भारतीय भाषा आंदोलन - दिल्ली

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भारतीय भाषा आंदोलन - दिल्ली bhartiya bhasha aandolan Delhi, भारतीय भाषा आंदोलन दिल्ली

भारतीय भाषा आंदोलन का उदेश्य जनता को न्याय जनता की भाषा में दिलाना है।
हरियाणा सरकार ने अभियान की मांग स्वीकार करते हुए अपनी राज्य की भाषा को न्यायपालिका का अनिवार्य अंग बनाया है। व सर्वोच्च न्यायालय ने 13 प्रादेशिक भाषाओं में अपने निर्णयों को जारी करना आरंभ किया है

09/07/2025
30/06/2025
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भारतीय भाषाओं के महत्व पर जोर देते हुए एक बड़ा बयान दिया है. उन्होंने कहा कि वह दिन दूर ...
23/06/2025

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भारतीय भाषाओं के महत्व पर जोर देते हुए एक बड़ा बयान दिया है. उन्होंने कहा कि वह दिन दूर नहीं जब भारत में लोग अंग्रेजी बोलने पर शर्मिंदगी महसूस करेंगे, एक किताब के विमोचन के मौके पर बोलते हुए अमित शाह ने कहा, 'मेरी बात ध्यान से सुनिए और याद रखिए, इस देश में अंग्रेजी बोलने वालों को शर्म आएगी, ऐसे समाज का निर्माण अब दूर नहीं है.

19/06/2025

भारतीय न्यायपालिका और हिन्दी भाषा

भारतीय लोकतंत्र की तीन प्रमुख संस्थाओं — विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका — में न्यायपालिका को विशेष महत्व प्राप्त है। यह संविधान की व्याख्या करने वाली सर्वोच्च संस्था है और नागरिकों के मौलिक अधिकारों की संरक्षक भी। परंतु जब भाषा की बात आती है, तो भारतीय न्यायपालिका में हिन्दी भाषा की स्थिति एक जटिल और विचारणीय विषय बन जाती है।

1. भारतीय न्यायपालिका में भाषा का महत्व

भारत एक बहुभाषी देश है, और संविधान ने हिन्दी को राजभाषा का दर्जा दिया है। संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार, संघ सरकार का कामकाज हिन्दी में होना चाहिए। लेकिन न्यायपालिका में, विशेषकर उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में, अभी भी अंग्रेज़ी का वर्चस्व बना हुआ है।

2. न्यायपालिका में हिन्दी की वर्तमान स्थिति

सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालय: संविधान के अनुच्छेद 348(1) के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों की कार्यवाही और निर्णय अंग्रेज़ी में होंगे। हालांकि, राज्य सरकारें भारत सरकार की अनुमति से उच्च न्यायालयों में हिन्दी अथवा राज्य की अन्य भाषाओं का प्रयोग कर सकती हैं।

निचली अदालतें: यहाँ स्थानीय भाषाओं और हिन्दी का अधिक उपयोग होता है। आम नागरिकों की पहुंच इन अदालतों तक अधिक होती है, इसलिए भाषा का लोकप्रचलित स्वरूप आवश्यक होता है।

3. हिन्दी के प्रयोग की चुनौतियाँ

कानूनी शब्दावली की जटिलता: हिन्दी में तकनीकी और विधिक शब्दों का अभाव या असामान्यता।

न्यायाधीशों और अधिवक्ताओं की शिक्षा: अधिकांश न्यायिक अधिकारी और वकील अंग्रेज़ी माध्यम से शिक्षित होते हैं।

अनुवाद की समस्या: अंग्रेज़ी से हिन्दी में सटीक अनुवाद करना चुनौतीपूर्ण होता है, विशेषकर जब कानून की व्याख्या की बात आती है।

4. हिन्दी को प्रोत्साहन देने के प्रयास

राजभाषा विभाग और विधि मंत्रालय समय-समय पर न्यायिक शब्दावली का हिन्दीकरण कराता है।

अनेक राज्यों में उच्च न्यायालयों में हिन्दी में याचिका दाखिल करने की अनुमति दी गई है, जैसे: उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार आदि।

अनुवादकों और हिन्दी में विधिक शिक्षा की उपलब्धता बढ़ाई जा रही है।

5. आगे की दिशा

हिन्दी को न्यायपालिका में प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए सतत प्रयासों की आवश्यकता है।

कानून की पढ़ाई हिन्दी में भी सुलभ होनी चाहिए।

न्यायिक दस्तावेज़ों, निर्णयों और अधिनियमों के प्रमाणिक हिन्दी अनुवाद सुलभ कराना होगा।

डिजिटल तकनीकों और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से अनुवाद और भाषा-सम्बंधित बाधाएँ कम की जा सकती हैं।

