sweta darpan hindi news paper

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🧘*॥ श्रीहरि: ॥*🧘*⚜️ 'अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुष:। अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजित:॥  (गीता 3/36)। *⚜️👩‍❤️‍...
18/04/2026

🧘*॥ श्रीहरि: ॥*🧘
*⚜️ 'अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुष:। अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजित:॥ (गीता 3/36)। *⚜️
👩‍❤️‍👩मनुष्य पाप करना नहीं चाहता है, फिर मनुष्य न चाहते हुए भी किससे प्रेरित होकर पाप का आचरण करता है? अर्जुन के इस प्रश्न का उत्तर देते हुए भगवान् ने कहा कि— संसार की कामना के कारण मनुष्य पाप करने में प्रवृत्त होता है, यह जो धन में, परिवार में, सुख में प्रियता है, इसीका नाम आसक्ति है; इस आसक्ति के चलते मनुष्य पाप में प्रवृत्त होता है।*👩‍❤️‍👩
*⚜️ अब प्रश्न उठता है कि आसक्ति कैसे छूटे? भाई लोग आसक्ति मिटाने की और भगवान् के चिन्तन की जो चेष्टा करते हैं, यह उपाय बढ़िया नहीं है।आसक्ति मिटती है, भगवान् की स्वाभाविक ही याद आने से। भगवान् की याद आना और याद करना— इन दोनों में बड़ा अन्तर है। विशेष ध्यान देने की बात है कि करना कभी निरन्तर नहीं होता है, करने का आरम्भ और अन्त होता है; और जो स्वत: होता है, वह असली होता है। यदि भगवान् में प्रियता जाग्रत् हो जाय तो स्वत: भगवान् का चिन्तन होगा और स्वत: संसार की आसक्ति मिट जाएगी।*
*⚜️ साधक अपने बल से निराश होकर सच्चे हृदय से भगवान् से प्रार्थना करे कि— 'हे भगवन् ! मेरे से नहीं हो रहा है, जो कुछ होगा, आपकी कृपा से ही होगा'— तो भगवान् की कृपा से स्मृति मिल जाती है। उस स्मृति से स्वरूप का बोध, भगवान् का प्रेम जाग्रत् होता है, उससे आसक्ति मिट जाती है। साधक जो चिन्तन करता है, वह मन-बुद्धि से होता है, लेकिन भगवत् कृपा से जो स्मृति जाग्रत् होती है, वह स्वयं में होती है। 'मैं हूँ और प्रभु मेरे हैं'— यह याद आ जाय— इसमें कर्तृत्व नहीं है। ऐसी यह स्मृति स्वत: उदय होती है।*
*⚜️ 'मैं हूँ' में जो 'हूँ' है, यह सत्ता का, होने-पन का वाचक है। मैं होने से यह 'हूँ' है; मैं न हो तो 'है' (सत्ता) ही है। वास्तव में 'मैं' नहीं है, 'है' ही है; 'मैं' माना हुआ है, जो नहीं मानने से मिट जाता है और 'है' की स्मृति जाग्रत हो जाती है। मैं-पन बदलता रहता है, 'हूँ' बदलता नहीं है, मैं ज्ञानी हूँ, अज्ञानी हूँ, मैं पण्डित हूँ, मैं अन्जान हूँ, आदि-आदि। 'मैं' जिस ज्ञान में प्रकाशित होता है, वह है, मैं जिसमें दिखता है, वह 'है' तत्त्व है।*
*⚜️ परा और अपरा— भगवान् की दो प्रकृतियां है। भगवान् कहते हैं— 'इस संसार में जीव बना हुआ आत्मा (परा प्रकृति) मेरा ही सनातन अंश है; इसमें प्रकृति का अंश बिल्कुल भी नहीं है।' 'ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।' अहम् (मैं) नहीं है, स्वरूप है, सत्ता मात्र है। अहम् (मैं) में और मिट्टी के ढेले में कुछ फर्क नहीं है; अपने से मिट्टी का ढेला जितनी दूर है, उतना ही दूर अहम् है।*
🌷🌷🌷🌷🌷
🙏श्रीमन नारायण नारायण नारायण 🙏

डा. शवेता रस्तोगी
संस्थापक/राष्ट्रीय अध्यक्ष
भारतीय जनसंघ जनसहयोग मंच

भगवान परशुराम और भगवान राम में भेद करने वालो को एक छोटा सा post समर्पित। कुछ रामायण के संदर्भ। (मन्दोदरी रावण से)अतिबल म...
18/04/2026

भगवान परशुराम और भगवान राम में भेद करने वालो को एक छोटा सा post समर्पित। कुछ रामायण के संदर्भ।

(मन्दोदरी रावण से)
अतिबल मधु कैटभ जेहिं मारे। महाबीर दितिसुत (परशुराम) संघारे।।
जेहिं बलि बाँधि सहसभुज मारा। सोई अवतरेउ हरन महि भारा।।
रामचरितमानस- बालकाण्ड-५/४

देवता श्रीरघुवीर से
मीन कमठ सूकर नरहरी। बामन परसुरामबपु धरी।
जब जब नाथ सुरन्ह दुखु पायो। नाना तनु धरि तुम्हईं नसायो।
रामचरितमानस- बालकाण्ड- १०९/४
...क्षत्रियाधीश करिनिकर नव केसरी, परशुधर विप्र सस जलदरूपं। विनयपत्रिका-५२/६
हे कोसलपति..... आपने सहस्त्रबाहु आदि अभिमानी क्षत्रिय राजा रूपी हाथियों के समूह को विदीर्ण करने के लिए सिंह रूप और ब्राह्मण रूपी धान्य को हरा-भरा करने के लिए मेघरूप, ऐसा परशुराम अवतार धारण किया।

