01/09/2026
प्राचीन काल में एक गाँव में एक ग्वालिन रहती थी, जो दूध और दही बेचा करती थी।एक बार हलछठ का व्रत था और उस ग्वालिन का प्रसवकाल (बच्चे के जन्म का समय) निकट आ गया था।प्रसव पीड़ा से व्याकुल होने के बावजूद उसका मन दूध-दही बेचने में लगा हुआ था। उसने सोचा कि यदि अभी प्रसव हो गया, तो उसका सारा दूध-दही ऐसे ही पड़ा रह जाएगा और बिकेगा नहीं।लालच में आकर उसने गाय और भैंस दोनों का मिला हुआ दूध यह कहकर बेचा कि यह केवल भैंस का शुद्ध दूध है।उस दिन गाँव की सभी महिलाओं ने अपनी संतान की लंबी उम्र के लिए हलछठ का व्रत रखा था और पवित्रता के साथ दूध-दही का प्रयोग किया था।ग्वालिन के इस पापकर्म और झूठ के कारण व्रत खंडित हो गया। दैवीय प्रकोप के कारण उसी समय उस ग्वालिन का नवजात शिशु मृत पैदा हुआ या उससे बिछड़ गया।प्रायश्चित और क्षमा-याचनाअपनी संतान की ऐसी हालत देखकर ग्वालिन को अहसास हुआ कि यह सब उसके झूठ बोलने और व्रत करने वाली महिलाओं को धोखा देने का फल है।वह बहुत पछताई और रोते-बिलखते हुए उसी गाँव की गलियों में पहुँची।उसने हाथ जोड़कर सभी व्रती महिलाओं से चीख-चीखकर सच बताया कि उसने गाय और भैंस का मिला हुआ दूध भैंस का बताकर बेचा था, जिससे सबका व्रत टूटा।उसने सभी से क्षमा माँगी और अपने पाप का प्रायश्चित किया।व्रत का फल और बालक का जीवित होनाग्वालिन का सच्चा पश्चाताप देखकर सभी व्रती महिलाओं ने उसे क्षमा कर दिया और आशीर्वाद दिया।इसके बाद जब वह ग्वालिन वापस झरबेरी की झाड़ी के पास पहुँची जहाँ उसका मृत शिशु रखा था, तो उसने देखा कि उसका पुत्र जीवित और पूरी तरह सकुशल था।उसी दिन से उसने कभी झूठ न बोलने का प्रण लिया और पूरी श्रद्धा के साथ हलछठ का व्रत करने लगी।