11/06/2026
क्या हमारी खेती ज़हर के सहारे चल रही है?
हरित क्रांति के बाद भारत ने खाद्यान्न उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि देखी। जिन खेतों में कभी अकाल का डर था, वहां रिकॉर्ड पैदावार होने लगी। इस बदलाव के पीछे बेहतर बीज, सिंचाई और एग्रोकेमिकल्स की बड़ी भूमिका रही। लेकिन अब, आधी सदी बाद, एक नया सवाल उठ रहा है—क्या उत्पादन बढ़ाने की इस दौड़ में हम अपनी मिट्टी, स्वास्थ्य और किसान की जेब पर भारी कीमत चुका रहे हैं?
आज खेतों में कीटनाशक, खरपतवारनाशी और रासायनिक उर्वरकों का बड़े पैमाने पर उपयोग होता है। इन रसायनों ने फसलों को कीटों और रोगों से बचाया, लेकिन इनके दुष्प्रभावों को लेकर चिंताएं भी बढ़ी हैं। कई वैज्ञानिक अध्ययनों में मिट्टी की उर्वरता में कमी, भूजल प्रदूषण और जैव विविधता पर असर की बात सामने आई है। मधुमक्खियों जैसे परागण करने वाले जीवों की संख्या में गिरावट को भी कुछ विशेषज्ञ रासायनिक खेती से जोड़ते हैं।
हाल के दिनों में ग्लाइफोसेट जैसे खरपतवारनाशी पर बहस तेज हुई है। कुछ अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने इसके संभावित स्वास्थ्य जोखिमों की ओर इशारा किया है, जबकि कई नियामक एजेंसियां निर्धारित मानकों के भीतर इसके उपयोग को सुरक्षित मानती हैं। यही वजह है कि दुनिया भर में इस पर मतभेद हैं। कुछ देशों ने इसके उपयोग पर प्रतिबंध या सख्त नियंत्रण लगाए हैं, जबकि कई देशों में यह अभी भी इस्तेमाल हो रहा है।
सबसे बड़ी चिंता किसान की अर्थव्यवस्था को लेकर भी है। खेती में रसायनों की बढ़ती लागत ने उत्पादन खर्च बढ़ाया है। कई किसानों का कहना है कि पहले जहां कम दवा में काम चल जाता था, अब कीटों में प्रतिरोधक क्षमता बढ़ने के कारण अधिक मात्रा और नई दवाओं की जरूरत पड़ती है। इससे लागत बढ़ती है और मुनाफा घटता है।
हालांकि, यह भी सच है कि केवल रासायनिक खेती को दोष देकर समस्या का समाधान नहीं निकाला जा सकता। भारत जैसी विशाल आबादी वाले देश में खाद्यान्न सुरक्षा भी एक बड़ी चुनौती है। विशेषज्ञों का मानना है कि समाधान रसायनों को पूरी तरह छोड़ने में नहीं, बल्कि उनके विवेकपूर्ण उपयोग में है। इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट (IPM), जैविक विकल्पों, प्राकृतिक खेती और वैज्ञानिक सलाह के अनुसार सीमित रासायनिक उपयोग जैसे रास्ते अपनाए जा सकते हैं।
आज जरूरत इस बात की है कि खेती को “रसायन बनाम जैविक” की बहस से आगे बढ़ाकर “सतत और सुरक्षित खेती” की दिशा में ले जाया जाए। आखिरकार सवाल केवल अधिक उत्पादन का नहीं, बल्कि ऐसी खेती का है जो मिट्टी को भी बचाए, किसान को भी मजबूत बनाए और उपभोक्ता की थाली तक सुरक्षित भोजन पहुंचाए।
क्योंकि यदि खेत स्वस्थ रहेंगे, तभी किसान और देश दोनों स्वस्थ रहेंगे।