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30/05/2025
माता मसानी मदानन चौगानन का इतिहासजोर से बोलो......माता मसानी, माता धुतनी, माता मदानन, माता जेवरवाली,माता खादरवाली माता च...
30/05/2025

माता मसानी मदानन चौगानन का इतिहास

जोर से बोलो......माता मसानी, माता धुतनी, माता मदानन, माता जेवरवाली,माता खादरवाली माता चौगानन, माता शीतला की जय-जयकार

मसानी देवी को भगत ललिता मईया, शीतला मईया और मसानी माता के नाम से पुकार कर जयकारे लगाते हैं। गुड़गाँव के शीतला माता मन्दिर की कहानी महाभारत काल से जुड़ी हुई है। माना जाता है कि महाभारत युद्ध में गुरु द्रोणाचार्य के वीरगति प्राप्त होने पर उनकी पत्नी कृपि (शीतला माता) ने इसी स्थान पर 'सती प्रथा' द्वारा आत्मदाह किया था। उन्होंने लोगों को आशीर्वाद दिया कि मेरे इस सती स्थल पर जो भी अपनी मनोकामना लेकर पहुँचेगा, उसकी मनोकामना पूर्ण होगी।

कहा जाता है कि गुड़गाँव में दो भाइयों पदारथ व सिंघा प्रारंभ से ही सदचरित्र व शील स्वभाव के थे। उस जमाने में दोनों भाइयों के पास हजा़ारों एकड़ जमीन थी। सिंघा की भजन वृत्ति और निठल्लेपन के कारण परिवार की औरतों में टकराव हुआ तथा जमीनों कें बंटवारे हो गए। सिंघा को 8 बिस्वा भूमि सौंप दी गयी। इस धरती पर बाद में अर्जुन नगर, भीम नगर, केम्प कालोनी, अर्बन स्टेट, शिवपुरी, शिवाजी नगर आदि आबाद हो गए। यह भूमि खाण्डसा तक फैली है, इसी भूमि पर गुरू द्रोणाचार्य का तालाब है। कहा जाता है कि गुरु द्रोणार्चाय ने यहां कौरवों व पाडवों को धनुर्विद्या व गजविद्या का प्रशिक्षण दिया था।

सिंघा की भक्ति से प्रसन्न होकर एक दिन मां शीतला देवी ने स्वप्न में उसे दर्शन दिए और वर दिया कि जिसे भी तू स्पर्श करेगा वह स्वतः ही कष्ट मुक्त हो जाएगा। सिंघा भक्त अपने महल से निकल कर उस तालाब के पास पहुंचा और तपस्या में लीन हो गया। उसने एक कच्ची मढ़ी बनाकर देवी पूजन प्रारम्भ किया। किवदन्ती है कि एक दिन तालाब की मिट्टी उठाते समय सिंघा को वह मुर्ति मिल गयी जिसे उसने मढ़ी में स्थापित कर दिया। यही बाद में माता शीतला देवी का मंदिर कहलाया।
माता मसानी मदानन चौगानन का इतिहास-2

जोर से बोलो......माता मसानी, माता धुतनी, माता मदानन, माता जेवरवाली,माता खादरवाली माता चौगानन, माता शीतला की जय-जयकार

उल्लेखनीय है कि मुगल काल में हिन्दू मंदिरों व मूर्तियों को कुछ कट्टरपंथी बादशाह तालाबों में फिंकवा दिया करते थे। इसी भय से सूर्यास्त होने पर पुजारी मूर्ति को उठाकर अपने घर ले जाते रहे तथा सूर्योदय से पूर्व मूर्ति को स्नान इत्यादि कराके मंदिर में ले आया करते थे। कहा जाता है कि एक मुगल बादशाह ने कृपी माता की इस मूर्ति को तालाब में फिकवा दिया था। मूर्ति बाद में मिट्टी में दब गयी। समय ने करवट ली तथा सिंघा भक्त ने इस मूर्ति को बाहर निकलवाया और मढ़ी में रख दिया।

