29/05/2021
मुज़फ़्फ़रपुर के धरोहर भाग 5
अखाड़ा शब्द दो अलग-अलग अर्थों में प्रयुक्त होता है-
व्यायामशाला, जहाँ पहलवान कुश्ती आदि करते/सीखते थे, तथाअखाड़ा साधुओं का वह दल है जो शस्त्र विद्या में भी पारंगत रहता है।[1]गाँव का मैदान, जहाँ लोग नृत्य करते हैं।
आखाड़ा प्राचीनकाल में भारत के साधु-सन्तों का एक ऐसा समूह होता था जो संकट के समय में राजधर्म के विरुद्ध परिस्थियों में, राष्ट्र रक्षा और धर्म रक्षा के लिए कार्य करता था। इस प्रकार के संकट से राष्ट्र और धर्म दोनो की रक्षा के लिए अखाड़े के साधू अपनी अस्त्र विद्या का उपयोग भी किया करते थे। इसी लिए अखाड़े के अन्तर्गत पहलवानों के लिए एक मैदान होता था जिसमें सभी अखाड़े के सदस्य शरीर को सुदृढ़ रखने और संकट के समय में सुरक्षा की दृष्टि से खुद को एक से बढ़कर एक दाँव-पेच का अभ्यास किया करते थे। साथ ही अस्त्र विद्या भी सीखते थे। वर्तमान समय में भी आखाड़े होते हैं जो आज भी राष्ट्र को संकट में आने पर ज्ञान आदि से लोगों को सही राह पर लाने के लिए तत्पर रहते हैं।
भारत के सबसे विशाल मेले कुम्भ में ये अखाड़े पूरी तन्मयता से आज भी सम्मलित होते हैं और शाही स्नान किया करते है। इन आखाड़ों का एक अध्यक्ष होता जिसका चुनाव एक जटिल प्रक्रिया के अधीन होता है।
कुल 14 अखाड़े हैं-
शिव संन्यासी सम्प्रदाय के 7 अखाड़े
1. श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी- दारागंज प्रयाग (उत्तर प्रदेश)
2. श्री पंच अटल अखाड़ा- चैक हनुमान, वाराणसी (उत्तर प्रदेश)
3. श्री पंचायती अखाड़ा निरंजनी- दारागंज, प्रयाग (उत्तर प्रदेश)
4. श्री तपोनिधि आनन्द अखाड़ा पंचायती- त्रम्केश्वर, नासिक (महाराष्ट्र)
5. श्री पंचदशनाम जूना अखाड़ा- बाबा हनुमान घाट, वाराणसी (उत्तर प्रदेश)
6. श्री पंचदशनाम आवाहन अखाड़ा- दशस्मेव घाट, वाराणसी (उत्तर प्रदेश)
7. श्री पंचदशनाम पंच अग्नि अखाड़ा- गिरीनगर, भवनाथ, जूनागढ़ (गुजरात)
किन्नर अखाड़ाबैरागी वैष्णव सम्प्रदाय के 3 अखाड़े
8. श्री दिगम्बर अनी अखाड़ा- शामलाजी खाकचौक मन्दिर, सांभर कांथा (गुजरात)
9. श्री निर्वानी आनी अखाड़ा- हनुमान गादी, अयोध्या (उत्तर प्रदेश)
10. श्री पंच निर्मोही अनी अखाड़ा- धीर समीर मन्दिर बंसीवट, वृन्दावन, मथुरा (उत्तर प्रदेश)
उदासीन संप्रदाय के 4 अखाड़े
11. श्री पंचायती बड़ा उदासीन अखाड़ा- कृष्णनगर, कीटगंज, प्रयाग (उत्तर प्रदेश)
12. श्री पंचायती अखाड़ा नया उदासीन- कनखल, हरिद्वार (उत्तराखण्ड)
13. श्री निर्मल पंचायती अखाड़ा- कनखल, हरिद्वार (उत्तराखण्ड)
14. अन्तरराष्ट्रीय जगतगुरु दसनाम गुसांई गोस्वामी एकता अखाड़ा परिषद, दिल्ली (गृहस्थ दसनामी गोस्वामी गुसांई का सबसे बड़ा, सामाजिक अखाड़ा )
इसी 11 नम्बर पर उद्धरित श्री पंचायती बड़ा उदासीन अखाड़ा- कृष्णनगर, कीटगंज, प्रयाग (उत्तर प्रदेश) के एक अंग के रूप में श्रीचंद महाराज के शिष्य ने इस मठ का निर्माण कराया था ।
इस मठ को लेकर कई आलेख भी प्रकाशित हो चुके हैं , जिनमे कई किंवदंतियों को भी शामिल किया गया है । मनियारी की चर्चा हो और उन आलेखों को नही लिखा जाए तो यह बेमानी होगी ।
कुढ़नी मनियारी के पत्रकार संजय कुमार सिंह ने मनियारी मठ पर जो लिखा है उसके अनुसार ।
