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सभी को दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं
24/10/2022

सभी को दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं

17/03/2020

किसानों की बर्बादी !
इस दौर में सिर्फ बैंक और पब्लिक सेक्टर ही नहीं डूब रहे बल्कि किसानों की बर्बादी और ज्यादा दुखी करने वाली है । ये बात अलग है कि किसानों की बर्बादी का कारण मौसम का प्रकोप है । जिन बीमा कंपनियों ने फसल बीमा के नाम पर किसानों से भारी कमाई की और वक्त पड़ने पर मुआवजे के नाम पर उन्हें 13 और 17 रुपये जैसी रकम के चेक भेज कर उनके साथ क्रूर मजाक किया ,उन्हें अगर उचित और पर्याप्त मुआवजा देने के लिए सरकार बाध्य कर सके तो किसानों के दुख को घनीभूत होने से रोका जा सकता है । बीते दिनों बे मौसम की बारिश से फसल की तबाही को देख कर झांसी में एक किसान की हार्ट अटैक से मौत हो गयी और हमीरपुर में एक किसान ने फांसी लगा कर अपनी जान दे दी । सिर्फ दो मामलों से देशभर के किसानों की बर्बादी का अनुमान लगाया जा सकता है । वैसे अब किसानों की आत्महत्या कोई मुद्दा नहीं रहा क्योंकि बेरोजगारों की आत्महत्या के भी बहुत मामले आ रहे हैं लेकिन सरकार ने किसानों की आय में दो गुना इजाफा करने का जो वादा किया था ,वो अभी जमीनी शक्ल नहीं ले सका है और उस पर मौसम की नाराजगी किसानों के लिए जानलेवा साबित हो रही है लेकिन इस दौर में जब सरकारें उखाड़ने का काम युद्धस्तर पर चालू है तो किसानों की परवाह भी कौन करे ? दरअसल किसानों की सबसे बड़ी समस्या भंडारण की सुविधाओं का अभाव है और दूसरी दिक्कत उन पर उपज की बिक्री से जुड़ी सरकारी बाधा है । कई सालों से इस बात की जरूरत अनुभव की जा रही है कि ग्रामीण क्षेत्रों में कोल्ड स्टोरेज की श्रृंखला बनाने से किसानों ,विशेष रूप से सब्जी उत्पादकों की स्थिति में जबरदस्त सुधार हो सकता है । इसलिए कि सब्जी तुरंत नष्ट होने वाली उपज है ,इसलिए लागत का उचित मूल्य मिले बिना भी किसानों को मजबूरी में बेचना पड़ जाता है । रंगनाथन कमेटी ने भी इस बारे में सुझाव दिया था । इसमे या तो सरकार को खुद निवेश करना था या सहकारिता क्षेत्र को आगे बढ़ाए किन्तु इस दिशा में कोई प्रयास नहीं किया गया । किसानों पर अपनी उपज को देश के अन्य हिस्सों में भेजने पर भी बाधाएं हटानी जरूरी है जिस पर सरकार को विचार करना चाहिए ।
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16/03/2020

विलफुल डिफाल्टर्स के नाम
कॉंग्रेस नेता राहुल गांधी ने सदन में सरकार से देश के 500 बड़े विलफुल डिफाल्टर्स के नाम बताने को कहा जिसका जवाब तो सरकार ने सदन में नहीं दिया किंतु इसके जवाब में रिजर्वबैंक ने कुल 30 डिफाल्टर्स की लिस्ट जारी की है जो नाकाफी है और इससे लगता है कि सरकार बड़े बेईमानों के नाम अभी भी सार्वजनिक करने को तैयार नहीं है । मैं मानता हूं कि बैंकिंग सेक्टर की आर्थिक रीढ़ तोड़ कर देश की अर्थव्यवस्था को बर्बाद करने में इन बेईमानों की बड़ी भूमिका है । इन लोगों ने अपने सियासी रसूख का फायदा उठा कर कर्ज के रूप में बैंकों से भारी भारी रकमें उठायी और कर्ज वापिस नहीं लौटाया । राजनीतिक रसूख इसलिए कि आम कारखानेदारों-कारोबारियों को वास्तविक जरूरत के लिए लाखों का कर्ज आसानी से नहीं मिल पाता जबकि इन्हें हजारों करोड़ का कर्ज आसानी से मिल गया और कर्ज न चुकाने के बावजूद विजय माल्या ,नीरव मोदी ,मेहुल चौकसी और नितिन संदेसरा जैसे दर्जनों लोगों को देश छोड़ कर भागने और दूसरे देशों की नागरिकता हासिल करने में भी सफलता मिल गयी जो बिना सियासी रसूख के , मुमकिन नहीं थी । बैंकों को हजारों करोड़ का चूना लगा कर जो विदेश भाग गए ,उनकी बात अपनी जगह लेकिन जो लोग देश मे ही शानोशौकत की जिंदगी बिता रहे हैं ,उन पर भी सरकार की पूरी कृपा बनी हुई है । ताजा उदाहरण पीएमसी और यस बैंक के डूबने को देख लीजिए । जिन बड़े लोगों ने बैंक के हजारों करोड़ डकार लिए , उन पर कोई कार्रवाई न करके सरकार जांच कर रही है राणा कपूर द्वारा प्रियंका गांधी से दो करोड़ रुपये में पेंटिंग खरीदने और राणा कपूर पर 2 हजार करोड़ की मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों की । मेरे विचार में ये आरोप अगर सही भी हैं तो बैंक के प्रॉफिट में कमी हो सकती है लेकिन बैंक डूब नहीं सकता । इसलिए विलफुल डिफाल्टर्स पर कार्रवाई न करना कहीं न कहीं सरकार के साथ उनके गंठजोड़ का शक पैदा करता है । कई साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने भी सरकार को आदेश दिया था कि सौ करोड़ और इससे बड़ी रकम के कर्जदारों के नाम सार्वजनिक किए जाएं , इस आदेश पर भी अमल न करने से मेरे संदेह की पुष्टि होती है । और अगर ऐसा नहीं है तो सरकार ,राहुल गांधी की मांग के अनुसार संसद के माध्यम से देश की जनता को 500 बड़े विलफुल डिफाल्टर्स के नामों की जानकारी दे और अगर संभव हो तो यह भी बताए कि इन विलफुल डिफाल्टर्स से फंसे बैंक कर्ज की वसूली के लिए क्या प्रयास किया गया और इसमे कितनी सफलता मिली ?
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13/03/2020

