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पाकिस्तान आर्मी का वो कैप्टन जिसे कारगिल युद्ध में भारतीय सेना के कहने पर मिला था पाकिस्तान का सबसे बड़ा वीरता सम्मान नि...
11/01/2026

पाकिस्तान आर्मी का वो कैप्टन जिसे कारगिल युद्ध में भारतीय सेना के कहने पर मिला था पाकिस्तान का सबसे बड़ा वीरता सम्मान निशान-ए-हैदर।

ऐसा बहुत कम देखने में आता है कि शत्रु सेना किसी सैनिक की बहादुरी की दाद दे और उसकी सेना को लिख कर कहे कि इस सैनिक की वीरता का सम्मान किया जाना चाहिए.
1999 के कारगिल युद्ध में ऐसा ही हुआ जब टाइगर हिल के मोर्चे पर पाकिस्तानी सेना के कैप्टन कर्नल शेर ख़ाँ ने इतनी बहादुरी से लड़ाई लड़ी कि भारतीय सेना ने उनका लोहा माना.

उस लड़ाई को कमांड कर रहे ब्रिगेडियर एमएस बाजवा याद करते हैं, "जब ये लड़ाई ख़त्म हुई तो मैं क़ायल था इस अफ़सर का. मैं 71 की लड़ाई भी लड़ चुका हूँ. मैंने कभी पाकिस्तानी अफ़सर को लीड करते नहीं देखा. बाकी सारे पाकिस्तानी कुर्ते पाजामे में थे. अकेला ये ट्रैक सूट पहने हुए था."

हाल ही में कारगिल पर एक किताब 'कारगिल अनटोल्ड स्टोरीज़ फ़्राम द वॉर' लिखने वाली रचना बिष्ट रावत बताती हैं, "कैप्टन कर्नल शेर ख़ाँ नॉर्दर्न लाइट इंफ़ैंट्री के थे."

"टाइगर हिल पर पांच जगहों पर उन्होंने अपनी चौकियां बना रखी थीं. पहले 8 सिख को उन पर कब्ज़ा करने का काम दिया गया था. लेकिन वो उन पर कब्ज़ा नहीं कर पाए. बाद में जब 18 ग्रेनेडियर्स को भी उनके साथ लगाया गया तो वो एक चौकी पर किसी तरह कब्ज़ा करने में कामयाब हो गए. लेकिन कैप्टन शेर ख़ाँ ने एक जवाबी हमला किया."

एक बार नाकाम होने पर उन्होंने फिर अपने सैनिकों को 'रिग्रुप' कर दोबारा हमला किया. जो लोग ये 'बैटल' देख रहे थे, वो सब कह रहे थे कि ये 'आत्मघाती' था. वो जानते थे कि ये मिशन कामयाब नहीं हो पाएगा, क्योंकि भारतीय सैनिकों की संख्या उनसे कहीं ज़्यादा थी.

जेब में चिट

ब्रिगेडियर एमपीएस बाजवा कहते हैं, "कैप्टन शेर खाँ लंबा-चौड़ा शख़्स था. वो बहुत बहादुरी से लड़ा. आख़िर में हमारा एक जवान कृपाल सिंह जो ज़ख्मी पड़ा हुआ था, उसने अचानक उठ कर 10 गज़ की दूरी से एक 'बर्स्ट' मारा और शेर ख़ाँ को गिराने में कामयाब रहा."

शेर ख़ाँ का गिरना था कि उनके हमले की धार जाती रही. ब्रिगेडियर बाजवा बताते हैं, "हमने वहां 30 पाकिस्तानियों के शवों को दफ़नाया. लेकिन मैंने सिविलियन पोर्टर्स भेजकर कैप्टेन कर्नल शेर ख़ाँ के शव को नीचे मंगवाया, पहले हमने उसे ब्रिगेड हेडक्वार्टर में रखा."

जब उनकी बॉडी वापस गई तो उनकी जेब में ब्रिगेडियर बाजवा ने एक चिट रखी जिस पर लिखा था, 'कैप्टन कर्नल शेर ख़ाँ ऑफ़ 12 एनएलआई हैज़ फ़ॉट वेरी ब्रेवली एंड ही शुड बी गिवेन हिज़ ड्यू.''
यानी कैप्टन शेर ख़ाँ बहुत बहादुरी से लड़े और उन्हें इसका श्रेय मिलना चाहिए.

