19/09/2025
✨ शापित हवेली – Part 3
पूजा भागते-भागते एक बड़े हॉल में पहुँच गई। हॉल के बीचोंबीच एक टूटा हुआ झूमर लटका था और ज़मीन पर बिखरी काँच की बोतलें चमक रही थीं। अचानक उसकी नज़र सामने लगी एक विशाल तस्वीर पर पड़ी। तस्वीर में वही औरत थी—लाल साड़ी वाली। लेकिन तस्वीर के नीचे लिखा नाम उसे चौंका गया—
“राधिका देवी चौहान, हवेली की आख़िरी मालकिन (1901–1930)”
पूजा ने तस्वीर को गौर से देखा। उसके माथे पर हल्की चोट का निशान था, जैसे किसी ने हिंसक तरीक़े से उसकी जान ली हो। तभी उसे लगा तस्वीर की आँखें हिल रही हैं… और अगले ही पल तस्वीर से खून की बूंदें टपकने लगीं।
पूजा चीखते हुए पीछे हटी, लेकिन उसके पीछे दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया। हॉल की हवा भारी हो गई और अचानक उसी औरत की आवाज़ गूँजी—
“क्यों आई हो यहाँ? क्या तुम्हें मौत से दोस्ती करनी है?”
पूजा काँपते हुए बोली,
“मैं… मैं सच्चाई जानना चाहती हूँ। क्या हुआ था इस हवेली में?”
आवाज़ गूंजते हुए और भी भारी हो गई—
“मेरे पति ने मुझे धोखा दिया… इस हवेली की दीवारों के भीतर ही मेरी जान ली गई। मेरी आत्मा तब से यहाँ भटक रही है। और तब तक चैन नहीं लेगी जब तक कोई मेरी पीड़ा को महसूस न कर ले।”
इतना कहकर अचानक झूमर हिला और कमरे की हर चीज़ गिरने लगी। पूजा ने अपनी टॉर्च से कोने में देखा तो वहाँ और भी परछाइयाँ खड़ी थीं। औरतों, बच्चों, बूढ़ों की आत्माएँ… सब चुपचाप उसे देख रहे थे।
पूजा ने धीरे-धीरे समझा—ये हवेली सिर्फ़ एक आत्मा की नहीं, बल्कि सैकड़ों आत्माओं की क़ैदगाह है।
उसका दिल ज़ोर से धड़कने लगा। उसने अपनी डायरी में जल्दी से नोट किया—
"ये हवेली शापित नहीं, बल्कि अन्याय का स्मारक है। यहाँ हर आत्मा इंसाफ़ की तलाश में है।"
लेकिन तभी अचानक राधिका की आत्मा उसके सामने आकर बोली—
“अब जब तुमने सच जान लिया है, तुम्हें भी यहीं रहना होगा। कोई भी बाहर नहीं जाता…”
पूजा ने पूरी ताक़त लगाकर दरवाज़ा खोला और बाहर भागने की कोशिश की। लेकिन दरवाज़े के पार फिर वही हॉल था… वही तस्वीर… वही झूमर। हवेली उसे चक्रव्यूह में फँसा चुकी थी।
👉 क्या पूजा इस हवेली के चक्रव्यूह से निकल पाएगी? या अब उसकी आत्मा भी यहीं कैद हो जाएगी?
✨ आगे जानने के लिए जुड़े रहिए – “शापित हवेली – Part 4” में…
“कभी-कभी सच जानना, जीने से भी ज़्यादा खतरनाक होता है।”