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Hello Haryana महाभारत के शांति पर्व में भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को वफ़ादारी और कृतज्ञता की एक अद्भुत कथा सुनाई थी। यह क...
09/05/2026

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महाभारत के शांति पर्व में भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को वफ़ादारी और कृतज्ञता की एक अद्भुत कथा सुनाई थी। यह कहानी है एक धर्मात्मा तोते और देवराज इंद्र के संवाद की।

एक बार एक शिकारी का जहरीला तीर निशाना चूक कर एक हरे-भरे, विशाल वृक्ष में जा लगा। जहर के प्रभाव से वह पेड़ धीरे-धीरे सूखने लगा। उस पेड़ पर रहने वाले सभी पक्षी, जो कल तक उसके फलों का आनंद लेते थे, उसे मरता देख एक-एक कर छोड़ गए।
लेकिन, उस पेड़ के कोटर में रहने वाला एक बूढ़ा, धर्मात्मा तोता वहीं डटा रहा। दाना-पानी के अभाव में वह भी पेड़ के साथ-साथ सूखकर कांटा होता जा रहा था, पर उसने अपना घर नहीं छोड़ा।
यह बात देवराज इंद्र तक पहुंची। एक मरते हुए वृक्ष के लिए अपने प्राण त्यागने वाले इस तोते को देखने वे स्वयं धरती पर आए।

इंद्र ने तोते से कहा, "अरे भाई! यह पेड़ अब सूख चुका है। न इस पर पत्ते हैं, न फल। इसके बचने की कोई उम्मीद नहीं है। जंगल में फलों से लदे अनेकों पेड़ हैं, सुंदर सरोवर हैं। तुम वहां क्यों नहीं चले जाते? यहां व्यर्थ प्राण क्यों दे रहे हो?"
तोते का मर्मस्पर्शी उत्तर:
तोते ने जो जवाब दिया, उसने देवराज को भी निरुत्तर कर दिया। वह बोला:
"देवराज! मैं इसी पेड़ पर जन्मा, इसी की गोद में पला-ब बढ़ा। इसके मीठे फल खाए और इसने मुझे अनेकों बार दुश्मनों से बचाया। जब इसके अच्छे दिन थे, मैंने इसके साथ सुख भोगे। आज जब इस पर बुरा वक्त आया है, तो मैं अपने स्वार्थ के लिए इसे कैसे त्याग दूं? जिसके साथ सुख भोगे, दुःख में उसका साथ छोड़ देना तो अधर्म है। आप देवता होकर भी मुझे ऐसी स्वार्थी सलाह क्यों दे रहे हैं?"

तोते की निस्वार्थ भक्ति और त्याग देखकर इंद्र प्रसन्न हो गए। उन्होंने कहा, "मांगो, क्या वर मांगते हो?"
तोते ने अपने लिए कुछ नहीं माँगा। उसने कहा, "प्रभु, मेरे इस प्यारे आश्रयदाता वृक्ष को पहले की तरह हरा-भरा कर दीजिए।"
इंद्र ने अमृत वर्षा करके उस सूखे पेड़ को पुनर्जीवित कर दिया। पेड़ फिर से लहलहा उठा।

यह कथा हमें सिखाती है कि सच्चे रिश्ते वही होते हैं जो बुरे वक्त में परखे जाते हैं। जिसने हमारे अच्छे समय में साथ दिया हो, उसका हाथ बुरे समय में कभी नहीं छोड़ना चाहिए। जैसा कि भीष्म ने कहा- "किसी के सुख के साथी बनो न बनो, दुख के साथी जरूर बनो। यही सच्ची धर्मनीति है।"
।। जय श्री कृष्णा ।।

08/05/2026

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01/05/2026

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बुद्धं शरणं गच्छामिधम्मं शरणं गच्छामिसंघं शरणं गच्छामिबुद्ध पूर्णिमा के पावन अवसर पर सभी देशवासियों को हार्दिक शुभकामनाए...
01/05/2026

बुद्धं शरणं गच्छामि
धम्मं शरणं गच्छामि
संघं शरणं गच्छामि

बुद्ध पूर्णिमा के पावन अवसर पर सभी देशवासियों को हार्दिक शुभकामनाएँ

01/05/2026

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01/05/2026

बहुत प्राचीन समय की बात है। राजा अम्बरीष एक महान विष्णु भक्त थे। वे हमेशा धर्म, सत्य और भक्ति में लीन रहते थे। उनकी भक्त...
29/04/2026