मसानी देवी को भगत अजन्मी या होनी व योगमाया का अवतार के नाम से पुकारते हैं पर मसानी देवी चौगानन माता या चौगान की मसानी या चौगान वासिनी शक्ति कैसै बनी ये कोई नही बताता। चौगान या चौक की शक्ति का अाशीवाद भगवान कृष्ण ने माता शीतला को दिया था अब भगतो ने मसानी देवी या चौगानन माता या चौगान की मसानी या चौगान वासिनी शक्ति कैसै बना दिया ये भी कोई भगत नही बताता।

एक प्राचीन कथा के अनुसार भगवान कृष्ण पांडवो और कोरवो दोनो पक्ष मे पूज्यनीय रहै है कृष्ण को 16 कला अवतार माना जाता है जब भी भगवान कृष्ण गुड़गाँव अाते तब माता शीतला उनका अतिथि सत्कार करती अौर पूज्य के रूप मे मान देती उनके अानै वाली राह को एक साधिका की तरह निहारती गुड़गाँव के किस राह से वे अायेगै पर उसका माता शीतला को पता ना चल पाने पर वो अपने पूज्य भगवान कृष्ण के पृथम दशँन ना कर पाती इस मंशा के हल स्वरूप भगवान कृष्ण ने माता शीतला को चौक की शक्ति का अाशीवाद दिया जैसै-जैसै भगवान कृष्ण गुड़गाँव के एक-एक चौक पार करते माता शीतला जान जाती कि वे किस राह से अायेगै।

हिन्दू समाज मे पुजा सेवा के नाम पर भेदभाव होता था पुजा सेवा उस समय कुछ वगँ तक सीमित रह गई माता शीतला मन्दिर मे कुछ वगौ का ही पृवेश हो पाता था मसानी देवी को मदानण देवी को शुरूवात मे मैदान, कल्लर, घर के थानो मे पूजा जाता था।

माता मसानी मदानन चौगानन का इतिहास-3

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माता मदानण को सभी मसानी देवियों की रानी माना जाता है जिसे यक्षिणी माता भी कहते है इनका एक जैसा रूप नही होता मान्यता के अनुसार ये भी कोई भगत नही बताता इनका मैन रूप है क्या शुरूवात मे मसानी सात देवियाँ या सात बहनो के रूप मे पूजी जाती थी

योगमाया के अवतार मे मसानी को चौगानन माता या चौगान की मसानी या चौगान वासिनी शक्ति कैसै बना दिया ये माता शीतला मन्दिर से जुडी एक प्राचीन कथा है इस के दो कारण है जब मां के भक्त सिंघा को लोग पूजने लगे इसे संयोग कहा जाए अथवा मां भगवती का आशीर्वाद कि निठल्ले सिंघा की कीर्ति जगत मे फैलने लगी

तब मां शीतला ने सिंघा को सक्षात उसे दर्शन दिए और वर मागने को कहा तब सिंघा ने मां शीतला ने अपने नाम अमर होने का वर मांगा पर मां शीतला जानती थी नाम अमर किस मानव का होता है जो जगत मे हो ही नही उसका......तब मां शीतला ने सिंघा से एक बार अौर सोचने को कहा पर सिंघा जिद पर अडहा ही रहा जगत कीर्ति के लिए.......

शीतला देवी ने मैदान, कल्लर, घर के थानो मे पुजने वाली शक्ति सात देवियाँ या सात बहनो (ये सात बहिने थी-आवड, गुलो, हुली, रेप्यली, आछो, चंचिक और लध्वी। ) को मसानी मां के रूप में बुलाया अौर सिंघा के वरदान को पूरा मन चाहा पु्रा किया मैदान, कल्लर, घर के थानो मे पुजने वाली शक्तियाँ उस समय तामसिक पूजा विधान मे पूजी जाती थी अधिकतर साधक उन्है मदिरा बकरे कि बलि लगाते थे ये शक्तियाँ सभी सात द्वीपों में रात्रि में रास रचाती है यानि माया दिखाती है साधको के मन भावना के हिसाब से भोग लेती है देवी की माया का स्वरुप साधको के मन भावना के हिसाब से ही सामने अाता है मतलब साधक खुशी से जो दे सके

शीतला देवी के कथन अनुसार सिंघा के घर मे मैदान, कल्लर, घर के थानो मे पुजने वाली शक्तियो का घर की अोर रूख हुअा इस कारण अाज सिंघा का नाम अमर है बाकि परिजनो को मैदान, कल्लर, घर के थानो मे पुजने वाली शक्तियो कि बलि होना पडा... सिंघा के परिजनो मे किसी के ना बचने पर मां शीतला के थान का सारा पैसा सरकारी फंड मे जाता है ......

