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*कहानी: "कर्म का हिसाब"*एक गाँव में *सुमित्रा देवी* अपनी बेटी *पूजा* और बड़े बेटे *राहुल* की पत्नी *सीमा* के साथ रहती थी...
09/07/2026

*कहानी: "कर्म का हिसाब"*

एक गाँव में *सुमित्रा देवी* अपनी बेटी *पूजा* और बड़े बेटे *राहुल* की पत्नी *सीमा* के साथ रहती थी।

सीमा बहुत मेहनती और सीधी थी। सुबह 4 बजे उठकर पूरा घर साफ़ करना, सास और ननद की ख़िदमत करना - यही उसकी रोज़ की दिनचर्या थी।

पर *सास सुमित्रा* और *ननद पूजा* को सीमा से हमेशा शिकायत रहती।
- "नमक तेज़ है" कहकर खाना फेंक देना
- मेहमानों के सामने ताने मारना: "देखो हमारी बड़ी बहू को काम ही नहीं आता"
- सीमा की मेहनत की कभी तारीफ़ ना करना

राहुल चुप रहता क्योंकि माँ और बहन नाराज़ हो जातीं। सीमा बस चुप-चाप सब सहती और भगवान से दुआ करती।

2 साल बाद सुमित्रा के छोटे बेटे *अमन* की शादी हुई। बहू आई *किरण* - पढ़ी-लिखी, तेज़ और स्वाभिमानी।

पहले ही दिन पूजा बोली: "भाभी, झूठे बर्तन तुम धो दो। सीमा दीदी को आदत है"
किरण मुस्कुराकर बोली: "दीदी, घर के काम सबके हैं। आज आप धो दीजिए, कल मैं धो दूंगी।"

सुमित्रा ने ताना मारा: "आजकल की लड़कियां कामचोर होती हैं"
किरण बोली: "सासू माँ, कामचोर वो नहीं जो काम बाँट कर करे। कामचोर वो है जो दूसरों से सब करवा कर खुद आराम करे।"

: वो चिल्लाती नहीं थी, पर दबती भी नहीं थी। हर बात तरीके से बोलती।
उसने सीमा को सारा घर का बोझ नहीं उठाने दिया। "दीदी आप आराम करो, आज मैं बना लूंगी" कहकर खुद काम करती।
3. *आईने जैसी सच्चाई*: एक दिन मेहमान आए। पूजा ने फिर सीमा को बुरा-भला कहा। किरण ने तुरंत बोला: "बुआ जी, आप 1 दिन सीमा दीदी की जगह काम करके दिखाओ। फिर बात करना।"

जब किरण आई तो उसने सीमा से कहा: "दीदी, अब बस। जो बोएगा वही काटेगा।"

दोनों ने मिलकर एक प्लान बनाया।
एक दिन दोनों बहुओं ने कहा: "आज से हम छुट्टी पर हैं।"
और दोनों कमरे में जाकर आराम करने लगीं।

सारा काम अब *सास सुमित्रा* और *ननद पूजा* के सिर आ गया।
झाड़ू, बर्तन, खाना, कपड़े... 2 घंटे में ही उनकी कमर टूट गई।

खाना जला दिया, घर में धूल रह गई, कपड़े गंदे पड़े रहे।

शाम को *ससुर जी* गुस्से में बोले: "ये क्या हाल बना रखा है घर का? तुम दोनों करती क्या हो दिन भर?"

तभी *सीमा और किरण* कमरे से निकलीं और मुस्कुराकर बोलीं:

*सीमा:* "पिताजी, माँजी तो कहती हैं घर में काम ही क्या होता है? बस थोड़ा सा काम कर लेती हैं।"

*किरण:* "हाँ पिताजी, उन्होंने ही तो मना किया था हमें काम करने से। कहा था तुम दोनों कामचोर हो। तो अब हम कामचोर बनकर आराम कर रही हैं। बाकी काम आप लोग कर लीजिए।"

सास और ननद का चेहरा देखने लायक था। बर्तन के पास सुमित्रा के हाथ में छाले पड़ गए थे और पूजा झाड़ू लगाते-लगाते हांफ रही थी।

ससुर जी समझ गए। उन्होंने सख्ती से कहा: "बस बहुत हुआ। आज से घर का काम सब मिलकर करेंगे। और जो बहुओं की इज्जत नहीं करेगा, वो इस घर में नहीं रहेगा।"

उस दिन के बाद सुमित्रा और पूजा की अकड़ टूट गई। अब वो दोनों बहुओं से प्यार से बात करतीं और काम में हाथ भी बंटातीं।

