12/03/2020
कोंग्रेस में नेतृत्व का संकट
ज्योतिरादित्य सिंधिया के कोंग्रेस छोड़ने की असली वजह चाहे जो भी हो लेकिन वास्तव में एक मामले में चीन और कांग्रेस पार्टी की एक समस्या ,समान है । चीन बूढ़े होते लोगो से परेशान है तो कोंग्रेस बूढ़े होते नेताओं से परेशान है । कोंग्रेस के संकट का असली कारण भी यही है कि पार्टी दूसरी पंक्ति के लिए युवा नेतृत्व का विकास करने में विफल रही है । इसलिए कि मौजूदा शीर्ष नेतृत्व में दूरदर्शिता का अभाव था सो उसने कभी भविष्य के बारे में विचार ही नहीं किया । इसलिए अगर कोई कहता है कि सिंधिया के जाने से पार्टी को कोई फर्क नहीं पड़ेगा ,तो यह सही नहीं है । सिंधिया के पाला बदलने से न सिर्फ पार्टी कार्यकर्ताओं के मनोबल पर बुरा असर पड़ेगा बल्कि दूसरी पंक्ति में नेतृत्व का संकट सतह पर दिखने लगा है । ऐसे में कमल थामने के बाद सिंधिया ने जो तीन कारण बताए हैं ,उन पर विचार जरूरी है । वास्तविकता से इनकार करना , पार्टी के भीतर जड़ता का माहौल और नई सोच ,नए नेतृत्व को मान्यता न देना । कोंग्रेस की निरंतर होती दुर्दशा में इन तीनों कारणों की मुख्य भूमिका मैं भी देखता हूं । हालांकि सिंधिया के कोंग्रेस छोड़ने के ये कारण नहीं हो सकते लेकिन यह भी हकीकत है कि भारत की आजादी का इतिहास लिखने वाली किसी जमाने की देश की सबसे बड़ी और लोकप्रिय पार्टी कोंग्रेस नेतृत्व के जबरदस्त संकट से गुजर रही है । अग्रिम पंक्ति के नेता तेजी से बूढ़े होते जा रहे हैं और दूसरी ,तीसरी पंक्ति के लिए युवा और ऊर्जावान नेतृत्व के विकास पर पार्टी ने ध्यान नहीं दिया । इसीलिये केंद्रीय और राज्य स्तर दोनों जगहों पर ऐसी स्थिति बनी हुई है । इसके पहले कोंग्रेस में कभी नेतृत्व का संकट नहीं रहा क्योंकि नेहरूजी ,इंदिराजी और राजीवजी ने हमेशा युवा लोगों को जोड़ा और उन्हें उत्साहित करके राजनीति में स्थापित किया जिससे दूसरी पंक्ति में हर राज्य के लोग पार्टी का नेतृत्व संभालने की स्थिति में रहे और पार्टी को कभी नेतृत्व संकट का सामना नहीं करना पड़ा । युवा तुर्क चंद्र शेखर और मोहन धारिया जैसे दर्जनों नेता इंदिरा जी की खोज थे तो ज्योतिरादित्य के पिता माधवराव सिंधिया ,कमलनाथ और राजेश पायलट ,तारिक अनवर ,पीए संगमा और ममता बनर्जी जैसे दर्जनों नेताओं को हर राज्य में बढ़ावा देकर कोंग्रेस ने अपनी दूसरी पंक्ति को हमेशा मजबूत रक्खा जिसने उत्तर से लेकर दक्षिण और पूरब से लेकर पश्चिम तक कोंग्रेस को जनता के बीच सशक्त प्रतिनिधि की स्थिति में रखा । यद्यपि क्षेत्रीय नेतृत्व को विकसित करने के खतरे भी होते हैं और कोंग्रेस इसका खासा नुकसान भी उठा चुकी है । उत्तर प्रदेश में लोकतांत्रिक कोंग्रेस ,महाराष्ट्र की एनसीपी और बंगाल की टीएमसी कोंग्रेस द्वारा तैयार किये गए क्षेत्रीय क्षत्रपों की देन है । इन सभी पार्टियों ने अपने अपने इलाके में कोंग्रेस को ही नुकसान पहुंचाया लेकिन कोंग्रेस जनता के बीच बची खुची ताकत के साथ खड़ी रही । तो युवा नेतृत्व के विकास का जोखिम भी कोंग्रेस भुगत चुकी है लेकिन पार्टी के विस्तार और लोकतंत्र की मजबूती के लिए पार्टी को ये जोखिम उठाना ही पड़ेगा । अब ज्योतिरादित्य सिंधिया द्वारा बताए कारणों पर यदि विचार किया जाए तो बिल्कुल सही नजर आता है । नोटबंदी और जीएसटी जैसे आर्थिक जड़ों को झकझोर देने वाले फैसलों से जब जनता बेहाल थी तो कोंग्रेस सिर्फ मीडिया को बयान देने तक विरोध करती नजर आयी । इसी तरह से प्रतिरक्षा उत्पादन क्षेत्र का काम छीन कर निजी क्षेत्र को दिए जाने से लेकर भेल और दूसरे सार्वजनिक क्षेत्रों को बचाने के लिए भी कोंग्रेस कोई बड़ा आंदोलन खड़ा करने में विफल रही और देश को विकल्पहीनता की स्थिति में डाल दिया । आज भी यही स्थिति है जिसका एक मात्र कारण जनहित से जुड़े मुद्दों पर शीर्ष नेतृत्व की उदासीनता कहा जाए या मजबूरी । मजबूरी इसलिए कि कोंग्रेस ने केंद्र या राज्य स्तर पर नई सोच के साथ युवा और नए नेतृत्व को पनपने का अवसर नहीं दिया , पार्टी का सिकुड़ता आधार इसका सबसे बड़ा प्रमाण है । पार्टी नेतृत्व को इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि खोया हुआ जनाधार प्राप्त करने के लिए नए युवा और ऊर्जावान नेतृत्व को तैयार करना होगा ,आगे बढ़ाना होगा ।