21/06/2026
दादाजी का खजाना
अक्षर, जो अपने दादाजी के साथ गांव में छुट्टियाँ बिताने आया था, बहुत शरारती था। एक रात, जब पूरे गांव में बिजली चली गई, तो अक्षर डर के मारे दादाजी के पास दुबक कर बैठ गया। दादाजी मुस्कुराए और कमरे के कोने में रखे एक पुराने, धूल भरे संदूक को खोला।
उन्होंने उसमें से एक भारी, पीतल की बनी पुरानी टॉर्च निकाली। जैसे ही दादाजी ने उसका बटन दबाया, एक तेज़ और स्थिर रोशनी कमरे में फैल गई।
अक्षर ने उत्सुकता से पूछा, "दादाजी, यह टॉर्च तो बहुत पुरानी लगती है, क्या यह अभी भी इतनी अच्छी तरह काम करती है?"
पुरानी टॉर्च की अनकही कहानी
दादाजी ने टॉर्च को मेज पर रखा और अक्षर के सिर पर हाथ फेरते हुए बोले, "बेटा, यह कोई साधारण टॉर्च नहीं है। यह मेरे पिता की है। आज़ादी के उस दौर में, जब हम छोटे थे, इस टॉर्च ने हमें कई रातों में रास्ता दिखाया था। यह सिर्फ अंधेरा दूर नहीं करती, यह 'हिम्मत' का प्रतीक है।"
दादाजी ने आगे बताया, "एक बार जब बहुत तेज़ तूफ़ान आया था और घर की छत गिर गई थी, तब इसी टॉर्च की रोशनी में हम सबने मिलकर खुद को सुरक्षित जगह पहुँचाया था। यह टॉर्च हमें सिखाती है कि चाहे दुनिया कितनी भी काली क्यों न हो, एक छोटी सी मशाल या टॉर्च की रोशनी ही काफ़ी है सही रास्ता खोजने के लिए।"
रोशनी का सबक
अक्षर उस टॉर्च को बड़े ध्यान से देख रहा था। उसने उसे अपने हाथ में पकड़ा, वह भारी थी, जैसे उसमें बीता हुआ वक्त समाया हो। दादाजी ने उसे सिखाया कि कैसे टॉर्च को सही तरह से इस्तेमाल करते हैं ताकि रोशनी बर्बाद न हो।
दादाजी ने कहा, "अक्षर, ज़िन्दगी में भी ऐसा ही होता है। जब कभी तुम्हें लगे कि तुम अंधेरे में हो या रास्ता नहीं दिख रहा, तो घबराना मत। बस अपने अंदर की 'हिम्मत' की टॉर्च को जला लेना। वह कभी धोखा नहीं देगी।"
अगली पीढ़ी की जिम्मेदारी
उस रात, दादाजी ने वह टॉर्च अक्षर को सौंप दी। अक्षर को लगा जैसे उसे कोई बहुत बड़ा खजाना मिल गया हो। वह रात उसके लिए सिर्फ बिजली जाने वाली रात नहीं थी, बल्कि एक ऐसा सबक पाने की रात थी जो उसे जीवन भर याद रहने वाला था।
आज भी, जब कभी अक्षर के घर में लाइट जाती है, वह दौड़कर अपनी पुरानी पीतल की टॉर्च लाता है। उस टॉर्च को जलाते ही उसे दादाजी के शब्द याद आ जाते हैं— कि रोशनी सिर्फ चीज़ों को देखने के लिए नहीं, बल्कि खुद को रास्ता दिखाने के लिए होती है।