07/01/2022
पंडौ नृत्य
गाँव : पिण्डवाली
पांडव नृत्य उत्तराखंड राज्य का एक प्रमुख लोकनृत्य के रूप में जाना जाता है। यह नृत्य महाभारत में पांच पांडवों के जीवन से सम्बंधित है। पांडव नृत्य के माध्यम से पांच पांडवों व द्रोपदी की पूजा अर्चना करने की परंपरा वर्षों से चली आ रही है।उत्तराखंड को पांडवो की धरा भी कहा जाता है।
पांडव नृत्य का आयोजन हर साल नवंबर से फरवरी तक गढ़वाल में किया जाता है। इसमें लोग वाद्य यंत्रों की थाप और धुनों पर नृत्य करते हैं। मुख्यतः जिन स्थानों पर पांडव अस्त्र छोड़ गए थे वहां पांडव नृत्य का आयोजन होता है।
पाण्डव नृत्य देवभूमि उत्तराखण्ड का पारम्परिक लोकनृत्य है। पाण्डव गण अपने अवतरण काल में यहाँ वनवास, अज्ञातवास, शिव जी की खोज में और अन्त में स्वर्गारोहण के समय आये थे। महाभारत के युद्ध के बाद पांडवों ने अपने विध्वंसकारी अस्त्र और शस्त्रों को उत्तराखंड के लोगों को ही सौंप दिया था और उसके बाद वे स्वार्गारोहिणी के लिए निकल पड़े थे, इसलिए अभी भी यहाँ के अनेक गांवों में उनके अस्त्र- शस्त्रों की पूजा होती है और पाण्डव लीला का आयोजन होता है।
स्व. सर्वेश्वर दत्त काण्डपाल के अतिरिक्त आचार्य कृष्णानंद नौटियाल जी द्वारा गढ़वाली भाषा में रचित महाभारत के चक्रव्यूह, कमल व्यूह आदि के आयोजनों का प्रदर्शन पूरे देश में होता है। सबसे रोमांचक पाण्डव नृत्य रुद्रप्रयाग-चमोली जिलों वाले केदारनाथ- बद्रीनाथ धामों के निकटवर्ती गांवों में होता है।
Credit--
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