Maa Bala Sundri Ladwa Kurukshetra

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🛑 पितृ पक्ष, श्राद्ध, कनागत 🛑 ༺•═════❁═════•༻🏵🕉☀ जय जय श्री राधे ☀🕉🏵🕉️ पितृ पक्ष पर सादर समर्पित 🕉️प्यार दे कर जो हमें व...
09/27/2026

🛑 पितृ पक्ष, श्राद्ध, कनागत 🛑
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🏵🕉☀ जय जय श्री राधे ☀🕉🏵

🕉️ पितृ पक्ष पर सादर समर्पित 🕉️

प्यार दे कर जो हमें विदा हुए संसार से,
आओ उनका स्वागत करें आज से।
वो हुए पुरखो में शामिल जो कभी थे साथ में,
आज से नमन करेंगे हम मन के द्वार से।
पितर चरण में नमन करें, ध्यान धरें दिन रात।
कृपा दृष्टि हम पर करें, सिर पर धर दें हाथ।
ये कुटुम्ब है आपका, आपका है परिवार।
आपके आशिर्वाद से, फले - फूले संसार।
भूल -चूक सब क्षमा करें, करें महर भरपूर।
सुख सम्पति से घर भरें, कष्ट करें सब दूर।
आप हमारे हृदय में, आपकी हम संतान।
आपके नाम से हैं जुड़ी, मेरी हर पहचान।
🕉️
🌹सभी पितरो को कोटि कोटि सादर नमन व विनम्र श्रद्धांजलि।🌹
💞🌹🙏🏻🌷🕉️🌷🙏🏻🌹💞

🛑 ब्रह्मकपाल, श्री बद्रीनाथ जी 🛑༺•══════❁══════•༻🏵🕉☀ जय जय श्री राधे ☀🕉🏵💠 ब्रह्मकपाल, श्री बद्रीनाथ जी उत्तराखंड 💠🔴 भारत...
09/27/2026

🛑 ब्रह्मकपाल, श्री बद्रीनाथ जी 🛑
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🏵🕉☀ जय जय श्री राधे ☀🕉🏵

💠 ब्रह्मकपाल, श्री बद्रीनाथ जी उत्तराखंड 💠

🔴 भारत में एक ऐसा तीर्थ है जहां पर पिंडदान करने का फल गया जी से भी आठ गुणा आधिक प्राप्त होता है।
कहा जाता है कि यहां पर भोलेनाथ को ब्रह्महत्या से मुक्ति मिली थी। यह स्थान उत्तराखंड के प्रसिद्ध और पवन तीर्थ श्री बद्रीनाथ जी के पास स्थित है। जिसे ब्रह्मकपाल के नाम से जाना जाता है। संकलन सेवा:वि.रा.भारती। इसके विषय में मान्यता है कि यहां पर पितरों का पिंडदान करने से उन्हें नर्क से मुक्ति मिलती है। स्कंद पुराण में भी ब्रह्मकपाल को गया से आठ गुणा अधिक फलदायी पितर कारक तीर्थ कहा गया है।

🔸महाभारत में कई लोगों की मृत्यु हुई थी। उनका अच्छे से अंतिम संस्कार भी नहीं हुआ था। उनकी अतृप्त आत्माओं को संतुष्ट करना जरुरी था इसलिए श्रीकृष्ण ने पांडवों को ब्रह्मकपाल में पितरों का श्राद करने को कहा। पांडवों ने श्रीकृष्ण की बात मानकर ब्रह्मकपाल में आकर श्राद्ध किया। जिससे अकाल मृत्यु के कारण प्रेत योनि में गए पितरों को मुक्ति मिल गई।

🔸पुराणों में वर्णन है कि उत्तराखंड की धरती पर भगवान बद्रीनाथ के चरणों में ब्रह्मकपाल बसा है। यहां पर अलकनंदा नदी बहती है। कहा जाता है कि जिस व्यक्ति की अकाल मृत्यु होती है, उसकी आत्मा भटकती रहती है। ब्रह्मकपाल में उनका श्राद करने से आत्मा को शीघ्र शांति अौर प्रेत योनि से मुक्ति मिलती है।