जिसके परिवार के लोगो ने मसानी थान की स्थापना करवाई वे अाज भी मसानी थान की सेवा मे है दादा समय से.........तब से अाज भी शीतला देवी के उधार को मसानी मां लेने अाती है

माता मसानी मदानन चौगानन का इतिहास-4

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चौगान पर वास मां शीतला ने मसानी मां को अपने नाम के जोडै पर दिया क्यो कि शीतला पूरी सात्विक थी मसानी मां पूरी तामसिक थी इस लिए जिसकी जो स्थापना की गई, उसमें सात्विक और तामसिक दोनों ही पूजा विधान रखे गये। मठ मे सात्विक चौक मे तामसिक......

सिंघा के परिजनो को बलि लेने पर मसानी मां गुस्सै मे चौक चौक माया की हा हा का्र मचाने लगी वो देवी किसी भी प्रकार शांत न हुयी तब पीरो फकीरो ने अान दे देकर देवी को शांत किया अौर तब मसानी मां चौक पर मांसाहार करने वालो से मन्दिर की स्थापना करवाई अपना खुला परचा व रूप दिखा कर जिसके परिवार के लोग अाज भी मसानी थान की सेवा मे है

मुगल काल में हिन्दू मंदिरों से मूर्तियों को कुछ कट्टरपंथी बादशाह तालाबों में फिंकवा दिया करते थे। इसी कारण भोग मे नन्ही सुअर की बची की माँग करी देवी ने कहा मैने एक काफ़िर को बचाने के लिए अवतार लिया है ताकि हिन्दू मंदिरों को अाँच न अायै इसलिए मेरा आहार भी काफिरों वाला ही होगा ! मै इस्लाम के खिलाफ कार्य करूंगी ! मुझे सूअर और शराब का भोग लगेगा !

उस दिन से आज तक देवी को सूअर और शराब का भोग लगाया जाता है ! पहले मसानी थान मे सूअर और शराब का भोग लगने मात्र से किसी मुगल काल के कट्टरपंथी बादशाह ने पाँव रखने की हिम्मत नही की

अब भेट बलि की मान्यता करने वाले इस वगँ ने एक नयी लाइन की शुरूवात मिली - भगताई ये सात्विक और तामसिक दैवी-देवताओं का यह अनुठा गठबन्धन था।

माता मसानी मदानन चौगानन का इतिहास-5

जोर से बोलो......माता मसानी, माता धुतनी, माता मदानन, माता जेवरवाली,माता खादरवाली माता चौगानन, माता शीतला की जय-जयकार

प्रारम्भ मे अनेकों साधक इसी नियम को मानते हुऐ पुजन करते आ रहे है। किन्तु इन साधकों में भी दो मत बन गये- एक सात्विक दुसरा तामसिक।

सात्विक साधक साधना पूर्ण होने पर खीर-हलवे मीठै पकवान आदि का भोग लगाते है। किन्तु तामसिक साधक साधना पूर्ण होने पर मदिरा और बकरे आदि कि बलि लगाते है। सिद्धियाँ दोनों ही साधकों को प्राप्त होती है और दोनों ही साधक अपनी इच्छा अनुसार अपनी सिद्धियों का उपयोग करते है।

चौक मे मसानी थान की सेवा मे पाँच-वीरों की साधना को प्रधानता दी गई इन वीरों में जहाँ जाहर वीर और हनुमन्त वीर सात्विक है, वहीं नारसिहं, भैरव वीर और अंघोरी वीर तामसिक है। जैसै माँ शीतला का मसानी देवी उधार का हिशाब लेने वाली है वैसै बाबा सवलसिंह बाबरी देवी मसानी के दूत है !

