27/05/2025
ऑपरेशन सिंदूर: क्या खोया क्या पाया
किसी बीमारी का उपचार या इलाज अधूरा छोड़ देते है तो वो जब वापस उभरती है तो पहले दी गई दवाओ के असर से इम्यून होकर पहले से कहीं ज़्यादा घातक सिद्ध होती है क्योंकि ख़त्म होने से पूर्व उपचार रोक देने पर वो बीमारी उन दवाओं या उपचार के असर को कमजोर करने या उनके प्रति प्रतिरोधक क्षमता को विकसित कर चुकी होती हैं क्योंकि आंशिक ख़ात्मे पर जीवनदान पर उसके वायरस पूर्व में हुए उपचार के हमले का तोड़ निकालने की दौड़ में भी लग जाते है। यही हुआ इस बार के ऑपरेशन में। आंशिक कार्यवाही से हो सकता है दुश्मन पहले से ज़्यादा सशक्त हो जाए क्योंकि जो विफल होता है वो अगली बार सफलता के ज़्यादा प्रयास में लगता है जबकि जो सफलता के भ्रम में आश्वस्त जीने लगता है उसके विकास प्रयासों में विराम लग जाता है।
सबक के तौर पर पाक शायद अब अमेरिका से भी हथियार लेगा और भारत अमेरिका पर पाक को हथियार न बेचने हेतु दबाव बनानें की हेसियत में है नहीं तो रोक पाएंगे नहीं। वो अब इस युद्ध में रही उनकी कमियों पर हर हाल में कुछ न कुछ कार्य करेंगे क्योकीं उनके तो सर्वाइवल का आधार ही नफ़रत और हिंसा है तो वो इस दिशा में तो कुछ खुरापाती ज़रूर करेंगे। साथ ही जब उनके सारे मुख्य आतंकी ज़िंदा है वो अब शायद हमास हुती हिजबुल्ला जैसी ट्रेनिंग और हथियार लेने लगे जोकि भारत के लिए और बड़ा ख़तरा है।
तीसरा वहां इमरान ख़ान पर हुए जुर्मों के कारण उनकी आम जनता में ही सेना विरोधी माहौल खड़ा हो रखा था वो इस युद्ध के करण सेना के प्रति आम जन की सहानुभूति, सहयोग और वाह वाही में परिवर्तित हो गया। वहाँ का युवा और किशोर वर्ग जो सोशल मीडिया के ज़रिए वास्तिविक चित्र देखते हुए भारत के आंतरिक माहौल और विकास से प्रभावित होकर भारत को एक आदर्श मानते हुए ख़ुद के देश में भ्रष्टाचार एवं आतंकवाद विरोधी विचार बुन रहा था साथ ही भविष्य में भारत के साथ सारे मतभेद भुला कर सहयोग की तरफ़ बढ़ने की तरफ़ आकर्षित हो रहा था जोकि दोनों देशों में नफ़रत की राजनीती की दुकान चलाने वाले तमाम लोगों के लिए एक ख़तरा साबित होने वाला था इसलिए कुछ लोग वहां कुछ यहाँ लगातार इन प्रयासो में लगे हुए थे की कैसे भी करके ये नफ़रत ज़िंदा रहनी चाहिए ताकि राजनीति चल सके और अब ये घटना होने के करण आने वाले समय में जहाँ नई पीढ़ी नई दिशा लेना चाहती थी वो अब फिर भारत के विरुद्ध आक्रोश और नफ़रत से भर चुकी है जोकि आतंकवाद में भी कूद सकती है क्योंकि आंशिक आक्रोश और नफ़रत को इंतक़ाम की भावना में तब्दील करना अब उनकी ख़ुफ़िया एजेंसियों और आतंकियों के लिए आसान काम हो गया।
चौथी बात जो भारत के हमले के करण उनके वहाँ परमाणु रिसाव की अफ़वाहों को मीडिया और एक वर्ग ने तूल दिया जो तार्किक रूप से देखा जाए तो 1988 में परमाणु युद्ध की संभवना को रोकने हेतु दोनों देशों के बीच सभी परमाणु स्रोतों के स्थल की जानकारियाँ साझा रखने हेतु की गई संधि की अव्हेलना मानी जाएगी और इस दुष्प्रचार को पाक अगर वैश्विक स्तर पर एक तर्क के तौर पर भारत का ग़ैर ज़िम्मेदाराना आचरण सिद्ध करने हेतु हथियार के रूप में उपयोग में लेकर पेश करने लगा तो इन झूठे दावों के करण भारत की छवि को ज़रूर नुक़शान पहुचेगा। हो सकता है कुछ देश भारत पाक दोनों पर परमाणु हथियार निरस्त्रीकरण का दबाव बनाने जोकि चीन के परमाणु संपन्न रहते भारत के लिए घातक सिद्ध होगा।
आतंकवाद ख़त्म हुआ कि नहीं ये हम तब तक तो नहीं ही कह सकते जब पहलगाम की नृशंश घटना को अंजाम देते हुए निर्दोष निहत्थे लोगों की अकारण जान लेने वाले सभी आतंकी बिना सजा मिले ग़ायब हो गए हो और अक्सर भारत में आतंकी घटनाओं के अंजाम देने वाले अग्रणी आका मसूद अज़हर व हाफिज सईद आज भी ज़िंदा हो।
विवेकशील व्यक्ति इसके नफे नुक़शान का सही निष्कर्ष समझ सकता है पर राजनीति और अंधभक्ति से प्रभावित लोगों को शायद ही ये आभास हो।