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डांगावास कांड में सभी 40 आरोपी बरी, सचिन पायलट ने उठाया गंभीर सवाल, कहा- सच सामने नहीं आयानागौर के डांगावास कांड में सभी...
11/08/2026

डांगावास कांड में सभी 40 आरोपी बरी, सचिन पायलट ने उठाया गंभीर सवाल, कहा- सच सामने नहीं आया

नागौर के डांगावास कांड में सभी आरोपियों को बरी कर दिया गया। कांग्रेस के दिग्गज नेता सचिन पायलट ने गंभीर सवाल उठाया कि इतनी बड़ी वारदात का सच आखिर सामने क्यों नहीं आ सका?

Nagaur : नागौर का चर्चित डांगावास कांड आज भी हर राजस्थानी के दिलोदिमाग में बसा हुआ है। 5 अगस्त को आए फैसले के बाद एक बार फिर यह कांड फिर से चर्चा में आ गया। वजह थी कि इस कांड के सभी 40 आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया। कांग्रेस के दिग्गज नेता सचिन पायलट ने गंभीर सवाल उठाया कि इतनी बड़ी वारदात का सच आखिर सामने क्यों नहीं आ सका?

सचिन पायलट ने सोशल मीडिया अकाउंट X पर लिखा कि नागौर के डांगावास में वर्ष 2015 की वह दर्दनाक घटना आज भी पीड़ित परिवारों के जख्मों को ताजा करती है। जमीन विवाद में 6 लोगों की जान चली गई, जिनमें 5 दलित थे। करीब 11 वर्षों तक मामला जांच और अदालत की प्रक्रिया से गुजरता रहा।

नरेश मीणा की जमानत याचिका खारिज, अब हाईकोर्ट का खटखटाएंगे दरवाजादेवली-उनियारा विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में एसडीएम थप्...
11/08/2026

नरेश मीणा की जमानत याचिका खारिज, अब हाईकोर्ट का खटखटाएंगे दरवाजा

देवली-उनियारा विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में एसडीएम थप्पड़ कांड मामले में एससी-एसटी विशिष्ट अदालत टोंक ने मंगलवार को प्रत्याशी रहे नरेश मीणा की नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी। विशिष्ट लोक अभियोजक रामावतार सोनी ने बताया कि मंगलवार शाम न्यायाधीश आरती माहेश्वरी ने जमानत याचिका पर सुनवाई के बाद इसे खारिज करने का आदेश दिया। वहीं नरेश मीणा के अधिवक्ता फतेहराम मीणा ने बताया कि एससी-एसटी कोर्ट से नियमित जमानत याचिका खारिज हुई है। अब वे जमानत के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर करेंगे।

नरेश मीणा को पहले भी हाईकोर्ट से सशर्त जमानत मिली थी। लेकिन जमानत की शर्तों के उल्लंघन के चलते एससी-एसटी कोर्ट ने 13 जुलाई 2026 को उनकी जमानत रद्द कर दी थी। इसके बाद नरेश मीणा ने गत 6 अगस्त को नगरफोर्ट थाने में सरेंडर किया था।

क्यों रद्द हुई हाईकोर्ट से मिली बेल

करीब आठ माह बाद उन्हें 14 जुलाई 2025 को हाईकोर्ट से सशर्त जमानत मिली थी। जमानत की शर्तों में किसी भी धरना-प्रदर्शन में शामिल नहीं होना तथा स्वागत-सत्कार जैसे आयोजनों से दूर रहना शामिल था। आरोप है कि झालावाड़ जिले के पीपलोदी में स्कूल भवन की छत गिरने से बच्चों की मौत के बाद हुए आंदोलन में शामिल होकर उन्होंने जमानत की शर्तों का उल्लंघन किया। इसके आधार पर नगरफोर्ट थाना पुलिस ने न्यायालय में जमानत निरस्त करने की याचिका दायर की, जिसे स्वीकार करते हुए न्यायालय ने उन्हें 6 अगस्त तक आत्मसमर्पण करने के निर्देश दिए थे। समरावता हिंसा प्रकरण में नरेश मीणा सहित करीब 60 लोगों के खिलाफ मामला विचाराधीन है। अन्य आरोपी फिलहाल जमानत पर हैं।

जेन-जी आंदोलन के बाद पार्टियां रणनीति बदल रहीं: 2027 में 7 राज्यों में चुनाव, 22% वोटर जेन-जी; 5% इधर-उधर हु..दिल्ली के ...
09/08/2026

जेन-जी आंदोलन के बाद पार्टियां रणनीति बदल रहीं: 2027 में 7 राज्यों में चुनाव, 22% वोटर जेन-जी; 5% इधर-उधर हु..

दिल्ली के जंतर-मंतर पर जेन जी ने करीब 36 दिन प्रदर्शन किया था। यह प्रदर्शन नीट पेपर लीक और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर था। - Dainik Bhaskar
दिल्ली के जंतर-मंतर पर जेन जी ने करीब 36 दिन प्रदर्शन किया था। यह प्रदर्शन नीट पेपर लीक और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर था।

अगले साल 7 राज्यों- उत्तर प्रदेश, गुजरात, पंजाब, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर और गोवा में विधानसभा चुनाव होने हैं। इन चुनावों में जेन-जी यानी 18 से 29 साल के मतदाता अहम भूमिका निभा सकते हैं।

इसके पीछे दो बड़ी वजहें हैं। पहली, जुलाई में दिल्ली में हुआ जेन-जी आंदोलन, जिसने युवाओं के राजनीतिक रुझान को लेकर नई बहस छेड़ी। दूसरी, बिहार के बांकीपुर और मध्य प्रदेश के दतिया उपचुनाव के चौंकाने वाले नतीजे, जिनसे युवाओं की चुनावी भूमिका पर चर्चा तेज हुई है।

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, चुनावी समीकरण में महिला, पिछड़ा, किसान और दलित जैसे वर्गों के साथ अब जेन-जी भी एक अहम वोटर ग्रुप बनता जा रहा है। इन 7 चुनावी राज्यों में करीब 22% मतदाता 18 से 29 साल की उम्र के हैं। ऐसे में युवा वोट किसी भी पार्टी के चुनावी समीकरण को बदल सकता है।

7 राज्यों के पिछले चुनाव में 257 सीटों पर 5% वोट मार्जिन रहा

चुनाव वाले 7 राज्यों में अगर पिछले विधानसभा चुनाव के आंकड़े देखें तो कुल 940 सीटों में 257 सीटें (27%) ऐसी थीं, जहां जीत का अंतर 5% या उससे कम था।