अधिकारियों के कहने पर वापस लौटे

जनवरी 1998 में वो डोमेल सेक्टर में तैनात थे. जाड़े में जब भारतीय सैनिक पीछे चले गए, उनकी यूनिट चाहती थी कि उस ठिकाने पर कब्ज़ा कर लिया जाए.
अभी वो इस बारे में अपने आला अधिकारियों से इजाज़त लेने के बारे में सोच ही रहे थे कि कैप्टन कर्नल शेर ख़ाँ ने सूचना भेजी कि वो चोटी पर पहुंच गए हैं.

कर्नल अशफ़ाक़ हुसैन अपनी किताब 'विटनेस टू ब्लंडर - कारगिल स्टोरी अनफ़ोल्ड्स' में लिखते हैं, "कमांडिग ऑफ़िसर दुविधा में था कि क्या करें. उसने अपने आला अधिकारियों तक बात पहुंचाई और उस भारतीय चौकी पर कब्ज़ा जारी रखने की इजाज़त मांगी. लेकिन इजाज़त नहीं दी गई और कैप्टन शेर से वापस आने के लिए कहा गया. वो वापस आए लेकिन भारतीय चौकी से कई स्मृति चिन्ह जैसे कुछ ग्रेनेड, भारतीय सैनिकों की कुछ वर्दियाँ, वाइकर गन की मैगज़ीन, गोलियाँ और कुछ स्लीपिंग बैग उठा लाए."

टाइगर हिल पर दम तोड़ा

4 जुलाई, 1999 को कैप्टन शेर को टाइगर हिल पर जाने के लिए कहा गया. वहाँ पर पाकिस्तानी सैनिकों ने रक्षण की तीन पंक्तियाँ बना रखी थी जिनको कोड नेम दिया गया था 129 ए, बी और सी. उनके दूसरे नाम थे कलीम, काशिफ़ और कलीम पोस्ट.

भारतीय सैनिक 129 ए और बी को अलग-थलग करने में कामयाब हो चुके थे. कैप्टन शेर उस जगह पर शाम 6 बजे पहुंचे. हालात का मुआयना करने के बाद उन्होंने अगले दिन सुबह भारतीय सैनिकों पर हमला करने की योजना बनाई.
कर्नल अशफ़ाक हुसैन लिखते हैं,

"रात को उन्होंने सारे सिपाहियों को जमा कर शहादत पर एक तकरीर की. सुबह 5 बजे उन्होंने नमाज़ पढ़ी और कैप्टन उमर के साथ हमले पर निकल गए. वो मेजर हाशिम के साथ 129 बी पर ही थे कि भारतीय सैनिकों ने उन पर जवाबी हमला किया."
ख़तरनाक हालात से बचने के लिए मेजर हाशिम ने अपने ही तोपख़ाने से अपने ही ऊपर गोले बरसाने की माँग की. जब शत्रु सैनिक बहुत पास आ जाते हैं तो अक्सर सेनाएं उनसे बचने के लिए इस तरह की मांग करती हैं.

कर्नल अशफ़ाक हुसैन आगे लिखते हैं, "हमारी अपनी तोपों के गोले उनके चारों तरफ़ गिर रहे थे. पाकिस्तानी और भारतीय जवानों की हाथों से लड़ाई हो रही थी. तभी एक भारतीय जवान का एक पूरा बर्स्ट कैप्टन कर्नल शेर खाँ को लगा और वो नीचे गिर गए. शेर ख़ाँ को उनके साथियों के साथ शहादत मिली."

बाकी पाकिस्तानी सैनिकों को तो भारतीय सैनिकों ने वहीं दफ़ना दिया. लेकिन उनके पार्थिव शरीर को भारतीय सेना पहले श्रीनगर और फिर दिल्ली ले गई.

