Mahanth Maniyari

Mahanth Maniyari Mahanth Maniyari is famous for his legacy.

02/04/2026

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मुज़फ़्फ़रपुर के अमूल्य धरोहर भाग 08 (आठ )अंग्रेजों के समय के विद्यालय का स्तरोन्नयन !लोअर प्राइमरी विद्यालय मनियारी (बालक)...
08/06/2021

मुज़फ़्फ़रपुर के अमूल्य धरोहर भाग 08 (आठ )

अंग्रेजों के समय के विद्यालय का स्तरोन्नयन !

लोअर प्राइमरी विद्यालय मनियारी (बालक)

भारतीय क्षितिज पर सन् 1890 में भारत में अंग्रेजो का शासन था। भारतः दुर्भाग्य के अन्धकार में भटक रहा था। चारों ओर से अंग्रेज शासक जमघट लगाए हुए था। सभी ओर अविधा का अन्धकार फैला हुआ था महंथ मनियारी के चारों ओर दूर-दूर तक विद्यालय नहीं था। इस क्षेत्र के जनता में शिक्षा का घोर अभाव था। उसी समय मनियारी मठ के नौवा महंथ श्री गणेश दास जी ने सबसे पहले महंथ मनियारी में 2 मार्च 1890 को लोअर प्राइमरी स्कूल का स्थापना किये। जिस स्कूल में मात्र तीसरा वर्ग तक पढ़ाई होती थी। पूर्व में यह विद्यालय वर्तमान उच्च विद्यालय के प्रांगण में (जो उस समय नहीं थ) एक पाकड़ के पेड़ के छाया में चला करता था। इस विद्यालय से ही महंथ दर्शन दास जी ने भी प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त किये। जो 1915 में मनियारी मठ के ग्यारहें महंथ बने। इन्होंने ही इस विद्यालय को मनियारी के पूरब वाली तालाब के किनारे ले गए और सबसे पहले एक झोपड़ी का निर्माण कर विद्यालय का रूप दिया। उच्च विद्यालय बन जाने के बाद यानी 1932-33 में इस विद्यालय को पांचवा वर्ग तक स्तरोनयन करवाया। जिसके प्रथम सत्र के चौथा वर्ग का विद्यार्थी श्री दीनबंधु शर्मा एवं पाँचवा वर्ग के विद्यार्थी श्री राजेन्द्र ठाकुर थे। पाँचवा वर्ग के प्रथम सत्र में (यानी 1939 में) कुल 13 छात्र नामांकित हुए। जिसके कारण आज कुछ लोगों का कहना है कि यह विद्यालय का स्थापना महंथ दास जी 1929 में किये। इस विद्यालय के प्रथम प्रधानाध्यापक श्री बहादुर लाल हुए। जो मधुवन ग्राम के थे।

इस विद्यालय के प्रधानाध्यापकों की सूची इस प्रकार है

1. श्री बहादुर लाल

2, श्री रघुवंश ठाकुर

3. श्री राम सरीख्न शर्मा

4. श्री श्यामनंदन ठाकुर

5. श्रीमती शकुन्तला देवी

6, श्रीमती पन्ना देवी

7. श्रीमती अरुणा शर्मा

08. श्रीमती नंदन कुमारी

ईस विद्यालय की शिक्षको की सूची इस प्रकार है

01. श्री रामसागर ठाकुर

02. श्री सज्जन मिश्र

03. श्री गोनौर चौधरी

04. श्री महेश्वर प्रसाद

05. श्री शीतल प्रसाद

06. श्री उमेश राम

07. सुश्री प्रतिभा कुमारी

08 श्रीमती जानकी चौधरी
इत्यादि ।

इस विद्यालय का सन् 1971 में सरकारीकरण हुआ। पुराना भवन मरम्मत के अभाव में धीरे-धीरे ध्वस्त हो गया। सरकार के विभिन्न योजनाओं के द्वारा नया नया भवन बना। शौचालय चहारदीवारी का निर्माण हुआ। राज्य सरकार की ओर से विद्यालय में छात्रों को निःशुल्क पुस्तक दी जाने लगी। पोशाक योजना में पोशाक के लिए पैसा दिया जा रहा है। पोषाहार योजना के तहत दोपहर का भोजन दिया जा रहा है। सरकार के इन सभी योजनाओं से छात्र लाभान्वित हो रहे है। इस कारण विद्यालय में छात्रों की संख्या में भी उत्तरोत्तर वृद्धि हो रही है। आज यह विद्यालय राजकीय प्राथमिक विद्यालय (बालक) महंथ मनियारी के नाम से जाना जाता है।

इस विद्यालय के सामने पोखड़ का निर्माण महंथ जी ने करवा दिया था जिस वजह ग्रामीण बोलचाल की भाषा मे इसे पोखरी स्कूल भी कहा जाने लगा । अब विद्यालय भवन के सामने पोखड़ और दुर्गा, भोले सहित माई स्थान एक भव्य और मनोरम दृश्य उत्पन्न करता है । ग्रामीण बलराम साह , परशुराम प्रसाद वर्मा , का सहयोग अनवरत मिलते रहने के कारण कालांतर में शिव मंदिर ,दुर्गा स्थान और श्राद्ध स्थल भी पोखड़ के किनारे ही अवस्थित हो अपना मूर्त रूप ले पाया ।

हालांकि कुछ असामाजिक तत्वों द्वारा विद्यालय परिसर, और मंदिर परिसर में गंदगी फैला दिया जाता है और यदा कदा विद्यालय का ताला तोड़ दिया जाता है जो खेद का विषय है ।

आभार:- मुकुल कुमार 'मोती '

मुज़फ़्फ़रपुर के अमूल्य धरोहर :--भाग 07  दास मध्य विद्यालय मनियारीमहंथ दर्शन दास जी द्वारा एक उच्च विद्यालय 1928 में खोला ग...
04/06/2021