उत्तर प्रदेश की 403 में से 131 सीटें ऐसी थीं, जहां जीत का मार्जिन 5% से कम था। गुजरात की 182 में से 27, पंजाब की 117 में से 24, उत्तराखंड की 70 में से 15 और हिमाचल की 68 में से 14 सीटों पर भी वोट मार्जिन 5% से कम था।

इस आधार पर कह सकते हैं कि अगर 22% जेन-जी वोटर्स में से 5% भी एकजुट होकर किसी पार्टी के पाले में चले गए तो इन राज्यों में सियासी समीकरण पूरी तरह बदल सकते हैं।

यही वजह है कि राजनीतिक दल अब अपनी पूरी रण​नीति जेन-जी वोटर्स के इर्द-गिर्द बुनने में लग गए हैं। भाजपा, कांग्रेस और सपा ने इसकी मुहिम शुरू कर दी है।

जाति-धर्म के समीकरण बिगाड़ सकते हैं युवाओं का नया वर्ग

देश की सियासत में लंबे समय से चले आ रहे जाति और धर्म आधारित चुनावी समीकरणों को युवा वोटर चुनौती दे सकते हैं। इसकी वजह युवाओं का एक नया और मुखर वर्ग बनकर उभरना है।

अगले चुनावों में अभी 6-7 महीने का वक्त है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि तब तक यह युवा सेंटिमेंट कितना मजबूत रहता है। अगर यह बरकरार रहा या और बढ़ा, तो राजनीतिक दलों को आने वाले हफ्तों में अपनी रणनीति में पांच बड़े बदलाव करने पड़ सकते हैं।

राजनीतिक पार्टियां पांच बदलाव करने पर मजबूर

1. युवाओं पर फोकस्ड राजनीति शुरू होगी: भास्कर एक्सपर्ट के मुताबिक पहले घोषणापत्र में युवाओं के सिर्फ मुद्दे होते थे, पर अब रोजगार व स्किल डेवलपमेंट जैसे विषय सीधे भाषणों में होंगे। दलों को सिर्फ बेरोजगारों को भत्ता देने के बजाय यह समझाना होगा कि वे रोजगार और कौशल विकास कैसे बढ़ाएंगे। जो दल रोजगार, शिक्षा, डिजिटल इकोसिस्टम और स्किल डेवलपमेंट के मुद्दे उठाएगा, युवा उसी के साथ जाएंगे।

2. जाति-धर्म समीकरण: अगर यही माहौल रहा, तो जेन-जी के मुद्दों के कारण जातिगत और धार्मिक समीकरण काफी हद तक बिखर जाएंगे। युवा भी अब तक जाति-धर्म के आधार पर बंटे हुए थे। अब बदलाव दिख रहा है। चुनाव में जाति फैक्टर थोड़ा-बहुत तो रहेगा ही, लेकिन उम्मीदवारों के चयन और प्रतिनिधित्व में उसका असर साफ दिखेगा। पार्टियां सेल्फ-मेड युवाओं को अधिक टिकट देंगी, जिससे जेन-जी को चुनावी मैदान में बेहतर प्रतिनिधित्व मिल सके।

3. महिलाओं जैसा बदलाव: जैसे महिलाओं ने जातिगत समीकरण तोड़कर एनडीए को वोट दिए, युवा भी किसी एक तरफ जा सकते हैं।

4. मुफ्त योजनाओं से दूरी: युवाओं को मुफ्त की रेवड़ी या लुभावनी योजनाएं नहीं चाहिए, बल्कि वह दलों से ठोस समाधान चाहता है।

5. व्यावहारिक वादे: राजनीतिक पार्टियां आगामी चुनावों में ऐसे व्यावहारिक वादे करेंगी, जिन्हें धरातल पर उतारा जा सके।

मोदी से भागवत तक, सभी युवाओं से सीधे जुड़ रहे…कांग्रेस-सपा भी पीछे नहीं

भाजपा: पीएम मोदी समेत सभी नेता इंस्टाग्राम पर आने लगे

पीएम नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई एनडीए सांसदों की ‘मंगल मिलन’ बैठक पूरी तरह युवाओं पर केंद्रित थी, जिसमें रोजगार को लेकर प्रेजेंटेशन दिया गया। पार्टी के मोर्चों को निर्देश दिए गए हैं कि वे जेन-जी से जुड़े मुद्दों को संवेदनशीलता के साथ सुनें, उनका समाधान करें और इस पीढ़ी के साथ लगातार संपर्क बढ़ाएं।

आरएसएस: भागवत का जेन-जी प्रोग्राम

संघ प्रमुख मोहन भागवत ने गुरुवार को जेन-जी व जेन-अल्फा के साथ प्रोग्राम किया। संघ ने एप के जरिए हर महीने 10 हजार नए युवाओं को जोड़ने का लक्ष्य रखा है। शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों, किशोर गण और तरुण गण शाखाओं के माध्यम से जेन-जी की सहभागिता पर विशेष ध्यान दे रहा है।

एबीवीपी: 80 लाख सदस्य बनाने का लक्ष्य रखा

80 लाख सदस्य बनाने के लिए स्कूल-कॉलेज से निकलकर आगे कोचिंग सेंटर्स और क्लबों तक पहुंच रहा है। करियर गाइडेंस केंद्र खोलेगा।

कांग्रेस: आंदोलनकारियों को वकील दिलवाएंगे

प्रियंका गांधी वाड्रा की निगरानी में कन्हैया कुमार और जिग्नेश मेवानी दिल्ली के आंदोलनकारी युवाओं के संपर्क में हैं। 150 वकीलों का नेटवर्क बनाया गया है। छोटे वीडियो, पीपीटी, पॉडकास्ट और ‘छात्रों की गूंज’ जैसे संवाद कार्यक्रम होंगे। एनएसयूआई और यूथ कांग्रेस ने भी कई कार्यक्रम शुरू किए।

सपा: डिंपल यादव को जिम्मा सौंपा गया

सांसद डिंपल यादव जिम्मेदारी संभालेंगी। लगातार संवाद, कैंपस में कार्यक्रम। युवजन सभा और समाजवादी छात्र सभा के जरिए अभियान चलाएंगी।

चुनाव से पहले परिसीमन भी बड़ा मुद्दा

अगले साल 7 राज्यों में चुनाव से पहले परिसीमन का मुद्दा भी राष्ट्रीय राजनीति में बड़ा मुद्दा बन गया है। लोकसभा सीटों के नए परिसीमन से राज्यों के संसदीय प्रतिनिधित्व में बदलाव की आशंका है। दक्षिणी राज्यों को चिंता है कि आबादी के आधार पर सीटों के पुनर्विन्यास में जनसंख्या नियंत्रण करने वाले राज्यों की हिस्सेदारी प्रभावित हो सकती है।