अंतिम विदाई

18 जुलाई 1999 की आधी रात के बाद से ही कैप्टन कर्नल शेर ख़ाँ के पार्थिव शरीर की आगवानी करने मलीर गैरिसन के सैकड़ों सैनिक कराची अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पहुंच चुके थे. उनके पुश्तैनी गांव से उनके दो भाई भी वहाँ पहुंचे हुए थे.
कर्नल अशफ़ाक हुसैन लिखते हैं,

"तड़के 5 बज कर 1 मिनट पर विमान ने रनवे को छुआ. उसके पिछले हिस्से से दो ताबूत उतारे गए. एक में कैप्टन शेर ख़ाँ का पार्थिव शरीर था. दूसरे ताबूत में रखे शव को अभी तक पहचाना नहीं जा सका था."
उन ताबूतों को एक एंबुलेंस में रख कर उस स्थान पर ले जाया गया जहां हज़ारों सैनिक और सामान्य नागरिक मौजूद थे. बलूच रेजिमेंट के जवान ताबूत को एंबुलेंस से उतार कर लोगों के सामने ले आए. ताबूतों को ज़मीन पर रख दिया गया और एक ख़ातिब ने नमाज़े- जनाज़ा पढ़ी.

उसके बाद कैप्टन शेर ख़ाँ के पार्थिव शरीर को उनके पुश्तैनी गांव ले जाया गया. वहाँ हज़ारों लोगों ने पाकिस्तानी सेना के इस बहादुर सिपाही को अंतिम विदाई दी।

मरणोपरांत निशान-ए-हैदर

ब्रिगेडियर बाजवा बताते हैं, "अगर मैं उनकी बॉडी नीचे नहीं मंगवाता और ज़ोर दे कर वापस नहीं भेजता तो उनका नाम भी कहीं नहीं होता. उनको मरणोपरांत निशान-ए-हैदर दिया गया जो पाकिस्तान का सबसे बड़ा वीरता पुरस्कार है और हमारे परमवीर चक्र के बराबर है."
बाद में उनके बड़े भाई अजमल शेर ने एक बयान दिया, "अल्लाह का शुक्र है कि हमारा दुश्मन भी कोई बुजदिल दुश्मन नहीं है. अगर लोग कहें कि इंडिया बुजदिल है तो मैं कहूँगा नहीं क्योंकि उसने एलानिया कह दिया कि कर्नल शेर हीरो हैं."

कमेंट में इंडियन आर्मी जिंदाबाद जरूर लिखें 👍🇮🇳🪖

👉 Source: BBC ✍️



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👉 यह पोस्ट केवल जानकारी साझा करने के उद्देश्य से है। इसका किसी भी व्यक्ति, धर्म या आस्था की भावनाओं को ठेस पहुँचाने से कोई संबंध नहीं है। इसमें दिए गए तथ्य आज भी इंटरनेट और विभिन्न विश्वसनीय वेबसाइटों पर उपलब्ध जानकारी के आधार पर प्रस्तुत किए गए हैं। हम सभी धर्मों जातियों और आस्थाओं का सम्मान करते हैं। यह पोस्ट केवल सूचना देने के उद्देश्य से साझा की गई है, न कि किसी की भावनाओं को आहत करने के लिए।

इंसानियत की एक तस्वीर… जो सालों तक उम्मीद बन गई ❤️ साल 2006…एक नन्हा बच्चा, भूखा-प्यासा, सड़क किनारे मौत से लड़ता हुआ। ल...
11/01/2026

इंसानियत की एक तस्वीर… जो सालों तक उम्मीद बन गई ❤️ साल 2006…एक नन्हा बच्चा, भूखा-प्यासा, सड़क किनारे मौत से लड़ता हुआ। लोगों ने मुँह मोड़ लिया… लेकिन उसी भीड़ में एक इंसान रुका।
एक बोतल पानी, थोड़ा सा प्यार — और वहीं से शुरू हुई एक नई ज़िंदगी।
फिर आया 2013…
वही बच्चा, अब सुरक्षित, मुस्कुराता हुआ।
डर की जगह भरोसा था, और अकेलेपन की जगह साथ।
और आज 2025…
वही बच्चा ग्रेजुएट बन चुका है। 🎓
जिसे कभी दुनिया ने ठुकरा दिया था, आज वही दुनिया उसके हौसले को सलाम कर रही है।
ये कहानी बताती है कि
👉 एक छोटा सा नेक कदम किसी की पूरी ज़िंदगी बदल सकता है।
👉 इंसानियत आज भी जिंदा है… बस उसे पहचानने वाली आँख चाहिए।
अगर आपको लगता है कि अच्छाई कभी हारती नहीं,
तो इस पोस्ट को शेयर कीजिए… ताकि इंसानियत की ये कहानी और दूर तक पहुँचे। 🙏
😭😱🫡