गलत नीतियों का आर्थिक संकट
कोंग्रेस नेता राहुल गांधी की यह बात बिल्कुल सही है कि केंद्र की गलत नीतियों की वजह से अर्थव्यवस्था का संकट बढ़ता जा रहा है । लेकिन मुझे लगता है कि जिस तरह से प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री ने इस बारे में खामोशी ओढ़ी हुई है और सरकार निष्क्रिय-बेपरवाह दिख रही है ,उससे यह संकट और गहरा सकता है । मजबूत अर्थव्यवस्था देश की ताकत हुआ करती थी लेकिन अब यह अपनी मजबूती खो चुकी है । जिस बांग्लादेश को सन 1971 में श्रीमती इंदिरा गांधी के करिश्माई नेतृत्व में भारत ने पैदा किया था ,उसकी जीडीपी 8 फीसदी है जबकि भारत की वास्तविक जीडीपी 2-2.5 फीसदी रह गयी है जिसे 4-4.5 फीसदी प्रचारित किया जा रहा है । अमरीकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये के ऐतिहासिक अवमूल्यन को विदेशी मुद्रा भंडार की ओट में छिपाने के प्रयास से मौद्रिक दुर्बलता पर पर्दा डालना संभव नहीं है और यह बात अपनी जगह कायम है कि अब विदेशी बाजारों में खरीद के लिए और ज्यादा रुपये खर्च करने होंगे । यद्यपि भारत की अर्थव्यवस्था में गिरावट के लिए वैश्विक अर्थव्यवस्था की गिरावट को दोषी ठहराया जा रहा है जो सफेद झूठ है । विश्वबैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष भी वैश्विक अर्थव्यवस्था में गिरावट के लिए भारतीय आर्थिक सुस्ती को जिम्मेदार ठहरा चुके हैं जो सही भी है । आंकड़ों पर निगाह डालिये तो साफ हो जाएगा कि नोटबंदी और जीएसटी के रूप में देश की आर्थिक तरक्की पर मानों ग्रहण ही लग गया । इसमे कोई शक नहीं कि चीन के वुहान से चला कोरोना वायरस मानवीय और आर्थिक स्वास्थ्य की दृष्टि से वैश्विक महामारी का रूप लेकर दुनियाभर के शेयर बाजारों पर कहर बरपा रहा है और भारतीय शेयर बाजार पर भी इसका स्वाभाविक प्रभाव है किन्तु यह भी साफ है कि भारतीय शेयर बाजार सट्टेबाजों की गिरफ्त में है । भारी गिरावट के बीच यस बैंक और स्टेटबैंक के शेयरों में खरीदा बेची की रफ्तार से इस बात को समझा जा सकता है कि आर्थिक बदहाली को कोरोना संकट ने 2008 की स्थिति में पहुंचा दिया । उस समय आर्थिक प्रबंधन डॉ मनमोहन सिंह ,पी चिदंबरम और मोंटेक सिंह अहलूवालिया जैसे विशेषज्ञों के हाथ मे था , देश ने इतनी सरलता से उस संकट को गुजर जाने दिया कि आम जनता को एहसास तक नहीं हुआ और न शेयर बाजार में कोहराम की स्थिति बन सकी । आज के दौर में परिस्थितियां बिल्कुल भिन्न हैं । 1जनवरी-20 से अब तक 71 दिन में सेंसेक्स 7 बार 700 अंक से ज्यादा और 3 बार 1हजार अंक से ज्यादा गिर चुका है । गुरुवार को 2919 अंक की गिरावट का एक नया कीर्तिमान बन गया । अब अगर 2008 की वैश्विक मंदी से तुलना की जाए तो उस दौर में , साल भर में 6 बड़ी गिरावट हुई थी । तब साल भर में 1हजार से ज्यादा अंकों की सिर्फ दो गिरावट हुई थी और एक दिन में अधिकतम 1408 अंक सेंसेक्स गिरा था जबकि सन 2020 में अब तक सेंसेक्स 19.60 फीसदी गिर चुका है । इसीलिए कई मार्किट एक्सपर्ट मौजूदा आर्थिक हालात को 2008 से बदतर बता रहे हैं तो सही लगता है । अभी बीते शुक्रवार को बाजार का हाल देखिए तो सवाल उठेगा कि अचानक क्या हुआ कि बाजार कोरोना संकट से बाहर आ गया ? सुबह बाजार खुलने के बाद 10 बजे सेंसेक्स 32,778 की पूर्व बंदी से गिर कर 29,687 पर आ गया था । यह गिरावट इतनी सनसनीखेज थी कि रिजर्वबैंक और सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार को भी मोर्चा संभालने के लिए मैदान में आना पड़ा लेकिन फिर बाद में अचानक 6 हजार अंकों की रिकवरी भी हो गयी जो हैरान करने वाली थी । मार्केट एक्सपर्ट भी इसका कारण बताने में असमर्थ हैं लेकिन कोई बड़ा खेल हो गया । वह भी तब ,जब बाजार की नियामक संस्था सेबी पूरे दमखम के साथ मौजूद है लेकिन इसके बावजूद निवेशकों को रोज हजारों करोड़ का चूना लग रहा है तो राहुल गांधी के बयान को गलत नहीं कहा जा सकता ।