मुजफ्फरपुर जिले का महंथ मनियारी गांव रहस्य भरे मठ, संत की समाधि स्थल व मंदिरों के लिए जाना जाता है। महंथ मनियारी गांव मुजफ्फरपुर जिला के कुढ़नी प्रखंड में अवस्थित है। मुजफ्फरपुर शहर से 15 किलोमीटर दक्षिण पश्चिम में अवस्थित यह स्थल अपनी कई ऐतिहासिक धरोहरो व आस्था के रूप में जानी जाती है। करीब चार सौ वर्ष पूर्व यह स्थल जंगलों से भड़ा परा था। तब संत मणिराम को मुगल शासक ने यहां की सात सौ एकड़ जमीन दान में दे दी थी। उन्होंने यहां एक झोपड़ी बना कर रहना शुरू किया। बाद में यहां एक मठ बना दिया। वे यहां अपनी अध्यात्म साधना में लीन रहते थे। मान्यता है कि अपने अंत समय में उन्होंने इसी मठ में जिन्दा समाधि ले ली थी।
ईश्वरीय अंश के प्रतीक थे महात्मा, मठ में मौजूद है दुर्लभ पांडुलिपियां ।
मणिराम सिख पंथ के गुरु गुरुनानक जी के पुत्र शिरचन
(श्रीचंद ) महाराज के शिष्य थे। मठ परिसर में एक पोखर के किनारे शिव मंदिर है। इसके बारे में एक रोचक कहानी है। मंदिर के पास एक काला नाग व सफेद नागीन का जोड़ा रहता है। एक बार मठ के वर्तमान महंथ वीरेश कुमार की बहन निजी परेशानियों के निदान के लिए कर्नाटक गईं जहाँ एक संत ने उनसे कहा आपके मठ परिसर के शिवालय में एक काला नाग व नागीन दूध के लिए भटक रहे हैं उन्हें दूध दीजिए सारी परेशानी दूर होगी। उसके बाद गांव के एक भक्त कैलाश पासवान रोज पूजा कर सुबह एक मिट्टी के बर्तन में एक लीटर दूध रख देते थे, जो दोपहर होते ही नाग व नागीन पी जाते थे। इसे कई बार लोगों ने देखने का प्रयास भी किया लेकिन नहीं देख पाए। हालांकि सांपों का यह जोड़ा यदा-कदा मंदिर के आसपास दीख जाता था। एक वर्ष पूर्व कैलाश की कैंसर से मौत हो गई। तब से मंदिर में दूध रखने वाला कोई नहीं है।
तत्कालीन महंथ ने मणिराम की समाधी स्थल पर विशाल मंदिर व राधे कृष्ण की प्रतिमा स्नाथापित कराई हैं
मठ के प्रबंधक रामाकांत मिश्र बताते हैं कि 1928 में तत्कालीन महंथ दर्शन दास ने मणिराम की समाधी स्थान पर विशाल मंदिर व राधे कृष्ण की प्रतिमा स्नाथापित कराई जो आज भी भक्तजनो के लिए आस्था का केन्द्र बनी हुई है। यहां पर अलग- अलग प्रांतों से सैकड़ों की संख्या में नागा संन्यासी महिनो रहा करते थे। कहतें हैं कि नागा साधुओं के ठहरने के लिए महंथ दर्शनदास ने जो भवन बनवाया, वह गर्मी में ठंडा व ठंडी मे गर्मी देता है। इस भवन ने दर्जनों भूकंप के झटके झेले हैं, फिर भी जस का तस खड़ा है। कहते है संत मणिराम की एक लाठी थी जिसे लोग उनका आशीर्वाद मानते थे। कहा जाता है कि प्रसव पीड़ा के दौरान उनकी लाठी रखने मात्र से पांच मिनट में स्वस्थ बच्चे का जन्म हो जाता था। इतना ही नही उस जमाने में मठ से सटे एक आखाड़ा बनाई गई थी, जहां कुस्ती खेलने के लिए दूर दूर के पहलवान, अपनी पहलवानी का परिचय देने आते थे। कहा जाता है कि इस आखाड़ा से कुसती जीतने को पहलवान अपना सौभाग्य समझते थे। संत मणिराम अपने जमाने से गुरूणानक जी की स्वयं हस्तलिखित दुर्लभ सिख पंथ के कई पांडुलिपि संयोग हुए थे, जो आज भी सुरक्षित है। इन पांडलिपि को देखने के लिए आज भी यदा कदा बाहर से लोगों के आने का सिलसिला जारी है। आज भी यहां समय-समय पर शिख पंथ के अनुयायी मठ में पहूंच कर पांडुलिपि की पूजा अर्चना व शब्द कीर्तन करते है। किन्तु, आज इस ऐतिहासिक स्थल को पहचान दिलाने वाला कोई नही है।