(मन्दोदरी रावण से) जिस समय राक्षसगण क्षत्रियरूप से उत्पन्न होकर पृथ्वी का भार हुए तब इन्होंने(रामचन्द्र) परशुरामस्वरूप से उन्हें कई बार संग्राम में मारा और पृथ्वी को जीतकर उसे कश्यप मुनि को दे दिया
अध्यात्म रामायण- युद्ध काण्ड- सर्ग १०- श्लोक५१✅

रघुवंशी राम उवाच-
मैंने ब्राह्मण परशुराम अवतार लिया .., सहस्त्रार्जुन.. वध,क्षत्रिय विनाश..👇👇
आनन्दरामायण- राज्यकाण्ड(उत्तरार्द्ध)- सर्ग २०/ श्लोक ३८-४१✅

देवी उवाच 👉श्री रामचन्द्र ही परशुराम हुए थे
श्रीमद्देवीभागवत पुराण - तृतीय स्कन्ध- अ०३० - श्लोक- ५३

महादेव द्वारा कहे गए राम सहस्त्रनाम में
आनन्दरामायण- राज्यकाण्ड(पूर्वार्द्ध)- सर्ग १/ श्लोक१६०

इन सभी अवतारों में बल की दृष्टि से, रूप की दृष्टि से और गुण की दृष्टि से किसी भी प्रकार का भेद नहीं किया जा सकता। गरुडपुराण - ३/१५/२८

इसलिए वह महामूर्ख हैं जो जय श्रीराम और जय श्री परशुराम में अंतर कहते हैं पर परशुराम भगवान को कमतर आंकने का महापाप करते हैं। वह महामूर्ख हैं जो सृष्ट्रीकर्ता श्रीहरि के रूपों के भेद नहीं समझ पाते और उसमें भेद करते हैं। वह महापापी हैं जो सहस्त्रबाहु जैसे पापी को नमस्कार करतें हैं। जब वह ऐसा करते हैं तो श्री हरी और उनके अवतार श्रीराम के साथ भी द्रोह करते हैं क्योंकि श्रीराम ने श्री परशुराम को पूजनीय कहा है। श्री परशुराम ने क्षत्रियों का नहीं बल्कि अत्याचारी, अहंकारी सामंतो का नाश किया था। उनकी शत्रुता किसी कुल से नहीं थी। भगवान श्रीराम को लंकेश और उनके कुल का वध करने के लिए ब्राह्मण विरोधी नहीं कहते बल्कि उनके सद्गुणों और आदर्शों की पूजा की जाती है।

ऐसा करने वाले अधिकतर महामूर्ख महापापी वह ही मिलेंगे जिन्होंने कभी श्री रामायण को पढ़ा नहीं। अपने ग्रंथो से दूर रहकर सोशल मीडिया पर भ्रांति फैलाने वाले इन लोगों को भगवान श्रीराम भी क्षमा नहीं करेंगे। श्री हरि के 10 के 10 अवतार श्रेष्ठ हैं और उनमें भेद करने वाला श्री हरि का द्रोही है।

डा. शवेता रस्तोगी
संस्थापक/राष्ट्रीय अध्यक्ष
भारतीय जनसंघ जनसहयोग मंच

*मन को बार-बार अतीत में जाने से रोकना सीखेंअतीत बदल नहीं सकता,  लेकिन उस पर बार-बार सोचना  आज को जरूर प्रभावित करता है।म...
18/04/2026

*मन को बार-बार अतीत में जाने से रोकना सीखें

अतीत बदल नहीं सकता, लेकिन उस पर बार-बार सोचना
आज को जरूर प्रभावित करता है।मन अक्सर पुरानी बातों में उलझकर वर्तमान की शांति खो देता है।जब ध्यान वर्तमान में आता है, तो मन स्वतः स्थिर होने लगता है।

1️⃣ जो बीत गया, उसे बार-बार दोहराना बंद करें।

2️⃣ हर विचार को पकड़कर बैठना जरूरी नहीं है।

3️⃣ अपने ध्यान को वर्तमान काम पर लाएं।

4️⃣ अतीत से सीख लें, बोझ न बनाएं।

5️⃣ मन को नई दिशा देना सीखें।

अतीत याद रखने के लिए है, जीने के लिए नहीं। जो वर्तमान में रहना सीख गया, वह शांति पाना सीख गया जब भी मन अतीत में जाए, तुरंत खुद से कहें —यह बीत चुका है, मैं अभी में लौट रहा/रही हूँ।*फिर अपने आसपास की किसी एक चीज़ पर ध्यान दें। वर्तमान ही शांति का वास्तविक द्वार है।*

डा. शवेता रस्तोगी
संस्थ/राष्ट्रीय अध्यक्ष
भारतीय जनसंघ जनसहयोग मंच

टोपी से इनकार और गमछा स्वीकार, सम्राट चौधरी ने बता दिया कि वो बीजेपी के सीएम हैं, बाहरी नहीं.डा. शवेता रस्तोगीसंस्थापक/र...
18/04/2026

टोपी से इनकार और गमछा स्वीकार, सम्राट चौधरी ने बता दिया कि वो बीजेपी के सीएम हैं, बाहरी नहीं.