मुज़फ़्फ़रपुर के अमूल्य धरोहर :--भाग 07

दास मध्य विद्यालय मनियारी

महंथ दर्शन दास जी द्वारा एक उच्च विद्यालय 1928 में खोला गया था जिसमें छठा वर्ग से ग्यारहवाँ वर्ग तक की पढ़ाई होती आ रही थी। परन्तु जनसंख्या वृद्धि के कारण छात्रों की संख्या में उत्तरोतर वृद्धि होती गई उसके फलस्वरूप महंथ जी 1952 में एक मध्य विद्यालय की स्थापना का संकल्प लिए जो उच्च विद्यालय के प्रांगण में ही दास मध्य विद्यालय मनियारी के नाम से स्थापित हुआ। इस विद्यालय में उच्च विद्यालय से छठा एवं सातवाँ वर्ग को हटा कर मध्य विद्यालय में इस वर्ग की पढ़ाई की व्यवस्था की गई। इस मध्य विद्यालय का नियंत्रण एवं संचालन सरकारीकरण होने तक प्रबंध समिति करती थी जो महंथ दर्शन दास जी के सभापतित्व में योग्य एवं कर्मठ व्यक्तियों का था। प्रथम प्रबंध समिति के सदस्य इस प्रकार थे

1. श्री दर्शन दास जी सभापति

2. श्री राम रीझन मिश्र मंत्री

3. श्री कपिल देव नारायण सिंह विधायक

4. श्री सुखदेव प्रसाद अधिवक्ता

5. श्री सत्यदेव चौधरी सदस्य

कालक्रम में श्री हरिहर ठाकुर, श्री सच्चितानंद ठाकुर मंत्री बने एवं प्रबंध समिति के सदस्य बदलते रहे। इस समिति द्वारा समय-समय पर योग्य एवं कर्मठ प्रधानाध्यापकों एवं अध्यापकों की नियुक्ति होती रही जो इस प्रकार है

निम्नलिखित प्रधानाध्यापक हुए

1. श्री सत्यदेव चौधरी

2. श्री जगदीश प्रसाद सिंह

3. श्री इन्द्रकांत झा

4. श्री युगल पंडित

5. श्रीमती ललिता सिन्हा

6. श्रीमती सीता देवी

7. श्रीमती इन्दु देवी

8 श्री उमेश तिवारी।

9. श्रीमती कुमोद श्रीवास्तव

10. श्री विनोद कुमार

मध्य विद्यालय के सहायक शिक्षको की सूची

1. श्री रामस्वरूप झा

2. राधे श्याम ठाकुर

3. रामनरेश मिश्र

4. रामसुरेश चौधरी

5. रामदेव महाराज

6. श्री सुरेन्द्र प्रसाद सिंह

7. मेघु पंडित

8. विनोद राम सिंह

9. श्रीमती इंदुवाला सिन्हा

10. राज किशोर

11. राम नरेश पंडित

12. तपन देव चंद्र सरकार

13. शैलेन्द्र शरण शर्मा इत्यादि।

14. श्रीमती शिला कुमारी

इस विद्यालय के सातवां वर्ग के प्रथम सत्र के छात्र श्री चन्द्रनारायण शर्मा जी थे। इस विद्यालय का अनुशासन इतना अच्छा अनुकरणीय था कि विद्यालय का नाम सुनते ही लोग प्रभावित हो जाते थे। विद्यालय की पढ़ाई इतनी अच्छी थी कि
उसके छात्र सम्मानित किये जाते थे। पहली घंटी से लेकर सातवीं घंटी तक वर्गों का संचालन होता था। शिक्षक एवं छात्र अनुशासन के सूत्र में बद्धकर कार्य करते थे। प्रधानाध्यापक श्री युगल पंडित जी की इतनी सशक्त निगरानी रहती थी कि किसी भी छात्र को घूमने की हिम्मत नहीं होती थी और न शिक्षक ही बेकार बैठते थे। श्री राम नरेश मिश्र जी शिक्षक को कक्षा में किसी विषय में कठिनाई होता था तो तुरंत उच्च विद्यालय या संस्कृत महाविद्यालय में जाकर विषय संबंधी जानकारी प्राप्त कर छात्रों का पढ़ाते थे। उसका ही परिणाम था कि इस विद्यालय का एक गौरव था। जिला एवं प्रखंड स्तर पर यह विद्यालय अपनी एक हस्ती रखती थी इस विद्यालय की पढ़ाई तो इसी से मालूम होता है कि यहाँ के छात्र राष्ट्रीय ग्रामीण छात्रवृति, मध्य विद्यालय छात्रवृत्ति के लिए चुने जाते थे। उसका ही परिणाम था कि 5 सितम्बर 1983 को शिक्षक दिवस के अवसर पर रेड क्रास भवन, मुजफ्फरपुर में श्री राजीव गीचा जिलाधिकारी सह अध्यक्ष जिला शिक्षा परियोजना मुजफ्फरपुर के द्वारा इस विद्यालय के प्रधानाध्यापक श्री युगल पंडित जी को सम्मानित एवं पुरस्कृत किया था। इस विद्यालय का भवन अन्य मध्य विद्यालयों के अपेक्षा काफी अच्छा था। 1971 में विद्यालय का सरकारीकरण हुआ। सरकारीकरण के पश्चात् राज्य सरकार की ओर से ग्राम में सर्व प्रथम इस विद्यालय में टेलीविजन आया। जिससे संध्या 7 बजे से रात्री के 9 बजे तक ग्रामीणों को कृषि समाचार इत्यादि कार्यक्रम दिखाया जाता था। इस विद्यालय के प्रारंभ से ही एक आदेशपाल का पद था। जिस पद पर श्री राम विलास साह कार्य करते हुए सेवानिवृत हुए। सरकारीकरण के पश्चात् इस विद्यालय को उत्क्रमित कर आठवाँ वर्ग की पढ़ाई भी होने लगा। सरकारी योजना से नए नए भवन का निर्माण किया गया है। छात्रों को पोशाक योजना के अन्तर्गत पोशाक के लिए राशि एवं छात्रवृति की राशि दी जा रही है। विद्यालय में छात्रों की संख्या में दिनों-दिन बढ़ोतरी हो रहा है। वर्तमान में यह विद्यालय राजकीय दास मध्य विद्यालय महंथ मनियारी के नाम से जाना जाता है।

