30/12/2025
शेखावाटी का जाट समाज खुद को कितना भी शेर समझ ले, सच्चाई यह है कि आज पूरी तरह कर्ज में गर्दन तक डूब चुका है। जमीन बैंक की, मकान बैंक का, गाड़ी बैंक की, मोबाइल तक किस्तों पर और फिर भी सीना तानकर घूम रहे है कि हम तो जाट हैं।
बच्चों की फीस बाकी, लेकिन फोर व्हीलर दरवाजे पर खड़ी चाहिए। चाहे जमीन बिक जाए, चाहे लुगाई के गहने गिरवी चले जाएं, चाहे पूरा घर बंधक हो जाए, लेकिन शान दिखनी चाहिए।
यही सोच पहले एक दो समाज को ले डूबी थी, आज जाट समाज उसी रास्ते पर आंख बंद करके दौड़ रहा है।
दस साल पहले मेरे गांव के बीस लड़के रोज सुबह दौड़ लगाते थे, बीएसएफ आर्मी की तैयारी करते थे। आज बीस से पच्चीस साल के लड़के दिखते हैं लेकिन एक भी दौड़ता हुआ नहीं दिखता। अब तैयारी वर्दी की नहीं, किस्तों के जुगाड़ की होती है।
EMI पर गाड़ी, EMI पर मोबाइल,EMI पर मकान और फिर बोलते हैं सिस्टम खराब है। सिस्टम खराब नहीं है, सोच सड़ चुकी है।
जाट समाज के लड़कों के दिमाग में पढ़ाई नहीं, दबंगई भरी है। कोचिंग खोल लेंगे लेकिन खुद कोचिंग नहीं जाएंगे। लाइब्रेरी खुलवा देंगे लेकिन किताब नहीं खोलेंगे। फाइनेंस की वसूली में आगे रहेंगे क्योंकि बदनामी का टैग लग चुका है कि जाट लड़का दबाव बना लेगा, झगड़ा कर लेगा, मारपीट कर लेगा
शराब ,अमल व केई प्रकार के नशे में आगे चल यही उपलब्धि रह गई है क्या?
जमीन जो कभी जाट समाज की पहचान थी, आज शान और शौकत में निपटा दी। खेत बेचकर गाड़ी ली, खेत बेचकर शादी की, खेत बेचकर भात भरा। किसने सबसे बड़ा मृत्यु भोज किया, किसने सबसे महंगा भात भरा, किसने शादी में सबसे ज्यादा खर्च किया।।
किस ने सबसे बड़ी कोठी बनाई । यही मुकाबला चल रहा है।
चाहे कर्ज लेना पड़े, चाहे घर तबाह हो जाए, लेकिन समाज में नाम होना चाहिए। नाम नहीं, नालायकी है ये।
मंदिरों व गोशाला में सबसे ज्यादा चढ़ावा जाट समाज देता है, चाहे उधार का पैसा हो। आस्था बुरी नहीं है, लेकिन कर्ज लेकर आस्था दिखाना सीधी मूर्खता है।
घर के अंदर भाई भाई का दुश्मन है।
एक भाई के पास धन है दुसरे भाई की बिल्कुल भी हेल्प कर के अपने बराबर नहीं लाता है लुगाई की पिवर में लाखों देगा लेकिन अपने मां बाप भाई बहन की हेल्प नहीं करेगा जमीन की मेड़ काट रहे हैं, पानी के लिए लड़ रहे हैं। और बाहर मंचों पर बोलते हैं कि जाट एकता सबसे मजबूत है। कैसी एकता, जो घर की देहरी तक टूट जाती है। औरतें आपस में लड़ रही हैं, बहुएं बहुएं की जड़ काट रही हैं, और फिर समाज के पतन पर रोना रोया जाता है।
नशा, दारू, अफीम, गांजा, बाल विवाह, मृत्यु भोज इन सब में जाट समाज सबसे आगे है। मेहनत, पढ़ाई, संयम और दूरदर्शिता में पीछे। गर्व डीएनए पर है लेकिन दिमाग छुट्टी पर गया हुआ है। दबदबा वक्त का होता है, किस्तों पर लाई गाड़ी का नहीं। दबदबा मेहनत से आता है, कर्ज से नहीं।
ये किसी एक जाट की कहानी नहीं है, पूरे समाज की बीमारी है। जाति पर गर्व करना गलत नहीं है, लेकिन सोच पर ताला लगा देना आत्महत्या है।
अगर यही हाल रहा तो आने वाली पीढ़ी को जमीन नहीं, सिर्फ लोन की फाइलें विरासत में मिलेंगी।
अब भी वक्त है। शान छोड़ो, मेहनत पकड़ो। दिखावा छोड़ो, पढ़ाई पकड़ो। कर्ज छोड़ो, कौशल पकड़ो। जाति पर गर्व रखो, लेकिन दिमाग साथ में लेकर चलो। वरना याद रखना, समाज खत्म बाहर से नहीं होता, अंदर की मूर्खता से होता है।
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लेखक ने लिखा मैं पढ़ा तो विचार करके आप लोगों के लिए भेज दिया । अपन सब को इस पर विचार करना चाहिए या नही ।।🙏🙏🫵