बहुत प्राचीन समय की बात है। राजा अम्बरीष एक महान विष्णु भक्त थे। वे हमेशा धर्म, सत्य और भक्ति में लीन रहते थे। उनकी भक्ति इतनी पवित्र थी कि स्वयं भगवान विष्णु भी उनसे प्रसन्न रहते थे।🙏
एक बार राजा अम्बरीष ने एकादशी का व्रत रखा और अगले दिन पारण करने की तैयारी की। उसी समय महान ऋषि दुर्वासा वहाँ पहुँचे। राजा ने उनका आदर-सत्कार किया और भोजन का निमंत्रण दिया।🚩
ऋषि दुर्वासा ने कहा कि वे स्नान करके लौटकर भोजन करेंगे, लेकिन वे ध्यान में इतने देर तक चले गए कि व्रत का समय निकलने लगा।⏳
राजा अम्बरीष धर्मसंकट में पड़ गए। यदि वे पारण नहीं करते तो व्रत टूटता, और यदि करते तो ऋषि का अपमान होता। तब उन्होंने धर्म के अनुसार थोड़ा जल ग्रहण कर लिया (धर्मानुसार व्रत पूर्ण करने के लिए)।💧
जब ऋषि दुर्वासा लौटे, तो उन्होंने इसे अपना अपमान समझ लिया और क्रोध में आगबबूला हो गए 🔥। उन्होंने राजा को दंड देने के लिए एक राक्षसी शक्ति उत्पन्न की।
लेकिन उसी क्षण भगवान विष्णु ने अपना सुदर्शन चक्र भेज दिया। चक्र उस राक्षसी शक्ति के बाद अब ऋषि दुर्वासा के पीछे पड़ गया।😨
ऋषि दुर्वासा पूरे ब्रह्मांड में भागते रहे—स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल तक—लेकिन कहीं शरण नहीं मिली। अंत में वे भगवान विष्णु के पास पहुँचे और क्षमा माँगी।🚩
भगवान विष्णु ने कहा:
👉 “भक्त का अपमान करने वाला स्वयं धर्म से दूर हो जाता है।”
ऋषि दुर्वासा ने राजा अम्बरीष से क्षमा माँगी। राजा ने विनम्रता से उन्हें क्षमा कर दिया। तभी सुदर्शन चक्र शांत हुआ।

🌟 सीख:🚩🙏
सच्चा भक्त अहंकार नहीं रखता, और धर्म का पालन ही सबसे बड़ा पुण्य है। क्रोध ज्ञान को नष्ट कर देता है, लेकिन क्षमा सब कुछ शांत कर देती है। 🚩

लंका युद्ध अपने चरम पर था। रावण के पुत्र मेघनाद ने युद्धभूमि में लक्ष्मण जी पर शक्तिबाण चला दिया। वह बाण इतना प्रचंड था ...
29/04/2026

लंका युद्ध अपने चरम पर था। रावण के पुत्र मेघनाद ने युद्धभूमि में लक्ष्मण जी पर शक्तिबाण चला दिया। वह बाण इतना प्रचंड था कि लक्ष्मण जी मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़े। श्रीराम व्याकुल हो उठे। पूरा वानर दल चिंतित था।🚩
तभी वैद्य सुषेण को बुलाया गया। उन्होंने लक्ष्मण जी को देखकर कहा—
“यदि प्रातःकाल से पहले हिमालय से संजीवनी बूटी लाई जाए, तभी लक्ष्मण जी के प्राण बच सकते हैं।”
यह सुनते ही हनुमान जी तुरंत उठ खड़े हुए और बोले—
“प्रभु! मैं अभी संजीवनी लेकर आता हूँ।” 🚩
हनुमान जी आकाश मार्ग से हिमालय की ओर उड़ चले। उनकी गति वज्र के समान थी। इधर रावण को जब यह समाचार मिला, तो वह घबरा गया। उसने सोचा—यदि लक्ष्मण जीवित हो गए, तो युद्ध में उसकी हार निश्चित है।
तब रावण ने अपने मायावी राक्षस कालनेमि को बुलाया और आदेश दिया—
“हनुमान को किसी भी तरह रोक दो, ताकि वह समय पर संजीवनी न ला सके।”🚩
कालनेमि मायावी था। उसने मार्ग में एक सुंदर आश्रम रच दिया। वहाँ सरोवर, पुष्प, साधु वेश और शांत वातावरण बना दिया। स्वयं वह ऋषि का रूप धरकर बैठ गया।
जब हनुमान जी वहाँ पहुँचे, तो कालनेमि बोला—
“वत्स, तुम बहुत थके हुए लगते हो। पहले जल पी लो, विश्राम कर लो, फिर आगे जाना।”
हनुमान जी को थोड़ा संदेह हुआ, पर समय कम था। उन्होंने जल पीने का विचार किया और सरोवर की ओर बढ़े। जैसे ही वे जल लेने झुके, एक मगरमच्छ ने उनका पैर पकड़ लिया।
हनुमान जी ने तुरंत उसे मार दिया। तभी वह मगरमच्छ एक दिव्य अप्सरा के रूप में प्रकट हुई। उसने हाथ जोड़कर कहा—
“प्रभु! मैं श्राप से मगरमच्छ बनी थी। आपने मुझे मुक्त किया। सावधान रहिए, वह साधु नहीं, राक्षस कालनेमि है।” 🚩
हनुमान जी तुरंत समझ गए। वे आश्रम लौटे और कालनेमि से बोले—
“पहले गुरुदक्षिणा ले लो!”🚩
इतना कहकर उन्होंने एक प्रचंड घूंसा मारा। कालनेमि का मायावी रूप टूट गया और वह अपने असली राक्षसी स्वरूप में आ गया। कुछ ही क्षणों में हनुमान जी ने उसका वध कर दिया।
फिर वे बिना समय गँवाए हिमालय पहुँचे। संजीवनी पहचान न पाने पर पूरा पर्वत ही उठा लाए और लक्ष्मण जी के प्राण बच गए।