डा. शवेता रस्तोगी
संस्थापक/राष्ट्रीय अध्यक्ष
भारतीय जनसंघ जनसहयोग मंच

भगवान परशुराम से जुड़े कुछ पौराणिक रहस्य 🚩जय श्री परशुराम जी 🙏
18/04/2026

भगवान परशुराम से जुड़े कुछ पौराणिक रहस्य 🚩
जय श्री परशुराम जी 🙏

.                        अक्षय तृतीया महत्व   (आरम्भ रविवार 19.04.2026 को 10:49 से सोमवार प्रातः 07:27 तक)         अक्षय...
18/04/2026

. अक्षय तृतीया महत्व

(आरम्भ रविवार 19.04.2026 को 10:49 से सोमवार प्रातः 07:27 तक)

अक्षय तृतीया या आखा तीज वैशाख मास में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को कहते हैं। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार इस दिन जो भी शुभ कार्य किये जाते हैं, उनका अक्षय फल मिलता है। इसी कारण इसे अक्षय तृतीया कहा जाता है। वैसे तो सभी बारह महीनों की शुक्ल पक्षीय तृतीया शुभ होती है, किन्तु वैशाख माह की तिथि स्वयंसिद्ध मुहूर्तो में मानी गई है।
अक्षय तृतीया का सर्वसिद्ध मुहूर्त के रूप में भी विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस दिन बिना कोई पंचांग देखे कोई भी शुभ व मांगलिक कार्य जैसे विवाह, गृह-प्रवेश, वस्त्र-आभूषणों की खरीददारी या घर, भूखंड, वाहन आदि की खरीददारी से संबंधित कार्य किए जा सकते हैं। नवीन वस्त्र, आभूषण आदि धारण करने और नई संस्था, समाज आदि की स्थापना या उदघाटन का कार्य श्रेष्ठ माना जाता है। पुराणों में लिखा है कि इस दिन पितरों को किया गया तर्पण तथा पिन्डदान अथवा किसी और प्रकार का दान, अक्षय फल प्रदान करता है। इस दिन गंगा स्नान करने से तथा भगवत पूजन से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। यहाँ तक कि इस दिन किया गया जप, तप, हवन, स्वाध्याय और दान भी अक्षय हो जाता है। यह तिथि यदि सोमवार तथा रोहिणी नक्षत्र के दिन आए तो इस दिन किए गए दान, जप-तप का फल बहुत अधिक बढ़ जाता हैं। इसके अतिरिक्त यदि यह तृतीया मध्याह्न से पहले शुरू होकर प्रदोष काल तक रहे तो बहुत ही श्रेष्ठ मानी जाती है। यह भी माना जाता है कि आज के दिन मनुष्य अपने या स्वजनों द्वारा किए गए जाने-अनजाने अपराधों की सच्चे मन से ईश्वर से क्षमा प्रार्थना करे तो भगवान उसके अपराधों को क्षमा कर देते हैं और उसे सदगुण प्रदान करते हैं, अतः आज के दिन अपने दुर्गुणों को भगवान के चरणों में सदा के लिए अर्पित कर उनसे सदगुणों का वरदान माँगने की परंपरा भी है।
अक्षय तृतीया के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर समुद्र या गंगा स्नान करने के बाद भगवान विष्णु की शांत चित्त होकर विधि विधान से पूजा करने का प्रावधान है। नैवेद्य में जौ या गेहूँ का सत्तू, ककड़ी और चने की दाल अर्पित किया जाता है। तत्पश्चात फल, फूल, बरतन, तथा वस्त्र आदि दान करके ब्राह्मणों को दक्षिणा दी जाती है। ब्राह्मण को भोजन करवाना कल्याणकारी समझा जाता है।
मान्यता है कि इस दिन सत्तू अवश्य खाना चाहिए तथा नए वस्त्र और आभूषण पहनने चाहिए। गौ, भूमि, स्वर्ण पात्र इत्यादि का दान भी इस दिन किया जाता है। यह तिथि वसंत ऋतु के अंत और ग्रीष्म ऋतु का प्रारंभ का दिन भी है इसलिए अक्षय तृतीया के दिन जल से भरे घडे, कुल्हड, सकोरे, पंखे, खडाऊँ, छाता, चावल, नमक, घी, खरबूजा, ककड़ी, चीनी, साग, इमली, सत्तू आदि गरमी में लाभकारी वस्तुओं का दान पुण्यकारी माना गया है।
इस दान के पीछे यह लोक विश्वास है कि इस दिन जिन-जिन वस्तुओं का दान किया जाएगा, वे समस्त वस्तुएँ स्वर्ग या अगले जन्म में प्राप्त होगी। इस दिन लक्ष्मी नारायण की पूजा सफेद कमल अथवा सफेद गुलाब या पीले गुलाब से करना चाहिये।

सर्वत्र शुक्ल पुष्पाणि प्रशस्तानि सदार्चने।
दानकाले च सर्वत्र मंत्र मेत मुदीरयेत्॥

