30/04/2026
मैं उससे मिलने सपनों और शर्तों के साथ गई थी, लेकिन जब वह फटे कपड़ों में मेरे सामने बैठा और बोला, “अगर मेरे पास कुछ न हो तो क्या तुम फिर भी मुझे चुनोगी?”, मेरी दुनिया वहीं बदल गई।
मुंबई की सर्दियों वाली रातें दिल्ली जैसी चुभती नहीं, लेकिन समुद्र से उठती नमकीन हवा में एक ऐसी नमी होती है जो महँगे से महँगे कपड़ों के भीतर तक उतर जाती है। बांद्रा वेस्ट की ऊँची इमारतों, जगमगाती सड़कों और देर रात तक खुले रहने वाले रूफटॉप कैफ़े की दुनिया में उस रात भी सब कुछ चमकदार, व्यवस्थित और सफल दिख रहा था। नीचे सड़क पर गाड़ियाँ चमकती लकीरों की तरह भाग रही थीं, ऊपर आसमान में बादल शहर की रोशनी से फीके गुलाबी पड़ गए थे, और “सुनहरी छत” नाम के कैफ़े की छत पर हल्की पीली लाइटों के नीचे हँसी, संगीत और ग्लासों की टकराहट से एक ऐसी दुनिया बन रही थी जहाँ मानो दुख को प्रवेश की अनुमति न हो।
उसी छत के एक कोने में बैठी थी काव्या मेहरा।
उम्र सिर्फ उनतीस साल। पेशे से कॉरपोरेट वकील। दक्षिण मुंबई की एक नामी लॉ फर्म में पार्टनर बनने की दौड़ में सबसे आगे। उसके बाल बेहद सलीके से पीछे बंधे थे, मरून रंग की ड्रेस उस पर ऐसे बैठ रही थी जैसे किसी पत्रिका के फोटोशूट से निकली हो, और उसकी कलाई पर बँधी घड़ी किसी इशारे की तरह बार-बार उसे समय का अहसास करा रही थी। उसने पाँचवीं बार स्क्रीन देखी। फिर छठी बार। फिर उसने अपने होंठ भींच लिए।
“फिर लेट,” उसने बुदबुदाकर कहा।
उसकी दोस्त मीरा ने उससे कई बार कहा था कि डेटिंग ऐप्स पर “परफेक्ट” दिखने वाले लोग अक्सर सबसे बड़े भ्रम होते हैं, लेकिन आर्यन कपूर अलग लगा था। प्रोफ़ाइल में वह एक सफल उद्यमी था—टेक कंपनी का संस्थापक, विदेशों में काम कर चुका, किताबें पढ़ने वाला, यात्राओं का शौक़ीन, शालीन, गहरा, और उसकी बातों में एक तरह की समझ थी जो काव्या को बरसों बाद किसी पुरुष में मिली थी। पिछले तीन हफ़्तों से वे रात-रात भर चैट करते रहे थे। उसने उसे हँसाया था, उससे बहस की थी, उससे कविता की बातें की थीं, उसकी थकान पहचानी थी। काव्या के लिए यह दुर्लभ था।
वह स्थिरता चाहती थी।
कोई ऐसा आदमी जो उसके संघर्ष को समझ सके। जो उसके बराबर खड़ा हो सके। जो उसकी दुनिया में फिट हो सके।
तभी उसके सामने रोशनी पर एक परछाईं पड़ी।
काव्या ने सिर उठाया—और उसका दिल एक झटके से धड़का, लेकिन वैसा नहीं जैसा किसी इंतज़ार किए हुए पुरुष को देखकर धड़कता है। यह धड़कन खतरे की थी।
उसके सामने कोई सलीकेदार, महँगी शर्ट पहने, आत्मविश्वास से भरा बिज़नेसमैन नहीं खड़ा था।
वहाँ एक आदमी खड़ा था जिसकी दाढ़ी महीनों से बढ़ी हुई लगती थी। बाल बिखरे थे। उसने एक पुरानी, गंदी जैकेट पहन रखी थी जिसके कोनों पर धागे लटक रहे थे। जीन्स जगह-जगह से घिसी हुई थी, बूट फटे हुए थे, और उसके साथ एक ऐसी गंध चली आई थी जिसमें बारिश खाई हुई दीवारों, पुराने कपड़ों, धूल और उपेक्षा का मिला-जुला दर्द था।
आदमी ने धीमे से कहा, “माफ़ कीजिए… क्या मैं यहाँ बैठ सकता हूँ? हीटर के पास थोड़ी गर्मी है।”
काव्या का चेहरा सख़्त हो गया। उसका पहला रिफ़्लेक्स था अपना बैग अपनी ओर खींच लेना। उसने आँखों के कोनों से इधर-उधर देखा, शायद कोई वेटर आ जाए, शायद कोई उसे इस असुविधा से बचा ले।
“मैं किसी का इंतज़ार कर रही हूँ,” उसने ठंडे स्वर में कहा। “आप किसी और टेबल पर बैठिए।”
आदमी वहीं खड़ा रहा। उसके होंठों पर एक ऐसी थकी हुई मुस्कान आई जो दया नहीं माँगती थी, बस सब कुछ समझती हुई लगती थी।
“मुझे पता है,” उसने नरमी से कहा। “तुम आर्यन कपूर का इंतज़ार कर रही हो।”
काव्या का हाथ फोन पर थम गया।
उसने ऊपर देखा। उसकी आँखें सिकुड़ गईं।
“आपको यह नाम कैसे पता?”
आदमी ने सामने वाली कुर्सी खींची और बैठ गया। आसपास की दो-तीन मेज़ों पर बैठे लोगों ने नाक-भौं सिकोड़ी। एक लड़की ने अपने दोस्त के कान में कुछ कहा और दोनों हल्के से हँस दिए। लेकिन वह आदमी मानो कुछ सुन ही नहीं रहा था।
उसने काव्या की आँखों में देखते हुए कहा, “क्योंकि मैं ही आर्यन हूँ।”
एक पल के लिए काव्या को लगा उसने गलत सुना है। फिर उसके भीतर से एक नर्वस हँसी निकली।
“बहुत घटिया मज़ाक है।”
“मज़ाक नहीं है।”
“नहीं,” काव्या ने तेज़ी से कहा, “आर्यन कपूर एक कंपनी चलाता है। उसकी तस्वीरें, उसकी प्रोफ़ाइल, उसकी बातें—सब…”
“सब सच थीं,” आदमी ने उसकी बात पूरी की, “लेकिन तीन महीने पुरानी।”
काव्या चुप रह गई।
उसी समय उसका फोन कंपन करने लगा। डेटिंग ऐप पर नया संदेश आया था। उसने स्क्रीन खोली।
“मैं तुम्हारे सामने बैठा हूँ। घबराओ मत। मुझे बस यह देखना था कि अगर तुम्हें लगे कि मैंने सब कुछ खो दिया है, तो क्या तुम फिर भी मुझसे बात करोगी।”