धीरे-धीरे घर का माहौल बदल गया। सुमित्रा और पूजा को समझ आया कि सीमा के साथ गलत हुआ था।

आखिर में सुमित्रा ने सीमा का हाथ पकड़कर कहा: "बेटी, मुझे माफ़ कर दे। किरण ने हमें इंसानियत का सबक सिखा दिया।"

06/07/2026

Anay

04/07/2026

Funny joks

जब देवरानी ने दिया अपनी सास को जवाब सास शांत खड़ी रह गयी शांता देवी के दो बेटे थे। बड़ा बेटा रमेश और छोटा बेटा सुरेश। रम...
30/06/2026

जब देवरानी ने दिया अपनी सास को जवाब सास शांत खड़ी रह गयी
शांता देवी के दो बेटे थे। बड़ा बेटा रमेश और छोटा बेटा सुरेश। रमेश की पत्नी गीता और सुरेश की पत्नी सीता।

*जेठानी गीता* बहुत सीधी थी। कुछ महीने पहले रमेश की नौकरी छूट गई। घर का खर्च चलाना मुश्किल हो गया। गीता ने सिलाई का काम शुरू कर दिया। सुबह से रात तक मशीन चलाती, पर सास शांता देवी को दया नहीं आती।

*शांता देवी का भेदभाव:*
छोटी बहू सीता को वो छुप-छुपकर नई साड़ी, फल, मिठाई लाकर देतीं। सीता जब कहती, "माँजी, दीदी को भी दे दीजिए," तो शांता देवी झिड़क देतीं, "तुझे ज्यादा हमदर्दी हो रही है? उसका पति कमाएगा तब खाएगी। मेरा सुरेश तो अफसर है।"

जबकि सच ये था कि सुरेश भी अभी नई नौकरी में था, ज्यादा कमा नहीं पाता था। पर सीता का दिल बड़ा था। वो अपनी जेठानी गीता को चुपके से अपने हिस्से का दूध, फल, यहाँ तक कि अपनी नई साड़ी भी दे देती। गीता मना करती तो कहती, "दीदी, हम बहनें हैं। बहन से छुपाकर कब तक खाऊँगी?"

*एक दिन हद हो गई:*
गीता को भूख लगी थी। दोपहर में उसने एक रोटी ज्यादा ले ली। शांता देवी किचन में आ धमकीं। सबके सामने चिल्लाईं, "तुझसे कितनी बार कहा है कि दिन में दो बार ही खाना खाया कर! वरना मोटी हो जाएगी। तेरे पति के पास नौकरी नहीं, और तू खाने पर टूटी पड़ती है?"

गीता की आँखों में आँसू आ गए। वो चुपचाप किचन के कोने में जाकर रोने लगी। थाली वहीं पड़ी रह गई।

सीता से देखा नहीं गया। वो उठी, गीता के पास गई और बोली, "दीदी आप रोओ मत। चलिए खाना खा लीजिए। पेट भर के खाए बिना काम कैसे होगा?" उसने अपने हाथ से गीता को रोटी खिलानी शुरू की।

तभी शांता देवी दौड़ती हुई आईं। गुस्से से उनका चेहरा लाल था। वो चिल्लाईं, "छोटी बहू! तेरी हिम्मत कैसे हुई अपनी जेठानी को खाना देने की? जब मैंने मना कर दिया तो तू उसे खाना क्यों दे रही है? उसका पति नहीं कमाता। जब कमाने लगेगा तब खाएगी वो!"

पूरा घर सन्नाटा। गीता डर गई। पर सीता खड़ी हो गई। उसने पहली बार सास की आँखों में आँखें डालकर शांत आवाज़ में पूछा:

*"तो माँजी, बात ये है कि भैया अभी नौकरी नहीं कर रहे हैं इसलिए आप दीदी को खाना नहीं खाने देतीं? यदी किसी दिन ऐसा मेरे साथ भी हुआ... कि मेरे पति की नौकरी छूट गई... तो क्या आप ऐसा ही मेरे साथ करेंगी? जैसा दीदी के साथ कर रही हैं?"*

शांता देवी के पैरों तले जमीन खिसक गई। उनके मुँह से बोल नहीं फूटा। सुरेश भी वहीं खड़ा था। उसे पहली बार समझ आया कि उसकी माँ क्या कर रही हैं।

सीता ने फिर कहा, "माँजी, आज भैया की नौकरी नहीं है, कल को सुरेश की भी चली जाए... तो? क्या तब आप मुझे भी भूखा मारेंगी? *रिश्ते नौकरी से नहीं बनते माँजी, इंसानियत से बनते हैं। आज दीदी की जगह मैं होती, तो?"*

