14/10/2025
दुसरो को बचा रहा था राजनीतिक नदियारे में ।
ये मल्लाह डूब गया है राजनीतिक गलियारे में ।।
- सुनील कश्यप
पहली बात, जितनी भी ओबीसी जातियां दलित होने का आंदोलन चला रही हैं, वे पूरी तरह गलत दिशा में हैं। जब राजनीति का पेंडुलम ओबीसी की तरफ झुक चुका है और उनकी आबादी 50 प्रतिशत से अधिक की निर्णायक ताकत बन चुकी है, तब दलित होने का आंदोलन करना आत्मघाती कदम है।
बिहार में अगर कोई अतिपिछड़ा वर्ग की जाति दलित बनने की मांग उठाए, तो उससे बड़ा राजनीतिक मूर्ख शायद इस धरती पर कोई नहीं है। यह वही राज्य है जहाँ पिछड़ा और अतिपिछड़ा दो अलग सामाजिक-राजनीतिक वर्ग हैं।
जो भी लोग इस तरह का आंदोलन चला रहे हैं, वे दरअसल अपनी ही जाति का मानसिक दोहन कर रहे हैं। वे अपने समाज की ऊर्जा खत्म कर रहे हैं और उसे दो दशक पीछे धकेलने की साजिश कर रहे हैं।
मुकेश साहनी इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। अपने समाज को बरगलाकर दलित होने की लड़ाई लड़ी, और अंत में खुद राजनीतिक दलदल में फँस गए। अब उसी राह पर आई.पी. गुप्ता जैसे नेता चल पड़े हैं।
इन सबकी समस्या यह है कि ये न बड़ा सोच पाते हैं, न बड़ा कर पाते हैं। इनका लक्ष्य सिर्फ अपनी जाति का नेता बनना, एक मंत्री या विधायक पद पाकर खुश हो जाना, और बाकी टिकट बेचकर मुनाफा कमाना रह गया है। न दृष्टि है, न दिशा। परिणामतः इनका समाज वहीं खड़ा है जहाँ था।
यूपी में यदि यही हाल संजय निषाद, ओम प्रकाश राजभर का हो जाए तो चकित मत होईयगा।
महागठबंधन ने मुकेश साहनी के साथ जो किया, वह एक तरह से राजनीतिक न्याय ही था, अब यर न घर के रहे, न घाट के!
पहला मल्लाह था जो सबको बचाने निकला था, लेकिन आखिर में खुद ही लहरों में डूब गया।