किन्तु पाँच वीरों की साधना करने वाला साधक,अपनी इच्छा अनुसार अपनी सिद्धि का इस्तेमाल नहीं कर सकते थे। यहाँ पर साधक या आम व्यक्ति केवल अर्जी लगा कर (प्रार्थना करके) छोड़ देता है। उस अर्जी का फैसला उन पाँच वीरों के हाथ में होता है। ये पाँच वीर साधक की अर्जी को सुनकर, उसके भाग्य, कर्म, श्रद्धा और भक्ति को देख कर ही फैसला करते है।

हिन्दुओं की इस नई व्यवस्था को देख कर ही, मुस्लिम सम्प्रदाय में भी पाँच पीरों की स्थापना हुई। इन पाँच पीरों को कुछ साधक पाँच-बली भी कहते है। अस्त बली, शेरजंग, मोहम्मद वीर, मीरा साहब और कमाल-खाँ-सैयद जैसी व्यवस्था पाँच पीरों-वीरों की साधना में थी।

आज के समय में इस परम्परा का रूप अनेकों ही जगह देखा जा सकता है। पाँच हिन्दू वीर और पाँचों मुस्लमानी पीर इकठ्ठे पूजे जाने लगे। अधिकतर हिन्दू पाँच वीरों के साथ-साथ पाँच पीरों को भी मानने लगे। वहीं पाँचों पीर सुख और समृद्धि प्रदान करते थे। इसी प्रकार सिख धर्म में भी पंच प्यारे हैं।

आज के समय सात्विक कम तामसिक आवेश धीरे-धीरे बढने का प्रचलन प्रारम्भ हुआ है धीरे-धीरे मूल साधनाऐं और सात्विक साधनाऐं समाप्त होने लगी और सभी जगह तामसिकता ने स्थान ग्रहण कर लिया। नौ दुर्गाओं का स्थान 64 योगनियों ने ले लिया और साथ-ही-साथ डाकनी, शाकनी की पूजा, नवदुर्गा के सात्विक और तामसिक साधकों ने प्रारम्भ कर दी।

माता मसानी मदानन चौगानन का इतिहास-6

जोर से बोलो......माता मसानी, माता धुतनी, माता मदानन, माता जेवरवाली,माता खादरवाली माता चौगानन, माता शीतला की जय-जयकार

मसानी देवी अजन्मी या होनी व भगवान कृष्ण की योगमाया का अवतार होके भी यह मां शीतला के जोडै मे पुजती अा रही है वैसै योगमाया को भगवन श्रीकृष्ण कि बहन कहा जाता है | जो वरदान भगवान कृष्ण ने माता शीतला को चौक की शक्ति अौर ज्ञान का दिया था उसका अाशीश मसानी मां को मां शीतला ने अपने नाम के जोडै पर दिया

अामतौर पर चौक पर पुजने वाले सब देव -देवी यक्ष व यक्षिणी की तरह अपना रूप शक्ति दिखाते है मान्यता के अनुसार ये कोई भगत नही बता पाता कि इनका मैन रूप है क्या बस पुजने या पुकारने मात्र से ये साधको के साथ हो जाते है देवी का स्वरुप साधको के मन भावना के हिसाब से मे समक्ष अाता है परिणामस्वरूप ये शक्ति मन भावना के हिसाब से परचा देती है योगमाया की माया का मूल स्वरुप साधक की समझ से परे भी माना जाता है

शुरूवात मे मैदान, कल्लर, घर के थानो मे पुजने वाली शक्तियाँ सात देवियाँ के रूप मे पूजी जाती थी जैसै मसानी, धुतनी, मदानन, जेवरवाली,खादरवाली या जिस देवी का भोग घर के बाहर दिया जाता हो जब से मसानी मां को मां शीतला ने अपने नाम के जोडै पर दिया चौक पर थान दिया तब से सब देवियाँ के थान व चढावा चौक पर जाने लगा पर अाज भी मैदान, कल्लर, घर के बाहर मे पुजने वाली काफी शक्तियाँ है जो अपनी मूल जगह नही छोड पाई

