28/05/2026
मोहन भागवत से मिलने के लिए नागपुर में लोगों की लंबी कतार लगी थी।
हर कोई अपनी बात कहने को आतुर था, कोई सुझाव लेकर आया था तो कोई अपनी भावनाएँ साझा करने।
उसी भीड़ के एक कोने में एक बुजुर्ग स्वयंसेवक शांत खड़े थे।
चेहरे पर उम्र की थकान थी, लेकिन आँखों में संघ के वर्षों पुराने संस्कार अब भी चमक रहे थे।
जब उनकी बारी आई तो उन्होंने कोई लंबा भाषण नहीं दिया।
बस धीमी आवाज़ में इतना बोले—
“अब शरीर जवाब देने लगा है… शाखा तक जा नहीं पाता… यही कसक भीतर रहती है।”
उन शब्दों में शिकायत कम थी, पीड़ा ज्यादा थी।
मानो जीवन का सबसे प्रिय हिस्सा उनसे धीरे-धीरे दूर हो रहा हो।
यह सुनकर Mohan Bhagwat कुछ पल बिल्कुल शांत हो गए।
फिर अचानक अपनी सीट से उठे और सीधे उस वृद्ध स्वयंसेवक के पास पहुँच गए।
उन्होंने बड़े अपनत्व से उनका हाथ थामा और मुस्कराकर कहा—
“शाखा केवल मैदान में लगने वाली उपस्थिति का नाम नहीं है।
जिसने अपना जीवन संस्कार देने में लगा दिया, उसकी हर सांस स्वयं एक शाखा बन जाती है।”
फिर आगे बोले—
“आज अगर हजारों स्वयंसेवक राष्ट्रभाव से खड़े हैं, तो उसमें आपका भी उतना ही योगदान है।
आप मैदान तक नहीं पहुँच पा रहे, लेकिन आपके दिए संस्कार आज भी हजारों कदमों में चल रहे हैं।”
बस इतना सुनना था कि उस वृद्ध स्वयंसेवक की आँखें छलक उठीं।
वहाँ खड़े कई कार्यकर्ता भी भावुक हो गए।
क्योंकि उस पल उन्होंने भाषण नहीं, संगठन की आत्मा देखी थी।
असल नेतृत्व वही होता है जो मंच की ऊँचाई से नहीं, कार्यकर्ता के त्याग की गहराई से पहचाना जाए।
जो वर्षों तक चुपचाप काम करने वाले व्यक्ति को भी उतना ही सम्मान दे, जितना बड़े पदों पर बैठे लोगों को मिलता है।
किसी भी संगठन की असली ताकत उसके भवन, बैनर या नारों में नहीं होती।
वह उन अनगिनत लोगों के समर्पण में बसती है, जो बिना नाम और पहचान के पूरी निष्ठा से अपना जीवन लगा देते हैं।