निष्कर्ष

भारतीय न्यायपालिका में हिन्दी का प्रयोग संविधान के अनुरूप बढ़ाया जा सकता है, परंतु यह केवल भाषाई निर्णय नहीं, बल्कि एक प्रशासनिक, तकनीकी और शैक्षिक चुनौती भी है। यदि सही दिशा में प्रयास किए जाएँ, तो हिन्दी को न्यायिक व्यवस्था का अभिन्न अंग बनाना न केवल संभव है, बल्कि आवश्यक भी है — ताकि आम जन तक न्याय सरल भाषा में पहुँच सके।

अगर आप चाहें तो मैं इस विषय पर निबंध, भाषण, पीपीटी या लेख भी तैयार कर सकता हूँ।

04/03/2025
भारतीय भाषा आंदोलन की राष्ट्रीय टोली कानून मंत्री से मिलकर, आंदोलन के विषय जनता को न्याय जनता की भाषा में मिले, को रखा औ...
02/02/2025

भारतीय भाषा आंदोलन की राष्ट्रीय टोली कानून मंत्री से मिलकर, आंदोलन के विषय जनता को न्याय जनता की भाषा में मिले, को रखा और जल्द न्यायपालिका में भारतीय भाषाओं के प्रयोग हेतु अनुरोध किया।

🙏दुखद सूचना🙏हमारे भारतीय भाषा आंदोलन के कर्मठ कार्यकर्ता   श्री सुनील सिंह जी के पिता जी का स्वर्गवास हो गया है।ॐ शान्ति...
22/01/2025

🙏दुखद सूचना🙏

हमारे भारतीय भाषा आंदोलन के कर्मठ कार्यकर्ता श्री सुनील सिंह जी के पिता जी का स्वर्गवास हो गया है।

ॐ शान्ति शान्ति शान्ति

 #भारतीय_भाषा_आंदोलन की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की आज दिनांक 5 जनवरी 2025 को बैठक आयोजित हुई।बैठक में मंच संचालन नितिन निच...
05/01/2025

#भारतीय_भाषा_आंदोलन की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की आज दिनांक 5 जनवरी 2025 को बैठक आयोजित हुई।

बैठक में मंच संचालन नितिन निचोड़िया ने किया।

बैठक में आंदोलन के राष्ट्रीय महामंत्री प्रशांत वर्मा जी ने कहा कि राष्ट्रीय कार्यकारिणी के 3 वर्ष का कार्यकाल पूरा हो चुका है और सभी प्रमुख अधिकारियों और कार्यकर्ताओं से विचार विमर्श के उपरांत नई कार्यकारिणी के कुछ नाम सर्व सहमति से तय हुए हैं और उन्होंने निम्न दायित्वों की घोषणा की जिस पर सभी उपस्थित राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्यों ने सहमति प्रकट की: -

अध्यक्ष: श्री नवीन कौशिक जी ( चंडीगढ़)
उपाध्यक्ष : श्री प्रशांत वर्मा जी (उड़ीसा)
श्रीमति रेखा मेहता जी (मुंबई),
श्रीमति अनीता जी (चेन्नई, तमिलनाडु) और
श्रीमान देवेंद्र मणि त्रिपाठी जी प्रयागराज।
राष्ट्रीय महामंत्री: श्री हरगोविंद उपाध्याय जी लखनऊ।
मंत्री : श्री नितिन निचोड़िया और श्रीमति उषा शर्मा जी (दिल्ली)
राष्ट्रीय कोष प्रमुख: प्रभात रंजन जी (पटना बिहार)
राष्ट्रीय महिला प्रमुख : श्रीमती प्रतिभा वर्मा जी (भुवनेश्वर,उड़ीसा)
सह महिला प्रमुख: सुश्री प्रतिभा सिंह जी (लखनऊ,उत्तरप्रदेश)।
विशेष आमंत्रित सदस्य ; माननीय श्री अरुण भारद्वाज जी, श्रीमती पूनम गौड़ जी, श्री आशीष राय जी।

नव नियुक्त कार्यकारिणी सदस्यों को भारतीय भाषा आंदोलन के संस्थापक अध्यक्ष श्री अरुण भारद्वाज जी ने शुभाशीष दी और मिलजुल कर कार्यक्रमों के माध्यम से आंदोलन को नई ऊंचाइयों पर पहुंचने का आग्रह किया।

पूर्व आंदोलन की राष्ट्रीय महिला प्रमुख पूनम गौड़ जी ने तन मन धन से आंदोलन की नई कार्यकारिणी को सहयोग देने का आश्वासन दिया और सभी नवनियुक्त पदाधिकारी को शुभाशीष दिया।

इस अवसर पर नवनियुक्त अध्यक्ष श्री नवीन कौशिक जी ने कहा कि राष्ट्रीय कार्यकारिणी के शेष पदाधिकारी और राज्यों के अध्यक्षों की घोषणा फरवरी माह के दूसरे सप्ताह तक कर दी जाएगी।