12/03/2020

कोंग्रेस में नेतृत्व का संकट
ज्योतिरादित्य सिंधिया के कोंग्रेस छोड़ने की असली वजह चाहे जो भी हो लेकिन वास्तव में एक मामले में चीन और कांग्रेस पार्टी की एक समस्या ,समान है । चीन बूढ़े होते लोगो से परेशान है तो कोंग्रेस बूढ़े होते नेताओं से परेशान है । कोंग्रेस के संकट का असली कारण भी यही है कि पार्टी दूसरी पंक्ति के लिए युवा नेतृत्व का विकास करने में विफल रही है । इसलिए कि मौजूदा शीर्ष नेतृत्व में दूरदर्शिता का अभाव था सो उसने कभी भविष्य के बारे में विचार ही नहीं किया । इसलिए अगर कोई कहता है कि सिंधिया के जाने से पार्टी को कोई फर्क नहीं पड़ेगा ,तो यह सही नहीं है । सिंधिया के पाला बदलने से न सिर्फ पार्टी कार्यकर्ताओं के मनोबल पर बुरा असर पड़ेगा बल्कि दूसरी पंक्ति में नेतृत्व का संकट सतह पर दिखने लगा है । ऐसे में कमल थामने के बाद सिंधिया ने जो तीन कारण बताए हैं ,उन पर विचार जरूरी है । वास्तविकता से इनकार करना , पार्टी के भीतर जड़ता का माहौल और नई सोच ,नए नेतृत्व को मान्यता न देना । कोंग्रेस की निरंतर होती दुर्दशा में इन तीनों कारणों की मुख्य भूमिका मैं भी देखता हूं । हालांकि सिंधिया के कोंग्रेस छोड़ने के ये कारण नहीं हो सकते लेकिन यह भी हकीकत है कि भारत की आजादी का इतिहास लिखने वाली किसी जमाने की देश की सबसे बड़ी और लोकप्रिय पार्टी कोंग्रेस नेतृत्व के जबरदस्त संकट से गुजर रही है । अग्रिम पंक्ति के नेता तेजी से बूढ़े होते जा रहे हैं और दूसरी ,तीसरी पंक्ति के लिए युवा और ऊर्जावान नेतृत्व के विकास पर पार्टी ने ध्यान नहीं दिया । इसीलिये केंद्रीय और राज्य स्तर दोनों जगहों पर ऐसी स्थिति बनी हुई है । इसके पहले कोंग्रेस में कभी नेतृत्व का संकट नहीं रहा क्योंकि नेहरूजी ,इंदिराजी और राजीवजी ने हमेशा युवा लोगों को जोड़ा और उन्हें उत्साहित करके राजनीति में स्थापित किया जिससे दूसरी पंक्ति में हर राज्य के लोग पार्टी का नेतृत्व संभालने की स्थिति में रहे और पार्टी को कभी नेतृत्व संकट का सामना नहीं करना पड़ा । युवा तुर्क चंद्र शेखर और मोहन धारिया जैसे दर्जनों नेता इंदिरा जी की खोज थे तो ज्योतिरादित्य के पिता माधवराव सिंधिया ,कमलनाथ और राजेश पायलट ,तारिक अनवर ,पीए संगमा और ममता बनर्जी जैसे दर्जनों नेताओं को हर राज्य में बढ़ावा देकर कोंग्रेस ने अपनी दूसरी पंक्ति को हमेशा मजबूत रक्खा जिसने उत्तर से लेकर दक्षिण और पूरब से लेकर पश्चिम तक कोंग्रेस को जनता के बीच सशक्त प्रतिनिधि की स्थिति में रखा । यद्यपि क्षेत्रीय नेतृत्व को विकसित करने के खतरे भी होते हैं और कोंग्रेस इसका खासा नुकसान भी उठा चुकी है । उत्तर प्रदेश में लोकतांत्रिक कोंग्रेस ,महाराष्ट्र की एनसीपी और बंगाल की टीएमसी कोंग्रेस द्वारा तैयार किये गए क्षेत्रीय क्षत्रपों की देन है । इन सभी पार्टियों ने अपने अपने इलाके में कोंग्रेस को ही नुकसान पहुंचाया लेकिन कोंग्रेस जनता के बीच बची खुची ताकत के साथ खड़ी रही । तो युवा नेतृत्व के विकास का जोखिम भी कोंग्रेस भुगत चुकी है लेकिन पार्टी के विस्तार और लोकतंत्र की मजबूती के लिए पार्टी को ये जोखिम उठाना ही पड़ेगा । अब ज्योतिरादित्य सिंधिया द्वारा बताए कारणों पर यदि विचार किया जाए तो बिल्कुल सही नजर आता है । नोटबंदी और जीएसटी जैसे आर्थिक जड़ों को झकझोर देने वाले फैसलों से जब जनता बेहाल थी तो कोंग्रेस सिर्फ मीडिया को बयान देने तक विरोध करती नजर आयी । इसी तरह से प्रतिरक्षा उत्पादन क्षेत्र का काम छीन कर निजी क्षेत्र को दिए जाने से लेकर भेल और दूसरे सार्वजनिक क्षेत्रों को बचाने के लिए भी कोंग्रेस कोई बड़ा आंदोलन खड़ा करने में विफल रही और देश को विकल्पहीनता की स्थिति में डाल दिया । आज भी यही स्थिति है जिसका एक मात्र कारण जनहित से जुड़े मुद्दों पर शीर्ष नेतृत्व की उदासीनता कहा जाए या मजबूरी । मजबूरी इसलिए कि कोंग्रेस ने केंद्र या राज्य स्तर पर नई सोच के साथ युवा और नए नेतृत्व को पनपने का अवसर नहीं दिया , पार्टी का सिकुड़ता आधार इसका सबसे बड़ा प्रमाण है । पार्टी नेतृत्व को इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि खोया हुआ जनाधार प्राप्त करने के लिए नए युवा और ऊर्जावान नेतृत्व को तैयार करना होगा ,आगे बढ़ाना होगा ।