शनिवार को तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने राज्य के सांसदों की बैठक बुलाई। 57 में से 21 सांसद बैठक में पहुंचे और उन्होंने परिसीमन बिल के मौजूदा स्वरूप का विरोध किया। हालांकि, DMK और AIADMK ने बैठक का बहिष्कार किया।

पत्थर से बमनुमा-वस्तु तोड़ने की कोशिश में हुआ था धमाका: आधा चेहरा उड़ा, दिल में धातु के टुकड़े घुसे; 7 फीट दूर गिरा सेना की...
06/08/2026

पत्थर से बमनुमा-वस्तु तोड़ने की कोशिश में हुआ था धमाका: आधा चेहरा उड़ा, दिल में धातु के टुकड़े घुसे; 7 फीट दूर गिरा

सेना की फील्ड फायरिंग रेंज में बमनुमा वस्तु (विस्फोटक) को पत्थर से तोड़ने के दौरान हादसे में किसान की जान गई थी। डॉक्टरों ने पोस्टमॉर्टम कर शव परिजनों को सौंप दिया है। डॉक्टरों की जांच में सामने आया है कि हादसा इतना भीषण था कि किसान 7 फीट दूर जा गिरा। पास खड़ी उसकी बाइक भी गिर गई। विस्फोटक फटने से इसके धातु के टुकड़े उसके चेहरे और सीने में धंस गए थे। चेहरा आधा फटा हुआ था और सीने के दाईं और गहरा छेद हो गया था। उसकी मौके पर ही मौत हो गई। परिजन उसका रातभर इंतजार करते रहे और सुबह मौत की सूचना आई।

विस्फोटक को तोड़ने की कोशिश

पोकरण पुलिस सीओ बुद्धाराम विश्नोई ने बताया- सत्यनारायण सिंह (40) निवासी बिलिया गांव की बुधवार को चाचा गांव से 6 किलोमीटर दूर सेना की फायरिंग रेंज में मौत हो गई थी। FSL और पुलिस की टीमों ने इसके सबूत जुटाए और शव को मॉर्च्युरी में शिफ्ट कर परिजनों को सौंप दिया।

FSL और डॉक्टरों की जांच में सामने आया है कि युवक यहां मशरूम इकठ्ठा करने आया था। इसी दौरान उसे विस्फोटक दिखा तो उसे पत्थर से तोड़ने की कोशिश की।

अब ग्राफिक में समझिए पूरा मामला…

1. विस्फोटक को पत्थर से तोड़ने का प्रयास

2. अचानक हुआ धमाका और दूर जा गिरा किसान…

3. चरवाहों ने देखा तो पुलिस बुला ली…

मुंह फटा, टुकड़े दिल में धंसे

इसी दौरान जोरदार धमाका हुआ और युवक 7 फीट दूर जा गिरा। उसके बाईं ओर से मुंह फट चुका था, आंखें गायब थी। वहीं ठोड़ी के नीचे (चिन) का हिस्सा भी धमाके में उड़ गया था। प्राथमिक जांच में यह सामने आया है कि उसके सीने विस्फोटक के धातु के टुकड़े उसके सीने दाईं ओर धंसे हैं। जो चमड़ी और मांस को चीरते हुए दिल (हार्ट) को डैमेज कर गए। ऐसे में, उसकी मौके पर ही मौत हो गई।

पूरी रात पड़ा रहा शव

वह मंगलवार शाम 6 से 7 बजे के बीच रेंज में पहुंचा और इसी दौरान हादसा हुआ है। सुनसान इलाका होने के कारण किसी को घटना का पता नहीं चल पाया। पूरी रात शव यही पड़ा रहा। सुबह जब चरवाहे यहां पहुंचे तो उन्होंने बाइक और युवक का कटा-फटा शव देखा तो पुलिस और ग्रामीणों को सूचना दी। सत्यनारायण सिंह ही अपने परिवार का आखिरी सहारा था। अब परिवार में पत्नी, एक बेटा और बेटी बचे हैं।

राजस्थान में छात्रसंघ चुनाव की मांग को लेकर हंगामा: उदयपुर में ABVP और NSUI कार्यकर्ता भिड़े, जयपुर में राजस्थान में छात्...
06/08/2026

राजस्थान में छात्रसंघ चुनाव की मांग को लेकर हंगामा: उदयपुर में ABVP और NSUI कार्यकर्ता भिड़े, जयपुर में

राजस्थान में छात्रसंघ चुनाव बहाल करने की मांग अब तेज हो गई है। जयपुर में राजस्थान यूनिवर्सिटी के गेट पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) और RLP के कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन किया।

प्रदर्शन के दौरान ABVP कार्यकर्ता यूनिवर्सिटी के मुख्य गेट पर चढ़ गए। यूनिवर्सिटी कैंपस से जेएलएन मार्ग पर पहुंचने पर पुलिस से धक्का-मुक्की हो गई। पुलिस ने ABVP के विश्वविद्यालय राष्ट्रीय संयोजक भारत भूषण यादव सहित 36 से ज्यादा स्टूडेंट्स को हिरासत में लिया। राजस्थान में मूक बधिर स्टूडेंट्स ने भी प्रदर्शन किया।

उदयपुर की मोहनलाल सुखाड़िया यूनिवर्सिटी में प्रदर्शन के दौरान ABVP और NSUI कार्यकर्ता आपस में भिड़ गए। पुलिस ने दोनों संगठनों के कार्यकर्ताओं को अलग-थलग कर मामला शांत करवाया।

जोधपुर में जय नारायण व्यास यूनिवर्सिटी के गेट पर ABVP से जुड़े छात्रों ने प्रदर्शन किया। सीकर की शेखावाटी यूनिवर्सिटी में ABVP के कार्यकर्ताओं ने मुख्य बिल्डिंग के गेट के ऊपर चढ़कर नारेबाजी की।

जयपुर में ABVP का कहना है कि अगर सरकार ने छात्रसंघ चुनाव बहाल नहीं किया तो ABVP प्रदेशभर में बीजेपी सरकार के खिलाफ उग्र आंदोलन करेगी। उसने जयपुर से प्रदेशव्यापी आंदोलन शुरू करने की घोषणा की है।

ABVP के विश्वविद्यालय राष्ट्रीय संयोजक भारत भूषण यादव को उठाकर गाड़ी में डालती पुलिस।