🔸वैदिक परंपरा के अनुसार पुत्र, पुत्रत्व तभी सार्थक होता है जब पुत्र अपने माता-पिता की सेवा करे व उनके मरणोपरांत उनकी मृत्यु तिथि व पितृपक्ष में विधिवत श्राद्ध करें। भारतीय वैदिक आदि सनातन हिंदू धर्म में मानव के जन्म मात्र से ही तीन ऋण (देव, ऋषि व पितृ ऋण) होते हैं। इनमें पितृ ऋण से मुक्ति के लिए श्रद्धापूर्वक अन्न, जल, आदि समर्पित करने की धार्मिक क्रिया को श्राद्ध कहते हैं। अपने पितरों के निमित्त श्रद्धापूर्वक किये जाने वाले श्राद्ध से पितृ योनि में भटकती हुई आत्मा को शांति मिलती है न की मुक्ति ? यह अपने किये हुए कर्मों का फल भोगने के लिए
‘‘पुनरपि जननम् - पुनरपि मरणम्’’
के सिद्धांतानुसार बार-बार अलग-अलग योनियों में जन्म लेकर भटकते रहते हैं। यही पितृयोनि में भटकती हुई आत्मा का चक्र मोक्ष पर्यन्त काल तक चलता रहता है। इसलिए पितृयोनि में पृथ्वी और यमलोक के बीच भटकती हुई आत्मा को मोक्ष के लिए कुल वंशज तृप्ति संतुष्टि के लिए श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करते हैं। परंतु श्राद्ध से पितरों की मुक्ति संभव नहीं है। प्रेत या पितृ योनि में भटकती हुई आत्मा कष्ट भोगकर अपने कुल को श्राप देती है, इसी पितृश्राप को शास्त्रों में पितृदोष कहा गया है। पौराणिक ग्रंथ पुराणों में लिखा है कि शरीर पंचतत्व में विलीन हो जाता है। आत्मा अमर रहती है, मरती नहीं है? संकलन सेवा:वि.रा.भारती। यही आत्मा पितर-दोष के रूप में आपके परिवार के आस-पास मडंराती रहती है। स्वयं दुखी होकर नकारात्मक ऊर्जा द्वारा अपने परिवार को परेशान करती है। पितृ आत्मा का मोक्ष नहीं होने तक नरक से भी ज्यादा कष्ट भोगती है। यही कष्ट आपके परिवार के दुखों का कारण बनता है। पितृ दोष के कारण ही परिवार में अशांति, दुख, कष्ट, कलह, दुर्घटना, रोग और वंशहीनता आती है। यदि आपका परिवार इन्हीं सभी परेशानियों में उलझा हुआ है तो आपके परिवार पर पितृदोष का प्रभाव है और इस दोष से मुक्ति के लिए श्राद्ध करना ही उपाय है। पितरों के मोक्षधाम के लिए हिमालय पर स्वर्गारोहिणी के रास्ते अलकनंदा के किनारे बद्रीनाथ धाम के पास सिद्ध क्षेत्र ब्रह्मकपाल में पितृ मोक्ष कराकर पितृदोष व पितृण से जन्म-जन्मांतर के लिए मुक्त हो जाते हैं तथा पितृ योनि में भटकती हुई आत्मा को भी मोक्ष अर्थात् मुक्ति मिलती है और कुल वंशज को वरदान स्वरूप जो प्राप्त होता है उसके विषय में पुराणों में लिखा है...

☀आयुः प्रजां धनं विद्यां, स्वर्गं मोक्ष सुखानि च।
प्रयच्छति तथा राज्यं पितरः मोक्षतर्पिता।।

🔸 अर्थात्: जो लोग अपने पितरों के निमित्त श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करने के बाद भी पितृदोष से मुक्ति के लिए सिद्ध क्षेत्र ब्रह्मकपाल में अपने पितरों के निमित्त पितृ मोक्ष, पिंडदान व तर्पण आदि करने से पितरों को मुक्ति, मोक्ष की प्राप्ति होती है तथा पितृमोक्ष से आयु, वंशवृद्धि, धन-धान्य, स्वर्ग, राजयोग व अन्य सभी भौतिक सुख सुविधा मिलती है। पितृदोष शांति के लिए पुष्कर, हरिद्वार, प्रयाग, काशी, गया जी है। प्राचीन ग्रंथों में वर्णित ब्रह्मकपाल उत्तराखंड में स्थित बद्रीनाथ धाम के समीप अलकनंदा नदी के किनारे यह विश्व प्रसिद्ध तीर्थ पित्रों की मोक्ष प्राप्ति का तीर्थ है। संकलन सेवा:वि.रा.भारती। ऐसी मान्यता है कि बिहार में गया जी में पित्र शांति मिलती है किंतु ब्रह्मकपाल में मोक्ष मिलता है। यहां पर पितरों का उद्धार होता है। इस संबंध में पुराणों व धर्म शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि इस पावन चमत्कारी सिद्ध क्षेत्र ब्रह्मकपाल में पित्रों के निमित्त श्रद्धापूर्वक पिंडदान व तर्पण करने से पितरों को मोक्ष, मुक्ति मिलती है। तथा पूर्वजों को ब्रह्मकपाल तीर्थ पर पिंडदान व तर्पण करने के बाद श्राद्धकर्म व अन्य जगह पिंडदान की आवश्यकता नहीं है। इस संबंध में मत्स्य पुराण में उल्लेख मिलता है।

☀ पितृतीर्थ ब्रह्मकपालम् सर्वतीर्थवर सुभम्।
यत्रास्ते देव देवेशः स्वमेव पितामह’’।।

🔸अक्षय तृतीया से दीपावली तक बद्रीनाथ धाम के समीप ही ब्रह्मकपाल सिद्ध क्षेत्र में पितृदोष मुक्ति के निमित्त पिंडदान व तर्पण का विधान है। इसके अलावा बर्फीला प्रदेश होने से बर्फ से ढंका रहता है। मई से अक्तूबर-नवंबर तक यहां सहज रूप से पहुंचा जा सकता है और अपने पितरों के निमित्त पितृ दोष मुक्ति करा सकते हैं। संकलन सेवा:वि.रा.भारती। पितृदोष से ग्रसित व्यक्ति अपने पितरों के मोक्ष के लिए मुख्य रूप से हर वर्ष श्राद्ध पक्ष आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से लेकर आश्विन अमावस्या तक लाखों हिंदू धर्मावलंबी अपने पूर्वजों की पितृ योनि में भटकती हुई आत्मा को मुक्ति मोक्ष के लिए पिंडदान व तर्पण के लिए ब्रह्मकपाल आते हैं। परिवार का सदस्य चाहे वो गर्भपात हो, बच्चा, बूढ़ा या जवान हो मृत्यु होने पर पितर-दोष बनता है। यह शास्त्र वचन है। अपने कुल, वंश के जो मरणोपरांत पितृ लोक में विभिन्न योनियों में भटक रहे हैं उनकी आत्मा को उनके वंशज कुल के व्यक्ति इस चमत्कारी सिद्ध क्षेत्र ब्रह्मकपाल में पितृ शांति कर उन्हें मोक्ष प्रदान कर सकते हैं। पितृ शांति विधि क्रम निम्न प्रकार है:

अग्नौ करणं पिंडदानं,
तर्पण तथा च ब्राह्मण भोजनम्।।

🔸पितृ शांति सिद्ध क्षेत्र ब्रह्मकपाल में पितृ मोक्ष से पूर्व गर्म तप्तकुंड में स्नान कर बद्रीनाथ धाम के दर्शन कर फिर उसके बाद ब्रह्मकपाल अलकनंदा नदी के किनारे पितृ मोक्ष के लिए पूजा अर्चना करता है। अपने पितरों की मुक्ति के लिए पिंडदान में काले तिलों का विशेष महत्व है। ऐसी भी मान्यता है कि अपने पितरों के निमित्त श्रद्धापूर्वक ब्रह्मकपाल में रविवार को करने से आरोग्य, सोमवार को सौभाग्य, मंगलवार को विजय, बुधवार को कामा सिद्धि, गुरुवार को धनलाभ, तथा शनिवार के दिन पितृशांति करने से दीर्घायु की प्राप्ति होती है। गरुड़ पुराण में ब्रह्मकपाल पितृ मोक्ष हेतु लिखा है-

☀ दद्यात् ब्रह्मकपालेऽस्मिन्,
पिंडम् पुत्रः अथवा अपरः।
सर्वम् ब्रह्मलोकम् याति,
नूनम् इति न संशयः।। -
।। गरुड़ पुराण ।।

🔶 अर्थात् - ब्रह्मकपाल में जो अपने पितरों के निमित्त स्वयं या कोई परिवार का सदस्य पिंडदान व तर्पण करता है तो अपने कुल के सभी पितर मुक्त होकर ब्रह्मलोक को जाते हैं। इसमें कोई संशय नहीं है। पितर मोक्ष के बाद श्राद्धकर्म की आवश्यकता नहीं है। ब्रह्मकपाल पर पिंडदान, तर्पण, होने के बाद मृत आत्माओं द्वारा आशीर्वाद वचन सिद्धि मिलने पर शास्त्रों में स्वर्णदान, अन्नदान, गोदान, वस्त्रदान, भूमिदान, देने का विधान है। संकलन सेवा:वि.रा.भारती। ऐसा करते ही आपके पितर मोक्ष स्वर्ग के लिए अंतिम यात्रा पूरी करेंगे। बद्रीनाथ धाम के समीप स्थित ब्रह्मकपाल तीर्थ में पितरों के मोक्षधाम के विषय में पुराणों में उल्लेख मिलता है कि जगत पिता ब्रह्माजी ने जब कामदेव को प्रकट किया तो कामदेव ने ब्रह्मा जी पर ही काम बाण चला बैठे, फलस्वरूप ब्रह्मा जी अपनी मानस पुत्री को ही देखकर काम-मोहित हो गये। उनके इस धर्म, दैवत्व, लोक विरूद्ध कृत्य को देखकर उनके मानस पुत्र मरीचि और अन्य ऋषियों ने अनेक प्रकार से पितामह ब्रह्मा जी को समझाने की चेष्टा की। इस पर भगवान भोलेनाथ शिव धर्म की रक्षा के लिए निंदित कार्य को सहन नहीं कर सके और अपने त्रिशूल से ब्रह्मा जी के सिर को धड़ से अलग कर दिया। तभी से जगतपिता ब्रह्मा चतुर्मुखी कहलाने लगे, क्योंकि इस घटना से पहले उनके पांच सिर थे। तभी एक दिव्य घटना हुई। ब्रह्मा जी का वह पांचवां सिर भगवान महादेव शिव के हाथ से जा चिपका और भगवान महादेव को धर्म की रक्षा के लिए ब्रह्म हत्या का दोष लगा। भगवान देवाधिदेव महादेव शिव इस पाप के निवारण के लिए संपूर्ण आर्यावर्त भारत भूमि के अनेक तीर्थ स्थानों पर गये परंतु फिर भी इस जघन्य पाप से मुक्ति नहीं मिली। जब वे अपने धाम कैलाश पर जा रहे थे तो बद्रीकाश्रम में अलकापुरी कुबेर नगरी से आ रही मां अलकनंदा में स्नान करके भगवान शिव बद्रीनाथ धाम की ओर बढ़ने लगे कि 200 मी. पूर्व ही ब्रह्माजी का पांचवां सिर उनके हाथ से वहीं नीचे गिर गया। बद्रीनाथ धाम के समीप जिस स्थान पर वह सिर (कपाल) गिरा वह स्थान ब्रह्मकपाल कहलाया और भगवान देवाधिदेव महादेव को इसी स्थान पर ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति मिली। ब्रह्मकपाल में पिंडदान, तर्पण करने से घोर पापों से मुक्ति मिलती है तथा पितरों के निमित्त श्रद्धा-भक्ति पूर्वक पिंडदान, तर्पण करने से पूर्वज तथा सभी पितरों को मुक्ति व सद्गति प्राप्त होती है।

•●•┉┅━━┅━•❀••ॐ••❀•━━┅━┅┉•●•

🔸💠🔶हर हर महादेव🔶💠🔸
🔹🏵️🌼 जय श्री बद्रीनाथ जी 🌼🏵️🔹
🔹⭕ ॐ पितृदेवय नमः ⭕🔹
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🛑  गयासुर व श्री गया जी तीर्थ की कथा 🛑 °༺•═══════•❁•═══════•༻°🏵🕉☀ जय जय श्री राधे ☀🕉🏵💠 गयासुर व पितृमोक्ष तीर्थ श्री गया...
09/27/2026