11/03/2020

अधनंगा ,अपाहिज ,बिकाऊ लोकतंत्र
जब देश की जनता एक दूसरे पर रंग डाल कर , गुलाल अबीर लगा कर ,गले मिलकर होली मना रही थी तो मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में ग्वालियर महाराज और कोंग्रेस नेता राहुल गांधी की निजी टीम के खासुलखास ज्योतिरादित्य सिंधिया भाजपा के साथ मिल कर कोंग्रेस के खिलाफ राजनैतिक होली खेलने की पटकथा पूरी गंभीरता और मनोयोग से लिख रहे थे ,ये बात बुधवार को प्रमाणित हो गयी जब सिंधिया ने भाजपा की सदस्यता ग्रहण करने के साथ ही राज्यसभा का टिकट भी प्राप्त कर लिया । इससे यह भी स्पष्ट हो गया कि भारतीय राजनीति में अब मूल्य ,सिद्धांत और जनता के प्रति जवाबदेही पर निज स्वार्थ और पद लिप्सा की भावना पूरी तरह से हावी हो चुकी है । वैसे दलबदल देश की राजनिति के लिए कोई अनोखी घटना नहीं है बल्कि इसके बिना देश की राजनीति का इतिहास लिखना संभव ही नही है । हर दल में किसी न किसी दल के लोग न सिर्फ मौजूद हैं बल्कि बड़े बड़े पदों की शोभा बढ़ा रहे हैं । हरियाणा के भजनलाल और यूपी के नरेश अग्रवाल को दलबदलुओं का सम्राट कहा जा सकता है जिन्होंने पूरी पार्टी सहित दलबदल कर लिया था । लेकिन जूनियर सिंधिया का फैसला अप्रत्याशित रहा । इसलिए कि कोंग्रेस पार्टी से इनके पुराने पारिवारिक रिश्ते थे । किसी जमाने मे माता विजय राजे सिंधिया से विवाद के चलते परिवार से बहिष्कृत माधवराव सिंधिया (ज्योतिरादित्य के स्व.पिता) ने श्रीमती इंदिरा गांधी (स्व.) की शरण ली थी और इंदिराजी ने उन्हें अपने बेटे की तरह गले लगाया । कानूनी सहायता के लिए कोंग्रेस के दिग्गज वकीलों की सेवाएं उपलब्ध कराई । राजनीतिक सम्मान दिलाया । इंदिराजी की नृशंस हत्या के बाद राजीव जी ने भी उन्हें अपने भाई सा प्रेम और सम्मान दिया और विमान दुर्घटना में माधवराव जी की मृत्यु के बाद कोंग्रेस ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को वही सम्मान और रुतबा दिया । 5 बार लोकसभा का टिकट दिया ,केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह दी और बीसीसीआई में भी महत्वपूर्ण भूमिका सौंपी । इससे ज्यादा कोई भी पार्टी और क्या दे सकती थी ? इसीलिये सिंधिया का पाला बदलना मुझे अप्रत्याशित लगा । लेकिन इसे एक ऐसे कुंठित और हताश नेता के फैसले के रूप में भी देखा जा सकता है जो चुनाव में अपनी सीट भी न बचा सका । ये भारतीय लोकतंत्र का विचित्र विद्रूप है कि इसमे जनादेश को बेचने की अद्भुद शक्ति है । संभव है भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र हो किन्तु इतना अधनंगा , विकलांग और बिकाऊ लोकतंत्र दुनिया की किसी भी डेमोक्रैसी में नहीं मिलेगा ,ये भी मेरा दावा है ।
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08/03/2020
08/03/2020