उदयपुर की मोहनलाल सुखाड़िया यूनिवर्सिटी में छात्रसंघ चुनाव को लेकर प्रदर्शन के दौरान ABVP और NSUI के कार्यकर्ता आमने-सामने हो गए। पुलिस ने मामला शांत कराया।

उदयपुर की मोहनलाल सुखाड़िया यूनिवर्सिटी में छात्रसंघ चुनाव को लेकर प्रदर्शन के दौरान ABVP और NSUI के कार्यकर्ता आमने-सामने हो गए। पुलिस ने मामला शांत कराया।

छात्रों को अपना प्रतिनिधि चुनने का मिलना चाहिए अधिकार

ABVP के विश्वविद्यालय राष्ट्रीय संयोजक भारत भूषण यादव ने कहा- छात्रसंघ चुनाव स्टूडेंट्स की लंबे समय से चली आ रही जायज मांग है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में छात्रों को अपना प्रतिनिधि चुनने का अधिकार मिलना चाहिए। लेकिन पिछले कई साल से यह अधिकार उनसे छीन लिया गया है।

उन्होंने कहा- कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में छात्रों की आवाज को दबाने का काम किया गया था। सत्ता परिवर्तन के बाद स्टूडेंट्स को उम्मीद थी कि नई सरकार छात्रसंघ चुनाव बहाल करेगी। लेकिन अब तक इस दिशा में कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया। इससे छात्रों में निराशा बढ़ रही है।

पहले से गरमाया हुआ है छात्र राजनीति का माहौल

राजस्थान में छात्रसंघ चुनाव को लेकर पिछले कुछ समय से लगातार आंदोलन चल रहे हैं। NSUI चुनाव बहाली की मांग को लेकर प्रदर्शन कर चुकी है। निर्दलीय छात्र नेता भी अलग-अलग स्तर पर आंदोलन कर रहे हैं। छात्र नेता शुभम रेवाड़ का आमरण अनशन भी इस मुद्दे को लेकर प्रदेशभर में चर्चा का विषय बना हुआ था।

अब ABVP के भी आंदोलन में उतरने से छात्रसंघ चुनाव का मुद्दा और अधिक राजनीतिक होता नजर आ रहा है। प्रदेश के प्रमुख छात्र संगठनों के एक के बाद एक आंदोलन शुरू करने से सरकार पर चुनाव बहाल करने का दबाव बढ़ने की संभावना है।

छात्रसंघ चुनाव को लेकर प्रदर्शन के पल-पल की अपडेट के लिए ब्लॉग से गुजर जाइए…

कोटा यूनिवर्सिटी में VC को दिया ज्ञापन
कोटा में एबीवीपी की ओर से छात्रसंघ चुनाव कराने की मांग को लेकर कोटा यूनिवर्सिटी के VC को ज्ञापन सौंपा गया। इसके साथ ही छात्रों ने यूनिवर्सिटी की अन्य अव्यवस्थाओं को सुधारने की भी मांग की।

छात्रों ने कुलपति के सामने समय पर परीक्षा परिणाम जारी करने और परिसर में पीने के पानी की सुचारू व्यवस्था करने समेत कई अन्य मांगें रखीं।

सीकर में बिल्डिंग पर चढ़कर किया प्रदर्शन
सीकर की शेखावाटी यूनिवर्सिटी में ABVP ने छात्रसंघ चुनाव बहाली को लेकर प्रदर्शन किया। ABVP के कार्यकर्ता मुख्य बिल्डिंग के ऊपर चढ़कर नारेबाजी करने लगे। एडमिन ब्लॉक की सीढ़ियों पर बैठे हैं।

ABVP के विभाग संगठन मंत्री अभिनव सिंह और राष्ट्रीय कार्यसमिति सदस्य उत्तम चौधरी ने बताया- पूरे राजस्थान में छात्रसंघ चुनाव बंद हैं। इस वजह से स्टूडेंट्स के मुद्दों पर सही तरीके से सुनवाई नहीं हो रही है। सभी यूनिवर्सिटी कैंपस में मनमर्जी हावी है।

जोधपुर में यूनिवर्सिटी के गेट पर प्रदर्शन
जोधपुर में छात्रसंघ चुनाव की मांग को लेकर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता जय नारायण व्यास यूनिवर्सिटी में प्रदर्शन कर रहे हैं। छात्र विश्वविद्यालय के गेट पर जुटे हैं। वहीं उन्हें रोकने के लिए पुलिस बल तैनात है।

RLP नेता बोले- हम डरेंगे नहीं
राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के छात्र नेता कमल चौधरी ने कहा- राजस्थान की भजनलाल सरकार ने छात्रों की आवाज को दबाने का काम किया है। हम डरेंगे नहीं, बल्कि अपनी मांग को लेकर पुरजोर प्रदर्शन करेंगे।

आज हम शांतिप्रिय तरीके से आंदोलन कर रहे थे। लेकिन पुलिस ने हमें हिरासत में ले लिया है। इसके बाद अब प्रदेशभर में यह आंदोलन उग्र रूप लेगा। अब हम किसी भी सूरत में छात्रसंघ चुनाव बहाल कराकर ही दम लेंगे।

मूक बधिर स्टूडेंट्स ने भी किया प्रदर्शन
राजस्थान यूनिवर्सिटी में मूक बाधिर छात्र भी छात्रसंघ चुनाव फिर से शुरू करने को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। इसके साथ ही उन्होंने यूनिवर्सिटी प्रशासन की बदहाल व्यवस्था को लेकर भी प्रदर्शन किया।

उनका कहना है, जो भवन है उसके हालात काफी खराब हैं। ऐसे में अगर जल्द उनकी मांग पूरी नहीं हुई तो बड़ा आंदोलन किया जाएगा।

उदयपुर में NSUI और ABVP कार्यकर्ता भिड़े
उदयपुर के मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय में छात्रसंघ चुनाव की मांग को लेकर छात्रों के प्रदर्शन के दौरान माहौल गरमा गया। दोपहर करीब 12 बजे ABVP और NSUI के कार्यकर्ता आमने-सामने हो गए।

दोनों छात्र संगठनों के बीच विवाद इतना बढ़ गया कि कार्यकर्ता आपस में गुत्थम-गुत्था हो गए। मौके पर मौजूद पुलिस बल ने तुरंत स्थिति को संभाला और कार्यकर्ताओं को अलग-थलग कर मामला शांत करवाया।

प्रदर्शन के दौरान विवाद की शुरुआत आट्‌र्स कॉलेज के मुख्य गेट को बंद करवाने को लेकर हुई। इसके बाद जब दोनों संगठनों के कार्यकर्ता प्रदर्शन करते हुए कुलपति कार्यालय पहुंचे, तो वहां NSUI कार्यकर्ताओं द्वारा झंडा हटाने की बात पर फिर से बहस शुरू हो गई। देखते ही देखते दोनों गुटों के बीच धक्का-मुक्की और मारपीट की नौबत आ गई।