संकलन :-- श्री रामकुमार ठाकुर

आभार:- मुकुल कुमार 'मोती '

मुज़फ़्फ़रपुर के धरोहर भाग 5 अखाड़ा शब्द दो अलग-अलग अर्थों में प्रयुक्त होता है-व्यायामशाला, जहाँ पहलवान कुश्ती आदि करते/सी...
29/05/2021

मुज़फ़्फ़रपुर के धरोहर भाग 5

अखाड़ा शब्द दो अलग-अलग अर्थों में प्रयुक्त होता है-

व्यायामशाला, जहाँ पहलवान कुश्ती आदि करते/सीखते थे, तथाअखाड़ा साधुओं का वह दल है जो शस्त्र विद्या में भी पारंगत रहता है।[1]गाँव का मैदान, जहाँ लोग नृत्य करते हैं।

आखाड़ा प्राचीनकाल में भारत के साधु-सन्तों का एक ऐसा समूह होता था जो संकट के समय में राजधर्म के विरुद्ध परिस्थियों में, राष्ट्र रक्षा और धर्म रक्षा के लिए कार्य करता था। इस प्रकार के संकट से राष्ट्र और धर्म दोनो की रक्षा के लिए अखाड़े के साधू अपनी अस्त्र विद्या का उपयोग भी किया करते थे। इसी लिए अखाड़े के अन्तर्गत पहलवानों के लिए एक मैदान होता था जिसमें सभी अखाड़े के सदस्य शरीर को सुदृढ़ रखने और संकट के समय में सुरक्षा की दृष्टि से खुद को एक से बढ़कर एक दाँव-पेच का अभ्यास किया करते थे। साथ ही अस्त्र विद्या भी सीखते थे। वर्तमान समय में भी आखाड़े होते हैं जो आज भी राष्ट्र को संकट में आने पर ज्ञान आदि से लोगों को सही राह पर लाने के लिए तत्पर रहते हैं।

भारत के सबसे विशाल मेले कुम्भ में ये अखाड़े पूरी तन्मयता से आज भी सम्मलित होते हैं और शाही स्नान किया करते है। इन आखाड़ों का एक अध्यक्ष होता जिसका चुनाव एक जटिल प्रक्रिया के अधीन होता है।

कुल 14 अखाड़े हैं-

शिव संन्यासी सम्प्रदाय के 7 अखाड़े

1. श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी- दारागंज प्रयाग (उत्तर प्रदेश)

2. श्री पंच अटल अखाड़ा- चैक हनुमान, वाराणसी (उत्तर प्रदेश)

3. श्री पंचायती अखाड़ा निरंजनी- दारागंज, प्रयाग (उत्तर प्रदेश)

4. श्री तपोनिधि आनन्द अखाड़ा पंचायती- त्रम्केश्वर, नासिक (महाराष्ट्र)

5. श्री पंचदशनाम जूना अखाड़ा- बाबा हनुमान घाट, वाराणसी (उत्तर प्रदेश)

6. श्री पंचदशनाम आवाहन अखाड़ा- दशस्मेव घाट, वाराणसी (उत्तर प्रदेश)

7. श्री पंचदशनाम पंच अग्नि अखाड़ा- गिरीनगर, भवनाथ, जूनागढ़ (गुजरात)

किन्नर अखाड़ाबैरागी वैष्णव सम्प्रदाय के 3 अखाड़े

8. श्री दिगम्बर अनी अखाड़ा- शामलाजी खाकचौक मन्दिर, सांभर कांथा (गुजरात)

9. श्री निर्वानी आनी अखाड़ा- हनुमान गादी, अयोध्या (उत्तर प्रदेश)

10. श्री पंच निर्मोही अनी अखाड़ा- धीर समीर मन्दिर बंसीवट, वृन्दावन, मथुरा (उत्तर प्रदेश)

उदासीन संप्रदाय के 4 अखाड़े

11. श्री पंचायती बड़ा उदासीन अखाड़ा- कृष्णनगर, कीटगंज, प्रयाग (उत्तर प्रदेश)

12. श्री पंचायती अखाड़ा नया उदासीन- कनखल, हरिद्वार (उत्तराखण्ड)

13. श्री निर्मल पंचायती अखाड़ा- कनखल, हरिद्वार (उत्तराखण्ड)

14. अन्तरराष्ट्रीय जगतगुरु दसनाम गुसांई गोस्वामी एकता अखाड़ा परिषद, दिल्ली (गृहस्थ दसनामी गोस्वामी गुसांई का सबसे बड़ा, सामाजिक अखाड़ा )

इसी 11 नम्बर पर उद्धरित श्री पंचायती बड़ा उदासीन अखाड़ा- कृष्णनगर, कीटगंज, प्रयाग (उत्तर प्रदेश) के एक अंग के रूप में श्रीचंद महाराज के शिष्य ने इस मठ का निर्माण कराया था ।

इस मठ को लेकर कई आलेख भी प्रकाशित हो चुके हैं , जिनमे कई किंवदंतियों को भी शामिल किया गया है । मनियारी की चर्चा हो और उन आलेखों को नही लिखा जाए तो यह बेमानी होगी ।

कुढ़नी मनियारी के पत्रकार संजय कुमार सिंह ने मनियारी मठ पर जो लिखा है उसके अनुसार ।

