08/04/2026
बीजेपी सालों से छाती ठोक-ठोक कर कहती रही कि हम परिवारवाद के खिलाफ हैं।
फेसबुक पे फॉलोअर्स बनाने के लिए सम्राट ने २ करोड़ रुपया खर्च किया गया जिसका सीबीआई द्वारा जांच करना चाहिए ।
तेजस्वी यादव को दिन-रात वंशवाद की पैदाइश बताया गया…
उनकी पढ़ाई का मज़ाक उड़ाया गया… 9वीं फेल कहकर पूरे बिहार में नैरेटिव सेट किया गया कि ये लड़का मुख्यमंत्री बनने लायक नहीं है।
लेकिन अब ज़रा आईना घुमा कर देखिए…
वही बीजेपी आज बिहार में जिस चेहरे को मुख्यमंत्री बनाने जा रही है, वो ऐसा नेता है जो किसी विचारधारा की पैदाइश नहीं, बल्कि राजनीति के शॉर्टकट का प्रोडक्ट है।
आरजेडी से निकले, जेडीयू में घूमे, फिर हम और आखिर में बीजेपी में फिट हो गए ... जैसे सत्ता जहां दिखी, वहीं टिक गए।
तेजस्वी पर जितना आरोप बीजेपी लगाती है वह सारा सम्राट पर फिट बैठता है। सम्राट चौधरी भी सकूनी चौधरी का राजनीतिक विरासत बढ़ा रहे हैं। यानि यह कैसे परिवारवाद का आरोप लगाएंगेय़
और कहानी यहीं खत्म नहीं होती…
'मुरैठा सम्राट' का असली कहानी अब शुरु करते हैं। अगर आप उम्र और राजनीति के तालमेल को समझना चाहते हैं, तो सम्राट जी से बेहतर उदाहरण शायद ही कोई मिले।
आइए, आज बात करते हैं उस दौर की जब सम्राट चौधरी RJD के 'राजकुमार' हुआ करते थे और कैसे उनके उम्र के 'चमत्कार' ने उस समय की सरकार को हिला दिया था।
दुनिया में लोग एक बार पैदा होते हैं, लेकिन हमारे सम्राट साहब के मामले में मामला थोड़ा 'स्पेशल' है। इन्हें मीडिया में 'थ्राइस-बॉर्न' (तीन बार जन्म लेने वाला) तक कह दिया गया। क्यों? क्योंकि कागजों पर इनकी उम्र मौसम की तरह बदलती रही।
किस्सा ये है कि 1995 में एक मर्डर केस (तारापुर हत्याकांड) में नाम आने के बाद इन्होंने कोर्ट में गुहार लगाई कि हुजूर, मैं तो अभी बच्चा हूं, सिर्फ 15 साल का 'नाबालिग' हूं। लेकिन चार साल ही बीते थे कि 1999 में जब राबड़ी देवी की सरकार में मंत्री बनने की बारी आई, तो अचानक सम्राट जी की उम्र में ऐसा 'बूस्ट' आया कि वो सीधे 25 पार कर गए। वैसे, 2020 के चुनावी हलफनामे को देखें तो वो 1995 में 26 साल के होने चाहिए थे, पर उस वक्त वो 'बाल कलाकार' बनकर जेल से बाहर आ गए थे।
जब आरजेडी सरकार ने इन्हें बागवानी मंत्री बनाया, तब बीजेपी और समता पार्टी (जो आज इनकी अपनी टीम है) ने शोर मचा दिया कि 'ये बच्चा अभी मंत्री बनने लायक नहीं है'। मामला राज्यपाल तक पहुंचा, जिन्होंने जांच बिठाई और पाया कि कागजों में झोल है।
अपनी 'मदद' के लिए सम्राट जी ने एक गजब का तरीका निकाला। उन्होंने प्रेस के सामने 31वां जन्मदिन मनाया और केक पर 27 मोमबत्तियां लगाकर ये साबित करने की कोशिश की कि देखो, मैं बड़ा हो गया हूं! तंज ये है कि जिस उम्र को लेकर आज प्रशांत किशोर उन्हें घेर रहे हैं, उसी उम्र के 'हेरफेर' के लिए कभी बीजेपी ने उन्हें बर्खास्त करवाया था।
सम्राट चौधरी आज जिस नीतीश कुमार के साथ सरकार चला रहे हैं, कभी उन्हीं को हटाने के लिए उन्होंने 'मुरैठा' (पगड़ी) बांधकर कसम खाई थी। लोग तंज कसते हैं कि बिहार की राजनीति में कसमें भी उतनी ही कच्ची होती हैं जितनी पुरानी फाइलों में दर्ज जन्मतिथियां।
कल तक जो लालू यादव के 'खास' थे और उनके 'सामाजिक न्याय' की ढाल थे, आज वही लालू जी को 'बिहार का गब्बर' और 'भ्रष्टाचार का प्रतीक' बताते नहीं थकते। दलबदल के इस खेल में उन्होंने आरजेडी से जेडीयू और फिर बीजेपी तक का सफर ऐसे तय किया, जैसे कोई शॉर्टकट रास्ता हो।
कुल मिलाकर, सम्राट चौधरी बिहार की राजनीति के वो खिलाड़ी हैं जिन्होंने ये साबित कर दिया कि अगर आपके पास सही 'कागज' (या कई सारे कागज) हों, तो आप नाबालिग से सीधे मंत्री और मंत्री से सीधे उपमुख्यमंत्री... यहां से मुख्यमंत्री बन सकते हैं।
हां इनकी पढ़ाई की डिग्री भी जादूगर वाला है। बिना पढ़े लिखे मिला है। यह कहानी भी बता चुका हूं।
नाम बदला, जन्मदिन कई बार बदला, पार्टी बदलने में माहिर... पढ़ाई का अता पता नहीं ... परिवारवाद का प्रोडक्ट सब गुण है भावी मुख्यमंत्री जी में।
आज वो भले ही लालू यादव - आरजेडी पर हमला बोलते - बोलते वह सीएम की कुर्सी पर बैठ जाए , लेकिन उनकी अपनी राजनीतिक नर्सरी आरजेडी की ही थी। मुझे तो बीजेपी के उन कार्यकर्ताओं ... आरएसएस के सदस्यों पर तरस आ रहा है जिसने पार्टी के लिए कितना खून पसीना बहाया और आज उनको मिला क्या ? बीजेपी और पार्टियों में अंतर क्या रह गया?
सम्राट 7 वी फेल और बिहार को शर्मसार कर रहा है ।