माँ मसानी, माता धुतनी, मात मदानन, माई जेवरवाली व शीतला भगवती की साधना भक्ति और मुक्ति दोनों ही प्रदान करने वाली है। इसी योगमाया के प्रभाव से समस्त जगत आवृत्त है। जगत में जो भी कुछ दिख रहा है, वह सब भगवान कृष्ण की योगमाया की ही माया है।

माता मसानी मदानन चौगानन का इतिहास-7

जोर से बोलो......माता मसानी, माता धुतनी, माता मदानन, माता जेवरवाली,माता खादरवाली माता चौगानन, माता शीतला की जय-जयकार

हिन्दुओं की धमँ व्यवस्था (हिन्दुओं को मुस्लिम बनाने के लिए)बदलने के लिए मुस्लिम सम्प्रदाय मुगल काल से हिन्दू मंदिरों से मूर्तियों को कुछ कट्टरपंथी बादशाह तालाबों में फिंकवा दिया करते थे। इसी कारण माता चौगानन मसानी ने भोग मे नन्ही सुअर की बची की माँग करी जिस कारण अाज तक कोई मुगल बादशाह इनके मन्दिर मे दाखिल नही हो पाया ना हो पायेगा......दाखिल......मन्दिर मे......

सिंघा के परिजनो को बलि लेने पर मसानी मां गुस्सै मे चौक चौक माया की हा हा का्र मचाने लगी (चौक से अाने-जाने लोगो को ऊपरी हवा का असर होने लगा ) वो देवी एक समय मे मैदान, कल्लर, घर के थानो मे खुली भेट लेती थी अब भगतो के उतारा करके भी रोग हटता नही लोगो का.... पीर,फकीर,वीर सबका चढावा उतारा करके भी रोग हटता नही ये मसानी की माया की हा हा का्र....है........

जो वरदान भगवान कृष्ण ने माता शीतला को चौक की शक्ति अौर ज्ञान का दिया था उसका अाशीश मसानी मां को मां शीतला ने अपने नाम के जोडै पर दिया था चौक पर थान भेट-बलि के लिए मन्दिर की स्थापना करवानी थी......तब मसानी मां चौक पर अपने मन्दिर की स्थापना करवाई अपना खुला परचा व रूप दिखा कर जिस परिवार के लोगो ने चौक पर मन्दिर की स्थापना की वो अाज भी मसानी मां की सेवा मे है जिसके परिवार के लोग अाज भी मसानी थान की सेवा करते एक ही खानदान के लोग ये सेवा निभा रहे है..........

अाज के समय मे मसानी मन्दिर साफ भी रहता है जब भगतो ने मसानी मां को मन्दिर थान के अासन पर बिठाया तब मसानी मां की मैन मुर्ति के अागे भेट-बलि दी जाती थी परिसर की दिवारे सुअर की बची के खुन की छाप लाल रंग मे रंगी रहती थी चारो अोर फशँ पर खुन की छाप मिलती थी लोग अपनी साख से भेट करते थे......

अगर अाप सबको पुराने मन्दिर की छाप बैठकर या मसानी मां की माया को अनुभव लेना है तो कृपा एक बार अाज के मसानी मां के थान की बगल वाले भेट-बलि के कमरे मे बैठने का मन बनाअो अाप समझ जाअोगै इनका मैन रूप है क्या बस पुजने या पुकारने मात्र से ये साधको के साथ क्यो हो जाती है मसानी मां की माया का स्वरुप साधको के मन भावना के हिसाब से कैसै सामने अाता है कुछ समय मे ये शक्ति मन भावना के हिसाब से परचा दिखा देती है मसानी मां की माया का मूल स्वरुप साधको की मन भावना के हिसाब से भी माना जाता है

माता मसानी मदानन चौगानन का इतिहास-8

जोर से बोलो......माता मसानी, माता धुतनी, माता मदानन, माता जेवरवाली,माता खादरवाली माता चौगानन, माता शीतला की जय-जयकार