अर्थात सभी महीनों की तृतीया में सफेद पुष्प से किया गया पूजन प्रशंसनीय माना गया है।
ऐसी भी मान्यता है कि अक्षय तृतीया पर अपने अच्छे आचरण और सद्गुणों से दूसरों का आशीर्वाद लेना अक्षय रहता है। भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा विशेष फलदायी मानी गई है। इस दिन किया गया आचरण और सत्कर्म अक्षय रहता है।
भविष्य पुराण के अनुसार इस तिथि की युगादि तिथियों में गणना होती है, सतयुग और त्रेता युग का प्रारंभ इसी तिथि से हुआ है। भगवान विष्णु ने नर-नारायण, हयग्रीव और परशुराम जी का अवतरण भी इसी तिथि को हुआ था। ब्रह्माजी के पुत्र अक्षय कुमार का आविर्भाव भी इसी दिन हुआ था।
इस दिन श्री बद्रीनाथ जी की प्रतिमा स्थापित कर पूजा की जाती है और श्री लक्ष्मी नारायण के दर्शन किए जाते हैं। प्रसिद्ध तीर्थ स्थल बद्रीनारायण के कपाट भी इसी तिथि से ही पुनः खुलते हैं। ऐसी ही अनेकानेक पोस्ट पढ़ने के लिये हमारा फेसबुक पेज ‘श्रीजी की चरण सेवा’ को लाईक एवं फॉलो करें। अब आप हमारी पोस्ट व्हाट्सएप चैनल पर भी देख सकते हैं। चैनल लिंक हमारी फेसबुक पोस्टों में देखें। वृंदावन स्थित श्रीबांकेबिहारीजी मन्दिर में भी केवल इसी दिन श्री विग्रह के चरण दर्शन होते हैं, अन्यथा वे पूरे वर्ष वस्त्रों से ढके रहते हैं।
जी.एम. हिंगे के अनुसार तृतीया ४१ घटी २१ पल होती है तथा धर्म सिंधु एवं निर्णय सिंधु ग्रंथ के अनुसार अक्षय तृतीया ६ घटी से अधिक होना चाहिए। पद्म पुराण के अनुसार इस तृतीया को अपराह्न व्यापिनी मानना चाहिए। इसी दिन महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ था और द्वापर युग का समापन भी इसी दिन हुआ था। ऐसी मान्यता है कि इस दिन से प्रारम्भ किए गए कार्य अथवा इस दिन को किए गए दान का कभी भी क्षय नहीं होता। मदनरत्न के अनुसार :
अस्यां तिथौ क्षयमुर्पति हुतं न दत्तं।
तेनाक्षयेति कथिता मुनिभिस्तृतीया॥
उद्दिष्य दैवतपितृन्क्रियते मनुष्यैः।
तत् च अक्षयं भवति भारत सर्वमेव॥

बुंदेलखंड में अक्षय तृतीया से प्रारम्भ होकर पूर्णिमा तक बडी धूमधाम से उत्सव मनाया जाता है, जिसमें कुँवारी कन्याएँ अपने भाई, पिता तथा गाँव-घर और कुटुम्ब के लोगों को शगुन बाँटती हैं और गीत गाती हैं। अक्षय तृतीया को राजस्थान में वर्षा के लिए शगुन निकाला जाता है, वर्षा की कामना की जाती है, लड़कियाँ झुण्ड बनाकर घर-घर जाकर शगुन गीत गाती हैं और लड़के पतंग उड़ाते हैं। यहाँ इस दिन सात तरह के अन्नों से पूजा की जाती है। मालवा में नए घड़े के ऊपर खरबूजा और आम के पल्लव रख कर पूजा होती है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन कृषि कार्य का आरम्भ किसानों को समृद्धि देता है।
० ० ०

जय जय श्री राधे
डा. शवेता रस्तोगी
संस्थापक/राष्ट्रीय अध्यक्ष
भारतीय जनसंघ जनसहयोग मंच

भारतीय जनसंघ जनसहयोग मंच का app आ गया है ।सभी सदस्य नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके तुरंत ही जुड़ें और अपना सदस्य Community ...
17/04/2026

भारतीय जनसंघ जनसहयोग मंच का app आ गया है ।

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🥀प्रभु चरणों में प्रेम 🥀नाथ एक बर मागउँ , राम कृपा करि देहु ।जनम जनम प्रभु पद कमल , कबहुँ घटै जनि नेहु ।।हे नाथ! हे श्री...
17/04/2026

🥀प्रभु चरणों में प्रेम 🥀
नाथ एक बर मागउँ , राम कृपा करि देहु ।
जनम जनम प्रभु पद कमल , कबहुँ घटै जनि नेहु ।।

हे नाथ! हे श्री रामजी! मैं आपसे एक वर माँगता हूँ, कृपा करके दीजिए। प्रभु आप के चरणकमलों में मेरा प्रेम जन्म-जन्मांतर में भी कभी न घटे ।

🙏🌹🥀जय सियाराम 🥀🌹🙏
🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀

🙏🌹🥀 कर्मों का फल🥀🌹🙏
(भीष्म पितामह को बाणों की शैय्या क्यों मिली इस संबंध में अनेक कथाएं कर्म सिद्धांत पर आधारित हैं उनमे से एक इस प्रकार हैं)

🥀हमें कर्मों का फल अवश्य ही भुगतना पड़ता है, क्योंकि मनुष्य ही अच्छे और बुरे कर्म करता है, पशु नहीं। मनुष्य कर्म योनि है जबकि पशु पक्षी भुक्त योनि है l

इसलिए हम अपने कर्मों का फल अवश्य भुगतना पड़ेगा चाहे देर हो या सवेर कर्म सिर्फ हमें भूगतने ही पडेंगे। इसलिए कर्म करने से पहले एक बार अवश्य सोचें क्या मैं यह सही कर रहा हूं, अगर कर्म करने से पहले अच्छे से सोच ले तो शायद हम बुरा कर्म करने से बच सकते हैं। अगर आपने अपने आप को बचा लिया तो सजा से भी बचा लिया। आपने बुरा कर्म कर लिया तो एक न एक दिन भगवान अवश्य सजा देगा इस जन्म में नहीं अगले जन्म में ही कर्मों का फल भोगना पड़ता है।