अब कहाँ से लाएं होलिका ?
होली खुशियों का त्यौंहार है । गिले शिकवे ,आपसी मतभेद भुला कर एक दूसरे पर विविध प्रकार के रंगों के रूप में सम्मान ,प्रेम और स्नेह की बौछार के साथ गले मिलने और तरह तरह के पकवान खाने-खिलाने के पर्व का नाम है होली । फागुन का महीना वातावरण में एक अजीब तरह की बेफिक्री ,मस्ती घोल देता है जिसका चरम होली पर हास परिहास के रूप में देखने को मिलता है । हर राज्य में ये पर्व अपने अपने तरीके से मनाया जाता है किन्तु राजस्थान में उड़ते गुलाल के बीच ढफ की थाप पर होली के मस्ती भरे गीतों का अपना अलग आनंद है । होली के त्यौंहार के पीछे एक पौराणिक कथा बतायी जाती है । किसी जमाने में हिरण्यकश्यप नाम का एक राजा था जो आचरण से राक्षसों जैसा था । हिरण्यकश्यप को ईश्वर के नाम से चिढ़ थी । वह अपने आपको भगवान समझता था और चाहता था कि सारी प्रजा भी उसे भगवान समझे । दैवयोग से प्रह्लाद नाम का उसका एक पुत्र भी था जो घोर ईश्वरवादी और भगवान विष्णु का अनंन्य भक्त था । जब हिरण्यकश्यप को यह बात पता चली तो उसने प्रह्लाद को बहुत समझाया किन्तु उसके रोम रोम में भगवान विष्णु की भक्ति थी ,वह अपनी भक्ति में लीन रहा । पता चलने पर हिरण्यकश्यप गुस्से से आग बबूला हो गया और अपने सैनिकों को प्रह्लाद की जीवनलीला समाप्त करने का आदेश दे दिया । प्रह्लाद को पहाड़ों से फेंका गया ,समुद्र में डुबा कर मारने का प्रयास किया गया किन्तु हर बार नारायण ने साक्षात प्रगट होकर उसकी प्राण रक्षा की कि उसका बाल भी बांका नहीं हुआ तब हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को मारने के लिए अपनी बहन होलिका की मदद मांगी जिसे वरदान स्वरूप भगवान शंकर ने ऐसी चादर दी थी जिसे ओढ़ने वाले को कोई भी आग नहीं जला सकती थी । प्रह्लाद को आग में जलाने के लिए होलिका सजाई गई और प्रह्लाद को गोद मे लेकर होलिका बैठी । जब आग लगाई गई तो चादर ने प्रह्लाद को लपेट लिया और होलिका जल कर राख हो गई । तब से बुराईयों को खत्म करने के रूप में होलिका दहन की परंपरा शुरू हो गयी और प्रह्लाद भक्त प्रह्लाद कहलाये गए । आज भी हिरण्यकश्यप जैसी प्रवृत्तियां पनप रही हैं लेकिन होलिका कहाँ से लाएं ?

06/03/2020

खतरा स्टेट बैंक की ओर..?
रिजर्वबैंक द्वारा यस बैंक का बोर्ड भंग करके ग्राहकों के लिए महीने में 50 हजार तक की निकासी निर्धारित करने के बाद अब इस बैंक का डूबना या बिक जाना निश्चित हो गया है लेकिन जिस तरह से कर्ज की लूट के शिकार बैंक और गैर बैंकिग वित्तीय कंपनियों को स्टेटबैंक और एलआईसी के मत्थे मढ़ा जा रहा है ,उसे स्टेटबैंक की ओर बढ़ते खतरे के रूप में देखा जा सकता है । 2004 में राणा कपूर ने अपने रिश्तेदार अशोक कपूर के साथ मिल कर यस बैंक की शुरुआत की जो मात्र 10 साल में 3 लाख करोड़ की एसेट खड़ी करके निजी क्षेत्र का चौथा सबसे बड़ा बैंक बन गया । ये अपने आप मे रहस्य है कि 18हजार कर्मचारियों के साथ देशभर में 1120 शाखाओं के साथ मजबूती से खड़ा निजी क्षेत्र का यस बैंक मात्र एक साल में (2019-2020) ,कब और कैसे जर्जर हो गया जबकि एक समय इसके शेयर का भाव 1400 रुपये तक पहुंच गया था । केंन्द्रीय नियामक के रूप में बैंकों के कामकाज और गतिविधियों पर निगरानी का दायित्व निभाने में रिजर्वबैंक क्यों विफल रहा और बाजार की नियामक संस्था सेबी क्या करती रही ? अब रिजर्वबैंक ने 3 अप्रैल तक रोक लगाते हुए स्टेटबैंक के पूर्व मुख्य वित्त अधिकारी प्रशांत कुमार को यसबैंक का एडमिनिस्ट्रेटर नियुक्त किया है और लगभग 39 हजार करोड़ के डूबत कर्ज में डूबे इस बैंक की हिस्सेदारी स्टेटबैंक और एलआईसी को पहनाने की तैयारी की जा रही है । रिजर्वबैंक ने अपने फैसले के समर्थन में यह दलील दी है कि निवेशकों के हितों की सुरक्षा के लिए बैंक का नियंत्रण अपने हाथ मे लिया है । वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने भी किसी ग्राहक का पैसा न डूबने का भरोसा दिया है किंतु पीएमसी बैंक के जमा कर्ताओं का पैसा अभी भी नहीं मिला और पंजाब और महाराष्ट्र बैंक (पीएमसी ) के मामले में भी रिजर्वबैंक की यही दलील थी किन्तु निवेशकों या जमा कर्ताओं की जान अभी भी गले मे फंसी है । बहरहाल ,बात सिर्फ यस बैंक की ही नहीं है ,उसकी कहानी खत्म होने की पूरी पटकथा लिखी जा चुकी है और पीएमसी बैंक के बाद वंदे मातरम बोलने वाला यह दूसरा बड़ा बैंक हो गया है । असल चिंता देश के सबसे बड़े और दुनिया के सबसे ज्यादा प्रतिष्ठित बैंकों में शुमार स्टेटबैंक की आर्थिक मजबूती को लेकर है । जिस तरह से डूबत कर्ज की मार से घायल बैंक और गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनिया स्टेटबैंक के साथ नत्थी की जा रही हैं ,उससे इसकी आर्थिक मजबूती ज्यादा दिनों तक कायम रहने की उम्मीद नहीं है । दरअसल भारत मे शुरू किए गए नव आर्थिक उदारीकरण या नए किस्म के पूंजीवाद के रूप में जो अर्थशास्त्र का मॉडल खड़ा किया जा रहा है उसमें कैलकुलेटिव लॉस (गणनात्मक हानि ) का सिद्धांत सरकारी और निजी बैंकों पर काल बन कर टूट रहा है जिसके लिए मुख्य औजार की भूमिका में मोदी सरकार द्वारा लाया गया दिवालिया कानून और नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल है । यह सारा ढांचा निवेशकों और कर्जदाता बैंक/गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों को कंगाल करके ,बेईमान उद्योग घरानों को फायदा पहुंचाने का काम कर रहा है । इस कानून के तहत कुछ निर्धारित प्रक्रिया के तहत कंपनी अपने आप को दिवालिया घोषित करती है और ट्रिब्यूनल में जा कर 100 रुपये का कर्ज 10-15 रुपये में चुका कर गंगा नहा लेती है । इसीलिए डूबने वाले बैंक या गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के कर्ज न चुकाने वाले उद्योग घरानों की सूची को ,सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद सार्वजनिक नहीं किया जा रहा । अनेक बैंकों की बदहाली का यही कारण है जिसे छिपाने के लिए तमाम भारी डूबत कर्ज के शिकार बैंकों का मर्जर किया जा चुका है और अनेक की प्रक्रिया शुरू है । वीडियोकॉन अकेली स्टेटबैंक को 29 हजार करोड़ का चूना लगाने वाली कंपनी नहीं है बल्कि इंफ्रास्ट्रक्चर लीजिंग एंड फाइनेंस (आईएल एंड एफएस ) पिछले साल लगभग 80 हजार करोड़ का झटका दे चुकी है । अन्य सरकारी बैंकों और दीवान हाउसिंग जैसी कंपनियों के लिए डिफाल्टर कंपनियों की लिस्ट में जेपी इंफ्रा ,रुचि सोया ,बल्लारपुर इंडस्ट्रीज ,एस्सार स्टील्स ,और इलेक्ट्रोस्टील्स जैसी दर्जनों कंपनियों के नाम हैं जो 4 हजार करोड़ से लेकर 37 हजार करोड़ तक का कर्ज डकार कर दिवालिया कानून के तहत एनसीएल्टी में गंगा स्नान कर चुके हैं । अगर मर्ज किए जाने वाले हर बैंक के डिफॉल्टरों की सूची को सार्वजनिक किया जाए तो जनता भी यह गण जाल समझ सकती है और यही वह वजह भी है जो स्टेटबैंक के लिए खतरे का कारण बन सकती है । फिलहाल यस बैंक की बेहतर सेहत की दुआ के साथ ,आने वाले दिनों में उद्योग जगत में होने वाले अधिग्रहण का नंगा नाच देखने के लिए तैयार हो जाइए । यह टेकओवर वार उन लोगों द्वारा शुरू होने वाली है जिन्होंने पिछले 6 सालों में बेहिसाब दौलत और सियासी ताकत जुटाने में कामयाबी के सारे रिकॉर्ड तोड़ डाले ।