🛑 गयासुर व श्री गया जी तीर्थ की कथा 🛑
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🏵🕉☀ जय जय श्री राधे ☀🕉🏵

💠 गयासुर व पितृमोक्ष तीर्थ श्री गया जी की कथा 💠

🔴 भारतवर्ष का प्रमुख पितृतीर्थ गया है। पित्र कामना करते हैं कि उनके वंश में कोई ऐसा पुत्र उत्पन्न हो, जो गया जाकर वहाँ उनका श्राद्ध करे। इस नगरी का नाम गया महान तपस्वी गयासुर राक्षस के नाम पर पड़ा है।

🔸सनतकुमार जी नारद जी को बताते हैं कि एक समय स्वयं ब्रह्मजी ने सृष्टि रचते समय गयासुर को उत्पन्न किया, कीच में जैसे कमल उत्पन्न होता है, वैसे ही असुर- जाति में भी कुछ भत्त उत्पन्न हो जाते हैं। भक्तराज प्रह्लाद का नाम प्रसिद्ध है। गयासुर भी इसी कोटि का भक्त था। बचपन से ही गय का हृदय भगवान विष्णु के प्रेम में ओतप्रोत रहता था। उसके मुख से प्रतिक्षण भगवान के नाम का उच्चारण होता रहता था।

🔸 उसने कोलाहल पर्वत पर जाकर घोर तपस्या की और बहुत दिनों तक श्वास रोक कर खड़ा रहा। उसकी ऐसी तपस्या देखकर इन्द्र घबराये कि कहीं मेरा सिंहासन न ले ले। ऐसा विचार कर सब देवताओं को ले ब्रह्मा के पास गये और सब वृतान्त कहा। संकलन सेवा:वि.रा.भारती। ब्रह्मा जी ने कहा, हमे इस विषय मे भगवान शिव के पास चलना चाहिए। तब सभी भगवान शिव जी के पास गये। महादेवजी ने सब देवताओं को साथ लिया और विष्णु के पास गये और प्रणाम कर स्तुति की। तब विष्णु भगवान् ने सब देवताओं से पूछा कि हे देवता लोग! आप सब किस कारण यहां आये हैं ? तब सब देवता बोले कि नारायण! गयासुर नामक एक भारी दैत्य उत्पन्न हुआ और उसने घोर तपस्या की। सो हे नाथ! वरदान देकर हम सबकी रक्षा कीजिए। तब विष्णुभगवान बोले-तुम लोग उसके पास चलो, मैं गरूड़ पर चढ़कर आता हूँ। सब देवताओं के चले जाने के बाद विष्णु भगवान गरूड़ पर चढ़कर गयासुर के पास आये और शंख से उसका शरीर स्पर्ष कर बोले हे दैत्यराज! तुम्हारी उग्र तपस्या देखकर हम अति प्रसन्न है और तुम्हें वरदान देने के लिए आयें हैं, वर मांगो। यह सुनकर गयासुर बोला हे प्रभु! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं और वर देने आयें हैं तो दया कर वर दीजिए कि मेरे स्पर्श से यावतसुर, असुर, कीट, पतंग, पापी, ऋषि, मुनि, प्रेत यह सभी पवित्र होकर मुक्ति को प्राप्त होवें। उसके वरदान को सुनकर विष्णु भगवान एवमस्तु कहकर सब देवता सहित निज आश्रम को चले गय।

🔸उसी दिन से गयासुर के दर्शन और स्पर्श से सभी जीव मुक्ति प्राप्त कर बैकुण्ठ को जाने लगे। धीरे-धीरे यमपुरी जनशुन्य हो गयी। तब यमराज इन्द्रादि देव सहित ब्रह्मा जी को लेकर विष्णु भगवान के पास गये और बोले हे दीनबन्धु! गयासुर के स्पर्श से सब बैकुण्ठ को जा रहे हैं और यमपुरी जनशून्य हो गयी। यमराज की ऐसी विनती सुन विष्णु भगवान बोले, हे ब्रह्मा आप गयासुर के समीप जाकर यज्ञ करने हेतु उसका शरीर मांगिए। विष्णु की आज्ञा पा ब्रह्मा जब गयासुर के पास आये तब असुर प्रणाम करके बोला हे प्रभु! आप मेरे समीप किसलिए आये हैं कृपाकर कहिये तब ब्रह्मा ने कहा, हे दैत्यराज! मैं तमाम पृथ्वीपर घूम आया और मुझे यज्ञ करने के निमित कोई भी पवित्र स्थान न मिला, इस वास्ते मैं तुम्हारे पास आया हूँ कि तुम्हारा शरीर नारायण के वरदान से पवित्र है सो अपना शरीर मुझे यज्ञ के हेतु दो। ब्रह्मा जी का ऐसा वचन सुन गयासुर अति हर्ष से बोला हे नाथ! आपही लोगों की कृपा से यह मेरा अधर्म शरीर पवित्र हुआ है सो आप इस पर यज्ञ अवश्य करिये जिससे यह और भी पवित्र हो जाय।