कार्यक्रम का समापन नवनिर्वाचित महामंत्री श्री हरगोविंद उपाध्याय जी के द्वारा किया गया

भारत के संविधान के अनुच्छेद 348(1) में प्रावधान है कि उच्चतम न्यायालय और प्रत्येक उच्च न्यायालय में सभी कार्यवाही अंग्रे...
28/11/2024

भारत के संविधान के अनुच्छेद 348(1) में प्रावधान है कि उच्चतम न्यायालय और प्रत्येक उच्च न्यायालय में सभी कार्यवाही अंग्रेजी भाषा में होगी जब तक कि संसद विधि द्वारा अन्यथा उपबंध न करे ।

अनुच्छेद 348(2) में उपबंध है कि किसी राज्य का राज्यपाल, राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से उच्च न्यायालय की कार्यवाहियों में, जिसका मुख्य स्थान उस राज्य में है, हिन्दी भाषा का या उस राज्य के शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाली किसी अन्य भाषा का प्रयोग प्राधिकृत कर सकेगा। राजभाषा अधिनियम, 1963 में इसी बात को दोहराया गया है और धारा 7 के तहत उपबंध किया गया है कि किसी राज्य का राज्यपाल, राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से अंग्रेजी भाषा के अतिरिक्त हिन्दी या उस राज्य की राजभाषा का प्रयोग, उस राज्य के उच्च न्यायालय द्वारा पारित या दिए गए किसी निर्णय, डिक्री या आदेश के प्रयोजनों के लिए प्राधिकृत कर सकेगा । इस संबंध में संसद द्वारा अभी तक कोई कानून नहीं बनाया गया है । अतः उच्चतम न्यायालय की सभी कार्यवाहियाँ अंग्रेजी भाषा में होती हैं ।

भारत के 18वें विधि आयोग ने “भारत के उच्चतम न्यायालय में अनिवार्य भाषा के रूप में हिन्दी की शुरुआत करने की अवव्यवहार्यता” (2008) पर अपनी 216वीं रिपोर्ट में सभी हितधारकों के साथ विस्तृत विचार विमर्श करने के उपरांत, अन्य बातों के साथ-साथ सिफ़ारिश की गई है कि उच्चतम न्यायपालिका पर वर्तमान सामाजिक संदर्भ में किसी भी प्रकार का परिवर्तन, चाहे वह प्रेरक स्वरूप का ही क्यों न हो, नहीं थोपा जाना चाहिए ।

मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार के राज्यों के उच्च न्यायालयों में कार्यवाहियों के साथ-साथ निर्णयों, आदेशों या आदेशों में भी हिंदी के प्रयोग को प्राधिकृत किया गया है । भारत सरकार को मद्रास उच्च न्यायालय, गुजरात उच्च न्यायालय और छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की कार्यवाही में क्रमशः तमिल, गुजराती और हिंदी के प्रयोग की अनुमति देने के लिए तमिलनाडु, गुजरात और छत्तीसगढ़ सरकार से प्रस्ताव प्राप्त हुए थे । इन प्रस्तावों पर 1965 में लिए गए संसदीय समिति के एक उस निर्णय के अनुसार भारत के मुख्य न्यायमूर्ति की सलाह मांगी गई थी, जिसमें प्रावधान है कि किसी उच्च न्यायालय की कार्यवाही में हिन्दी या किसी भी क्षेत्रीय भाषा के उपयोग के किसी भी प्रस्ताव पर विचार करने से पहले भारत के मुख्य न्यायमूर्ति की टिप्पणियाँ आवश्यक हैं । भारत के मुख्य न्यायमूर्ति ने अपने दिनांक 16.10.2012 के अ.शा. पत्र द्वारा सूचित किया कि पूर्ण न्यायालय ने उचित विचार विमर्श के उपरांत प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करने का निर्णय लिया । सरकार ने उच्चतम न्यायालय के निर्णय का पालन किया है ।

तमिलनाडु सरकार से प्राप्त अन्य अनुरोध के आधार पर सरकार ने भारत के मुख्य न्यायमूर्ति से दिनांक 04.07.2014 के अ.शा. पत्र द्वारा उच्च न्यायालयों में हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं के प्रयोग के लिए और अधिक लचीलापन प्रदान करने के लिए इस संबंध में पिछले निर्णयों की समीक्षा करने और भारत के उच्चतम न्यायालय की सहमति भेजने का अनुरोध किया है । माननीय भारत के मुख्य न्यायमूर्ति ने अपने दिनांक 18.01.2016 के अ.शा. पत्र द्वारा सूचित किया है कि पूर्ण न्यायालय ने विस्तृत विचार विमर्शों के उपरांत इन प्रस्तावों को निरनुमोदित किया है और उन संकल्पों को दोहराया है ।

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