मुजफ्फरपुर जिले का महंथ मनियारी गांव रहस्य भरे मठ, संत की समाधि स्थल व मंदिरों के लिए जाना जाता है। महंथ मनियारी गांव मुजफ्फरपुर जिला के कुढ़नी प्रखंड में अवस्थित है। मुजफ्फरपुर शहर से 15 किलोमीटर दक्षिण पश्चिम में अवस्थित यह स्थल अपनी कई ऐतिहासिक धरोहरो व आस्था के रूप में जानी जाती है। करीब चार सौ वर्ष पूर्व यह स्थल जंगलों से भड़ा परा था। तब संत मणिराम को मुगल शासक ने यहां की सात सौ एकड़ जमीन दान में दे दी थी। उन्होंने यहां एक झोपड़ी बना कर रहना शुरू किया। बाद में यहां एक मठ बना दिया। वे यहां अपनी अध्यात्म साधना में लीन रहते थे। मान्यता है कि अपने अंत समय में उन्होंने इसी मठ में जिन्दा समाधि ले ली थी।

ईश्वरीय अंश के प्रतीक थे महात्मा, मठ में मौजूद है दुर्लभ पांडुलिपियां ।

मणिराम सिख पंथ के गुरु गुरुनानक जी के पुत्र शिरचन
(श्रीचंद ) महाराज के शिष्य थे। मठ परिसर में एक पोखर के किनारे शिव मंदिर है। इसके बारे में एक रोचक कहानी है। मंदिर के पास एक काला नाग व सफेद नागीन का जोड़ा रहता है। एक बार मठ के वर्तमान महंथ वीरेश कुमार की बहन निजी परेशानियों के निदान के लिए कर्नाटक गईं जहाँ एक संत ने उनसे कहा आपके मठ परिसर के शिवालय में एक काला नाग व नागीन दूध के लिए भटक रहे हैं उन्हें दूध दीजिए सारी परेशानी दूर होगी। उसके बाद गांव के एक भक्त कैलाश पासवान रोज पूजा कर सुबह एक मिट्टी के बर्तन में एक लीटर दूध रख देते थे, जो दोपहर होते ही नाग व नागीन पी जाते थे। इसे कई बार लोगों ने देखने का प्रयास भी किया लेकिन नहीं देख पाए। हालांकि सांपों का यह जोड़ा यदा-कदा मंदिर के आसपास दीख जाता था। एक वर्ष पूर्व कैलाश की कैंसर से मौत हो गई। तब से मंदिर में दूध रखने वाला कोई नहीं है।

तत्कालीन महंथ ने मणिराम की समाधी स्थल पर विशाल मंदिर व राधे कृष्ण की प्रतिमा स्नाथापित कराई हैं

मठ के प्रबंधक रामाकांत मिश्र बताते हैं कि 1928 में तत्कालीन महंथ दर्शन दास ने मणिराम की समाधी स्थान पर विशाल मंदिर व राधे कृष्ण की प्रतिमा स्नाथापित कराई जो आज भी भक्तजनो के लिए आस्था का केन्द्र बनी हुई है। यहां पर अलग- अलग प्रांतों से सैकड़ों की संख्या में नागा संन्यासी महिनो रहा करते थे। कहतें हैं कि नागा साधुओं के ठहरने के लिए महंथ दर्शनदास ने जो भवन बनवाया, वह गर्मी में ठंडा व ठंडी मे गर्मी देता है। इस भवन ने दर्जनों भूकंप के झटके झेले हैं, फिर भी जस का तस खड़ा है। कहते है संत मणिराम की एक लाठी थी जिसे लोग उनका आशीर्वाद मानते थे। कहा जाता है कि प्रसव पीड़ा के दौरान उनकी लाठी रखने मात्र से पांच मिनट में स्वस्थ बच्चे का जन्म हो जाता था। इतना ही नही उस जमाने में मठ से सटे एक आखाड़ा बनाई गई थी, जहां कुस्ती खेलने के लिए दूर दूर के पहलवान, अपनी पहलवानी का परिचय देने आते थे। कहा जाता है कि इस आखाड़ा से कुसती जीतने को पहलवान अपना सौभाग्य समझते थे। संत मणिराम अपने जमाने से गुरूणानक जी की स्वयं हस्तलिखित दुर्लभ सिख पंथ के कई पांडुलिपि संयोग हुए थे, जो आज भी सुरक्षित है। इन पांडलिपि को देखने के लिए आज भी यदा कदा बाहर से लोगों के आने का सिलसिला जारी है। आज भी यहां समय-समय पर शिख पंथ के अनुयायी मठ में पहूंच कर पांडुलिपि की पूजा अर्चना व शब्‍द कीर्तन करते है। किन्तु, आज इस ऐतिहासिक स्थल को पहचान दिलाने वाला कोई नही है।

इस आलेख से भी इस मठ का पंचायती अखाड़ा होने का प्रमाण मिलता है । इस आलेख के आलोक में कुछ चीजें आज भी मेरे स्मृति पटल पर अंकित है । मैं तब छोटा ही था , मिडिल स्कूल में । उस समय 1984 या 85 रहा होगा , नागा साधुओं की एक टोली जिसमे लगभग 100 की संख्या में नागा साधु सामिल थे मनियारी स्टेट पर पहुंचे थे । साथ मे हाथी ,घोड़े और ऊँट सवार इन नागा साधुओं के सरदार जिन्हें महंथ कहा जाता था वे भी शामिल थे । यह भी कुछ -कुछ याद है कि उस साधुओं की जमात की अगुआई के लिये स्थानीय थाना की गाड़ी आगे और पीछे चल रही थी ।

लगभग एक महीने के मनियारी प्रवास के दौरान नागा साधु गाँव की ओर बहुत कम ही निकले । शायद उनके कम वस्त्रों के कारण वे महिलाओं के सामने आने से परहेज करते रहे होंगे । (यह मेरी निजी सोच है ) साधुओं के रहते कई अच्छी बुरी घटनाएं भी हुई जिसका जिक्र करना यहाँ उचित होगा ।