🔸सनतकुमार बोले हे नारद्! उसी समय गयासुर उतर दिशा की तरफ सिर करके लेट गया, तब ब्रह्मा ने सम्पूर्ण ऋषि औेर मुनि को बुलाकर गयासुर के उपर यज्ञारम्भ किया, यज्ञ के समाप्त होने पर सबके साथ ब्रह्मा स्नान करने ब्रहासरोवर पर उपस्थित हुए। संकलन सेवा:वि.रा.भारती। उसी समय गयासुर का शरीर हिलने लगा। तब ब्रह्माजी धर्मराज से बोले कि हे धर्मराज। आपके यहां जो देवमयी शिला है उसको लाकर इसके सिर पर रख दीजिए। उस शिला के रखने पर भी असुर स्थित न हुआ तब ब्रह्माजी फिर सब देवताओं के साथ लेकर विष्णु भगवान के पास गये। तब नारायण ने अपने शरीर में से एक विष्णु मूर्ति निकालकर दी, परन्तु मूर्ति लेकर रखने पर भी असुर स्थित न हुआ। तब ब्रह्माजी ने साक्षात् विष्णु का आवाहन किया। तब भगवान उस शिला पर गदा लेकर आ विराजे और ब्रह्मा भीं पांच रूप में प्रपितामह पितामह, फलवास, केदार, कनकेष्वर होकर स्थित हुए और गजरूप धारण करके गणेशजी, गदादित्य नाम से दक्षिणायम, उतरायण सूर्य शान्त नाम से, लक्ष्मी और सावित्री त्रिसन्ध्या तथा सरस्वती नाम से, इन्द्र वृहस्पति, वसुयक्ष, गन्धर्व और सम्पूर्ण देवता अपनी-अपनी शक्ति से गयासुर के देह को स्थिर किया। तब गयासुर का हिलना बन्द हुआ, तभी से विष्णु का नाम गदाधर हुआ। गयासुर के स्थिर होने पर विष्णु भगवान ने कहा हे असुर! मैं तुमसे अति प्रसन्न हूँ, वर मांगो। तब गयासुर बोला हे नाथ! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो यह वर दिजिए कि जब तक सूर्य, चन्द्रमा पृथ्वी पर है तब तक मेरे ऊपर इस शिला पर सब देवता विराजमान रहें और यह तीर्थ मेरे नाम से प्रसिद्ध हो । यहा स्नान तर्पण दानपुण्य करने से मनुष्य को सब तीर्थो से ज्यादा फल प्राप्त हो और गदाधर भगवान के दर्शन-पूजन से मनुष्यों के हजारों कुल तर जावें। जिन पित्रों के लिए यहां पिण्डदान दिया जाऐ वह ब्रह्मलोक वासी हो और पापों से मुक्त हो। गयासुर का यह वचन सुन विष्णु भगवान ने कहा कि ऐसा ही होगा। इसके उपरान्त ब्राह्मणों को बहुत सा द्रव्यमान देकर विदा किया। कुछ काल बीतने पर, ब्राह्मणों ने द्रव्य मांग कर धर्म यज्ञ किया, उसका धुआं स्वर्ग को गया। तब ब्रह्मा ने आकर ब्राह्माणों को श्राप दिया कि मेरे द्रव्य देने पर भी तुम लोगों ने द्रव्य मांगा, इसलिए तुम सदा दरिद्र ही रहोगे। संकलन सेवा:वि.रा.भारती। यह दूध - दही की जो नदियां है पानी हो जाय और यह स्वर्ग, रत्नादि के गृह हैं। वह मिट्टी के हो जाय व कल्पवृक्ष कामधेनू स्वर्ग को जावें। ब्रह्मा का ऐसा श्राप सुनकर सब ब्राह्मण हाथ जोड़कर बोले कि हे प्रभु! अपने दिये सम्पूर्ण पदार्थो को आपने नष्ट कर दिया। अब कृपा कर हम लोगों के जीविकाकार्य का उपाय बताइए। यह सुनकर दयावश हो ब्रह्माजी बोले कि जब तक सूर्य, चन्द्रमा हैं, तब तक तुम लोगों के जीविका के लिए यह क्षेत्र है। जो भी यात्री यहां आएगा वह तुम लोगो को अवश्य पूजेगा। तथा बिना इनकी उपस्थिति एवं सहायता के यात्रियों को गयाजी श्राद्ध की पूर्णता प्राप्त नहीं हो सकेगी।

🔸तब से गयासुर सबका उद्धार करता आ रहा है। यह एक भक्त का विश्व के कल्याण के लिये अद्भुत अवदान है।

🔸कहा जाता हैं कि गया में जिसका श्राद्ध हो गया हो, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। संकलन सेवा:वि.रा.भारती। इसी लिए गया में श्राद्ध और पिंडदान के बाद फिर श्राद्ध की आवश्यकता नहीं होती। 'गया' शब्द एक क्रिया बन गया है। लोग कहते हैं कि वे अमुक व्यक्ति की गया करने गए हैं।

✡ गयाजी माहात्मय ✡

🔸 सराहैां गयाजी द्याम को
विदित हिन्दुआन बीच मगद्य में गयाजी,
चारो अेार छायी है सब जानैं सुनाम को।
सकल सृष्टि कत्र्ता प्रभु बिष्णु बिराजें जहाँ,
संग-संग कमला भवानी आठेाबान है।
साद्युसंत देवता अैार गुणीजन महान,
द्यन्य मानै जीवन करिके प्रणाम को।
माता-पिता तारिबे को, आवतं अनेक लोग,
लोक को सराहैां कि सराहैां गयाजी द्याम को। ।
मंदिर एक बांका है
राम गयाजी गिरिवर की सुन्दर छाया में,
फल्गु की द्यारा मानो रजत की सलाका है।
पीले-पीले सिकता अनुपम शोभा देत्
बैठै किनारो पर अगणित बलाका हैं।
रवि की किरणों से चम-चम चमकती है,
बाल गोविन्द सेन की सोने की पताका है।
परम पुनीत श्रीविष्णु का यहाँ चरण छाप
अहिल्या ने बनाई मंदिर एक बांका है।