एनएसयूआई और एबीवीपी ने राजस्थान में जल्द छात्रसंघ चुनाव नहीं कराने पर बड़े आंदोलन की चेतावनी दी है।

RLP के कार्यकर्ता भी कर रहे प्रदर्शन
ABVP के बाद अब राजस्थान यूनिवर्सिटी में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी और निर्दलीय छात्रों की ओर से छात्रसंघ चुनाव बहाल करने की मांग को लेकर प्रदर्शन किया जा रहा है।

बड़ी संख्या में छात्र यूनिवर्सिटी कैंपस में सरकार के खिलाफ धरना देकर अपनी मांग पूरी करवाने की कोशिश कर रहे हैं।

पुलिस कार्यकर्ताओं को रोकने में जुटी
राजस्थान में छात्रसंघ चुनाव बहाल करने की मांग को लेकर राजस्थान यूनिवर्सिटी में एबीवीपी के कार्यकर्ता प्रदर्शन कर रहे हैं।

सरकार से चुनाव बहाल करने की मांग कर रहे हैं। पुलिस कार्यकर्ताओं को रोक रही है। अब तक एक दर्जन कार्यकर्ताओं को पुलिस ने हिरासत में लिया है। छात्रों के साथ छात्राएं भी विरोध प्रदर्शन कर रही हैं।

पुलिस ने 5 छात्रों को हिरासत में लिया
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता यूनिवर्सिटी कैंपस से जवाहरलाल नेहरू मार्ग पर पहुंच गए हैं। जिन्हें पुलिस द्वारा हिरासत में लिया जा रहा है।

अब तक पांच छात्रों को पुलिस ने हिरासत में ले लिया है। फिलहाल यूनिवर्सिटी के मुख्य गेट पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं का प्रदर्शन जारी है।

छात्रसंघ चुनाव बहाल नहीं किए तो BJP सरकार के खिलाफ उग्र आंदोलन करेंगे
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के छात्र राजस्थान यूनिवर्सिटी के मुख्य गेट पर बैठकर सरकार के खिलाफ धरना दे रहे हैं।

छात्रों की मांग है कि पिछले 3 साल से राजस्थान में छात्रसंघ चुनाव बंद हैं। अगर सरकार ने इस बार फिर से चुनाव बहाल नहीं किया तो अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद प्रदेशभर में बीजेपी सरकार के खिलाफ उग्र आंदोलन करेगी।

सरकार के फैसले पर टिकी नजर
छात्रसंघ चुनाव को लेकर फिलहाल सरकार की ओर से कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। ऐसे में आने वाले दिनों में छात्र संगठनों के आंदोलन की दिशा और सरकार की प्रतिक्रिया पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी।

ऐसे में अगर छात्रों की मांगों पर जल्द फैसला नहीं होता है तो प्रदेशभर के विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में आंदोलन और तेज होने की संभावना जताई जा रही है।

हर हाल में लेकर रहेंगे छात्रसंघ चुनाव का हक
ABVP के विश्वविद्यालय राष्ट्रीय संयोजक भारत भूषण यादव ने कहा कि अगर सरकार ने जल्द सकारात्मक फैसला नहीं लिया तो परिषद का आंदोलन पूरे प्रदेश में व्यापक स्तर पर चलाया जाएगा।

उन्होंने कहा- छात्रसंघ चुनाव हमारा अधिकार है और इसे हम किसी भी कीमत पर लेकर रहेंगे। प्रदेशभर में परिषद के कार्यकर्ता और पदाधिकारी इस मांग को लेकर सरकार के खिलाफ आंदोलन की शुरुआत कर रहे हैं।

यूनिवर्सिटी कैंपस में रैली निकाल रहे स्टूडेंट्स
राजस्थान यूनिवर्सिटी में छात्रसंघ चुनाव की मांग को लेकर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया है। बड़ी संख्या में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के छात्र हाथ में पोस्टर लेकर यूनिवर्सिटी कैंपस में रैली निकल विरोध कर रहे हैं।

ट्रेलर देखकर पहली प्रतिक्रिया... कुछ बातें अच्छी लगीं, कुछ सवाल अब भी बाकी हैं।किसी भी पौराणिक फिल्म का ट्रेलर आते ही सब...
02/08/2026

ट्रेलर देखकर पहली प्रतिक्रिया... कुछ बातें अच्छी लगीं, कुछ सवाल अब भी बाकी हैं।

किसी भी पौराणिक फिल्म का ट्रेलर आते ही सबसे पहले दर्शक कलाकारों को नहीं, बल्कि उन किरदारों को तलाशते हैं जिन्हें वे बचपन से अपनी आस्था और कल्पना में देखते आए हैं। इसलिए हर पात्र पर अलग-अलग राय होना स्वाभाविक है।

मेरी पहली प्रतिक्रिया भी कुछ ऐसी ही रही।

सबसे पहले बात रावण की।

यश को मैंने पहले ज़्यादा फिल्मों में नहीं देखा है, इसलिए स्क्रीन पर वे रावण के रूप में अधिक दिखाई दिए, अभिनेता के रूप में कम। यही किसी भी कलाकार की सबसे बड़ी सफलता होती है कि दर्शक उसके चेहरे में किरदार देखने लगे।

लक्ष्मण, मेघनाद और अन्य कई पात्र भी पहली झलक में अपने किरदारों के अनुरूप लगे। कम से कम ट्रेलर के आधार पर उनके चयन को लेकर कोई विशेष असहजता महसूस नहीं हुई।

माता सीता के रूप में साई पल्लवी को लेकर सोशल मीडिया पर अलग-अलग राय सामने आ रही है। लेकिन व्यक्तिगत रूप से मुझे उनकी सादगी इस किरदार के अनुकूल लगी।

हम अक्सर "दिव्य सौंदर्य" का अर्थ केवल बाहरी रूप से जोड़ देते हैं, जबकि रामायण में माता सीता की सबसे बड़ी पहचान उनका त्याग, धैर्य, करुणा, मर्यादा और तेज है। यदि कोई कलाकार इन भावों को ईमानदारी से निभा सके, तो वही इस पात्र की सबसे बड़ी सफलता होगी।

रामानंद सागर की रामायण में दीपिका चिखलिया भी अत्यधिक ग्लैमरस प्रस्तुति के कारण नहीं, बल्कि अपनी सहजता और शांत व्यक्तित्व के कारण लोगों के मन में माता सीता के रूप में बस गई थीं।

हाँ...