 #ये_तस्वीर_सिर्फ एक टेबल नहीं,इंसानों के बदलते संस्कारों का आइना है।अपनी जेब से पैसा जाए तो लोग दाना तक नहीं छोड़ते,और ...
10/01/2026

#ये_तस्वीर_सिर्फ एक टेबल नहीं,
इंसानों के बदलते संस्कारों का आइना है।
अपनी जेब से पैसा जाए तो लोग दाना तक नहीं छोड़ते,
और जहाँ मुफ्त मिले… वहाँ इंसानियत तक फिसल जाती है।
अन्न की कद्र नहीं रही…
बस आदतें बिगड़ चुकी हैं.
थोड़ी सी शर्म साथ ले आते तो
ये टेबल भी इतना अपमानित न होता
और इंसानियत भी इतनी सस्ती न लगती...
ये खाने की बर्बादी है या लोगों की परवरिश का सच..
जिस किसान ने अपने खुन पसीना और मेहनत से अपनी खेती मे इसको उगाया है, उसका ये अपमान है और पैसो की मस्ती की निशाणी है...!
*इसे रोकने के लिए हर इन्सान को सोचना पडे़गा*

😡😞😔😔

सेकमताड़ी बोलते थे हम ..जब एकदूसरे पर पूरी ताकत से इंतेशनली गेंद फेंकी जाती थीबहुत तेज लगती थी🥴😣�खासतौर पर सर्दियों में ...
09/01/2026

सेकमताड़ी बोलते थे हम ..जब एकदूसरे पर पूरी ताकत से इंतेशनली गेंद फेंकी जाती थीबहुत तेज लगती थी🥴😣�
खासतौर पर सर्दियों में तो...🥺

यादें बचपन की

बुजुर्ग की मदद करने पर नौकरी चली गई… लेकिन अगली सुबह जो हुआ, उसे देखकर सब रह गएइंसानियत की मिसालदिल्ली का एक मॉल शाम के ...
08/01/2026

बुजुर्ग की मदद करने पर नौकरी चली गई… लेकिन अगली सुबह जो हुआ, उसे देखकर सब रह गए

इंसानियत की मिसाल
दिल्ली का एक मॉल शाम के करीब 7:00 बजे थे। भीड़ थोड़ी कम हो चुकी थी, लेकिन ग्रोसरी सेक्शन के काउंटर नंबर चार पर अब भी कुछ ग्राहक लाइन में खड़े थे। उस काउंटर पर खड़ी थी संध्या। उम्र करीब 22 साल। वह एक मध्यमवर्गीय परिवार से थी और पढ़ाई के साथ-साथ नौकरी कर रही थी ताकि घर की जरूरतों में हाथ बटा सके। उसकी आंखों में थकान जरूर थी, लेकिन व्यवहार में शालीनता और चेहरे पर हल्की सी मुस्कान हमेशा बनी रहती थी।
तभी एक बुजुर्ग व्यक्ति धीरे-धीरे काउंटर के पास पहुंचे। उनकी उम्र करीब 75 साल थी, कमर झुकी हुई थी, हाथों में कंपन था और आंखों में झिझक। उन्होंने अपने छोटे से थैले में से कुछ सामान निकाला—दो ब्रेड, एक दूध का पैकेट, कुछ दवाइयां और एक साबुन। उन्होंने धीरे-धीरे सामान बेल्ट पर रखा और फिर जेब से एक पुराना सा बटुआ निकाला।

संध्या ने स्कैन करना शुरू किया। कुल ₹214 हुए, दादा जी। बुजुर्ग ने कांपते हाथों से कुछ नोट निकाले। ₹200 ही थे। बाकी बटुए में सिक्कों के अलावा कुछ नहीं था। उन्होंने घबराकर कहा, “बिटिया, बस ₹14 कम है। दूध का पैकेट हटा दूं?”
संध्या की नजर उनके हाथों पर पड़ी। एक उंगली में पट्टी बंधी थी और आंखों में इतनी लाचारी थी कि जैसे शब्द भी शर्मिंदा हो जाएं। उसने पल भर सोचा। फिर चुपचाप अपनी जेब से ₹20 निकाले और मशीन में डाल दिए। “सब ठीक है, दादा जी, आप सामान लीजिए।”