※•═•❖❀❖•═ஜ۩•ॐ•۩ஜ═•❖❀❖•═•※

💢🍃🌱⭐ ॐ हरि ॐ ⭐🌱🍃💢
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🛑 पुत्रदा एकादशी, पवित्रारोपणी एकादशी 🛑°༺•═══════••❁••═══════•༻°🏵🕉☀ जय जय श्री राधे ☀🕉🏵💠 पुत्रदा-पवित्रा, पवित्रोपना, पव...
08/23/2026

🛑 पुत्रदा एकादशी, पवित्रारोपणी एकादशी 🛑
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🏵🕉☀ जय जय श्री राधे ☀🕉🏵

💠 पुत्रदा-पवित्रा, पवित्रोपना, पवित्रारोपणी एकादशी, श्रावण, श्रीधर मास, गौर एकादशी 💠

☀️ 23 अगस्त 2026 की प्रातः से पूर्व 02:00 बजे से 24 अगस्त सोमवार प्रातः 04:18 तक एकादशी तिथि है।

⭕️ 24 अगस्त 2026 सोमवार को एकादशी का व्रत उपवास रखें।।

☀️ पारणा 25 अगस्त 2026 मंगलवार की प्रातः 05:55 से 06:20 तक। (समय दिल्ली अनुसार)

☀️ भगवान विष्णु को प्रिय पुत्रदा एकादशी वर्ष में दो बार आती है। एक बार श्रावण मास में और दूसरी बार पौष मास में। संकलन सेवा:वि.रा.भारती। उत्तर भारत में पौष मास की पुत्रदा एकादशी अधिक मनाई जाती है तो अन्य क्षेत्रों में श्रावण शुक्ल पुत्रदा एकादशी का अत्यंत महत्व है। इस श्रावण पुत्रदा एकादशी को पवित्रा एकादशी भी कहा जाता है और कुछ लोग इसे पवित्रोपना एकादशी भी कहते हैं।

☀ युधिष्ठिर ने पूछा : मधुसूदन ! श्रावण के शुक्लपक्ष में किस नाम की एकादशी होती है ? कृपया मेरे सामने उसका वर्णन कीजिये ।

☀ भगवान श्रीकृष्ण बोले : राजन् ! प्राचीन काल की बात है । द्वापर युग के प्रारम्भ का समय था । माहिष्मतीपुर में राजा महीजित अपने राज्य का पालन करते थे किन्तु उन्हें कोई पुत्र नहीं था, इसलिए वह राज्य उन्हें सुखदायक नहीं प्रतीत होता था । अपनी अवस्था अधिक देख राजा को बड़ी चिन्ता हुई । उन्होंने प्रजावर्ग में बैठकर इस प्रकार कहा: ‘प्रजाजनो ! इस जन्म में मुझसे कोई पातक नहीं हुआ है । मैंने अपने खजाने में अन्याय से कमाया हुआ धन नहीं जमा किया है । ब्राह्मणों और देवताओं का धन भी मैंने कभी नहीं लिया है । पुत्रवत् प्रजा का पालन किया है । संकलन सेवा:वि.रा.भारती। धर्म से पृथ्वी पर अधिकार जमाया है । दुष्टों को, चाहे वे बन्धु और पुत्रों के समान ही क्यों न रहे हों, दण्ड दिया है । शिष्ट पुरुषों का सदा सम्मान किया है और किसीको द्वेष का पात्र नहीं समझा है । फिर क्या कारण है, जो मेरे घर में आज तक पुत्र उत्पन्न नहीं हुआ? आप लोग इसका विचार करें।’

☀ राजा के ये वचन सुनकर प्रजा और पुरोहितों के साथ ब्राह्मणों ने उनके हित का विचार करके गहन वन में प्रवेश किया । संकलन सेवा:वि.रा.भारती। राजा का कल्याण चाहनेवाले वे सभी लोग इधर उधर घूमकर ॠषिसेवित आश्रमों की तलाश करने लगे । इतने में उन्हें मुनिश्रेष्ठ लोमशजी के दर्शन हुए ।

☀ लोमशजी धर्म के त्तत्त्वज्ञ, सम्पूर्ण शास्त्रों के विशिष्ट विद्वान, दीर्घायु और महात्मा हैं । उनका शरीर लोम से भरा हुआ है । वे ब्रह्माजी के समान तेजस्वी हैं । एक एक कल्प बीतने पर उनके शरीर का एक एक लोम विशीर्ण होता है, टूटकर गिरता है, इसीलिए उनका नाम लोमश हुआ है । वे महामुनि तीनों कालों की बातें जानते हैं ।

☀ उन्हें देखकर सब लोगों को बड़ा हर्ष हुआ। लोगों को अपने निकट आया देख लोमशजी ने पूछा : ‘तुम सब लोग किसलिए यहाँ आये हो ? अपने आगमन का कारण बताओ। तुम लोगों के लिए जो हितकर कार्य होगा, उसे मैं अवश्य करुँगा ।’

☀ प्रजाजनों ने कहा : ब्रह्मन् ! इस समय महीजित नामवाले जो राजा हैं, उन्हें कोई पुत्र नहीं है । हम लोग उन्हीं की प्रजा हैं, जिनका उन्होंने पुत्र की भाँति पालन किया है। उन्हें पुत्रहीन देख, उनके दु:ख से दु:खित हो हम तपस्या करने का दृढ़ निश्चय करके यहाँ आये है। द्विजोत्तम ! राजा के भाग्य से इस समय हमें आपका दर्शन मिल गया है। महापुरुषों के दर्शन से ही मनुष्यों के सब कार्य सिद्ध हो जाते हैं। मुने ! अब हमें उस उपाय का उपदेश कीजिये, जिससे राजा को पुत्र की प्राप्ति हो।