यदि किसी एक पात्र को लेकर सबसे अधिक मिश्रित भावना हुई, तो वह भगवान श्रीराम का किरदार है।

रणबीर कपूर निस्संदेह एक अच्छे अभिनेता हैं, लेकिन ट्रेलर देखते समय कई जगह ऐसा महसूस हुआ कि स्क्रीन पर भगवान श्रीराम से पहले रणबीर कपूर दिखाई दे रहे हैं।

शायद इसका कारण यह भी है कि दर्शकों ने उन्हें वर्षों तक अलग-अलग भूमिकाओं में देखा है। किसी स्थापित अभिनेता के लिए अपने स्टार इमेज से पूरी तरह बाहर निकलना हमेशा आसान नहीं होता।

हालांकि यह अंतिम निष्कर्ष नहीं कहा जा सकता।

कई बार ट्रेलर में साधारण लगने वाला अभिनय पूरी फिल्म में असाधारण साबित हो जाता है। इसलिए इस विषय पर अंतिम राय फिल्म देखने के बाद ही बननी चाहिए।

तकनीकी स्तर पर फिल्म निश्चित रूप से भव्य दिखाई दे रही है।

यदि वास्तव में हजारों करोड़ रुपये का निवेश किया गया है, तो उसका प्रभाव दृश्य निर्माण, VFX और युद्ध के दृश्यों में दिखाई देना भी चाहिए। रामानंद सागर के समय संसाधन सीमित थे, इसलिए उन्होंने अपनी सीमाओं के भीतर जो किया, वही आज भी लोगों के दिलों में जीवित है। आज तकनीक कहीं अधिक विकसित है, इसलिए दर्शकों की अपेक्षाएँ भी स्वाभाविक रूप से अधिक हैं।

युद्ध के दृश्य, लंका का निर्माण, वनवास, समुद्र पर सेतु और अन्य महत्वपूर्ण प्रसंग यदि प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किए जाते हैं, तो यह भारतीय सिनेमा के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि हो सकती है।

संवादों को लेकर भी उम्मीद बनी हुई है। यदि लेखन में मर्यादा, गंभीरता और मूल कथा की आत्मा बनी रही, तो फिल्म का प्रभाव कई गुना बढ़ जाएगा। रामायण जैसे महाकाव्य में केवल भव्य दृश्य पर्याप्त नहीं होते, शब्दों का वजन भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है।

संगीत को लेकर लोगों की राय अलग-अलग हो सकती है। ए. आर. रहमान भारतीय संगीत के बड़े नाम हैं, लेकिन कुछ दर्शकों की अपेक्षा रहती है कि रामायण जैसी कथा में भारतीय शास्त्रीय संगीत, वैदिक ध्वनियाँ और पारंपरिक वाद्यों की उपस्थिति अधिक महसूस हो। यह देखना दिलचस्प होगा कि फिल्म का अंतिम संगीत किस तरह का अनुभव देता है।

फिलहाल इतना कहना उचित होगा कि केवल ट्रेलर देखकर किसी फिल्म को महान या असफल घोषित कर देना जल्दबाज़ी होगी।

रामायण कोई सामान्य फिल्म नहीं है।

यह करोड़ों लोगों की आस्था, संस्कृति और भावनाओं से जुड़ा महाकाव्य है।

इसलिए इसकी प्रशंसा भी सोच-समझकर होनी चाहिए और आलोचना भी पूरी फिल्म देखने के बाद।

फिलहाल ट्रेलर ने उत्सुकता जरूर बढ़ाई है।

अब असली परीक्षा बड़े पर्दे पर होगी।

और शायद वही तय करेगा कि यह फिल्म केवल एक भव्य सिनेमाई अनुभव बनती है या आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक यादगार रामायण बन पाती है।

ट्रेलर देखा… और सबसे ज़्यादा ध्यान कैकेयी के किरदार पर गया।रामायण जैसे महाकाव्य में हर पात्र की अपनी एक अलग गरिमा, व्यक्...
02/08/2026

ट्रेलर देखा… और सबसे ज़्यादा ध्यान कैकेयी के किरदार पर गया।

रामायण जैसे महाकाव्य में हर पात्र की अपनी एक अलग गरिमा, व्यक्तित्व और पहचान है। इसलिए जब इन किरदारों को बड़े पर्दे पर उतारा जाता है, तो दर्शकों की अपेक्षाएं भी स्वाभाविक रूप से बहुत बढ़ जाती हैं।

ट्रेलर देखते समय एक दृश्य आया, जिसमें कैकेयी के रूप में लारा दत्ता दिखाई देती हैं। पहली नज़र में लगा कि अभिनय से पहले कॉस्ट्यूम और स्टाइलिंग पर ध्यान चला गया।

यहां बात लारा दत्ता की बिल्कुल नहीं है। वह एक अनुभवी और प्रतिभाशाली अभिनेत्री हैं। सवाल केवल उनके लुक और प्रस्तुति को लेकर है।

ट्रेलर में कैकेयी का लुक इतना आधुनिक, इतना परफेक्ट और इतना फैशन-ओरिएंटेड दिखाई देता है कि कुछ क्षणों के लिए यह भूलना पड़ता है कि कहानी त्रेतायुग की है।

साड़ी की ड्रेपिंग बिल्कुल डिजाइनर अंदाज में...

मेकअप एकदम हाई-डेफिनिशन...

बाल ऐसे जैसे अभी किसी प्रीमियम सैलून से तैयार होकर आई हों...

नाखून भी इतने सलीके से सजे हुए कि देखकर मजाक में यही ख्याल आता है—

शायद मंथरा ने राम के वनवास से पहले कैकेयी का पूरा ब्राइडल मेकओवर पैकेज बुक करवा दिया था। 😄

कई बार ऐसा लगा कि उस समय अयोध्या में राजवैद्य से ज्यादा व्यस्त फैशन स्टाइलिस्ट और स्किन केयर एक्सपर्ट रहे होंगे।

बेशक यह हल्के-फुल्के व्यंग्य की बात है, लेकिन इसके पीछे एक गंभीर सवाल भी छिपा है।

क्या पौराणिक पात्रों को प्रस्तुत करते समय आधुनिक फैशन का प्रभाव इतना अधिक होना चाहिए कि दर्शक का ध्यान किरदार से हटकर केवल स्टाइलिंग पर चला जाए?