बुजुर्ग की आंखें भर आईं। “बिटिया, तू बहुत बड़ी इंसान है। भगवान तेरा भला करें।” संध्या ने हल्के से सिर झुकाया और मुस्कुरा दी। लेकिन यह सब स्टोर के मैनेजर मृदुल देख रहे थे। उनकी उम्र करीब 40 साल थी, हमेशा नियम-कानून की किताब में डूबे रहने वाले और सहानुभूति शब्द से दूर। वो तेजी से काउंटर पर पहुंचे और बोले, “यह क्या कर रही थी तुम?”
“सर, बुजुर्ग थे। थोड़ा कम था, मैंने अपने पैसे दिए।”
“अपने पैसे? यह दानशाला है क्या? स्टोर के सामने ऐसी भावनाएं चलेंगी तो बाकी लोग भी तमाशा बनाएंगे। लेकिन सर, तुम अब इस स्टोर में काम नहीं करोगी। यू आर फायरड, अभी इसी वक्त।”

संध्या को समझ ही नहीं आया कि वह क्या कहे। भीड़ में कुछ लोग चुपचाप देख रहे थे, किसी ने कुछ नहीं कहा। बुजुर्ग हाथ जोड़ते हुए बोले, “साहब, बच्ची ने तो इंसानियत दिखाई है।”
मृदुल ने उनकी बात को अनदेखा कर दिया। संध्या ने काउंटर से अपना आईडी बैज उतारा, धीरे से मुड़ी और बाहर निकल गई। उसकी आंखें अब भी भरी हुई थीं, लेकिन उसमें कोई शर्म नहीं थी। सिर्फ चुप्पी थी। एक कसक थी।
बाहर जाते वक्त उस बुजुर्ग ने उसका हाथ पकड़ा और कहा, “बिटिया, यह जो तूने किया है ना, इसकी कीमत तू सोच भी नहीं सकती।”
संध्या अपने छोटे से किराए के कमरे में लौट आई थी। कमरा 10 गुना 10 का था। एक कोना जहां किताबें थीं, दूसरा जहां एक स्टील की अलमारी और एक छोटी सी चारपाई पड़ी थी। उसने चुपचाप अपना बैग रखा, बिना किसी से बात किए। मां ने फोन किया था, लेकिन उसने रिसीव नहीं किया। आंखों में अब भी आंसू थे। लेकिन सबसे ज्यादा चुभ रहा था वो तिरस्कार जो सबके सामने हुआ था।

उसे नौकरी की जरूरत थी। घर का किराया, मां की दवाइयां, छोटी बहन की कॉलेज फीस—सब कुछ उसी की तनख्वाह से चलता था। लेकिन आज बस कुछ इंसानियत दिखाने के लिए उसे निकाल दिया गया था। क्या वाकई में वह गलत थी? उसने खुद से सवाल किया। वो सवाल लिए, वो आंसू लिए, वो खालीपन लिए।
संध्या उस रात चुपचाप लेटी रही। अगली सुबह करीब 10:00 बजे दरवाजे पर दस्तक हुई। संध्या उठी और दरवाजा खोला। सामने खड़ा था वही बुजुर्ग, लेकिन इस बार अकेले नहीं, उनके साथ एक कार खड़ी थी, सफेद चमचमाती, और पीछे एक व्यक्ति खड़ा था, सूट-बूट में हाथ में फोल्डर।
“बिटिया, अब तेरे जीवन का असली दिन आया है,” बुजुर्ग मुस्कुराए। संध्या हैरान रह गई। “आप?”
“हाँ, और यह श्री शर्मा है, मेरे सेक्रेटरी।”
“सेक्रेटरी? बिटिया, मैं सिर्फ एक आम ग्राहक नहीं हूं। मैं हूं दयानंद अग्रवाल, अग्रवाल फाउंडेशन का संस्थापक। रिटायर जरूर हुआ हूं, लेकिन अब भी मेरे एक शब्द से बहुत कुछ बदल सकता है।”
संध्या की आंखें फैल गईं। उसे यकीन नहीं हो रहा था। “कल जब तूने बिना सोचे मदद की, तब तूने जो किया वह सिर्फ ₹14 नहीं थे। वह थे एक इंसान का सम्मान बचाना।”
बुजुर्ग ने जेब से एक लिफाफा निकाला। “यह है तेरी नई नौकरी का ऑफर लेटर। मेरी ही फाउंडेशन की एक शाखा में। ना सिर्फ बेहतर सैलरी, बल्कि वह सम्मान जो तू डिजर्व करती है।”
संध्या की आंखें भर आईं। “लेकिन सर, मैंने तो कुछ खास नहीं किया था।”
“बस यही तो खास था कि तूने बिना किसी स्वार्थ के किया। और बेटा, असली इंसान वही होता है जो दूसरों के लिए बिना सोचे खड़ा हो।”

