05/04/2026
शिक्षा के नाम पर व्यापार: कब जागेगा समाज और सरकार ?
आज के समय में शिक्षा को समाज की नींव माना जाता है। यह वह माध्यम है जो बच्चों के भविष्य को उज्ज्वल बनाता है और देश को प्रगति की ओर ले जाता है। लेकिन दुख की बात यह है कि अब शिक्षा धीरे-धीरे सेवा से हटकर एक व्यापार का रूप लेती जा रही है।
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माता-पिता के साथ हो रहा अन्याय
आज कई स्कूलों में ऐसी स्थिति बन गई है जहां माता-पिता को मजबूर किया जाता है कि वे बच्चों के लिए वही किताबें, कॉपियां, यूनिफॉर्म और अन्य सामान खरीदें जो स्कूल द्वारा तय दुकानों से ही मिलते हैं।
* जो सामान बाजार में ₹50 का मिलता है, उसे ₹150–₹200 में बेचा जाता है
* माता-पिता के पास कोई विकल्प नहीं होता
* बाहर से खरीदने पर बच्चों पर दबाव बनाया जाता है
यह साफ तौर पर शोषण है।
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फंक्शन और गतिविधियों के नाम पर अतिरिक्त बोझ
सिर्फ पढ़ाई ही नहीं, बल्कि स्कूलों में होने वाले फंक्शन, इवेंट और गतिविधियों के नाम पर भी माता-पिता से बार-बार पैसे लिए जाते हैं।
* हर छोटे-बड़े कार्यक्रम के लिए अलग शुल्क
* अनिवार्य भागीदारी के नाम पर दबाव
* खर्च का कोई स्पष्ट हिसाब नहीं
यह स्थिति माता-पिता की आर्थिक परेशानी को और बढ़ा देती है।
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ट्यूशन का बढ़ता जाल
सबसे चिंताजनक बात यह है कि इतना खर्च करने के बाद भी बच्चों को बाहर से ट्यूशन लेना पड़ता है।
और हैरानी की बात यह है कि:
* अक्सर वही शिक्षक ट्यूशन पढ़ाते हैं जो स्कूल में भी पढ़ा रहे होते हैं
* स्कूल में पूरा ध्यान नहीं दिया जाता, ताकि ट्यूशन की मांग बढ़े
* माता-पिता मजबूरी में अतिरिक्त पैसे खर्च करते हैं
यह शिक्षा प्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।
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शिक्षा या मजबूरी का सौदा ?
जब शिक्षा देने वाले ही उसे कमाई का जरिया बना लें, तो यह सिर्फ एक सिस्टम की समस्या नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए खतरा है।
माता-पिता अपनी मेहनत की कमाई का बड़ा हिस्सा खर्च करने के बाद भी संतुष्ट नहीं हैं।
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बच्चों के भविष्य पर असर
* गरीब और मध्यम वर्ग के परिवार शिक्षा से दूर हो सकते हैं
* बच्चों में असमानता बढ़ती है
* शिक्षा का असली उद्देश्य खत्म होता जा रहा है
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सरकार को लेना होगा संज्ञान
अब समय आ गया है कि सरकार इस पर सख्त कदम उठाए:
* स्कूलों द्वारा जबरन सामान खरीदवाने पर रोक
* फंक्शन और अन्य शुल्कों की पारदर्शिता सुनिश्चित हो
* शिक्षकों द्वारा अपने ही छात्रों को ट्यूशन पढ़ाने पर नियम बनाए जाएं
* शिकायतों के लिए मजबूत और असरदार व्यवस्था हो
समाज को भी जागरूक होना होगा
केवल सरकार के भरोसे रहना काफी नहीं है।
माता-पिता को एकजुट होकर इस अन्याय के खिलाफ आवाज उठानी होगी।
निष्कर्ष :
यह सवाल हर माता-पिता के मन में है:
ये सब कब तक चलेगा?
शिक्षा का उद्देश्य बच्चों को ज्ञान देना है, न कि माता-पिता से हर संभव तरीके से पैसे वसूलना।
शिक्षा सेवा है, इसे व्यापार बनने से रोकना ही असली जिम्मेदारी है।
जब तक सिस्टम में पारदर्शिता और ईमानदारी नहीं आएगी, तब तक यह समस्या बनी रहेगी।
अब वक्त है कि हम सब मिलकर यह मांग करें—
👉 शिक्षा को शिक्षा की तरह ही दिया जाए, व्यापार की तरह नहीं।
Narendra Modi Raghav Chadha Sir I request please look into this matter and take the action accordingly.