इस आलेख से भी इस मठ का पंचायती अखाड़ा होने का प्रमाण मिलता है । इस आलेख के आलोक में कुछ चीजें आज भी मेरे स्मृति पटल पर अंकित है । मैं तब छोटा ही था , मिडिल स्कूल में । उस समय 1984 या 85 रहा होगा , नागा साधुओं की एक टोली जिसमे लगभग 100 की संख्या में नागा साधु सामिल थे मनियारी स्टेट पर पहुंचे थे । साथ मे हाथी ,घोड़े और ऊँट सवार इन नागा साधुओं के सरदार जिन्हें महंथ कहा जाता था वे भी शामिल थे । यह भी कुछ -कुछ याद है कि उस साधुओं की जमात की अगुआई के लिये स्थानीय थाना की गाड़ी आगे और पीछे चल रही थी ।
लगभग एक महीने के मनियारी प्रवास के दौरान नागा साधु गाँव की ओर बहुत कम ही निकले । शायद उनके कम वस्त्रों के कारण वे महिलाओं के सामने आने से परहेज करते रहे होंगे । (यह मेरी निजी सोच है ) साधुओं के रहते कई अच्छी बुरी घटनाएं भी हुई जिसका जिक्र करना यहाँ उचित होगा ।
एक दिन मठ प्रांगण में अवस्थित पोखर में स्नान के दौरान एक नागा साधु ने अपनी घड़ी उतार कर ऊपर कपड़े के साथ रख दिया और स्नान करने चले गए । स्नानोपरांत उन्होंने पाया कि उनकी घड़ी गायब है । अब तो बबाल मच गया , आखिर अखाड़ा के साधु की घड़ी किसने ली । पता किया गया कि स्नान के पूर्व से लेकर घटना की जानकारी होने तक कौन कौन से ग्रामीण पोखर के पास या मठ परिसर में प्रवेश किये थे । पूरी जानकारी जुटाने में तीन -चार दिन बीत गए । अंत मे दो या तीन बच्चों पर निगाह टिक गई कि इन्ही में से किसी ने घड़ी उठा ली है । बच्चे छोटे उम्र के थे , उनके परिजनों तक यह बात पहुंचाई गई लोग सामाजिक दवाव बनाने लगे । पर इसी बीच एकदिन वह घड़ी महंथ जी के प्रांगण में ही एक ऐसे जगह नजर आ गयी जहां हर कोई उसे देख सकता था । कुछ लोग बताते हैं कि जिस किसी के बच्चे के पास वह घड़ी थी , उन्होंने अपने बच्चों से उसे प्राप्त कर घड़ी किसी उचित माध्यम से वहां रख दिया था । इस तरह गाँव की प्रतिष्ठा के साथ उस परिवार की प्रतिष्ठा भी बच गई और साधु को उनकी घड़ी वापस मिल गयी ।
मठ का #गुरुपर्व और घी का #हलुआ !
मनियारी स्टेट की चर्चा हो और गुरुपर्व की चर्चा न हो तो बात अधूरी ही रहेगी । हर साल आश्विन माह की दसवीं तिथि को यहां गुरुपर्व मनाने की प्रथा रही है ।इस गुरुपर्व की तिथि सिख गुरुपर्व से भिन्न हो सकती है पर लगभग मिलती जुलती प्रथा है । यह खुद में एक शोध का विषय है ।
दो दिनों तक चलने वाले इस गुरुपर्व में देश के कोने -कोने से कलाकार बुलाये जाते थे । गुरुवाणी ,शबद कीर्तन के साथ भजन ,गजल और विभिन्न राग की प्रस्तुति इन कलाकारों द्वारा की जाती थी । पूरे कार्यक्रम की प्रस्तुति में एक निर्णायक मंडल यह निर्णय लेती थी कि सबसे अच्छा प्रस्तुति किस कलाकार की रही । कार्यक्रम की समाप्ति पर दूसरे दिन उन कलाकारों को अंगवस्त्र के साथ लिफाफा में उनका पारितोषिक प्रदान किया जाता था ।
पूरे गुरुपर्व को देखने के लिए ग्रामीणों को निमंत्रण मिलता था । खासकर मनियारी मठ से जुड़े सभी संस्थाओं के कर्मचारियों की उपस्थिति तो लगभग अनिवार्य ही होती थी ।
अगले दिन सभी ग्रामीणों की उपस्थिति में ध्वजारोपण के बाद संस्था द्वारा प्रसाद वितरण होता था जिसे ग्रहण करने के बाद गुरुपर्व की समाप्ति हो जाती थी ।
अगली कड़ी में इस मठ द्वारा बनाई गई संस्थाओं की चर्चा करेंगे ।
क्रमशः....
आभार:- मुकुल कुमार 'मोती'