संध्या ने लिफाफा हाथ में लिया और वह पहली बार मुस्कुराई। इस बार खुशी की मुस्कान थी। भरोसे की मुस्कान थी। संध्या ने जब फाउंडेशन का ऑफर लेटर खोला, उसकी आंखें भर आईं। ना केवल सैलरी उसके पिछले वेतन से तीन गुना थी, बल्कि उसमें लिखा था, “आपको मानव सेवा और संवेदनशीलता के लिए अग्रवाल फाउंडेशन की सामाजिक न्याय टीम में कार्यभार सौंपा जाता है।”
यह सिर्फ नौकरी नहीं थी। यह उस सम्मान की वापसी थी जो कल उसके पैरों के नीचे कुचला गया था। अगले दिन संध्या ने नई जगह ज्वाइन कर ली। एक खूबसूरत ऑफिस जिसमें बच्चों, वृद्धों और जरूरतमंदों के लिए चल रही योजनाओं पर काम होता था। वहां उसका स्वागत पूरे स्टाफ ने तालियों के साथ किया।
दयानंद जी ने उसे एक कॉन्फ्रेंस में बुलाया। जहां उन्होंने मीडिया और जनप्रतिनिधियों के सामने कहा, “जब एक कैशियर लड़की ₹14 देकर किसी की इंसानियत बचा सकती है, तो हमें पूरे सिस्टम को दोबारा सोचने की जरूरत है।”
उसी दिन, उसी शहर के मॉल में जहां संध्या की पुरानी नौकरी थी, एक मेल आया। विषय था “नोटिस रिगार्डिंग वायलेशन ऑफ एंप्लई डिग्निटी।” मैनेजर मृदुल के पास कॉल आया। “आपकी रिपोर्ट हमें मिली है। जिस लड़की को आपने बिना जांच निकाला, वह अब हमारे सोशल इंपैक्ट प्रोग्राम की डायरेक्टर है। कृपया सफाई दें कि आपने सार्वजनिक रूप से किस आधार पर उसे अपमानित किया।”

मृदुल का चेहरा सफेद पड़ गया। अब उसकी समझ में आया कि कभी-कभी इंसान को नीतियों से नहीं, इंसानियत से चलाना चाहिए।

एक हफ्ते बाद, संध्या को वहीं मॉल में एक प्रोग्राम में आमंत्रित किया गया। जहां समाज के कुछ सम्मानित लोगों को अनसंग हीरो के रूप में बुलाया गया था। स्टेज पर चढ़ते समय संध्या की नजर उसी स्टोर के काउंटर पर गई, जहां अब कोई और लड़की खड़ी थी और पास में खड़े मृदुल शर्मा की नजरें नीचे झुकी थीं।
स्टेज पर जाकर संध्या ने कहा, “मुझे नहीं चाहिए था कोई माफी, ना ही बदला। बस एक ही उम्मीद थी कि अगली बार कोई लड़की सिर्फ इसलिए ना निकाली जाए क्योंकि उसने इंसानियत दिखा दी। मैंने ₹14 नहीं दिए थे। उस दिन मैंने अपने पापा को देखा था उस बुजुर्ग में।”
पूरे हॉल में तालियां गूंजने लगीं। “अगर दुनिया को बदलना है, तो बड़े फैसलों की नहीं, छोटे-छोटे इंसानी जज्बों की जरूरत है। कभी किसी को छोटा मत समझो। एक छोटा सा दिल बड़ा बदलाव ला सकता है।”