रामायण कोई सामान्य फिल्म नहीं है।

यह करोड़ों लोगों की आस्था, संस्कृति और भावनाओं से जुड़ा महाकाव्य है।

इसलिए दर्शक केवल भव्य सेट, शानदार VFX और महंगे कॉस्ट्यूम नहीं देखते।

वे उस युग की अनुभूति भी महसूस करना चाहते हैं।

वे चाहते हैं कि पर्दे पर उन्हें अभिनेता नहीं, बल्कि पात्र दिखाई दें।

जब दर्शक को हर फ्रेम में पहले सेलिब्रिटी और बाद में किरदार दिखे, तो भावनात्मक जुड़ाव थोड़ा कम हो जाता है।

यही कारण है कि आज भी लोग रामानंद सागर की रामायण को याद करते हैं। उस समय न करोड़ों का बजट था, न आधुनिक तकनीक। लेकिन पात्रों की सादगी, वेशभूषा और भाव-भंगिमा ऐसी थी कि दर्शक उन्हें अभिनय करते कलाकार नहीं, बल्कि वही चरित्र मानने लगे थे।

आज तकनीक कहीं आगे बढ़ चुकी है।

VFX बेहतर हैं।

कैमरे बेहतर हैं।

बजट भी कई गुना बड़ा है।

लेकिन शायद दर्शकों की सबसे बड़ी अपेक्षा अब भी वही है—

किरदार का तेज, उसकी गरिमा और उस युग की अनुभूति।

कॉस्ट्यूम सुंदर होना गलत नहीं है।

भव्यता भी जरूरी है।

लेकिन यदि फैशन पात्र पर हावी होने लगे, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।

हालांकि यह भी सच है कि ट्रेलर किसी फिल्म का बहुत छोटा हिस्सा होता है। केवल कुछ मिनट देखकर पूरी फिल्म का अंतिम मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। हो सकता है पूरी फिल्म में किरदार का विकास और प्रस्तुति कहीं अधिक प्रभावशाली हो।

इसलिए अंतिम राय फिल्म देखने के बाद ही बननी चाहिए।

फिर भी एक बात जरूर कही जा सकती है—

रामायण जैसे विषय में दर्शक फैशन आइकन नहीं, युग के पात्र देखना चाहते हैं।

क्योंकि यहां कॉस्ट्यूम से ज्यादा महत्वपूर्ण चरित्र है।

मेकअप से ज्यादा महत्वपूर्ण भाव हैं।

और स्टारडम से ज्यादा महत्वपूर्ण आस्था है।

बाकी...

यह तो दर्शक तय करेंगे कि पर्दे पर उन्हें कैकेयी दिखाई दीं...

या फिर एक ग्लैमरस क्वीन।

🙂

कुछ दिन पहले मैं एक पार्लर गई थी। वहाँ इंतज़ार करते-करते यूँ ही बातचीत शुरू हो गई। बात चेहरे की देखभाल पर पहुँचीतो मैंने...
31/07/2026

कुछ दिन पहले मैं एक पार्लर गई थी। वहाँ इंतज़ार करते-करते यूँ ही बातचीत शुरू हो गई। बात चेहरे की देखभाल पर पहुँची

तो मैंने मुस्कुराते हुए पार्लर वाली से पूछा,

"चेहरे की पिगमेंटेशन कम करने का कोई आसान उपाय हो तो बताइए?"

बस... मेरा सवाल सुनते ही उसने अपने सामने रखी महंगी-महंगी क्रीमों की पूरी दुनिया खोल दी।

एक के बाद एक कई प्रोडक्ट दिखाए और उनके फायदे गिनाने लगी।

मैंने हँसते हुए कहा,

"नहीं... मेरी स्किन थोड़ी सेंसेटिव है। कई बार क्रीम लगाने से फायदा होने की बजाय उल्टा असर हो जाता है। इसलिए कुछ घरेलू उपाय हो तो बताइए।"

मेरी बात सुनकर वह कुछ पल रुकी...

फिर बोली,

"अगर सच में नेचुरल तरीका अपनाना चाहती हैं, तो कच्ची हल्दी का रस लगाकर देखिए।"

मैंने दोबारा पूछा,

"क्या इससे टैनिंग और चेहरे के हल्के दाग भी कम हो जाएंगे?"

वह पूरे आत्मविश्वास से बोली,

"हाँ मैम... नियमित इस्तेमाल करेंगी तो धीरे-धीरे दाग हल्के पड़ सकते हैं और त्वचा में भी निखार महसूस होगा।"

उसकी बात सुनकर मुझे सबसे अच्छी बात क्या लगी, जानते हैं?

उसने इस बार कोई महंगी क्रीम बेचने की कोशिश नहीं की।

एक ऐसी चीज़ बताई जो लगभग हर रसोई में इस्तेमाल होती है।

घर लौटते समय मैंने सबसे पहले कच्ची हल्दी खरीद ली।

असम में तो लगभग पूरे साल ताज़ी कच्ची हल्दी मिल जाती है, इसलिए इसे लेना भी आसान है।

अब मैंने सोचा है कि केवल चेहरे पर ही नहीं, बल्कि रसोई में भी जहाँ संभव हो, पिसी हुई हल्दी की जगह कच्ची हल्दी का इस्तेमाल ज़्यादा करूँ।

कम से कम इतना तो संतोष रहेगा कि खाने में मिलावट कुछ कम होगी।

हाँ, एक बात ज़रूर समझनी चाहिए।

हर किसी की त्वचा अलग होती है।

जो चीज़ एक व्यक्ति को लाभ पहुँचाए, वह दूसरे व्यक्ति की त्वचा पर सूट करे, यह ज़रूरी नहीं। इसलिए कोई भी घरेलू उपाय अपनाने से पहले हाथ के एक छोटे हिस्से पर लगाकर देख लेना बेहतर रहता है। अगर जलन, खुजली या एलर्जी महसूस हो तो उसका उपयोग नहीं करना चाहिए। और यदि पिगमेंटेशन बहुत ज़्यादा हो या लंबे समय से बनी हुई हो, तो त्वचा विशेषज्ञ की सलाह लेना सबसे सही रहता है।

सुंदरता का मतलब केवल गोरा रंग नहीं होता।

स्वस्थ, साफ़ और आत्मविश्वास से भरा चेहरा ही सबसे बड़ी खूबसूरती है।

अगर प्रकृति की छोटी-छोटी चीज़ों से त्वचा की देखभाल हो जाए, तो उससे बेहतर क्या हो सकता है?