माता मदानण को सभी मसानी देवियों की रानी माना जाता है मसानी जिसे चौगान वासिनी शक्ति भी कहते है इनका एक जैसा रूप नही होता मान्यता के अनुसार ये भी कोई भगत नही बताता इनका मैन रूप है क्या शुरूवात मे मसानी सात देवियाँ या सात बहनो के रूप मे पूजी जाती थी ये सात बहिने थी-आवड, गुलो, हुली, रेप्यली, आछो, चंचिक और लध्वी।

मैदान, कल्लर, घर के थानो मे पुजने वाली शक्तियाँ उस समय तामसिक पूजा विधान मे पूजी जाती थी अधिकतर साधक उन्है मदिरा बकरे कि बलि लगाते थे ये शक्तियाँ सभी सात द्वीपों में रात्रि में रास रचाती है यानि माया दिखाती है साधको के मन भावना के हिसाब से भोग लेती है

देवी की माया का स्वरुप साधको के मन भावना के हिसाब से ही सामने अाती है मतलब साधक खुशी से जो दे सके बलि व भोग अब ये शक्तियाँ कहाँ अौर कब रास रचाती है ये कहा नही जा सकता.....अब भी कुछ घर के बाहर मे पुजने वाली देवी शक्तियाँ है जो अपनी मूल जगह नही छोड पाई

यदि आप सभी कुछ अागे का जानते है तो जरूर बतायै चुपी तोडो भलाई के दो शब्द बोलो बात ज्ञान की हो रही है !! जय हो जगत मे पूजने वाले समस्त माँ, बाबा, गुरू महाराज की जय..

भारतीय समयानुसार, 29 मार्च यानी कल लगने वाले सूर्य ग्रहण की शुरुआत दोपहर 2 बजकर 21 मिनट पर होगी और इसका समापन शाम 6 बजकर...
28/03/2025

भारतीय समयानुसार, 29 मार्च यानी कल लगने वाले सूर्य ग्रहण की शुरुआत दोपहर 2 बजकर 21 मिनट पर होगी और इसका समापन शाम 6 बजकर 14 मिनट पर होगा. इस ग्रहण की कुल अवधि 3 घंटे 53 मिनट की रहने वाली है. चूंकि, यह ग्रहण भारत में दृश्यमान नहीं होगा, इसलिए यहां इसका सूतक काल प्रभावी नहीं रहेगा

एक बार स्पेस से जुड़ी चीजों में दिलचस्पी रखने वालों के लिए खास मौका आने वाला है। हाल ही में होली के मौके पर 14 मार्च को साल 2025 का पहला पूर्ण चंद्रग्रहण लगा था। और अब इसी महीने के आखिर में साल 2025 का पहला सूर्य ग्रहण लग रहा है। जी हां, पृथ्वी और सूर्य के बीच जब चंद्रमा गुजरेगा तो दिन में धरती पर अंधेरा छा जाएगा।

आपको बताते हैं इस आंशिक सूर्य ग्रहण के समय व तारीख के बारे में सबकुछ…

क्या होता है आंशिक सूर्य ग्रहण

बता दें कि आंशिक सूर्य ग्रहण के दौरान जब चंद्रमा, पृथ्वी और सूर्य के बीच से गुजरता है और धरती के कुछ हिस्सों पर उसकी छाया पड़ती है जिसके चलते सूर्य की रोशनी नहीं आ पाती। इस स्थिति में चंद्रमा, सूर्य को पूरी तरह से नहीं ढक पाता और एक सूर्य के कुछ हिस्से की रोशनी पृथ्वी पर आती है। इस खगोलीय स्थिति को वैज्ञानिकों ने आंशिक सूर्य ग्रहण का नाम दिया है। आसमान में दिखने वाले इस दुर्लभ नजारे का दुनियाभर के खगोलविदों को बेसब्री से इंतजार है और उनके लिए इस आकाशीय घटना को समझने का यह शानदार मौका होगा।

कब होता है सूर्य ग्रहण ?

