14/07/2024
सहवास, संभोग, या कहें वो रातें जो मैंने अनजान मर्दों के साथ बिताईं
और मैं आपको वो सच बताने जा रही हूँ, जिसने मेरी जिंदगी को हमेशा के लिए बदल दिया।
मैं और मेरा पति अजय एक छोटे से किराए के मकान में रहते थे। हमारा बेटा, मनीष, सिर्फ तीन साल का था जब उसे पता चला कि उसका दिल कमजोर है। डॉक्टर ने कहा, "ऑपरेशन जरूरी है, लाखों लगेंगे।" अजय एक दुकान में क्लर्क था, उसकी कमाई से तो दवाइयाँ भी मुश्किल से आती थीं। हर रात मैं मनीष की साँसें गिनती, और अजय चुपचाप सिगरेट फूँकता। मैंने ठान लिया—मैं अपने बच्चे को नहीं खो सकती।
एक दिन मेरी पुरानी सहेली मीना से मुलाकात हुई। उसने कहा, "राधा, मेरे साथ बार में काम कर। वेट्रेस की जॉब है, अच्छे टिप्स मिलते हैं।" मैंने हिचकिचाते हुए हाँ कहा। अजय को बताया कि रात की शिफ्ट में रेस्तरां में काम करूँगी। वो बोला, "ठीक है, बस ध्यान रखना।"
बार की दुनिया वैसी नहीं थी जैसी मैंने सोची थी। चमकीली लाइटें, शराब की महक, और मर्दों की भूखी नजरें। मैं ट्रे लिए इधर-उधर घूमती, मुस्कुराती, और टिप्स जमा करती। पर एक रात, मालिक ने मुझे अलग बुलाया। "राधा, ग्राहकों को 'खास सर्विस' दे, तो तुझे दस गुना पैसे मिलेंगे।" मैं समझ गई वो क्या कह रहा था। मैंने मना किया, पर उसने कहा, "तेरे बच्चे का इलाज करना है न? सोच ले।"
उस रात मैं घर गई, मनीष को सीने से लगाया। उसकी धीमी साँसें सुनकर मेरा दिल टूट रहा था। अगली रात, मैंने मालिक को हाँ कह दिया। पहली बार था—एक अनजान मर्द, एक अंधेरा कमरा, और मेरे मन में सिर्फ मनीष की तस्वीर। मुझे घिन सी महसूस हुई, पर जेब में मोटी रकम थी। फिर एक बार, दो बार, ये सिलसिला चल पड़ा। पहले मजबूरी थी, फिर आदत। वो रातें मुझे पैसों के साथ एक अजीब सा नशा भी देती थीं। मैं रात-रात भर बार में रहती, और अजय को यही कहती कि काम ज्यादा था।
घर में अब पैसों की कमी नहीं थी। मनीष का इलाज शुरू हुआ, अजय खुश था। पर वो मुझसे सवाल करने लगा, "राधा, तू इतनी देर तक कहाँ रहती है? तेरा चेहरा क्यों बदल गया है?" मैं हँसकर टाल देती, पर मेरे अंदर डर बढ़ता जा रहा था।
फिर वो रात आई। अजय अपने दोस्त की शादी की पार्टी के लिए उसी बार में आया। मैं एक प्राइवेट रूम में थी, एक ग्राहक के साथ। तभी दरवाजा खुला, और अजय सामने खड़ा था। उसकी आँखों में गुस्सा, दर्द, और विश्वासघात था। ग्राहक भाग गया, और मैं काँपती हुई खड़ी रही। मैंने चिल्लाकर कहा, "तुम यहाँ क्या करने आए? ये तुम्हारी जगह नहीं है!"
अजय का चेहरा लाल था। वो बोला, "मैं? मैं तो दोस्त के साथ आया था, पर तू? तू ये सब कर रही थी? मैं दिन-रात मेहनत करता हूँ, और तू... ये धंधा?" उसकी आवाज में इतना दर्द था कि मेरे पैर डगमगा गए।
मैं रोते हुए बोली, "अजय, मैंने ये मनीष के लिए किया! तुम्हारी कमाई से उसका इलाज नहीं हो सकता था। हाँ, मैंने संभोग किया, पर हर बार मेरे मन में सिर्फ हमारा बेटा था। मैंने क्या गलत किया?"
अजय ने मुझे घूरा। उसने धीरे से कहा, "राधा, तूने मनीष को बचाया, पर मुझे मार दिया। मैंने तुझ पर भरोसा किया था।" वो पलटकर चला गया। मैंने उसे रोकने की कोशिश की, "अजय, रुक जाओ! हम बात कर सकते हैं!" पर वो नहीं रुका। बार की चमक मेरे पीछे धुंधली पड़ गई, और मैं अकेली रह गई।
अगले दिन मैं अस्पताल गई। मनीष की सर्जरी हो चुकी थी, डॉक्टर ने कहा वो ठीक हो जाएगा। मैंने उसका माथा चूमा, पर मेरे दिल में एक खालीपन था। घर लौटी, तो अजय का सामान गायब था। मेज पर सिर्फ एक चिट्ठी थी: "मनीष को तूने बचा लिया, पर हमें खो दिया। अलविदा।"
आज मैं मनीष के साथ हूँ। उसकी हँसी मेरी जिंदगी है, पर हर रात मैं सोचती हूँ—क्या मैंने सही किया? क्या एक माँ की मजबूरी इतनी बड़ी हो सकती है कि वो प्यार को कुचल दे? मैंने अपने बच्चे को बचा लिया, पर क्या मैंने अपने आप को खो दिया?
तो आप बताइए—क्या माँ का प्यार हर कीमत को जायज ठहराता है, या कुछ कीमतें इतनी बड़ी होती हैं कि वो सब कुछ छीन लेती हैं?