इस कहानी ने हमें यह सिखाया कि इंसानियत का मूल्य कभी कम नहीं होता। कभी-कभी, एक छोटी सी मदद किसी के जीवन को बदल सकती है। हमें हमेशा दूसरों की मदद के लिए तैयार रहना चाहिए, क्योंकि हम कभी नहीं जानते कि हमारी एक छोटी सी मदद किसी के लिए कितनी बड़ी हो सकती है।

पर्यावरण के लिए वरदान है कदम्ब का पौधा
08/01/2026

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पटना की सड़कों पर ओला-उबर की बाइक चलाते विजय कुमार सिर्फ सवारियां नहीं ढोते, वे हर दिन अपने चार साल के बेटे की जिंदगी ढो...
08/01/2026

पटना की सड़कों पर ओला-उबर की बाइक चलाते विजय कुमार सिर्फ सवारियां नहीं ढोते, वे हर दिन अपने चार साल के बेटे की जिंदगी ढोते हैं। मूल रूप से बिहार के पानापुर गांव के रहने वाले विजय इस समय पटना शहर में किराए के छोटे से कमरे में रहते हैं। उनका बेटा ब्लड कैंसर से जूझ रहा है। हर महीने खून चढ़वाना उसकी जिंदगी के लिए जरूरी है और इसके लिए कम से कम 8 हजार रुपए चाहिए। यह रकम न जुटे, तो बेटे की हालत कभी भी बिगड़ सकती है।
बेटा विजय के बिना एक पल भी नहीं रह पाता। इसलिए वे उसे बाइक पर साथ लेकर ही काम पर निकलते हैं। रास्ते में बच्चा कभी कुछ खाने की जिद करता है, कभी बाइक पर ही सो जाता है। ट्रैफिक जाम में फंसने पर विजय का दिल कांप उठता है कि कहीं अचानक बेटे की तबीयत न बिगड़ जाए। डॉक्टरों ने बताया है कि पांच साल की उम्र के बाद ही उसका ठोस इलाज संभव है, तब तक हर महीने खून चढ़वाना ही एकमात्र सहारा है।
विजय की जिंदगी पहले से ही दर्द से भरी है। उनका पहला बेटा तीन महीने की उम्र में चल बसा। घर पर 95 साल के लकवाग्रस्त पिता हैं, जिन्हें वे पोते की बीमारी का सच नहीं बताते। मां, दो बेटियां और बहन की जिम्मेदारी भी उन्हीं पर है। तमाम मजबूरियों के बावजूद विजय हार नहीं मानते। वे कहते हैं—बेटे का चेहरा ही मेरी सबसे बड़ी ताकत है।

जाते-जाते भाई को जीने की राह दिखा गई... 😭💔""एक बहन का आखिरी वादा, और भाई का टूटा हुआ दिल।""वो आखिरी गुडबाय जो हमेशा याद ...
07/01/2026

जाते-जाते भाई को जीने की राह दिखा गई... 😭💔"
"एक बहन का आखिरी वादा, और भाई का टूटा हुआ दिल।"
"वो आखिरी गुडबाय जो हमेशा याद रहेगा... 🥺"
"भाई-बहन का प्यार और वो आखिरी नसीहत। 🙏"
"अस्पताल के बिस्तर से दी गई सबसे बड़ी सीख।"
"अलविदा मेरी बहन... अब ये कलाई सूनी रहेगी 💔"
"शब्द नहीं हैं इस दर्द को बयां करने के लिए।"
"काश ये पल वहीं रुक जाता... 😢"
"बहन की वो आखिरी मुस्कान और नम आँखें।"
🙏
"'मेहनत करना और बड़ा इंसान बनना' - बहन के आखिरी शब्द ❤️"
"एक बहन का सपना, अब भाई की जिम्मेदारी।"
"जिंदगी की सबसे बड़ी सीख, जाते हुए दे गई।"