🥀श्री कृष्ण जी ने भी गीता में- कर्मों को ही सबसे उत्तम बताया है क्योंकि कर्म हो हमारे भाग्य का निर्माण करते हैं। अगर हम अच्छे कर्म करेंगे तो हमारे साथ अच्छा होगा अगर हम बुरे कर्म करेंगे तो हमारे साथ बुरा ही होगा।*
भगवान की न्याय वयवस्था बहुत ही ज्यादा सुदृढ है.कर्म का फल अच्छे कार्य करने वाले को अच्छा और बुरे कर्म करने वाले को बुरा फल अवश्य ही भोगना पड़ेगा।भगवान् के देर भले ही हो जाए मगर अन्धेर हो ही नहीं सकता। जिसको आप देर समझते है वह देर भी नहीं है।

प्रभु ने प्रत्येक कर्म के फलीत होने का समय पहले से ही निर्धारित कर रखा है। समय से पहले या पीछे फल की प्राप्ति नहीं होगी । प्रभु की प्रत्येक रचना प्रत्येक नियम इतना ज्यादा गहरा है कि हरेक प्राणी उसको समझ या जान नहीं सकता।
आज जो कर्म हम कर रहे हैं परिपक्व होकर उनसे ही हमारे भाग्य की रचना होती है। हमारे भाग्य के निर्माता हम खुद ही है और प्रत्येक मनुष्य को उसके भाग्य के अनुसार उसे फल या कुफल अवश्य भोगना पड़ेगा ही ।इस समय हम जो दुख भुगत रहे है।

यह हमारे ही पिछले जन्मो का या इसी जन्म के हमारे किए गए पुण्यों या बुरे कर्मों का पापों का फल है। प्रभु को दोष नहीं देना चाहिए।
🥀भगवान् का एक विधान यह है कि हमारे कर्म ,विचार और भावना को अनुसार ही हमें सुख या दुःख की प्राप्ति होगी और वह सुख या दुःख हमे खुदको ही भोगना पड़ेगा। मनुष्य के कब किये हुए पाप का फल कब मिलेगा- इसका कुछ पता नहीं । भगवान् का विधान विचित्र है।
🥀जब तक पुराने पुन्य प्रबल रहते है,उग्र पाप का फल भी तत्काल नही मिलता। जब पुराने पुण्य खत्म होते हैं तब पाप की बारी आती है।

🥀मगर सत्संग दण्ड को कम करा सकता है या फिर कुछ प्रसाद के रूप में भी दे सकता है। अपने दुखों को हसं हसं झेलो या रोकर झेलो यह हमारे कर्मो का फल तो हमे अवश्य अवश्य ही पडेगा, फिर रोकर क्यो झेले?*
रोने से कष्ट दुगना हो जाता है और हँसते हँसते रहने से आधा हो जाता है। जिस दिन पाप कर्म हो जाए तो अगले दिन उपवास रखो यह एक उत्तम यह कर्मभूमि है। कर्म तो करना पडेगा कर्म नहीं करोगे तो पाप चढेगा। जैसा कार्य कर्म होगा वैसा ही फल भी भोगना पडेगा। फिर दुष्कर्म क्यो करे ?
🥀प्रत्येक कर्म प्रभू को याद करके करेंगे तभी अच्छे फल ही भोगेगे।
🥀धन , दौलत , सुयश , खुशिया , सफलताएँ , सुखी परिवार रोना हमारे कर्मो का फल है और पीड़ा, दुख , बिमारियो आफत , दुखी परिवार , रोना ,हमारे ही बुरे कर्मों का फल है। भूतकाल में हमने जो किया था उसका फल हमें अब मिल रहा है ।
भूतकाल में हम जो भोग चुके है या हो सकता है इस जन्म में भोगेगे।*

🥀श्रीकृष्ण ने समझाया कि भीष्म पितामह सुख - दुख से ,जय - पराजय से परे है। वो जानते हैं कि जो होने वाला था यही हुआ। भीष्म ने श्रीकृष्ण से कहा भगवान मैने ध्यान करके अपने ७३ वे जन्म तक देखा।
मैने तो कोई कुकर्म नहीं किया फिर मुझे बाणों की शय्या पर क्यों सोना पड़ा ?
🥀श्रीकृष्ण मुस्कुराकर बोले ....हे संयममूर्ति भीष्म 73 वे जन्म के पहले 74 वें जन्म तक जब आपको पता चलता कि जम आप किशोर थे तब वन में घूमने गए वहा पत्ते पर बैठी टिड्डी के शरीर में आपने कांटा चुभोया था उस कर्म का फल घूमते - घूमते अब मिल रहा है।
🥀कर्म का फल छह साल में दुगुना , बारह साल में चार गुना , अठारह साल में आठ गुना , चौबीस साल में सोलह गुना - इस प्रकार मिलता है।

🥀इसलिये जब आप कर्ता होकर कर्म कर रहे हैं तो सोचे लें कि इस का क्या फल होगा।

🙏🌹🥀ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🥀🌹🙏
🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀

🙏🌹🥀देवताओं का वास 🥀🌹🙏

(देवता यानि आपकी रचनात्मक, सकारात्मक एवं नकारात्मक प्रभाव को रोकने की क्षमता)