एक दिन मठ प्रांगण में अवस्थित पोखर में स्नान के दौरान एक नागा साधु ने अपनी घड़ी उतार कर ऊपर कपड़े के साथ रख दिया और स्नान करने चले गए । स्नानोपरांत उन्होंने पाया कि उनकी घड़ी गायब है । अब तो बबाल मच गया , आखिर अखाड़ा के साधु की घड़ी किसने ली । पता किया गया कि स्नान के पूर्व से लेकर घटना की जानकारी होने तक कौन कौन से ग्रामीण पोखर के पास या मठ परिसर में प्रवेश किये थे । पूरी जानकारी जुटाने में तीन -चार दिन बीत गए । अंत मे दो या तीन बच्चों पर निगाह टिक गई कि इन्ही में से किसी ने घड़ी उठा ली है । बच्चे छोटे उम्र के थे , उनके परिजनों तक यह बात पहुंचाई गई लोग सामाजिक दवाव बनाने लगे । पर इसी बीच एकदिन वह घड़ी महंथ जी के प्रांगण में ही एक ऐसे जगह नजर आ गयी जहां हर कोई उसे देख सकता था । कुछ लोग बताते हैं कि जिस किसी के बच्चे के पास वह घड़ी थी , उन्होंने अपने बच्चों से उसे प्राप्त कर घड़ी किसी उचित माध्यम से वहां रख दिया था । इस तरह गाँव की प्रतिष्ठा के साथ उस परिवार की प्रतिष्ठा भी बच गई और साधु को उनकी घड़ी वापस मिल गयी ।

मठ का #गुरुपर्व और घी का #हलुआ !

मनियारी स्टेट की चर्चा हो और गुरुपर्व की चर्चा न हो तो बात अधूरी ही रहेगी । हर साल आश्विन माह की दसवीं तिथि को यहां गुरुपर्व मनाने की प्रथा रही है ।इस गुरुपर्व की तिथि सिख गुरुपर्व से भिन्न हो सकती है पर लगभग मिलती जुलती प्रथा है । यह खुद में एक शोध का विषय है ।

दो दिनों तक चलने वाले इस गुरुपर्व में देश के कोने -कोने से कलाकार बुलाये जाते थे । गुरुवाणी ,शबद कीर्तन के साथ भजन ,गजल और विभिन्न राग की प्रस्तुति इन कलाकारों द्वारा की जाती थी । पूरे कार्यक्रम की प्रस्तुति में एक निर्णायक मंडल यह निर्णय लेती थी कि सबसे अच्छा प्रस्तुति किस कलाकार की रही । कार्यक्रम की समाप्ति पर दूसरे दिन उन कलाकारों को अंगवस्त्र के साथ लिफाफा में उनका पारितोषिक प्रदान किया जाता था ।

पूरे गुरुपर्व को देखने के लिए ग्रामीणों को निमंत्रण मिलता था । खासकर मनियारी मठ से जुड़े सभी संस्थाओं के कर्मचारियों की उपस्थिति तो लगभग अनिवार्य ही होती थी ।

अगले दिन सभी ग्रामीणों की उपस्थिति में ध्वजारोपण के बाद संस्था द्वारा प्रसाद वितरण होता था जिसे ग्रहण करने के बाद गुरुपर्व की समाप्ति हो जाती थी ।

अगली कड़ी में इस मठ द्वारा बनाई गई संस्थाओं की चर्चा करेंगे ।

क्रमशः....

आभार:- मुकुल कुमार 'मोती'

मुज़फ़्फ़रपुर के अमूल्य धरोहर भाग 4  (चार )मनियारी मठ उदासी सम्प्रदाय का है । अब पहले यह जानना आवश्यक है कि उदासी सम्प्रदाय...
27/05/2021

मुज़फ़्फ़रपुर के अमूल्य धरोहर भाग 4 (चार )

मनियारी मठ उदासी सम्प्रदाय का है । अब पहले यह जानना आवश्यक है कि उदासी सम्प्रदाय क्या है । मै खुद को बहुत या अति ज्ञानी नही मानता । बस एक प्रयास है कि अपने गाँव के इतिहास से अपने आनेवाली पीढ़ी को अवगत करा सकूं ।

आज जब संयुक्त परिवार समाप्त होकर एकल परिवारवाद का बोलबाला हो चुका है । तब यह आवश्यक हो गया है कि कुछ चीजों को डिजिटल माध्यम से जमा कर रख दिया जाय ।

अब विषय पर :-- गूगल पर उपलब्ध सामग्री और डॉक्टर विजय कुमार शर्मा (सेवानिवृत प्रोफेसर आईआईटी रुड़की और आइआइटी कानपुर ) सह महंथ विसंभर कुमार शर्मा के इकलौते पुत्र से बातचीत के आधार पर प्रस्तुत ।

उदासी संप्रदाय सिख-साधुओं का एक सम्प्रदाय है जिसकी कुछ शिक्षाएँ सिख पंथ से लीं गयीं हैं। इसके संस्थापक गुरु नानक के पुत्र श्री चन्द (1494–1643) थे। ये लोग सनातन धर्म को मानते हैं तथा पञ्च-प्रकृति (जल, अग्नि, पृथ्वी, वायु, आकाश) की पूजा करते हैं।

उदासी सम्प्रदाय के साधु सांसारिक बातों की ओर से विशेष रूप से तटस्थ रहते आए हैं और इनकी भोली भाली एवं सादी अहिंसात्मक प्रवृत्ति के कारण इन्हें सिख गुरु अमरदास तथा गुरु गोविन्द सिंह ने जैन धर्म द्वारा प्रभावित और अकर्मण्य तक मान लिया था। परन्तु गुरु हरगोविंद के पुत्र बाबा गुराँदित्ता ने सम्प्रदाय के संगठन एवं विकास में सहयोग दिया और तब से इसका अधिक प्रचार भी हुआ।

इसकी चार प्रधान शाखाएँ प्रसद्धि हैं -

(१) फूल साहिब वाली बहादुरपुर की शाखा,(२) बाबा हसन की आनन्दपुर के निकटवर्ती चरनकौल की शाखा,(३) 'अलमस्त साहब की पुरी' नामक नैनीताल की शाखा,(४) गोविंदसाहब की शिकारपुर वाली शाखा