गौर करने वाली बात है कि हिंदू कैलेंडर के मुताबिक, सूर्य ग्रहण की घटना केवल अमावस्या के दिन ही होती है। इस दौरान सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी एक सीध में होते हैं। साल 2025 में दो सूर्य ग्रहण लग रहे हैं। साल का पहला सूर्य ग्रहण नजदीक है और 29 मार्च को लगेगा वहीं साल का दूसरा सूर्य ग्रहण 21 सितंबर को लगेगा।

सूर्य ग्रहण किस समय लग रहा है ?

अमेरिकी स्पेस एजेंसी NASA के अनुसार, आंशिक सूर्य ग्रहण अमेरिकी समय के मुताबिक सुबह 4.50 बजे शुरु होगी और 6 बजकर 47 मिनट पर यह पीक यानी अपने चरम पर होगा। और सुबह 8.43 पर ग्रहण समाप्त हो जाएगा।

नासा के मुताबिक, कुछ जगहों पर ग्रहण के दौरान सूर्य का 93 प्रतिशत तक हिस्सा ढकने की उम्मीद है यानी इन जगहों पर दिन में अंधेरा छा जाएगा।

क्या भारत में दिखाई देगा सूर्य ग्रहण ?

साल 2025 का पहला सूर्य ग्रहण भारत में नहीं दिखेगा। यह आंशिक सूर्य ग्रहण एशिया, अफ्रीका, यूरोप अटलांटिक सूर्यग्रहण को एशिया, अफ्रीका, यूरोप, अटलांटिक महासागर, आर्कटिक, उत्तरी अमेरिका और दक्षिणी अमेरिका में नजर आएगा। बता दें कि भारत में दिखाई ना देने के चलते, हिंदू पंचांग के मुताबिक, माने जाने वाला सूतक काल भी देश में मान्य नहीं होगा।

भले ही ग्रहण भारत में दिखाई ना दे, लेकिन हर बार की तरह भारतीय इसे ऑनलाइन लाइव देख सकेंगे। NASA के यूट्यूब चैनल पर सूर्यग्रहण की लाइव स्ट्रीमिंग होगी। इसके अलावा कई अन्य लैबोरेटरीज भी इस ग्रहण को लाइव स्ट्रीम करेंगी।

Holika Dahan 2025 Muhurat: होलिका दहन पर रात 11 बजकर 26 मिनट तक भद्रा का साया, अग्नि दहन के लिए केवल 1 घंटे का समय, जाने...
12/03/2025

Holika Dahan 2025 Muhurat: होलिका दहन पर रात 11 बजकर 26 मिनट तक भद्रा का साया, अग्नि दहन के लिए केवल 1 घंटे का समय, जानें शुभ मुहूर्त

Holika Dahan 2025 Muhurat Bhadra Kaal:

फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि को हर वर्ष होलिका दहन किया जाता है. होलिका दहन के लिए भद्रा काल का देखना जरूरी माना गया है क्योंकि इस काल में दहन नहीं किया जाता. ऐसा करना अशुभ माना जाता है और इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं. आइए जानते हैं होलिक दहन के लिए सही मुहूर्त क्या है...

होलिका दहन पर रात 11 बजकर 26 मिनट तक भद्रा का साया

13 मार्च को होलिका दहन किया जाएगा.

होलिका दहन मुहूर्त रात 11:27 से 12:30 तक है.
भद्रा काल 10:35 से 11:26 तक रहेगा.

