08/05/2026
कुछ मर्द अपनी मर्दानगी केवल औरतों के जिस्म तक ही सीमित है ऐसे मर्दों को मर्द नहीं बल्कि हिजड़ों से भी गए गुजरे का दर्जा देती हु।
.... समाज में कुछ पुरुष अपनी मर्दानगी को केवल महिलाओं के शरीर तक सीमित कर लेते हैं। वे भूल जाते हैं कि मर्दानगी असल में चरित्र की ऊँचाई, संवेदनशीलता, आत्मसंयम और दूसरों का सम्मान करने में होती है। ऐसे पुरुष न केवल महिलाओं के लिए अभिशाप बन जाते हैं, बल्कि वे हिजड़ों से भी गए-गुजरे साबित होते हैं—क्योंकि हिजड़ा तो प्रकृति की मजबूरी है, पर ये अपनी सोच की गंदगी खुद चुनते हैं।
हाल ही में एक साहसी IPS महिला अधिकारी B Shumithi ने इस गंदगी को नंगा करने का साहस किया। वे सिविल ड्रेस में रात के अंधेरे में सड़क पर उतरीं—उस उद्देश्य से कि प्रतिदिन आम महिलाएँ क्या कुछ झेलती हैं, इसे अपनी आँखों से देखा जाए। लगभग 11 बजे रात से 3 बजे तक, मात्र तीन घंटे में करीब 40 मनचले उनके पास आए। उन्होंने उनकी उम्र, रंग-रूप या हैसियत कुछ नहीं देखा। बस पूछा— “कितना लेगी?”, “क्या चलेगा?”, “रेट क्या है?”—जैसे भद्दे और अश्लील सवाल। वे नहीं जानते थे कि उनकी हरकतें कैमरे में कैद हो रही हैं।
यह IPS अधिकारी 52 वर्ष की हैं। सोचिए—एक 52 वर्षीय महिला, जो देश की सेवा कर रही है, जिसके कंधों पर जिम्मेदारियों का बोझ है, अगर सड़क पर सुरक्षित नहीं है, तो युवा लड़कियाँ, कॉलेज जाने वाली छात्राएँ, ऑफिस जाती महिलाएँ और घर से निकलने वाली माताएँ कैसे सुरक्षित रहेंगी?
इस घटना ने दो बातें साफ कर दीं। पहली, महिलाओं के दर्द को समझने के लिए एक वरिष्ठ महिला अधिकारी ने अपनी सुरक्षा को दांव पर लगा दिया। उन्होंने सोचा नहीं कि “मुझे कुछ हो गया तो?” बस महिलाओं की पीड़ा को समझने की चिंता थी। दूसरी, समाज में कितनी गहरी बीमारी फैली हुई है। 40 लोग मात्र तीन घंटे में—यानी हर कुछ मिनट में एक। यह आँकड़ा डरावना है।
मर्दानगी क्या है, असली मर्द वह है जो कमजोर को देखकर शोषण नहीं, संरक्षण का भाव रखता है। जो किसी भी उम्र की महिला को देखकर उसे “ऑब्जेक्ट” नहीं, एक इंसान मानता है—माँ, बहन, बेटी या किसी और की माँ, बहन, बेटी। जिसकी नजर में यौवन नहीं, बल्कि इंसानियत होती है। जो समझता है कि हर महिला का अपना व्यक्तित्व, सपने, सम्मान और अधिकार है।
जब हम अपनी सोच में किसी के यौवन को फिट कर लेते हैं, तब हम इंसानियत खो देते हैं। तब नजरें गंदी हो जाती हैं, बातें भद्दी हो जाती हैं और चरित्र गिर जाता है। इसीलिए जरूरत है कि हम **न्यूट्रल नजरिया** अपनाएँ। हर महिला को एक सामान्य इंसान की तरह देखें—जिसके साथ व्यवहार सम्मानजनक, शालीन और सभ्य हो।
समाज को बदलना होगा
देश में गंदगी है—इसे स्वीकार करना पहला कदम है। लेकिन इसे साफ करने की जिम्मेदारी सिर्फ कानून की नहीं, हम सबकी है।
माता-पिता को बेटों को सम्मान सिखाना चाहिए, सिर्फ सफलता नहीं।
स्कूलों-कॉलेजों में जेंडर सेंसिटिविटी की शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए।
पुरुषों को खुद से सवाल करना चाहिए— “क्या मैं किसी की बेटी के साथ वैसा व्यवहार सहन कर पाऊँगा, जैसा मैं दूसरों की बेटियों के साथ करता हूँ?”
मीडिया और सोशल मीडिया को भी जिम्मेदारी लेनी होगी। महिलाओं को ऑब्जेक्ट बनाकर पेश करना बंद होना चाहिए।
वह IPS अधिकारी अपने कर्तव्य का पालन कर रही थीं, लेकिन उन्होंने एक बड़ा संदेश भी दिया—महिलाओं की सुरक्षा सबकी जिम्मेदारी है। अब हमें उनकी इस बहादुरी को व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए।
आइए, हम सब मिलकर एक ऐसे समाज का निर्माण करें जहाँ हर महिला बिना डरे घर से निकल सके। जहाँ उम्र, कपड़े या समय कुछ भी हो, उसकी इज्जत पर कोई सवाल न उठाए। जहाँ पुरुष अपनी मर्दानगी को हिंसा या वासना में नहीं, बल्कि गरिमा, संवेदना और सुरक्षा में तलाशें।
एक सामान्य, शालीन और सम्मानजनक नजरिया—यही असली बदलाव है। जब हम इस सोच को अपनाएंगे, तब समाज स्वतः सुधरेगा। महिलाएँ सुरक्षित महसूस करेंगी और पुरुष खुद को सच्चा मर्द कहने का हक हासिल करेंगे।
एक बेहतर, सुरक्षित और सम्मानपूर्ण भारत के लिए। 🙏
TopFan