ये शाखाएँ एक-दूसरी से स्वतंत्र भी जान पड़ती हैं। विलियम कुक ने इस संप्रदाय को नानकशाही पंथ का नाम देकर उसके मुख्य गुरुद्वारे का देहरा में होना बतलाया है; फिर उन्होंने यह भी कहा है कि पूर्वी भारत के अंतर्गत इसकी ३७० गद्दियों का पाया जाना कहा जाता है। संप्रदाय के लोग अधिकतर मालवा, जालंधर, फीरोजपुर, काशी एवं रोहतक में ही पाए जाते हैं और उनमें से बहुत से भ्रमणशील रूप में ही दीख पड़ते हैं।

#परिचय

उदासियों की दार्शनिक विचारधारा दशनामियों से बहुत मिलती जुलती है और वह, इसी कारण, ज्ञानप्रधान भी कही जा सकती है। परंतु दशनामी लोग जहाँ अपने को प्राय: 'स्मार्त' मानते हैं वहाँ उदासी अपने को 'श्रौत' कहा करते हैं। इनकी काशी, वृंदावन एवं हरिद्वार जैसे कुछ स्थानों में पृथक् पाठशालाएँ चलती है जहाँ अधिकतर संस्कृत भाषा में रचित धार्मिक ग्रंथों का अध्यापन होता है। इनकी वृंदावनवाली पाठशाला का एक नाम 'वृंदावन श्रौत मुनि आश्रम' प्रसिद्ध है। यद्यपि दशनामी साधुओं की भाँति ये लोग शिव को अधिक महत्व नहीं देते, फिर भी ये प्राय: 'त्रिपुंड' धारण करते हैं और वैसे ही कमंडलु भी रखते हैं। इनके यहाँ स्त्री उदासी अथवा उदासिनियों की संख्या अत्यंत कम दीख पड़ती है। इस संप्रदाय के अनुयायियों पर समय पाकर अन्य अनेक संप्रदायों का न्यूनाधिक प्रभाव पड़ चुका है और ये कतिपय सुधारों की ओर भी आकृष्ट होते जान पड़ते हैं।

'उदासी' नाम के साथ कुछ संप्रदाय भी मिलते हैं, जैसे 'उदासी कबीर' आदि, किंतु उनसे इनका कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है।

इसी उदासी सम्प्रदाय की एक शाखा किटगंज प्रयाग (इलाहाबाद ) में भी है । उसी किटगंज उदासी अखाड़ा से जुड़ा यह मनियारी मठ अपने अंदर इतनी गुमनाम चीजों को छुपाए बैठा है , जो शोध का विषय है ।

गुरुमुखी में लिखी रामायण , महाभारत , गीता के साथ साथ गुरु गोविंद सिंह या उनके पुत्र श्रीचंद महाराज दोनों में से किन्ही एक व्यक्ति द्वारा हस्तलिखित कुल 10 (दस) ग्रंथ आज भी मनियारी मठ में सुरक्षित रखें हैं । बस जरूरत है उसे जानने और शोध करने की ।

कड़ी को आगे बढ़ाते हुए हम जानेंगे कि अखाड़ा क्या है , और साधुओं को अखाड़ा बनाने की जरूरत क्यों पड़ी ।

क्रमशः.....

आभार:- मुकुल कुमार 'मोती'

मुज़फ़्फ़रपुर के अमूल्य धरोहर भाग 2 महंथ दर्शन दास अस्पताल मनियारी , एक परिचय !उत्तर बिहार के लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सेवा...
24/05/2021

मुज़फ़्फ़रपुर के अमूल्य धरोहर भाग 2

महंथ दर्शन दास अस्पताल मनियारी , एक परिचय !

उत्तर बिहार के लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सेवा देने की परिकल्पना के साथ खोला गया यह अस्पताल आज लोगों के सपनो को सही मायने में सपना ही बना दिया। इसके संस्थापक दानवीर महंथ दर्शन दास जी थे। इन्होंने ही सन् 1932 में मुज़फ़्फ़रपुर से महुआ जाने वाली सड़क के किनारे एक अस्पताल की स्थापना की स्थापना की जिसका नाम महंथ दर्शन दास अस्पताल मनियारी है । वर्तमान में सवा चार एकड़ से अधिक में फैले इस अस्पताल का उद्घाटन बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह द्वारा किया गया था।

महंत दर्शन दास जी के द्वारा जो जनकल्याण का काम किया गया , बिहार में उस समय वह अद्वितीय ही था । यह 32 शैय्या वाला अस्पताल है जिसमें 16 पुरुष एवं 16 महिलाओं के लिए शैय्या का व्यवस्था है । इस अस्पताल के प्रारंभ से ही दो डाक्टर (एक पुरुष एमबीबीएस एवं एक महिला एमबीबीएस का पद निर्धारित किया गया था) । इन दोनों डॉक्टर को रहने के लिये दो अलग -अलग आवास बनाया गया था ,जो मुख्य द्वार के दोनों सड़क के किनारे पर अवस्थित है । दो नर्स, दो कंपाउंडर, दो दाईयाँ , एक लिपिक, आदेशपाल एवम मेहतर की सेवाओं को उपलब्ध कराया गया था ।

इसका संचालन एवं नियंत्रण प्रबंध समिति किया करती थी जो योग्य एवम प्रभावशाली व्यक्ति हुआ करते थे । प्रथम प्रबंध समिति के सदस्य निम्नलिखित थे ।

1- श्री दर्शन दास (सभापति)

2-श्री इन्द्रदवन ठाकुर (मंत्री )

3- श्री राम रिझन मिश्र ( सदस्य)

4 - श्री सुखदेव प्रसाद (सदस्य )

5- श्री कपलदेव नारायण सिंह (सदस्य )

6- श्री वासुदेव प्रसाद (सदस्य )