डॉक्टर बोले- ब्लड कैंसर है..बचना मुश्किल,,,जब मौत सामने थी और दवा ने जवाब दे दिया, तब इस आदमी ने जंगल और बर्फीली नदी से ...
06/01/2026

डॉक्टर बोले- ब्लड कैंसर है..बचना मुश्किल,,,जब मौत सामने थी और दवा ने जवाब दे दिया, तब इस आदमी ने जंगल और बर्फीली नदी से जिंदगी की नई कहानी लिखी..,,।।

52 वर्षीय एक व्यक्ति की कहानी इस सोच को नई ऊर्जा देती है। उन्हें ल्यूकेमिया (ब्लड कैंसर) और लिंफोमा (लसीका ग्रंथि का कैंसर) हुआ। डॉक्टरों ने तुरंत कीमोथेरेपी और रेडिएशन की सलाह दी। लेकिन उन्होंने conventional treatment को ठुकराकर Natural Cancer Healing का मार्ग अपनाया।

इस व्यक्ति ने खुद को एक ‘प्राकृतिक ट्रायल’ में झोंक दिया। उन्होंने 4°C के बर्फीले पानी में 187 मील तैरने का संकल्प लिया। यह किसी भी औसत व्यक्ति के लिए असंभव लगता है, लेकिन उनके लिए यह प्रकृति से जुड़ने का एक जरिया था। Natural Cancer Healing के तहत ठंडे पानी में तैरना न सिर्फ शरीर को झटका देता है, बल्कि इम्यून सिस्टम को भी जाग्रत करता है।

187 मील (करीब 300 किलोमीटर) तैराकी 4°C के बर्फीले पानी में की हर हफ्ते एक रात जंगल में बिताई कैंसर से लड़ने की बजाय जीवन से प्यार करने का नजरिया अपनाया

हर हफ्ते एक रात वह जंगल में अकेले बिताते थे। कोई गैजेट नहीं, कोई इंसानी संपर्क नहीं – सिर्फ पेड़, चांदनी और उनके विचार। यह प्रकृति से गहन संपर्क Natural Cancer Healing का एक अनिवार्य हिस्सा है, जहां शरीर को नकारात्मकता से मुक्ति मिलती है।

पहली तैराकी के बाद जब ब्लड टेस्ट हुआ तो ल्यूकेमिया गायब हो चुका था। उनके कैंसर विशेषज्ञ डॉक्टर ने यहां तक कहा, "अगर मैंने खुद उनका टेस्ट नहीं किया होता, तो यकीन नहीं करता कि उन्हें कभी कैंसर था!"

इस तरह के प्राकृतिक तरीकों को आज विज्ञान भी समर्थन देता है:

जापान में हुए एक शोध में पाया गया कि जंगल में 72 घंटे बिताने पर नैचुरल किलर सेल्स (NK Cells) की संख्या 50 से 200 गुना तक बढ़ जाती है। ये वही कोशिकाएं हैं जो कैंसर से लड़ती हैं।

Natural_Cancer_Healing में प्रयोग होने वाले शारीरिक और मानसिक व्यायाम, जैसे तैराकी और मेडिटेशन, इम्यून सिस्टम को पुनर्जीवित करने में सहायक हैं।

ColdWater में डुबकी लगाने से एंटी-इंफ्लेमेटरी हार्मोन्स सक्रिय होते हैं, जिससे शरीर खुद को मरम्मत करता है।

सच है कि दवाएं आखिरी विकल्प होनी चाहिए, पहली नहीं। हर दवा के साइड इफेक्ट होते हैं, लेकिन प्रकृति के सिर्फ फायदे होते हैं।

आज वे 64 वर्ष के हैं, पूरी तरह स्वस्थ और दो वर्ल्ड रिकॉर्ड उनके नाम हैं – एक लंबी दूरी की बर्फीली तैराकी और दूसरा जंगल में सबसे लंबा एकल ध्यान (solo meditation retreat)।
उनका मानना है कि जीवन में उद्देश्य और आत्मबल से बड़ा कोई इलाज नहीं।
वे अब लोगों को बिना दवा, कीमो और रेडिएशन के अपनी प्राकृतिक हीलिंग पावर को जगाना सिखा रहे हैं।
एक सच्ची कहानी किसी भारतीय की मदद कर सकती है,,,
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27/08/2025

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