13 मार्च दिन गुरुवार को होलिका दहन किया जाएगा और अगले दिन यानी शुक्रवार को रंगों वाली होली खेली जाएगी. हर वर्ष फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि को होलिका दहन किया जा है और इस छोटी होली भी कहा जाता है. होलिका दहन में तिथि, भद्रा और शुभ मुहूर्त का विशेष ध्यान रखा जाता है. लेकिन होलिका दहन पर इस बार सुबह 10 बजकर 35 मिनट से रात 11 बजकर 26 मिनट तक भद्रा का साया रहने वाला है. शास्त्रों के अनुसार, होलिका दहन कभी भी भद्रा काल में नहीं करना चाहिए. इसलिए लोगों में असमंजस की स्थिति बनी हुई है कि आखिर पूरे दिन भद्रा का साया रहने से होलिका दहन के लिए शुभ समय क्या होगा, आइए जानते हैं…

बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व

होलिका दहन का पर्व बुराई पर अच्छाई के जीत के तौर पर मनाया जाता है और हर वर्ष यह पर्व फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है. कहा जाता है कि विधि पूर्वक और नियमों के साथ होलिका दहन किया जाए तो सभी चिंता व परेशानियां भी उसी अग्नि में स्वाहा हो जाती हैं और परिवार में सुख-शांति का वास होता है. इस पर्व का सभी बेसब्री से इंतजार करते हैं और दूर दूर से अपने घरों में जाते हैं. इस शुभ दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी के साथ चंद्र देव की भी पूजा की जाती है. मान्यता है कि ऐसा करने से मानसिक शांति मिलती है और धन धान्य की कभी कमी नही होती.

13 मार्च को होलिका दहन

फाल्गुन पूर्णिमा प्रारंभ – 13 मार्च, सुबह 10 बजकर 35 मिनट सेफाल्गुन पूणिमा समापन – 14 मार्च, दोपहर 12 बजकर 24 मिनट तक13 मार्च को दिन और रात को पूर्णिमा तिथि होने की वजह से होलिका दहन इसी दिन किया जाएगा

Holi 2025: इस बार 14 मार्च को धुलंडी मनाई जाएगी. जबकि होलिका दहन 13 मार्च, गुरुवार को किया जाएगा.
वही साल का पहला चंद्रग्रहण 14 मार्च को लगेगा. ग्रहण का समय सुबह 9:29 बजे से दोपहर 3:29 तक रहने वाला है. इस दौरान पृथ्वी सूर्य और चंद्रमा के बीच आ जाएगी और पृथ्वी की छाया चंद्रमा को पूरी तरह से ढक लेगी. इसी के चलते यह पूर्ण चंद्रग्रहण होगा. खगोलशास्त्रियों के लिए भी यह दिन काफी महत्‍व रखता है. इस दृश्‍य के हर पल की गणना करने के साथ वे इसे अपने कैमरे में कैद करना चाहते हैं. लेकिन होली के दिन ग्रहण का असर क्या रहेगा, इसे लेकर भी सवाल बरकरार है.

भारत में नहीं, बल्कि इन हिस्सों में दिखेगा ग्रहण

इसका प्रभाव मुख्य रूप से ऑस्ट्रेलिया, यूरोप और अफ्रीका के अधिकांश क्षेत्र के अलावा प्रशांत, अटलांटिक, आर्कटिक महासागर, उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका, पूर्वी एशिया और अंटार्कटिका पर पड़ेगा. लेकिन भारत में चंद्रग्रहण दिखाई नहीं देगा, क्योंकि चंद्रग्रहण भारतीय समय अनुसार दिन में घटित होने वाला है. ऐसे में इसका सूतक काल भी मान्य नहीं होगा.

इन कार्यों को करने की होती है मनाही
होलाष्टक के समय विवाह नहीं होते हैं.
होलाष्टक के समय नामकरण, मुंडन, जनेऊ जैसे कार्य नहीं होते हैं.
होलाष्टक के समय गृह प्रवेश, उपनयन संस्कार समेत सभी 16 संस्कारों पर रोक रहती है.
होलाष्टक की अवधि में नया मकान, संपत्ति, आभूषण और वाहन की खरीदारी नहीं करनी चाहिए.
इस समय घर बनवाने का काम शुरू नहीं करना चाहिए.
होलाष्टक के आठ दिन हवन और यज्ञ पर भी रोक रहती है.
होलाष्टक के दौरान नई नौकरी जौइन करने या नौकरी बदलने से भी बचना चाहिए.

Address

Safidon Dham
Jind

Telephone

+919594070786

Website

https://www.youtube.com/@ajaydumada2400

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