05/03/2020

ब्याज कटौती का दबाव
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर कोरोना वायरस के बढ़ते संक्रमण के प्रभाव को देखते हुए अमरीकी फेडरल रिजर्व ने ब्याज दरों में 0.50 फीसदी की कटौती करके एक तरह से दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों पर ब्याज कटौती का दबाव बढ़ा दिया है किंतु भारतीय रिजर्वबैंक पर सबसे ज्यादा दबाव आ गया है । वैसे भारतीय रिजर्वबैंक कोरोना के प्रकोप से पहले ही सुस्त पड़ी अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए ब्याज दरों में कटौती पर विचार कर रही थी किन्तु 9 फीसदी के आस पास पहुंच चुकी खुदरा महंगाई दर ने उसके कदम थाम लिए थे । अब रिजर्वबैंक को भी अर्थव्यवस्था पर कोरोना का असर कम करने के लिए ब्याज घटाने की संभावनाओं पर विचार करना होगा । हालांकि रिजर्वबैंक पहले कर्ज की घटती मांग को सुधारने का प्रयास कर रही है और मुद्रास्फीति की दरों में नरमी की प्रतीक्षा कर रही है लेकिन फेडरल रिजर्व के एक्शन से पड़ने वाले दबाव से भी उसे निपटना क्यो जरूरी है ,इसे जानने के लिए फेडरल रिजर्व द्वारा जारी किए गए बयान पर ध्यान दिया जाना चाहिए जो ब्याज दरों में कटौती के फैसले के साथ जारी किया गया है । वैसे फेड की नियमित बैठक 17-18 मार्च को होनी थी किन्तु कोरोना के बढ़ते प्रकोप को देखते हुए अचानक मंगलवार को बैठक बुलाई गई और ब्याज कटौती का फैसला लेते हुए कहा गया कि अमरीकी अर्थव्यवस्था की बुनियाद मजबूत है लेकिन कोरोना वायरस आर्थिक गतिविधियों के लिए जोखिम पैदा कर रहा है । जबकि भारत की मुश्किल कुछ अलग किस्म की है । आर्थिक विकास में निरंतर गिरावट और बेरोजगारी दर में निरंतर वृद्धि को देखते हुए यह नहीं कहा जा सकता कि भारत की अर्थव्यवस्था बेहद मजबूत स्थिति में है लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि नोटबंदी और जीएसटी की मार से घायल अर्थव्यवस्था अब कुछ करवट बदलती दिखने लगी है । इसलिए कोरोना के असर को निष्क्रिय करके अधिकतम रोजगार और मूल्य स्थिरता के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए रिजर्वबैंक के लिए भी ब्याज दरों में कटौती जरूरी है ताकि खुले बाजार की प्रतिस्पर्धा में हमारे निर्माता-उत्पादक पिट न सकें और सिर्फ ब्याज दरों में कटौती से ही काम नहीं चलेगा बल्कि इस कटौती का सौ फीसदी लाभ उद्योगों-उपभोक्ताओं तक पहुंचना भी सुनिश्चित करना होगा । अगर पहले की तरह ब्याज कटौती का लाभ खुद बैंक हड़प लेंगे तो आर्थिक गतिविधियों में तेजी लाकर उत्पादन और उपभोग बढ़ाने के उद्देश्य की प्राप्ति संभव नहीं होगी ।
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04/03/2020