शांता देवी की आँखें झुक गईं। पहली बार उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने कुछ नहीं कहा, बस चुपचाप किचन से चली गईं।

उस दिन के बाद घर में कुछ बदल गया। शांता देवी अब दोनों बहुओं को एक साथ बिठाकर खाना खिलातीं। गीता की सिलाई की तारीफ भी करने लगीं। और रमेश को नौकरी ढूंढने में सुरेश ने भी मदद की।

*सीख:* घर देवरानी-जेठानी से नहीं, *समझदारी और बराबरी से चलता है।* वक्त सबका बदलता है, पर जो साथ दे जाए वही अपना होता है।

*चाय का दूसरा कप*गांव की सावित्री देवी का एक ही सपना था - बेटा अजय की शादी धूमधाम से हो। सपना पूरा हुआ। शहर से पढ़ी-लिखी...
27/06/2026

*चाय का दूसरा कप*

गांव की सावित्री देवी का एक ही सपना था - बेटा अजय की शादी धूमधाम से हो। सपना पूरा हुआ। शहर से पढ़ी-लिखी बहू नेहा आई।

*पर पहले ही दिन से तूफान शुरू।*

नेहा जींस पहनती, सावित्री को पसंद नहीं। सावित्री सुबह 5 बजे उठकर भजन लगाती, नेहा की नींद खराब होती। रोटी गोल नहीं बनती तो सावित्री ताना मारती, "हमारे जमाने में..."

6 महीने में घर अखाड़ा बन गया। अजय दोनों के बीच सैंडविच बना हुआ था।

एक दिन हद हो गई। सावित्री ने गुस्से में कह दिया, "शहर की लड़की, तुझे घर संभालना नहीं आता!"
नेहा ने भी जवाब दे दिया, "और आपको बहू को बेटी समझना नहीं आता!"

उस रात नेहा ने अपना सामान पैक किया। सुबह मायके जाने वाली थी।

*पर सुबह 5 बजे कुछ अलग हुआ।*

नेहा की नींद भजन से नहीं, खांसने की आवाज से खुली। बाहर आई तो देखा सावित्री देवी आंगन में चारपाई पर बैठी खांस रही थीं। रात भर बुखार में तपती रहीं, पर किसी से कहा नहीं।

नेहा से रहा नहीं गया। वो भागकर रसोई में गई। याद आया, माँ कहती थी - अदरक वाली चाय बुखार में रामबाण है।

10 मिनट में अदरक-तुलसी वाली कड़क चाय बनाकर लाई। सावित्री देवी हैरान रह गईं।
"मेरे लिए?"
नेहा ने कुछ नहीं कहा, बस चाय पकड़ा दी और पैर दबाने बैठ गई।

चाय का पहला घूंट पीते ही सावित्री की आंखें भर आईं। 30 साल हो गए, पति के जाने के बाद किसी ने उनके लिए चाय नहीं बनाई थी।

"बेटा, मुझे माफ कर दे," सावित्री फूट-फूटकर रो पड़ीं। "मैं डर गई थी। लगा तू अजय को मुझसे दूर कर देगी। मेरे पास वो अकेला ही तो है।"

नेहा ने सास के आंसू पोछे। "माँ, आपसे दूर करके मैं अजय का प्यार नहीं, बद्दुआ लूंगी। आप मेरी सास नहीं, माँ हो। और माँ से कोई दूर होता है क्या?"

*उस दिन के बाद घर बदल गया।*

अब सुबह 5 बजे भजन भी बजते और नेहा भी चाय लेकर आ जाती। सावित्री ने नेहा को अपने हाथ से रोटी बनाना सिखाया। नेहा ने सास को मोबाइल चलाना सिखाया।

गांव की औरतें पूछतीं, "सवित्री, बहू को वश में कैसे किया?"
सावित्री हंसकर कहतीं, "वश में नहीं किया बहन, दिल में जगह दी है। बहू नहीं, बेटी मिली है मुझे।"

अब सावित्री सबको एक ही बात समझाती हैं:
*"सास-बहू का रिश्ता चाय की तरह होता है। पहला कप कड़वा लगता है, पर दूसरा कप... दूसरा कप रिश्तों में मिठास घोल देता है। बस कोई एक पहल कर दे।"*

`रिश्ते खून से नहीं, एहसास से बनते हैं ❤️`
`सास-बहू की लड़ाई तो सबने देखी, आज प्यार वाली कहानी पढ़ो 👇`
`अगर दिल छू जाए तो Share जरूर करना। किस-किस की सास माँ जैसी है? Comment में बताओ ❤️`

`✍️ लेखक: Amba Mishra © Original Story`

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