गौ माता के दूध में 33 कोटि यानि प्रकार के देवताओं का वास है l इस कारण देसी गाय के दूध, दही, घृत एवं इसके गोबर मूत्र से बनी खाद से उपजाये हुए अन्न से हमारे महतत्व में आध्यात्मिक एव सकारत्मक प्रवृतियों का निर्माण होता है अतः सनातन धर्म के मानने वाले लोग लोग गौ रक्षा एवं सेवा का पुण्य अपने प्रारब्ध (भाग्य ) में संचित करे l दुसरी ओर तामसिक आसुरी वृत्ति के लोगों का क्या भविष्य हैं पढ़िए ,,,,,,

" गोचर भूमि हङप करने वाला महापापी " नर्कपाले तु चण्डाली काकमान्सं श्वचर्मणा।
चाच्छाद गोचररक्षोणीकृद्दृष्टभीतित ।।

अर्थात गायों के लिए गोचरभूमि छोङना महान् पूण्य और गोचरभूमि को नष्ट करना महापाप है ।

भारतवर्ष में आज गोचरभूमि पर बेईमानों ने कब्जा कर लिया है । गाय की भूमि हमनें छीन ली है, इसलिए वो दर- दर भटकने को मजबूर है और हम उसे अवारा कहकर दुत्कारते हैं । अवारा व महापापी हम हैं, जो हमनें गोचरभूमि को हङप लिया है । अतः हमें प्रयास करके गोचरभूमि को भ्रष्टाचारियों से मुक्त करवाना चाहिए l
🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀
नमो ब्रह्मण्य देवाय गोब्राह्मण हिताय च ।
जगत् हिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः ॥👏👏👏

🙏🌹🥀 जय श्री राम, जय महावीर हनुमान🥀🌹🙏
🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀

🥀जिस तरह थोडी सी औषधि., भयंकर रोगों को शांत कर देती हैl🥀
🥀उसी तरह....ईश्वर की थोडी सी स्तुति....बहुत से कष्ट और दुखों का नाश कर देती है 🥀

🙏🌹सर्वदेवमयी यज्ञेश्वरी गौमाता को नमन🌹🙏

डा. शवेता रस्तोगी
संस्थापक/राष्ट्रीय अध्यक्ष
भारतीय जनसंघ जनसहयोग मंच

मंगल की चट्टानें पृथ्वी पर: अंतरिक्ष का रहस्यमय सफर!यह सुनने में किसी साइंस-फिक्शन कहानी जैसा लगता है लेकिन यह एक वैज्ञा...
17/04/2026

मंगल की चट्टानें पृथ्वी पर: अंतरिक्ष का रहस्यमय सफर!

यह सुनने में किसी साइंस-फिक्शन कहानी जैसा लगता है लेकिन यह एक वैज्ञानिक सच्चाई है कि पृथ्वी पर ऐसी चट्टानें मौजूद हैं जो सीधे मंगल ग्रह से आई हैं और इंसानों ने उन्हें यहाँ नहीं लाया। ये चट्टानें अंतरिक्ष के विशाल शून्य को पार करके हमारे ग्रह तक पहुँची हैं और अपने साथ मंगल के इतिहास के अनमोल राज लेकर आई हैं।

कैसे शुरू होता है यह सफर?
मंगल ग्रह पर जब बड़े-बड़े उल्कापिंड टकराते हैं तो उनकी ऊर्जा इतनी जबरदस्त होती है कि सतह की चट्टानें अंतरिक्ष में उछल जाती हैं। इन टुकड़ों में से कुछ मंगल के गुरुत्वाकर्षण से बाहर निकलकर अंतरिक्ष में स्वतंत्र रूप से यात्रा करने लगते हैं। लाखों वर्षों तक यह चट्टानें अंतरिक्ष में भटकती रहती हैं और फिर कभी-कभी पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में आकर यहाँ गिर जाती हैं।

वैज्ञानिक पहचान: यह मंगल की ही हैं कैसे पता चलता है?
यह सवाल सबसे दिलचस्प है क्योंकि दिखने में ये चट्टानें साधारण उल्कापिंड जैसी ही होती हैं। वैज्ञानिक इनकी पहचान के लिए उन्नत तकनीकों का उपयोग करते हैं जैसे:
* गैस संरचना का विश्लेषण
* खनिजों की तुलना और सबसे महत्वपूर्ण आइसोटोप विश्लेषण
इन चट्टानों में फंसी गैसें मंगल के वातावरण से पूरी तरह मेल खाती हैं जो इन्हें “मंगल से आया हुआ” साबित करती हैं।

एक ऐतिहासिक खोज
1984 में अंटार्कटिका में एक खास चट्टान मिली,जिसे ALH84001 नाम दिया गया। यह लगभग 4 अरब साल पुरानी है और वैज्ञानिकों ने इसमें ऐसे संकेत देखे जो कभी-कभी प्राचीन जीवन की संभावना की ओर इशारा करते हैं हालांकि इस पर अभी भी बहस जारी है।

वैज्ञानिक महत्व
मंगल से आई ये चट्टानें वैज्ञानिकों के लिए किसी “टाइम कैप्सूल” से कम नहीं हैं। इनके जरिए मंगल के भूगर्भीय इतिहास को समझा जा सकता है। वहाँ के वातावरण और जलवायु के बारे में जानकारी मिलती है और जीवन की संभावना पर भी शोध किया जा सकता है। सबसे खास बात यह है कि बिना मंगल पर गए,हमें उसके नमूने पृथ्वी पर ही मिल जाते हैं।

