09/10/2026
लांस नायक भैरों सिंह राठौड़
🔥 लोंगेवाला का वह शेर, जिसके शौर्य ने दुश्मन के हौसले तोड़ दिए!
रेगिस्तान की रणभूमि पर अदम्य साहस, मातृभूमि के प्रति समर्पण और भारतीय सैनिक की वीरता की अमर गाथा
भारतीय जनसंघ जनसहयोग मंच की संस्थापक/राष्ट्रीय अध्यक्ष डा. श्वेता रस्तोगी ने बहुत स्पष्ट और ओजपूर्ण शब्दों में कहा—
भारत की सैन्य परंपरा ऐसे वीरों की गाथाओं से समृद्ध है, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी अपने साहस, धैर्य और कर्तव्यनिष्ठा से राष्ट्र का मस्तक ऊंचा किया। राजस्थान की तपती रेत पर लड़ी गई लोंगेवाला की ऐतिहासिक लड़ाई भी ऐसी ही वीरता का प्रतीक है।
इस युद्ध का नाम आते ही भारतीय सैनिकों के अदम्य साहस की तस्वीर आंखों के सामने उभर आती है। इसी वीरगाथा से जुड़ा एक नाम है—लांस नायक भैरों सिंह राठौड़, जिन्हें देशभर में लोंगेवाला के वीर के रूप में पहचान मिली।
राजस्थान के शेरगढ़ की धरती से निकले इस वीर सैनिक ने सीमा की रक्षा करते हुए जो साहस दिखाया, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है।
⚔️ दिसंबर 1971—जब लोंगेवाला की चौकी बनी रणभूमि
दिसंबर 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध अपने निर्णायक दौर में था। राजस्थान के जैसलमेर क्षेत्र में स्थित लोंगेवाला चौकी सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण थी।
4 और 5 दिसंबर की दरम्यानी रात पाकिस्तानी सेना ने टैंकों और पैदल सैनिकों के साथ भारतीय चौकी की ओर बढ़ना शुरू किया। दूसरी ओर, भारतीय सेना के सीमित संख्या वाले जवान अपने मजबूत हौसले, युद्धकौशल और अदम्य संकल्प के साथ मोर्चे पर डटे हुए थे।
दुश्मन के पास सैन्य संसाधन थे, टैंक थे और संख्या का लाभ भी था। लेकिन भारतीय सैनिकों के पास वह संकल्प था, जिसे किसी हथियार से कम नहीं आंका जा सकता—
“मातृभूमि की रक्षा हर कीमत पर करनी है!”
लोंगेवाला की लड़ाई में भारतीय सैनिकों ने रातभर मोर्चा संभाला। बाद में भारतीय वायुसेना के हवाई हमलों ने पाकिस्तानी सेना के टैंकों और वाहनों को भारी नुकसान पहुंचाया। इस संयुक्त सैन्य कार्रवाई ने युद्ध की दिशा बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
🪖 लांस नायक भैरों सिंह—साहस जिसकी पहचान बन गया लोंगेवाला
लोंगेवाला की वीरगाथा में भैरों सिंह राठौड़ का नाम विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है। वे सीमा सुरक्षा बल (BSF) से जुड़े थे और 1971 के युद्ध में उन्होंने अपनी बहादुरी का परिचय दिया।
युद्धभूमि में जब गोलियां बरस रही हों, चारों ओर विस्फोटों की आवाज गूंज रही हो और हर कदम पर खतरा मंडरा रहा हो, तब अपने मोर्चे पर डटे रहना असाधारण साहस मांगता है।
भैरों सिंह की वीरता की कहानियां भारतीय सैनिक के इसी अदम्य मनोबल को दर्शाती हैं। उनके शौर्य ने उन्हें देशवासियों के बीच एक लोकप्रिय पहचान दिलाई।
उनके नाम के साथ जुड़ा “हीरो ऑफ लोंगेवाला” का संबोधन केवल एक उपाधि नहीं, बल्कि उस सम्मान का प्रतीक है जो देश अपने बहादुर सैनिकों को देता है।
🔥 रेगिस्तान की रेत पर लिखी गई वीरता
राजस्थान का रेगिस्तान जितना कठोर है, वहां युद्ध करना उतना ही चुनौतीपूर्ण होता है। दूर-दूर तक फैली रेत, सीमित आड़, रात का अंधकार और दुश्मन की भारी सैन्य शक्ति—इन परिस्थितियों में मोर्चा संभालना सैनिकों की शारीरिक क्षमता के साथ-साथ उनके मानसिक साहस की भी परीक्षा लेता है।
लोंगेवाला के भारतीय जवानों ने अपनी सूझबूझ, अनुशासन और रणनीतिक दृढ़ता से इस चुनौती का सामना किया।
भैरों सिंह राठौड़ की वीरगाथा इसी सामूहिक पराक्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