☀ उनकी बात सुनकर महर्षि लोमश दो घड़ी के लिए ध्यानमग्न हो गये। तत्पश्चात् राजा के प्राचीन जन्म का वृत्तान्त जानकर उन्होंने कहा : ‘प्रजावृन्द ! सुनो । राजा महीजित पूर्वजन्म में मनुष्यों को चूसने वाला धनहीन वैश्य था। वह वैश्य गाँव-गाँव घूमकर व्यापार किया करता था। एक दिन ज्येष्ठ के शुक्लपक्ष में दशमी तिथि को, जब दोपहर का सूर्य तप रहा था, वह किसी गाँव की सीमा में एक जलाशय पर पहुँचा। पानी से भरी हुई बावली देखकर वैश्य ने वहाँ जल पीने का विचार किया। इतने में वहाँ अपने बछड़े के साथ एक गौ भी आ पहुँची। संकलन सेवा:वि.रा.भारती। वह प्यास से व्याकुल और ताप से पीड़ित थी, अत: बावली में जाकर जल पीने लगी। वैश्य ने पानी पीती हुई गाय को हाँककर दूर हटा दिया और स्वयं पानी पीने लगा। उसी पापकर्म के कारण राजा इस समय पुत्रहीन हुए हैं। किसी जन्म के पुण्य से इन्हें निष्कण्टक राज्य की प्राप्ति हुई है ।’

☀ प्रजाजनों ने कहा : मुने ! पुराणों में उल्लेख है कि प्रायश्चितरुप पुण्य से पाप नष्ट होते हैं, अत: ऐसे पुण्यकर्म का उपदेश कीजिये, जिससे उस पाप का नाश हो जाय।

☀ लोमशजी बोले : प्रजाजनो ! श्रावण मास के शुक्लपक्ष में जो एकादशी होती है, वह ‘पुत्रदा एकादशी’ के नाम से विख्यात है। वह मनोवांछित फल प्रदान करनेवाली है। तुम लोग उसीका व्रत करो।

☀ यह सुनकर प्रजाजनों ने मुनि को नमस्कार किया और नगर में आकर विधिपूर्वक ‘पुत्रदा एकादशी’ के व्रत का अनुष्ठान किया। संकलन सेवा:वि.रा.भारती। उन्होंने विधिपूर्वक जागरण भी किया और उसका निर्मल पुण्य राजा को अर्पण कर दिया। तत्पश्चात् रानी ने गर्भधारण किया और समय आने पर बलवान पुत्र को जन्म दिया।

☀ इस कथा माहात्म्य को सुनकर मनुष्य पापों से मुक्त हो जाता है तथा इहलोक में सुख पाकर परलोक में स्वर्गीय गति को प्राप्त होता है ।

💠 पुत्रदा एकादशी व्रत की एक अन्य कथा 💠

☀ भद्रावती नगर में राजा सुकेतुमान व उनकी पत्नी शैव्या निवास करते थे। इस दंपत्ति के कोई संतान नहीं थी। दोनों को दिन-रात यह चिंता सताती थी कि उनकी मृत्यु के बाद उन्हें अग्नि कौन देगा। संकलन सेवा:वि.रा.भारती। इसी चिंता में दोनों दिन-रात दुखी रहते थे। एक दिन राजा दुखी मन से वन में गए। राजा को वन में प्यास लगी। कुछ दूर भटकने पर उन्हें एक सरोवर दिखा। सरोवर के पास पहुंचने पर राजा ने देखा कि वहां कुछ दूरी पर ऋषियों के आश्रम बने हुए हैं। वहां बहुत से मुनि वेदपाठ कर रहे थे। राजा ने सरोवर से पानी पीया। प्यास बुझाकर राजा ने सभी मुनियों को प्रणाम किया। ऋषियों ने राजा को आशीर्वाद दिया और बोले कि हम आपसे प्रसन्न हैं। राजा ने ऋषियों से उनके एकत्रित होने का कारण पूछा। तब उनमें से एक मुनि ने कहा कि वह विश्वदेव हैं और सरोवर के निकट स्नान के लिए आए हैं। राजा को ऋषियों ने बताया कि आज पुत्रदा एकादशी है, जो मनुष्य इस दिन व्रत करता है उसे संतान की प्राप्ति होती है। राजा ने मुनियों के कहे अनुसार पुत्रदा एकादशी का व्रत आरंभ किया और अगले दिन द्वादशी को पारण (व्रत खोला) किया। व्रत के प्रभाव स्वरूप कुछ समय के पश्चात रानी गर्भवती हुईं और इन्हें योग्य संतान की प्राप्ति हुयी।।

☀ पुत्रदा एकादशी के दिन संतान की दीर्घायु की कामना के लिए पति और पत्‍नी दोनों व्रत रखते हैं और भगवान विष्‍णु की आराधना करते हैं। संकलन सेवा:वि.रा.भारती। पौराणिक मान्‍यताओं के अनुसार, इस व्रत को करने से श्रीहरि और माता लक्ष्‍मी तो प्रसन्‍न होती ही हैं, साथ में सावन के महीने में होने वाली पूजा से भगवान शिव भी प्रसन्‍न होते हैं। इस दिन भगवान शिव का अभिषेक करने का भी विधान है।