इनके अलावा भी कुछ सदस्य थे जिनकी सूची कागजी तौर पर उपलब्ध नही हुई ।

कालक्रम में प्रबंध समिति का नया गठन होता रहा एवं सदस्य तथा मंत्री बदलते रहे । इसी क्रम में श्री विशंभर कुमार शर्मा सभापति एवं श्री सच्चिदानन्द ठाकुर इत्यादि लोग मंत्री बने । सच्चितनन्द ठाकुर आगे चलकर रामदयालु सिंह कॉलेज के बड़ा बाबू के पद से सेवानिवृत्त हुए ।

अस्पताल के सुरु होने से अबतक के डॉक्टर की सूची निम्न है ।

1- डॉक्टर स्वामी चरण जी ( जो बाद में पीएमसीएच चले गए )

2- डॉक्टर नर्सिंग चौधरी

3- डॉक्टर चन्देश्वर प्रसाद शर्मा

4- डॉक्टर मुक्तेश्वर राय

5- डॉक्टर उमा बाबू

6 -डॉक्टर देवव्रत गुप्ता

7- डॉक्टर गौड़ी शंकर सिंह

8- डॉक्टर गोविंद जी

9- डॉक्टर अरुण कुमार

10 - डॉक्टर मुकुल कुमार मिश्रा

11 - डॉक्टर तारकेश्वर प्रसाद ठाकुर

12 - डॉक्टर नवल किशोर प्रसाद सिंह

इस अस्पताल के नर्स में रोजलिन एवम जोसलिन प्रमुख हैं । कंपाउंडर में श्री नन्दकिशोर , श्री लखिन्द्र , श्री शीतल प्रसाद , श्री दीनबंधु शर्मा एवं श्री रामनरेश शर्मा इत्यादि। अन्य कर्मचारी में श्री रामानंद शर्मा , श्री घनश्याम ठाकुर , श्री रामविलास , श्री इंद्रदेव पंडित , श्री सत्येंद्र ठाकुर , श्री रामविलास राम , अशोक राम , सत्येंद्र ठाकुर , मराछो देवी , रामपुकारी देवी सहित कई अन्य नाम शामिल हैं ।

अपने समय का यह सबसे उन्नत अस्पताल था ।साथ ही बिहार के किसी भी ग्रामीण क्षेत्र का पहला अस्पताल जहां मरीजों को खैराती दवाइयां दी जाती थी ।महंथ दर्शन दास जी के कागजातों को देखने से पता चलता है कि सुरुआत में इस अस्पताल में भर्ती मरीजों को मुफ्त दवाई ही नही मुफ्त भोजन भी मुहैया कराया जाता था । पूरे संस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिये महंथ जी ने एक ट्रस्ट की स्थापना की थी । जिससे अस्पताल के संचालन में दिक्कत न हो और अस्पताल सुचारू रूप से चले । महंथ दर्शन दास की मृत्यु होने के पश्चात् अस्पताल के संचालन में कमी आई ।खैराती दवा का वितरण बन्द हुआ । पुनः महंथ दर्शन दास जी के शिष्य महंथ विश्वम्भर दास जी के कार्यकाल में 1976 में इस अस्पताल को श्री कृष्ण चिकित्सा महाविद्यालय के अधीन कर दिया गया । तब यह अस्पताल ग्रामीण स्वास्थ केंद्र के रूप में कार्य करने लगा । श्रीकृष्ण चिकित्सा महाविद्यालय के द्वारा यहाँ डॉक्टर गौरी शंकर सिंह को ग्रामीण स्वास्थ्य केन्द्र का अधीक्षक बनाकर भेजा गया । डॉक्टर गौरीशंकर सिंह के समय में यहां चिकित्सा क्षेत्र में काफी विकास हुआ । उस समय श्रीकृष्ण चिकित्सा महाविद्यालय से विभिन्न रोग विशेषज्ञ डाक्टर मनियारी अस्पताल में अपना समय देते थे । उनकी प्रतिनियुक्ति मणियारी के नाम पर की जाती रही और वेतन भुगतान भी मनियारी के नाम से होता था । अस्पताल में दवा भी सरकार की और से दी जाने लगी । मरीजों को दो वक्त का भोजन दिया जाने लगा । बिहार सरकार के द्वारा इसमें दो मंजिल के भवन का निर्माण कराया गया । यहाँ के जनता में आशा की किरण जग गई कि अब इस अस्पताल का कल्याण हो जाएगा और यहाँ अन्य सुविधा भी मिलेगी ।

परन्तु जनता के उम्मीदों पर उस समय पानी फिर गया जब 1983 में श्रीकृष्ण चिकित्सा महाविद्यालय का सरकारीकरण होने लगा उसमें मनियारी अस्पताल का भी सरकारीकरण होना था परन्तु महंथ जी विशंभर शर्मा इस अस्पताल को सरकार को देने से इन्कार कर गये । फलस्वरूप श्रीकृष्ण चिकित्सा महाविद्यालय का सरकारीकरण हो गया और यह अस्पताल प्राइवेट रह गया।

अब डा० गौरी शंकर सिंह पुनः चिकित्सा महाविद्यालय वापस चले गये। उसके बाद डा० गोविन्द जी एवं डा० टी०पी० ठाकुर जी को नियुक्त किया गया। कुछ दिनों बाद जब अस्पताल का स्थिति दयनीय हुआ तो इस क्षेत्र की प्रबुद्ध जनता ने पुनः सरकारीकरण के लिए प्रयास किया। तब महंथ जी तैयार हुए परन्तु अस्पताल के आगे की जमीन को निजी स्वामित्व में काटकर राज्यपाल के नाम से भूमि का निबंधन किए एवं अपने नजदीक रहने वाले लोगों को काफी संख्या में नियुक्त कर दिये । फलस्वरूप श्री लालू प्रसाद की सरकार ने इस अस्पताल का सरकारीकरण करने से इन्कार कर दिया एवं इनके द्वारा की गयी भूमि का निबंधन महंथ जी को वापस कर दिया ।

