03/06/2026
तिथि --03/06/2026
वेद मन्दिर, योल (हि.प्र.) में चल रहे 78 दिवसीय चारों वेदों के यज्ञानुष्ठान के 53वें दिन स्वामी राम स्वरूप जी, योगाचार्य ने अथर्ववेद काण्ड 3 सूक्त 10 एवं 11 से श्रद्धालुओं को ज्ञान देते हुए कहा कि "श्रुतम् तपः स्वाध्याय तपः" मनुष्य योनि पाकर जीव का कर्तव्य है कि वह विद्वान् से वेदों को सुनकर और वेदों का स्वाध्याय करके स्वयं को तपस्वी कहलाए, साधारण मनुष्य न कहलाए। ऐसे तप से काम, क्रोध, मद, लोभ,अहंकार आदि सभी शत्रु ओं का नाश होता है और हमारी वेद विरुद्ध पाप वृत्तियों का भी ईश्वर जड़ से नाश कर देता है। अतः हम नित्य स्वाध्याय, ईश्वर पर भरोसा, अग्निहोत्र, नाम-सिमरन आदि करें। उन्होंने कहा कि प्रतिदिन अग्निहोत्र/यज्ञ करके साधक को निरोगता एवं दीर्घायु प्राप्त होती है, ऐसा चारों वेद कहते हैं।
परमेश्वर ने अथर्ववेद मन्त्र 3/11/2 में तो यहाँ तक वचन दे दिया है कि यदि कोई साधक रोगी है अथवा मृत्यु को प्राप्त होने वाला हो गया है तो परमेश्वर उसे मृत्यु के ग्रास से वापिस ले आता है और सौ वर्ष की दीर्घायु निरोगता सहित प्रदान करता है।
परन्तु खेद यही है कि वर्तमान काल में प्रायः मनुष्य वेदों का त्याग कर बैठे हैं और इस कारण चिन्तामय, रोग आदि से ग्रस्त होकर अल्पायु में ही मृत्यु का शिकार हो जाते हैं। हमें अपने भारत को महान् बनाने, स्वयं को निरोगी और सब दुःखों का नाश करने के लिए कभी न कभी तो वेदों की ओर लौटना ही पड़ेगा क्योंकि वेद मार्ग के अतिरिक्त सुख प्राप्ति का कोई अन्य मार्ग ईश्वर ने नहीं बनाया है, फलस्वरूप हमें दुःखों के सागर में डुबकी लगाते रहना पड़ेगा।
*********