आपकी रूह कांप रही थी उन सारी तस्वीरों का सम्बन्ध इन्ही इलाकों से था ,बेटी बाप को साइकिल से लेकर दिल्ली से दरभंगा पहुंचता ये भी इसी इलाके से आती है ।
कोटा से बिहार में जितने छात्र लौटे थे उनमें से 80 प्रतिशत छात्र भी इन्ही इलाकों से आते हैं समस्तीपुर ,दरभंगा .मुजफ्फरपुर,कटिहार .पूर्णिया से ना जाने कितने फोन काॅल आये होंगे ।
उस दौरान विधायक और मंत्री अपना मोबाइल स्वीच आंफ कर लिये थे याद करिए क्या हाल था कोटा में पढ़ने वाले बच्चों का, कोटा में बच्चा तरप रहा था एक से एक इमोशनल वीडियो हम लोगों को भेज रहा था और बिहार में उनके परिजन फोन कर कर के रो रहे थे। ऐसे रोने वाले एक दर्जन से अधिक अभिभावक को मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूं कि इस बार भी वो उसी विधायक को घंटों लाइन में खड़े होकर वोट किये जो फोन बंद कर लिया था ।
याद करिए बिहार में प्रवासी मजदूरों को लेकर आने वाली ट्रेन चार से पांच दिनों में बिहार पहुंच रही थी उनमें से अधिकांश ट्रेनों का रिश्ता मिथिलांचल से ही थी फोन काॅल कर कर के परेशान किये हुए था फिर खबरे जब चलनी शुरू हुई तो चीजें बदली लेकिन व्यवस्था पर चोट करने के लिए तो कठोर निर्णय लेने कि जरूरत है।
सरकार में कौन आयेगा ये महत्वपूर्ण नहीं है महत्वपूर्ण है सरकार सही तरीके से चले और ऐसा नहीं है तो फिर रोने कि भी जरूरत नहीं है। दरभंगा मेडिकल कॉलेज में कोरोना काल के दौरान एक बड़े नामचीन प्रो0 का परिवार पूरी रात पीएमओ से लेकर सीएमओ तक फोन करके पिता के इलाज के लिए गुहार लगाता रहा लेकिन कोई डाँ इलाज के लिए नहीं आया और ऑक्सीजन के अभाव में पत्नी की गोद में तरप तरप जान दे दिया ।
चुनाव के दिन मैं वही था पूरा परिवार वोट देने के लिए लाइन में खड़ा था और मुस्कुराते हुए सवाल किया क्या था इस बार वोट दरभंगा मेडिकल कॉलेज के स्वास्थ्य व्यवस्था में बदलाव के लिए दिया जा रहा है क्या कहना है उसका जवाब सुनकर आप भी खुश हो जाएंगे।
इसी तरीके से पटना शहर में जिस दिन चुनाव हो रहा था मैं दोपहर बाद उसी मतदान केन्द्र पर गये थे जहां के लोग 2019 के बाढ़ सब कुछ लूट चुके थे । मुझे याद है पटना विश्वविद्यालय के एक बड़े नामचीन प्रोफेसर का रो रो कर बुरा हाल था उनकी सारी कृति ,लेखनी और किताब सब कुछ उस मानव जनित बाढ़ में बर्बाद हो गया था लेकिन जब मोइन उल हक स्टेडियम स्थिति मतदान केन्द्रों पर लोगों से बात किये तो क्या कहना था वो एक त्रासदी था धीरे धीरे ठीक होगा ना, एक बार कैसे बदलाव होगा इस बार हम लोग विकास पर वोट कर रहे हैं ।
जो परिवार अपनी पूरी जिंदगी कि कमाई गवा दी उन्हें भी राजेन्द्र नगर के उस इलाके में विकास दिख रहा था जहां सरकार की लापरवाही के कारण इतनी बड़ी त्रासदी झेलनी पड़ी थी ।ये तात्कालिक मसला है स्थाई कारण बाढ़ शिक्षा, स्वास्थ्य और भ्रष्टाचार है जिसको लेकर हम लोग रोजाना जूझते रहते हैं रेंगते रहते हैं लेकिन इस मसले पर चुनाव में चर्चा तक नहीं होती है
यही हमारी समझ है और इसी समझ के सहारे इस देश में लोकतंत्र चल रहा है ऐसे में जब तक हम लोग पार्टी में बंटे रहेंगे कीड़े मकोड़े कि तरह जिंदगी जीने को विवश होंगे मेरा मकसद सिर्फ आपको पार्टी और व्यक्ति रुपी अफीम जैसे नशे से बाहर निकालना है ठंडे दिमाग से सोचिए आपने क्या खोया है ।