एक बड़ा सवाल: क्या जीवन के बीज भी आ सकते हैं?
कुछ वैज्ञानिक मानते हैं कि अगर चट्टानें ग्रहों के बीच यात्रा कर सकती हैं तो सूक्ष्म जीव भी इस तरह एक ग्रह से दूसरे ग्रह तक पहुँच सकते हैं। इस सिद्धांत को पैनस्पर्मिया कहा जाता है। अगर यह सच है तो संभव है कि जीवन का कोई रूप कभी मंगल से पृथ्वी तक आया हो या इसके उलट।

निष्कर्ष
मंगल ग्रह से आई चट्टानें हमें यह सिखाती हैं कि हमारा सौरमंडल एक-दूसरे से कहीं ज्यादा जुड़ा हुआ है,जितना हम सोचते हैं। ये चट्टानें केवल पत्थर नहीं हैं बल्कि अंतरिक्ष की करोड़ों साल पुरानी कहानियाँ हैं जो हमें ब्रह्मांड के रहस्यों के और करीब ले जाती हैं।

डा. शवेता रस्तोगी
संस्थापक/राष्ट्रीय अध्यक्ष
भारतीय जनसंघ जनसहयोग मंच

हिमालय की गोद में बसे पवित्र धाम केदारनाथ मंदिर की ओर एक वृद्ध भक्त अपने जीवन की अंतिम आशा लेकर चल पड़ा था।उसके कदम कमजो...
17/04/2026

हिमालय की गोद में बसे पवित्र धाम केदारनाथ मंदिर की ओर एक वृद्ध भक्त अपने जीवन की अंतिम आशा लेकर चल पड़ा था।

उसके कदम कमजोर थे, शरीर थका हुआ था, लेकिन हृदय में केवल एक ही संकल्प था—“मरने से पहले एक बार बाबा केदार के दर्शन कर लूँ…”बर्फीली हवाएँ चल रही थीं, रास्ते कठिन थे, और हर कदम पर शरीर जवाब दे रहा था…परंतु उसकी भक्ति हर कठिनाई से बड़ी थी। कई दिनों की कठिन चढ़ाई के बाद, जब वह किसी तरह मंदिर के द्वार तक पहुँचा…
तो सामने एक कठोर सत्य खड़ा था—मंदिर के कपाट बंद हो चुके थे।शीतकाल के कारण बाबा केदारनाथ अब छह महीने तक किसी को दर्शन नहीं देने वाले थे। पुजारी ने उसे समझाया—“बाबा अब अगले छह महीने बाद ही मिलेंगे… आप वापस लौट जाइए।”वृद्ध के लिए यह वाक्य किसी वज्रपात से कम नहीं था…वह वहीं मंदिर के द्वार पर बैठ गया…आँखों से अश्रु बहने लगे… और कांपती आवाज में वह बस इतना कह सका—“भोलेनाथ… मैं इतना दूर आया हूँ… अब खाली कैसे लौट जाऊँ?”रात गहराने लगी… ठंड असहनीय हो गई…पर वह भक्त वहीं बैठा, रोता रहा… पुकारता रहा…तभी अचानक, वहाँ एक अघोरी साधु प्रकट हुआ…जटाओं से ढका, भस्म से लिपटा, आँखों में अद्भुत शांति…उसने धीरे से वृद्ध के कंधे पर हाथ रखा और कहा—
“बाबा के द्वार से कोई खाली नहीं जाता…”
उस अघोरी ने उसके लिए आग जलाई, उसे सहारा दिया, और प्रेम से कहा—“थोड़ी देर विश्राम कर लो… सुबह होते ही बाबा दर्शन देंगे…”उसकी वाणी में इतना विश्वास था कि वृद्ध का अशांत मन भी शांत हो गया। वह उसी द्वार पर लेट गया… और गहरी नींद में चला गया…जब उसकी आँख खुली…
तो उसने देखा—मंदिर के पुजारी कपाट खोलने की तैयारी कर रहे हैं! वृद्ध घबरा गया—“अभी तो रात थी… इतनी जल्दी सुबह कैसे हो गई?”पुजारी उसे देखकर आश्चर्यचकित रह गए उन्होंने कहा—“बाबा के कपाट आज छह महीने बाद खुल रहे हैं…”
वृद्ध स्तब्ध रह गया…जिसे वह एक रात समझ रहा था…वह वास्तव में छह महीने थे…वह तुरंत उस अघोरी को खोजने लगा…पर वहाँ कोई नहीं था…तभी उसके हृदय में एक दिव्य अनुभूति हुई…आँखें भर आईं…उसे समझ आ गया—वो अघोरी कोई और नहीं… स्वयं महादेव थे…जो अपने भक्त की पुकार सुनकर,समय (काल) को भी बदलने आ गए थे…
और सबसे अद्भुत बात…मंदिर के अंदर जो दीपक छह महीने पहले जलाया गया था,वह आज भी वैसे ही जल रहा था…जैसे स्वयं महादेव उस रात…अपने भक्त के साथ…अघोरी बनकर जागते रहे हों…

✨ यह कथा हमें सिखाती है—
जहाँ सच्ची भक्ति होती है, वहाँ भगवान केवल सुनते नहीं… स्वयं आकर साथ देते हैं।

भक्त के लिए महादेव “काल” के भी पार चले जाते हैं…
🔱 हर हर महादेव 🔱
🌸 राधे राधे 🌸

डा. शवेता रस्तोगी
संस्थापक/राष्ट्रीय अध्यक्ष
भारतीय जनसंघ जनसहयोग मंच

.                        ‘श्रद्धा और समर्पण’          एक गाय घास चरने के लिए एक जंगल में चली गई। शाम ढलने के करीब थी। उस...
17/04/2026

