28/08/2026
नेताओं के वादों के बीच हर साल ‘टापू’ बन जाता है टीकमगढ़, दिगौड़ा और ज्योरा नाले खोलते हैं विकास की पोल
टीकमगढ़। आजादी के आठ दशक बाद भी टीकमगढ़ में बरसात आते ही विकास के दावों की तस्वीर बदल जाती है। बारिश बढ़ते ही दिगौड़ा और ज्योरा नाले उफान पर आ जाते हैं और टीकमगढ़-झांसी मार्ग पर आवागमन थम जाता है। हजारों लोगों को घंटों नहीं, कई बार दिनों तक परेशानी का सामना करना पड़ता है।
विडंबना यह है कि समस्या नई नहीं है। हर साल बारिश से पहले उम्मीद जगती है कि इस बार शायद स्थायी समाधान होगा, लेकिन पानी उतरते ही मुद्दा भी मानो बह जाता है। चुनाव के दौरान जिन सड़कों, पुलों और सुविधाओं के वादों की गूंज सुनाई देती है, वही वादे बरसात में खामोश नजर आते हैं।
दिगौड़ा और ज्योरा नाले पृथ्वीपुर,जतारा विधानसभा क्षेत्र में आते हैं। यहां से अलग-अलग समय में सत्ता पक्ष और विपक्ष के जनप्रतिनिधि चुने जाते रहे हैं, लेकिन वर्षों पुरानी इस समस्या का स्थायी समाधान अब तक नहीं हो सका। सवाल सिर्फ किसी एक दल या नेता का नहीं, बल्कि उन सभी जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही का है, जिन्होंने इस समस्या को जानते हुए भी इसे प्राथमिकता नहीं बनाया।
सबसे ज्यादा पीड़ा उन ग्रामीणों और यात्रियों की है, जिनके लिए यह मार्ग रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है। बारिश में नाला उफनता है तो स्कूल जाने वाले बच्चे, मरीज, नौकरी-पेशा लोग, किसान और व्यापारी—सभी रास्ता खुलने का इंतजार करते रह जाते हैं। निवाड़ी के वरिष्ठ पत्रकार मोंटी वर्मा कहते हैं कि यहां के नेताओं ने जनता के मुद्दों को छोड़कर सिर्फ अपना घर भरा हैं। चाहे वह विपक्ष का नेता हो या सत्ता पक्ष का सभी एक ही थाली के चट्टे बट्टे हैं
टीकमगढ़ को टापू बनने से रोकने के लिए अब सवाल सिर्फ यह नहीं कि गलती किसकी है, बल्कि यह भी है कि समाधान की जिम्मेदारी कौन लेगा? जनता को हर बरसात में पानी उतरने का इंतजार नहीं, स्थायी समाधान चाहिए। इस समस्या के लिए आप किसे जिम्मेदार मानते हैं—सत्ता पक्ष, विपक्ष या वर्षों से चली आ रही प्रशासनिक उदासीनता?
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