सीख 🙏🚩
👉 धर्म के मार्ग में बाधाएँ अवश्य आती हैं, पर बुद्धि और भक्ति से दूर होती हैं।
👉 छल चाहे कितना सुंदर रूप ले ले, सत्य उसे पहचान लेता है।
👉 समय पर लिया गया सही निर्णय जीवन बचा सकता है।
👉 सच्चा भक्त लक्ष्य से नहीं भटकता।
👉 जहाँ राम कार्य हो, वहाँ हनुमान जी स्वयं शक्ति बन जाते हैं।

29/04/2026

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एक बार महान ऋषि नारद मुनि वैकुंठ गए और भगवान विष्णु से पूछा, “हे भगवान, भक्तों की संगति में रहने के क्या फल होते हैं?” भ...
28/04/2026

एक बार महान ऋषि नारद मुनि वैकुंठ गए और भगवान विष्णु से पूछा, “हे भगवान, भक्तों की संगति में रहने के क्या फल होते हैं?”

भगवान ने मुस्कुराते हुए कहा, “हे मेरे प्रिय नारद, पृथ्वी पर एक वन में जाओ। वहाँ तुम्हें एक बरगद का वृक्ष मिलेगा, जिसकी बाईं शाखा पर एक तोते का घोंसला होगा। घोंसले में एक नवजात तोते का बच्चा होगा। उस तोते के बच्चे से यही प्रश्न पूछो, वह तुम्हें उत्तर देगा।”

नारद मुनि ने भगवान विष्णु के निर्देशों का पालन करते हुए वृक्ष के पास गए। उनके पहुँचते ही एक अंडा फूटा और उसमें से एक नन्हा तोता निकला।

नारद पक्षी के पास गए और पूछा, “नन्हे पक्षी, कृपया मुझे बताओ कि साधु संघ (भक्तों के साथ संगति) का क्या प्रभाव होता है?” जैसे ही ये शब्द कहे गए, नन्हा पक्षी वहीं गिर पड़ा और मर गया।

स्तब्ध और दुखी होकर नारद मुनि भगवान विष्णु के पास लौटे और उन्हें सारी घटना बताई। भगवान विष्णु ने एक बार फिर मुस्कुराते हुए नारद को एक ऐसे गाँव का निर्देश दिया जहाँ एक ब्राह्मण के घर अभी-अभी एक बछड़े का जन्म हुआ था। भगवान ने निर्देश दिया, “बछड़े से प्रश्न पूछो और अपना उत्तर पाओ।”

नारद गांव गए और उन्हें नवजात बछड़ा मिला। बछड़ा जैसे ही अपने पैरों पर खड़ा होने लगा, नारद ने पूछा, “प्यारे बछड़े, मुझे बताओ भक्तों के साथ रहने का क्या फल होता है?” जैसे ही उन्होंने अपना प्रश्न समाप्त किया, बछड़ा भी वहीं गिरकर मर गया।