. ‘श्रद्धा और समर्पण’

एक गाय घास चरने के लिए एक जंगल में चली गई। शाम ढलने के करीब थी। उसने देखा कि एक बाघ उसकी तरफ दबे पांव बढ़ रहा है। वह डर के मारे इधर-उधर भागने लगी। वह बाघ भी उसके पीछे दौड़ने लगा।
दौड़ते हुए गाय को सामने एक तालाब दिखाई दिया। घबराई हुई गाय उस तालाब के अन्दर घुस गई। वह बाघ भी उसका पीछा करते हुए तालाब के अन्दर घुस गया। तब उन्होंने देखा कि वह तालाब बहुत गहरा नहीं था। उसमें पानी कम था और वह कीचड़ से भरा हुआ था। उन दोनों के बीच की दूरी काफी कम हुई थी। लेकिन अब वह कुछ नहीं कर पा रहे थे।
वह गाय उस कीचड़ के अन्दर धीरे-धीरे धंसने लगी। वह बाघ भी उसके पास होते हुए भी उसे पकड़ नहीं सका। वह भी धीरे-धीरे कीचड़ के अन्दर धंसने लगा। दोनों ही करीब करीब गले तक उस कीचड़ के अन्दर फंस गए। दोनों हिल भी नहीं पा रहे थे। गाय के करीब होने के बावजूद वह बाघ उसे पकड़ नहीं पा रहा था।
थोड़ी देर बाद गाय ने उस बाघ से पूछा–‘क्या तुम्हारा कोई गुरु या मालिक है ?’
बाघ ने गुर्राते हुए कहा–‘मैं तो जंगल का राजा हूँ। मेरा कोई मालिक नहीं। मैं खुद ही जंगल का मालिक हूँ।’
गाय ने कहा–‘लेकिन तुम्हारी उस शक्ति का यहाँ पर क्या उपयोग है ?’
उस बाघ ने कहा–‘तुम भी तो फंस गई हो और मरने के करीब हो। तुम्हारी भी तो हालत मेरे जैसी है।’ ‘श्रीजी की चरण सेवा’ की सभी धार्मिक, आध्यात्मिक एवं धारावाहिक पोस्टों के लिये हमारे पेज से जुड़े रहें तथा अपने सभी भगवत्प्रेमी मित्रों को भी आमंत्रित करें।
गाय ने मुस्कुराते हुए कहा–‘बिलकुल नहीं। मेरा मालिक जब शाम को घर आएगा और मुझे वहाँ पर नहीं पाएगा तो वह ढूंढ़ते हुए यहाँ जरूर आएगा और मुझे इस कीचड़ से निकाल कर अपने घर ले जाएगा। तुम्हें कौन ले जाएगा ?’
थोड़ी ही देर में सच में ही एक आदमी वहाँ पर आया और गाय को कीचड़ से निकालकर अपने घर ले गया। जाते समय गाय और उसका मालिक दोनों एक दूसरे की तरफ कृतज्ञता पूर्वक देख रहे थे। वे चाहते हुए भी उस बाघ को कीचड़ से नहीं निकाल सकते थे क्योंकि उनकी जान के लिए वह खतरा था।
गाय समर्पित हृदय का प्रतीक है। बाघ अहंकारी मन है और मालिक सद्गुरु का प्रतीक है। कीचड़ यह संसार है। और यह संघर्ष अस्तित्व की लड़ाई है। किसी पर निर्भर नहीं होना अच्छी बात है लेकिन उसकी अति नहीं होनी चाहिए। आपको किसी मित्र, किसी गुरु, किसी सहयोगी की हमेशा ही जरूरत होती है।
० ० ०

"जय जय श्री राधे"
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डा. शवेता रस्तोगी
संस्थापक/राष्ट्रीय अध्यक्ष
भारतीय जनसंघ जनसहयोग मंच

.                             दान का अहंकार          एक बार अर्जुन के मन में यह जिज्ञासा हुई कि दान तो वे भी बहुत करते ह...
17/04/2026

. दान का अहंकार

एक बार अर्जुन के मन में यह जिज्ञासा हुई कि दान तो वे भी बहुत करते हैं, फिर केवल कर्ण को ही ‘दानवीर’ क्यों कहा जाता है। उनकी इस शंका को दूर करने के लिए भगवान श्री कृष्ण ने दो पर्वतों को सोने में बदल दिया और अर्जुन से उसे गाँव वालों में बाँटने को कहा।
अर्जुन अहंकार के साथ सोना बाँटने लगे। उन्होंने दो दिन और दो रात लगातार खुदाई की और लोगों को सोना दिया, लेकिन उनका अहंकार उन्हें थकने पर भी रुकने नहीं दे रहा था। वे खुद को ‘दाता’ और गाँव वालों को ‘याचक’ समझ रहे थे। अन्त में जब अर्जुन थक गए, तो कृष्ण ने कर्ण को बुलाया।
कर्ण ने बिना किसी ताम-झाम के गाँव वालों को बुलाया और सहज भाव से कहा–‘ये दोनों सोने के पर्वत अब उनके हैं, वे इसे आपस में बाँट लें।’
ऐसा कहकर कर्ण वहाँ से चले गए। कृष्ण ने अर्जुन को समझाया कि दान की श्रेष्ठता वस्तु की मात्रा में नहीं, बल्कि देने वाले के भाव में होती है।
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डा. शवेता रस्तोगी
संस्थापक/राष्ट्रीय अध्यक्ष
भारतीय जनसंघ जनसहयोग मंच

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