टूटने के कगार पर समझौता
अपने 12 हजार सैनिकों को निकालने के लिए भारत और अफगान जनता के हितों को दरकिनार करते हुए अमरीका ने तालिबान और हक्कानी नेटवर्क जैसे दुर्दांत हत्यारे संगठनों से शांति समझौता करके सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप को जिस तरह से आतंकवाद के हवाले करने का जो कुचक्र रचा था , उसे टूटना ही चाहिए ,यह बात तालिबान के ताजे हमलों ने सही साबित कर दी । अफगानिस्तान के 16 प्रान्तों पर सैन्य ठिकानों पर 33 से ज्यादा हमले करके तालिबान ने अमरीका को न सिर्फ अपनी सैनिक ताकत का एहसास करा दिया बल्कि तीन दिन पुरानी युध्द विराम संधि को भी पलीता लगा दिया । अभी एक सप्ताह भी नहीं बीता जब अमरीका ने कतर के दोहा में हिंसक और आतंकवादी तालिबान के साथ अफगानिस्तान में स्थायी शांति के लिए समझौता किया था जिसका कोई औचित्य नहीं था । यह सही है कि अफगानिस्तान में पिछले 18 सालों से लड़ रहे अमरीका को इस लड़ाई की भारी कीमत चुकानी पड़ी है । एक अनुमान के मुताबिक इस लंबी लड़ाई ने अमरीका पर 2 ट्रिलियन डॉलर (लगभग 146 लाख करोड़ रुपये ) का बोझ डाला जो सैन्य अभियानों ,अफगान सुरक्षा बलों के प्रशिक्षण ,आर्थिक विकास , पुनर्निर्माण और मादक पदार्थों की रोक पर खर्च की गई । इसके अलावा 2010 से 2012 के मध्य अफगानिस्तान में एक लाख से अधिक अमरीकी सैनिक तैनात थे जिन्हें क्रमिक रूप से अमरीका ने वापिस बुला लिया लेकिन अभी भी लगभग 12 हजार सैनिक पूरे साजोसामान के साथ डटे हैं । युद्ध के दौरान 2309 अमरीकी सैनिक अपनी जान गंवा चुके हैं जबकि 20 हजार से ज्यादा घायल हुए हैं । अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपनी जनता को सभी सैनिकों की सकुशल वापसी का भरोसा दिया था और उन्हें आने वाले नवंबर महीने में फिर चुनाव का सामना करना है । इसीलिए मजबूरी में तालिबान के साथ समर्पण करने जैसा शांति समझौता करना पड़ा जो सफल होने की उम्मीद भी नहीं थी ,किन्तु इतनी जल्दी दम तोड़ने की उम्मीद भी नहीं थी । लेकिन ये तालिबान भी खुद अमरीका द्वारा पैदा किया और पाला पोसा संगठन है जो आज खुद अमरीका को खून के आंसू रुला रहा है । दरअसल 1973 में जब राजा जहीर शाह का उनके चचेरे भाई दाऊद खान ने तख्ता पलट किया ,तभी से अफगानिस्तान हिंसा और अस्थिरता की चपेट में है । पांच साल बाद जहीर शाह की परिवार सहित वामपंथियों ने हत्या कर दी तो सोवियत संघ सक्रिय हुआ और 25 दिसंबर 1979 को उसने अपनी फौजें अफगानिस्तान में उतार दी । सोवियत संघ को भरोसा था कि वामपंथी समूह अफगानिस्तान में खुद की मजबूती के लिएउसे भी मजबूती देगा किन्तु स्वाभिमानी अफगानियों ने विदेशी हस्तक्षेप को खारिज कर दिया । वह शीत युद्ध का दौर था और अमरीका वियतनाम में अपनी शिकस्त के लिए रूस को जिम्मेदार मानता था ,इसलिए रूस से बदला चुकाने के लिए सक्रिय हो गया । इसी रणनीति के तहत अमरीका ने सऊदी अरब जैसे मुस्लिम मित्र देशों की मदद से भारी रकम खर्च करके पाकिस्तान में आतंकवाद के कारखाने लगवाए और तमाम जेहादी गुटों को पैसे और आधुनिक हथियारों की मदद दी । आतंकी संगठनों को आधुनिक हथियारों का प्रशिक्षण देने की जिम्मेदारी , भरपूर रकम के बदले पाक सेना ने निभाई और आत्मघाती विस्फोट जैसी बड़ी आतंकी घटनाओं की योजना बनाने की ट्रेनिंग कुख्यात खुफिया एजेंसी आईएसआई ने संभाली और सारे आतंकी गुटों को भारी भरकम जेहादी सेना के रूप में सोवियत सेना के सामने झोंक दिया और लगभग 10 साल जूझने के बाद ,सोवियत संघ को सन 1989 में अफगानिस्तान से अपनी सेना वापिस बुलानी पड़ी लेकिन पाकिस्तान ने इसे अफगानिस्तान पर कब्जे का अपने लिए सही मौका समझा और 1992 में अपने सारे मुजाहिदीन गुटों को अफगानिस्तान में भेज दिया ,कंट्रोल उसके हाथ ही में था । सन 1996 में अमरीका की आर्थिक सहायता से खड़े किए गए तालिबान को पाकिस्तान ने काबुल पर बैठा दिया और अगले पांच सालों में तालिबान ने इस्लामी हुकूमत के नाम पर पूरे देश को खोखला बना कर जनता पर जो अमानुषिक अत्याचार किये ,उसकी याद आज भी उनमें दहशत पैदा करने वाली है । इसके अलावा वहां ओसामा बिन लादेन भी इस दौरान अलकायदा के नाम से अपना आतंकी संगठन खड़ा करने में कामयाब रहा जिसने आतंक की दुनिया मे खूब शोहरत बटोरी लेकिन 9/11का बदला लेने के लिए जब अमरीका ने आतंक के खिलाफ निर्णायक जंग के संकल्प के साथ जब अफगानिस्तान पर हमला बोला और तालिबान को नेस्तनाबूद करने के लिए बी-52 तथा फाल्कन जैसे युद्धक विमानों से पहाड़ों को भी खोद डालने वाले क्लस्टर बम बरसाने शुरू किए तो सारे तालिबानी और आतंकी कमांडरों को पाकिस्तान ने सुरक्षित पनाह दे दी । तब से उलझा अमरीका अब अफगानिस्तान से जान छुड़ाना चाहता है । इसलिए उसने तालिबान से ऐसा शांति समझौता किया जो अब ज्यादा दिन चलता नहीं दिख रहा और जब तक पाकिस्तान को सीधा नहीं किया जाएगा ,तब तक अफगानिस्तान में शांति और लोकतंत्र बहाली की उम्मीद नहीं करनी चाहिए ।
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03/03/2020

