21/04/2026
हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में एक ऐसा संघर्ष चल रहा है जो पूरे देश को सोचने पर मजबूर करता है।
दृष्टिहीन जन संगठन के सदस्य पिछले 902 दिनों से अपनी मांगों को लेकर शिमला में धरने पर बैठे हैं।
यह आंदोलन अब हिमाचल प्रदेश के इतिहास के सबसे लंबे आंदोलनों में गिना जाने लगा है।
जनवरी की कड़ाके की ठंड में जब तापमान माइनस 2 से 3 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है — जब आम लोग घरों से बाहर निकलने से भी डरते हैं — तब ये दृष्टिबाधित लोग सचिवालय के बाहर खुले आसमान के नीचे रातें गुजारते रहे।
इनकी मांगें क्या हैं?
दृष्टिबाधित जन संगठन के जिला प्रभारी राजेश ठाकुर के अनुसार उनकी मांगें कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं, बल्कि कानूनी अधिकार हैं। वर्ष 1995 से शिक्षा, वन, लोक निर्माण और जल शक्ति विभाग में दिव्यांगों के लिए आरक्षित चतुर्थ श्रेणी के बैकलॉग पद आज तक खाली पड़े हैं — सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार के निर्देशों के बावजूद।
इसके अलावा दिव्यांग पेंशन को ₹1,700 से बढ़ाकर ₹5,000 करने की मांग भी उठाई गई है। साथ ही सरकार ने सहारा योजना और बस पास सुविधा भी बंद कर दी है, जो इनकी रोज़मर्रा की जिंदगी का सहारा थी।
सरकार का रवैया?
राजेश ठाकुर का कहना है कि सरकार के साथ कई दौर की बातचीत हो चुकी है, लेकिन हर बार केवल आश्वासन ही मिला — जमीनी स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
7 अप्रैल 2026 को जब संघ ने सचिवालय से मुख्यमंत्री आवास ओक ओवर तक रोष रैली निकाली, तो पुलिस ने उन्हें बीच रास्ते में ही रोक लिया। इस दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच धक्का-मुक्की भी हुई।
आगे क्या?
संगठन ने चेतावनी दी है कि यदि मांगें जल्द पूरी नहीं हुईं तो वे उग्र आंदोलन का रास्ता अपनाने के लिए मजबूर होंगे — और इसकी पूरी जिम्मेदारी सरकार और प्रशासन की होगी।
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