कभी-कभी रसोई में रखा एक साधारण-सा मसाला भी हमें याद दिला देता है कि हर समाधान महंगी बोतलों में ही नहीं मिलता।

आपने कभी कच्ची हल्दी का इस्तेमाल किया है? अगर हाँ, तो अपना अनुभव ज़रूर साझा कीजिए। 🌿💛

राधे-राधे। 🙏

क्या किसी फिल्म की सफलता केवल 4000 करोड़ के बजट से तय होती है? शायद नहीं… सब कुछ निर्देशक के विज़न ....किसी भी बड़ी फिल्...
31/07/2026

क्या किसी फिल्म की सफलता केवल 4000 करोड़ के बजट से तय होती है? शायद नहीं… सब कुछ निर्देशक के विज़न ....

किसी भी बड़ी फिल्म की असली ताकत उसके VFX, स्टारकास्ट या बजट में नहीं होती। उसकी सबसे बड़ी ताकत होती है निर्देशक का विज़न।

अगर निर्देशक के मन में शुरुआत से ही यह स्पष्ट हो कि वह पर्दे पर क्या दिखाना चाहता है, तो फिर कास्टिंग से लेकर कैमरा, संगीत, कॉस्ट्यूम, VFX और हर विभाग उसी दिशा में काम करता है। लेकिन यदि विज़न ही बार-बार बदलता रहे, तो करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी दर्शकों को वह प्रभाव महसूस नहीं होता जिसकी उनसे उम्मीद की जाती है।

इसी वजह से इन दिनों 'रामायण' फिल्म को लेकर सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा चर्चा केवल कलाकारों की नहीं, बल्कि निर्देशक नितेश तिवारी के विज़न की भी हो रही है।

जानकारी के अनुसार इस प्रोजेक्ट पर कई वर्षों से काम चल रहा है। बीच-बीच में निर्माता बदले, रचनात्मक मतभेदों की खबरें आईं, कहानी के प्रारूप में बदलाव की चर्चाएं हुईं और कई कलाकारों के नाम भी बदलते रहे।

शुरुआती दौर में इस प्रोजेक्ट से अलग-अलग निर्माता जुड़े थे। बाद में कुछ ने अलग राह चुन ली और पूरा प्रोजेक्ट दूसरे स्वरूप में आगे बढ़ा। इसी दौरान यह भी चर्चा रही कि भगवान राम और रावण जैसे प्रमुख किरदारों के लिए कई बड़े कलाकारों के नामों पर विचार किया गया, लेकिन अंततः अंतिम चयन अलग रहा।

यहीं से सवाल उठने शुरू हुए।

क्या इतने बड़े प्रोजेक्ट में शुरुआत से स्पष्ट योजना थी?

या फिर परिस्थितियों के अनुसार फैसले बदलते गए?

इसी संदर्भ में कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा का नाम भी चर्चा में है। हाल ही में उनकी एक दूसरी फिल्म की कास्टिंग की काफी सराहना हुई थी, लेकिन रामायण की कास्टिंग को लेकर सोशल मीडिया पर मिश्रित प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं।

कुछ दर्शकों का मानना है कि कुछ कलाकार अपने किरदारों के लिए उपयुक्त हैं, जबकि कुछ लोगों को लगता है कि भगवान राम, माता सीता और अन्य पात्रों की स्क्रीन प्रस्तुति से उनकी वर्षों पुरानी कल्पना मेल नहीं खाती।

हालांकि यह पूरी तरह व्यक्तिगत पसंद और दर्शकों की अपेक्षाओं का विषय है।

किसी कलाकार का अंतिम मूल्यांकन केवल पोस्टर या ट्रेलर देखकर नहीं किया जा सकता। पूरी फिल्म देखने के बाद ही यह तय होगा कि उसने अपने किरदार के साथ कितना न्याय किया।

लेकिन एक तुलना ऐसी है जो बार-बार सामने आती है।

वह है एस. एस. राजामौली।

राजामौली की फिल्मों की सबसे बड़ी पहचान उनका स्पष्ट विज़न माना जाता है। चाहे बाहुबली हो या RRR, उनकी फिल्मों में दर्शकों को महसूस होता है कि हर दृश्य पहले से सोच-समझकर बनाया गया है। कैमरे का कोण, बैकग्राउंड स्कोर, एक्शन, भावनाएं और चरित्र—सब एक ही दिशा में चलते हैं।

इसीलिए जब उनकी आगामी फिल्म 'वाराणसी' (जिसकी आधिकारिक जानकारी अभी सीमित है) को लेकर चर्चाएं होती हैं, तो लोग पहले से ही बड़ी उम्मीदें लगाने लगते हैं। सोशल मीडिया पर कई तरह की अटकलें और AI आधारित वीडियो भी वायरल होते रहते हैं। लेकिन राजामौली की पहचान यही रही है कि वे अंतिम फिल्म में दर्शकों को अपेक्षा से कहीं अधिक देने की कोशिश करते हैं।

यही कारण है कि बहुत से लोग मानते हैं कि पौराणिक या ऐतिहासिक विषयों पर फिल्म बनाना केवल तकनीक का खेल नहीं है।

यह भावनाओं का विषय है।

आस्था का विषय है।

और सबसे बढ़कर निर्देशक के दृष्टिकोण का विषय है।

इन दिनों रामायण के ट्रेलर को लेकर भी प्रतिक्रियाएं बंटी हुई हैं। कुछ दर्शकों को यह पसंद आया, जबकि कुछ लोगों ने अपने सवाल और आपत्तियां खुलकर रखीं। सोशल मीडिया पर हर कोई अपनी राय दे रहा है।

लेकिन शायद सबसे सही रास्ता यही होगा कि अंतिम निर्णय पूरी फिल्म देखने के बाद ही किया जाए।

क्योंकि इतिहास गवाह है—

कई फिल्मों के ट्रेलर साधारण रहे, लेकिन फिल्म शानदार निकली।

और कई बार बेहतरीन ट्रेलर के बाद फिल्म दर्शकों की उम्मीदों पर खरी नहीं उतर सकी।

इसलिए किसी भी फिल्म को लेकर अंतिम राय बनाने से पहले थोड़ा इंतजार करना ही बेहतर है।

एक बात जरूर तय है...

रामायण जैसी कथा केवल एक फिल्म नहीं है।

यह करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़ा विषय है।

इसलिए दर्शक केवल भव्य VFX या बड़े बजट की नहीं, बल्कि उस दिव्यता, मर्यादा और भावनात्मक गहराई की भी अपेक्षा करते हैं, जो इस महाकाव्य की सबसे बड़ी पहचान है।

अंततः किसी भी फिल्म की सफलता इस बात से तय होगी कि वह दर्शकों के दिल तक पहुंच पाती है या नहीं।

क्योंकि बजट फिल्म को बड़ा बना सकता है... लेकिन कालजयी केवल निर्देशक का विज़न ही बनाता है।

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