यह याद रखना भी जरूरी है कि लोंगेवाला की विजय किसी एक व्यक्ति की उपलब्धि नहीं थी। यह भारतीय सेना के जवानों, उनके नेतृत्व और भारतीय वायुसेना के प्रभावी सहयोग से संभव हुई ऐतिहासिक सफलता थी।
🎖️ सेना मेडल से सम्मानित वीर
भैरों सिंह राठौड़ की बहादुरी और युद्ध में उनके योगदान के लिए उन्हें सेना मेडल से सम्मानित किया गया। उनकी सैन्य सेवा और वीरता ने उन्हें देशभर में सम्मान दिलाया।
उनका जीवन यह संदेश देता है कि सैनिक का सबसे बड़ा परिचय उसका पद या प्रसिद्धि नहीं, बल्कि वह कर्तव्य है जिसे वह कठिनतम परिस्थितियों में भी निभाता है।
सीमा पर तैनात सैनिक को अक्सर यह भी नहीं पता होता कि उसके साहस की कहानी कितने लोगों तक पहुंचेगी। वह केवल अपने दायित्व को जानता है—देश की रक्षा।
यही सैनिक धर्म है। यही राष्ट्रसेवा है।
🎬 फिल्म ‘बॉर्डर’ और लोंगेवाला की अमर स्मृति
लोंगेवाला की लड़ाई को जनमानस तक पहुंचाने में हिंदी फिल्म ‘बॉर्डर’ की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। इस फिल्म ने 1971 के युद्ध और भारतीय सैनिकों के साहस को लोकप्रिय संस्कृति में विशेष स्थान दिलाया।
फिल्म में अभिनेता सुनील शेट्टी ने भैरों सिंह से प्रेरित चरित्र निभाया था। हालांकि फिल्म के कुछ दृश्य और घटनाक्रम सिनेमाई प्रस्तुति का हिस्सा हैं; वास्तविक इतिहास को समझने के लिए सैन्य अभिलेखों और प्रमाणित विवरणों का सहारा लेना आवश्यक है।
फिर भी इस फिल्म ने देश की अनेक पीढ़ियों में सैनिकों के प्रति सम्मान और देशभक्ति की भावना को मजबूत किया।
🇮🇳 भैरों सिंह राठौड़ की वीरगाथा हमें क्या सिखाती है?
उनका जीवन हमें कई महत्वपूर्ण संदेश देता है—
पहला—साहस परिस्थितियों का मोहताज नहीं होता। कठिनाई कितनी भी बड़ी हो, दृढ़ संकल्प व्यक्ति को आगे बढ़ने की शक्ति देता है।
दूसरा—कर्तव्य सर्वोपरि है। राष्ट्रसेवा केवल शब्दों से नहीं, जिम्मेदारी निभाने से सिद्ध होती है।
तीसरा—सफलता सामूहिक प्रयास से मिलती है। लोंगेवाला की विजय भारतीय सेना और वायुसेना के समन्वय, अनुशासन और साहस का परिणाम थी।
चौथा—वीरों का सम्मान हमारी जिम्मेदारी है। देश की रक्षा करने वाले सैनिकों की गाथाओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना राष्ट्रीय कर्तव्य है।
🔱 डा. श्वेता रस्तोगी का संदेश
“लांस नायक भैरों सिंह राठौड़ जैसे वीर हमारे राष्ट्र की अमूल्य धरोहर हैं। उनकी वीरता हमें याद दिलाती है कि देश की सुरक्षा केवल सीमाओं पर तैनात सैनिकों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हर नागरिक के मन में राष्ट्र के प्रति सम्मान, कर्तव्य और समर्पण की भावना भी आवश्यक है।
लोंगेवाला की लड़ाई भारतीय सैन्य इतिहास का गौरवशाली अध्याय है। हमें उन सभी जवानों को नमन करना चाहिए, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व समर्पित किया।
राष्ट्र अपने वीरों को कभी नहीं भूलता, क्योंकि उनकी वीरता ही आने वाली पीढ़ियों के साहस की नींव बनती है।”
💐 वीर सपूत को शत-शत नमन!
लांस नायक भैरों सिंह राठौड़—लोंगेवाला के वीर, राजस्थान की धरती के गौरव और भारतीय सैनिक के अदम्य साहस के प्रतीक।
उनकी वीरगाथा सदैव देशवासियों को प्रेरित करती रहेगी। उनके साथ 1971 के युद्ध में लड़ने वाले सभी वीर सैनिकों को भी हमारा कोटि-कोटि नमन।
✍️ डा. श्वेता रस्तोगी
संस्थापक/राष्ट्रीय अध्यक्ष
भारतीय जनसंघ जनसहयोग मंच
चेयरपर्सन
शवेता दर्पण समाचार पत्र
🇮🇳 “सीमा पर खड़ा सैनिक केवल देश की रक्षा नहीं करता—वह पूरे राष्ट्र के विश्वास की रक्षा करता है।”
जय हिंद! भारतीय सेना अमर रहे!