अब अत्यंत दुखी होकर नारद मुनि सोचने लगे, “मैं कितना पापी हूँ! लगता है मैं दो मौतों का कारण हूँ।” शोक में डूबे हुए वे वैकुंठ लौट आए और भगवान विष्णु को सब कुछ बताया।

भगवान ने उन्हें सांत्वना देते हुए कहा, “चिंता मत करो, इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं है। काशी के राजा के अस्तबल में अभी-अभी एक घोड़े का बच्चा पैदा हुआ है। जाओ और उस घोड़े के बच्चे से इसका उत्तर पूछो।”

संकोच करते हुए, लेकिन आज्ञाकारी होकर, नारद अस्तबल में गए और सावधानीपूर्वक घोड़े के बच्चे से वही प्रश्न पूछा। पहले की तरह ही, प्रश्न पूरा होते ही घोड़ा का बच्चा मर गया।

घोर निराशा में डूबे नारद मुनि भगवान विष्णु के पास लौट आए। उनकी पीड़ा देखकर भगवान विष्णु मुस्कुराए और बोले, “तुम्हारे तमाम कष्टों के बावजूद तुम्हें अभी तक अपना उत्तर नहीं मिला है। अब एक काम करो: काशी के राजा के यहाँ एक पुत्र का जन्म हुआ है। जाओ और उस शिशु से अपना प्रश्न पूछो।”

एक और मृत्यु का कारण बनने के भय से नारद ने विरोध करते हुए कहा, “हे प्रभु, बस! मैं अपने कारण और मृत्यु नहीं चाहता। मेरे प्रश्न का उत्तर न दिया जाए। मैं पहले से ही अपराधबोध से ग्रस्त हूँ; मैं किसी राजकुमार की मृत्यु का बोझ अपने अंतरात्मा पर नहीं लेना चाहता।” लेकिन भगवान ने नारद को आश्वासन दिया, “इस बार तुम्हें अपने प्रश्न का उत्तर अवश्य मिलेगा।”

अत्यंत अनिच्छा से नारद काशी के राजा के महल में गए। राजकुमार के जन्म से महल में खूब हर्षोल्लास था। राजा ने जब नारद मुनि को देखा, तो उन्होंने स्वयं को दुगुना भाग्यशाली समझा और तुरंत अपने पुत्र को आशीर्वाद के लिए ऋषि के पास ले गए।

नारद ने बच्चे को प्यार से अपनी बाहों में लिया और धीरे से पूछा, "बच्चे, कृपया मुझे बताओ कि भक्तों के साथ रहने का क्या फल होता है?"

नारद आश्चर्यचकित रह गए जब शिशु ने गुटरगू करते हुए कहा, “हे ऋषियों में श्रेष्ठ, क्या आप अभी तक नहीं समझ पाए?

मैं वही छोटा पक्षी था जिससे आपने बरगद के वृक्ष पर प्रश्न किया था। आप जैसे संत के थोड़े से संपर्क के कारण, मैं उस नन्हे शरीर से मुक्त होकर बछड़े के रूप में जन्मा।

जब आपने बछड़े के रूप में मुझसे प्रश्न किया, तो मैं उस शरीर को छोड़कर घोड़े के रूप में जन्मा। फिर, आपके थोड़े से संपर्क के कारण, मुझे काशी राज्य के राजकुमार के रूप में सबसे अनमोल मानव रूप प्राप्त हुआ।

यह 'साधु संग' का फल है—भक्तों के साथ थोड़े समय का मेल-मिलाप। हे ऋषि, मुझे इस अवस्था तक पहुँचाने के लिए मैं आपका आभारी हूँ।”

अंततः नारद मुनि के संदेह दूर हो गए। वे अब पशु शिशुओं की मृत्यु से दुखी नहीं थे। इसके बजाय, उन्होंने एक भक्त के साथ थोड़े समय के भी मेल-मिलाप की अपार शक्ति को महसूस किया।

उन्होंने राजकुमार को आशीर्वाद दिया और भगवान की महिमा का गुणगान करते हुए प्रसन्नतापूर्वक अपने मार्ग पर चल दिए।

यह कहानी भक्तों के साथ थोड़े समय के लिए भी संगति करने की परिवर्तनकारी शक्ति को खूबसूरती से दर्शाती है। एक शुद्ध भक्त की संगति आत्मा को विभिन्न जीवन रूपों से ऊपर उठा सकती है, अंततः मानव जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि - आध्यात्मिक ज्ञान और ईश्वर के साथ घनिष्ठ संबंध की ओर ले जा सकती है।

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