नए एनपीए का खौफ
पिछले कुछ समय से सुस्त पड़ी अर्थव्यवस्था को रफ़्तार देने की कोशिशों के बीच 10 लाख करोड़ का बैंक कर्ज नए एनपीए (नॉन परफोर्मिंग एसेट्स ) में बदलने का खतरा अर्थव्यवस्था पर नए संकट के रूप में मंडराता दिख रहा है । यह सही है कि नोटबंदी और जीएसटी के प्रहार से घायल अर्थव्यवस्था को सुधारने की पहल में सरकार ने काफी लंबा वक्त गंवा दिया लेकिन इसके नकारात्मक परिणामों पर देश भर में और विदेशी मीडिया पर जबरदस्त आलोचना के दबाव में आर्थिक सुस्ती तोड़ने के लिए सरकार और रिजर्वबैंक ने मिलाजुला प्रयास यह किया कि बैंक कर्ज वितरण में सतर्कता बरतने के साथ जरूरतमंद उद्योगों को कर्ज जरूर दें । किन्तु इस बार भी कर्ज वितरण में बैंकों ने वही गलती दोहराई जो हर बार की जाती है और जिसके कारण बिना चुकाए कर्ज के भारी बोझ से बैंकों को अपनी अर्थव्यवस्था संभालने के लिए आम ग्राहकों से मिनिमम बैलेंस जैसे बहानों से जबरन पैसा ऐंठना पड़ रहा है । कर्ज का बड़ा हिस्सा हर बार की तरह धनी और राजनीतिक पहुंच वाले बड़े उद्योगों तथा कॉरपोरेट घरानों को बांट दिया गया लेकिन चीन से शुरू होकर 30 से अधिक देशों तक फैल चुका कोरोना वायरस का असर देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी घातक होता दिख रहा है । रेटिंग एजेंसी इंडिया रेटिंग्स की ताजी रिपोर्ट के मुताबिक इसके चलते अगले तीन सालों में कॉरपोरेट जगत के 10.5 लाख करोड़ रुपये के कर्ज पर एनपीए होने का संकट खड़ा हो गया है जो उद्योग जगत के कुल कर्ज का 16 फीसदी के लगभग है । यह मुसीबत बैंकों पर बार बार इसलिए आती है कि आर्थिक और औद्योगिक विकास के बारे में सरकार का नजरिया दोषपूर्ण है । सरकार यह मानती है कि सिर्फ बड़े उद्योग घराने और कॉरपोरेट कंपनियां ही आर्थिक-औद्योगिक विकास को गति प्रदान कर सकती हैं जबकि मेरा मानना है कि जन जन की संपन्नता के माध्यम से देश की आर्थिक मजबूती के लिए छोटे और मंझोले कारखानों की बहुत बड़ी भूमिका है । इसलिए कि एक तो इसमे कर्ज की बहुत भारी रकम की जरूरत नहीं होती ,दूसरे इनमें रोजगार बहुत ज्यादा लोगों को मिलता है जबकि बड़े उद्योगों में भारी कर्ज के बावजूद ऑटोमेशन और कम्प्यूटराईजेशन के चलते रोजगार के अवसर सिर्फ उच्च शिक्षित और टेक्नोक्रेट किस्म के लिए निकल पाते हैं । अगर सरकार ने आर्थिक सुस्ती तोड़ने के लिए सूक्षम ,छोटे और मंझोले कारखानों पर फोकस किया होता तो आर्थिक सुस्ती और बेरोजगारी की स्थिति में अपेक्षित सुधार दिखाई देने लगता और बैंकों पर 10 लाख करोड़ जितनी भारी रकम डूबने की दहशत भी नहीं होती । डूबत कर्ज या एनपीए का पूरा चिट्ठा निकाल कर देख लीजिए ,सबसे ज्यादा हिस्सा बड़े उद्योग घरानों -कॉरपोरेट कंपनियों के नाम मिलेगा । छोटे-मंझोले उद्योंगों पर एनपीए काफी कम रहता है । इसका कारण यह कि इस स्तर के उद्योग मिडिल क्लास लोगों द्वारा चलाये जाते हैं जिन्हें अपनी सामाजिक मान-प्रतिष्ठा की चिंता ज्यादा होती है ।
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