जानकर बताते हैं कि लालू सरकार ने उस अस्पताल में अपने मुताबिक सामाजिक न्याय को खोजने का प्रयास किया । जैसे अल्पसंख्यक , पिछड़ा ,अति पिछड़ा और महिला कर्मचारियों का समन्वय , जिसमें महंथ जी का अस्पताल खड़ा नही उतर सका ।

उसके बाद डा० गोविन्द जी यहाँ से चले गये। इनके स्थान पर डा० नवल किशोर सिन्हा की नियुक्ति हुई। आज भी इस अस्पताल का रूप रेखा पहले जैसा ही है। दयनीय हालत में अभी भी कागजों पर ही चल रहा है। सभी कर्मचारी कार्यरत है। रोगी का थोड़ा या बहुत इलाज भी होता है ,वह भी डॉक्टर नवल किशोर प्रसाद सिंह के निजी क्लीनिक के तौर पर लेकिन मरनासन्न जैसा। क्योकि कर्मचारियों को न तो समय से वेतन मिलता है न दवा की व्यवस्था है।

इस तरह आपसी स्वार्थ, राजनेताओं एवं अधिकारियों की उदासीनता के कारण आज तक इसका सरकारीकरण नहीं हो सका। मंत्री, विधायक, पदाधिकारी बराबर आते है, देखते है एवं डपोरशंखी आश्वासन देकर चले जाते है। अभी वर्तमान में बिहार सरकार के भूमि राजस्व मंत्री श्री रमई राम जी अप्रील 2011 में आये अस्पताल के चारों ओर घूम कर देखें एवं घोषणा कर चले गए कि एक सप्ताह में यह अस्पताल विधिवत संचालित हो जायगा और इसका सरकारीकरण सरकार कर देगी ।

चुनाव समाप्त होते ही रमई राम जी का वादा भी हवा में ही रह गया । पुनः स्थानीय युवाओं ने इस अस्पताल को चालू करवाने का बीड़ा उठाया है । प्रखंड के आईएएस ( श्री त्रिपुरारी शरण जी ) मुख्य सचिव बनने के बाद लोगों के मन मे एक आस जगी है , की शायद पूर्वजों का यह धरोहर एक वार पुनः आमजनता के काम आ सके ।

संकलन :- श्री रामकुमार ठाकुर (सेवानिवृत प्रधान लिपिक दर्शन संस्कृत महाविद्यालय ) के पुस्तक माटी तेरे कितने रूप और उपलब्ध कागजातों के आधार पर ।

डिजिटल संकलन:- मुकुल कुमार 'मोती '

पुनः कुछ समाजसेवियों तथा स्थानीय युवाओं के प्रयास से यह अस्पताल फिर से चालू होने की संभावना है। फिलहाल इसको उपस्वास्थ केंद्र के रूप में चालू करने क्या निर्देश दिया गया है।।

मुजफ्फरपुर के अमूल्य धरोहर - भाग 1मुजफ्फरपुर की धरोहर की पहली कड़ी में आज हम बताएँगे कुढ़नी प्रखंड के मनियारी मठ के बारे म...
23/05/2021

मुजफ्फरपुर के अमूल्य धरोहर - भाग 1

मुजफ्फरपुर की धरोहर की पहली कड़ी में आज हम बताएँगे कुढ़नी प्रखंड के मनियारी मठ के बारे में।

1720 ईस्वी में सकरा थाना के पचदही गाओं के एक किसान के पुत्र बाबा मन्ना राम (मनु राम )जी परिवार से विरक्त होकर वर्तमान वैशाली जिला के प्रतापटांड चंद्रदेव जी के गुरुकुल में चले गए वहां मनीराम के गुरु नागा बाबा थे। वहीँ शिक्षा दीक्षा ग्रहण करने के बाद मनुराम (मणिराम ) के नाम से जाने जाने लगे। धार्मिक प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद उस गुरुकुल से दो गुरु भाई धनिराम और मनीराम निकले। मनीराम ने 1733 में मनियारी में तथा धनीराम ने शंकरपुर में अपनी कुटिया बनाई।

मनियारी में एक जगह वर्तमान मठ के पास कुआँ खुदवा कर मनीराम ने एक चबूतरे का निर्माण करवाया। वहीँ से अध्यात्म की चर्चा सुरु की और अपना आश्रय बना लिया। मुग़ल कालीन इतिहास राज्यादेश से इसकी पुस्टि होती है। मुग़ल शासक ने मनीराम की ख्याति से जलकर उनकी परीक्षा लेनी चाही। और विस्वस्त होने पर जमीन मठ को दी। 1739 से 43 के बीच सैंकड़ो एकड़ जमीन मठ के पास आ गया।

क्रमसः

०१ -महंथ बाबा मणिराम जी 1733 से 87

०२-महंथ धर्म चंद्र दास जी 1787 से 97

०३-महंथ फ़क़ीर चंद्र दास जी 1797 से 10

०४- महंथ कृपा राम दास जी 1810 से 1851
०५-महंथ रामप्रसाद दास जी 1851 से 1862
०६-महंथ कमल प्रसाद दास जी 1862 से 1870
०७-महंथ स्वरूप नन्द दास जी 1870 से 1880
०८ -महंथ रूद्र नारायण दास जी 1880 से 1883
०९- महंथ गणेश दास जी 1883 से 1895
१० -महंथ रामकृष्ण दास जी 1895 से 05-09-1910
११-कार्यकारी महंथ जे एम् विल्सन 1910 से 1915
१२-महंथ दर्शन दास जी 1915 से 15-02-1961
13-महंथ विश्वम्भर कुमार दास 15-02-61 से 05-12-2002
14-महंथ विरेश कुमार दास 05-12-2002 से लगातार वर्तमान महंथ हैं

वर्तमान मठ में रखे दस्तावेजों के आधार पर

Credit:- मुकुल कुमार 'मोती '

Address

Muzaffarpur-Mahua Road
Kurhani
843147

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