☀ शास्त्रनुसार जोड़े से इस एकादशी का व्रत करने से पुत्र की दीर्घायु प्राप्‍त होती है और जो दंपती संतान सुख से वंचित हैं, उनके आंगन में भी किलकारी गूंजने लगती है। यह एकादशी सभी पापों को नाश करने वाली होती है। धार्मिक मान्यता है कि इस एकादशी की कथा पढ़ने और सुनने से कई गायों के दान के बराबर पुण्य फल प्राप्त होता है। इस व्रत में भगवान विष्णु जी और पीपल की पूजा करने का शास्त्रों में विधान है।
इस दिन श्री विष्णु सहस्रनाम स्त्रोत्र का पाठ करना अत्यंत ही फलदायक माना जाता है।

※•══•❖•══•◆•۩•ॐ•۩•◆•══•❖•══•※

सशङ्खचक्रं सकिरीटकुण्डलं
सपीतवस्त्रं सरसीरुहेक्षणम्।
सहारवक्षस्स्थलशोभिकौस्तुभं
नमामि विष्णुं शिरसा चतुर्भुजम्॥

─═✤•═❖•❥◥◣•°ॐ°•◢◤❥•❖═•✤═─

ॐ नारायणाय विद्महे। वासुदेवाय धीमहि।
तन्नो विष्णु प्रचोदयात्।।

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✴🌀ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ✴🌀

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🛑 कामिका एकादशी 🛑 ༺•═══•❁•═══•༻🏵🕉☀ जय जय श्री राधे ☀🕉🏵⚜ कामिका एकादशी, श्रीधर, श्रावण मास, कृष्ण एकादशी ⚜ 🔴  08 अगस्त 20...
08/09/2026

🛑 कामिका एकादशी 🛑
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🏵🕉☀ जय जय श्री राधे ☀🕉🏵

⚜ कामिका एकादशी, श्रीधर, श्रावण मास, कृष्ण एकादशी ⚜

🔴 08 अगस्त 2026 को दोपहर 01:59 से 09 अगस्त को प्रातः 11:04 तक एकादशी है।

09 अगस्त रविवार को एकादशी का व्रत (उपवास) रखें ।

🌼 पारण - 10 अगस्त प्रातः 05:47 से 08:0 तक

समय राजधानी दिल्ली अनुसार ।

☀ युधिष्ठिर ने पूछा : गोविन्द ! वासुदेव ! आपको मेरा नमस्कार है ! श्रावण (गुजरात महाराष्ट्र के अनुसार आषाढ़) के कृष्णपक्ष में कौन सी एकादशी होती है ? कृपया उसका वर्णन कीजिये ।

☀ भगवान श्रीकृष्ण बोले : राजन् ! सुनो । मैं तुम्हें एक पापनाशक उपाख्यान सुनाता हूँ, जिसे पूर्वकाल में ब्रह्माजी ने नारदजी के पूछने पर कहा था ।

🔴 कामिका एकादशी कथा 🔴

☀️ युधिष्ठिर के आग्रह पर श्रीकृष्ण ने कहा, राजन सुनों मैं तुम्हें कथा सुनाता हूं।

☀️ एक नगर में एक ठेठ ठाकुर और एक ब्राह्मण रहते थे। दोनों की एक दूसरे से बनती नहीं थी। आपसी झगड़े के कारण ठाकुर ने ब्राह्मण को मार डाला। इस पर नाराज ब्राह्मणों ने ठाकुर के घर खाना खाने से मना कर दिया। ठाकुर अकेला पड़ गया और वह खुद को दोषी मानने लगा ठाकुर को अपनी गलती महसूस हुई और उसने एक मुनी से अपने पापों का निवारण करने का तरीका पूछा इस पर, मुनी ने उन्हें कमिका एकदशी का उपवास करने के लिए कहा।

☀ ठाकुर ने ऐसा ही किया। ठाकुर ने व्रत करना शुरू कर दिया। एक दिन कामिका एकादशी के दिन जब ठाकुर भगवान की मूर्ति के निकट सोते हुए एक सपना देखा, भगवान ने उसे बताया, “ठाकुर, सभी पापों को हटा दिया गया है और अब आप ब्राह्मण हटिया के पाप से मुक्त हैं”। इसलिए, इस एकादशी को आध्यात्मिक साधकों के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि यह चेतना से सभी नकारात्मकता को नष्ट करता है और मन और हृदय को दिव्य प्रकाश से भर देता है।

🔴 अन्य प्रचलित कथा 🔴

☀ एक गांव में एक वीर श्रत्रिय रहता था। एक दिन किसी कारण वश उसकी ब्राहमण से हाथापाई हो गई और ब्राहमण की मृत्य हो गई। अपने हाथों मरे गये ब्राहमण की क्रिया उस श्रत्रिय ने करनी चाही। संकलन सेवा:वि.रा.भारती। परन्तु पंडितों ने उसे क्रिया में शामिल होने से मना कर दिया। ब्राहमणों ने बताया कि तुम पर ब्रहम हत्या का दोष है। पहले प्रायश्चित कर इस पाप से मुक्त हो तब हम तुम्हारे घर भोजन करेंगे।

☀ इस पर श्रत्रिय ने पूछा कि इस पाप से मुक्त होने के क्या उपाय है। संकलन सेवा:वि.रा.भारती। तब ब्राहमणों ने बताया कि श्रावण माह के कृष्ण पश्र की एकादशी को भक्तिभाव से भगवान श्रीधर का व्रत एवं पूजन कर ब्राहमणों को भोजन कराके सदश्रिणा के साथ आशीर्वाद प्राप्त करने से इस पाप से मुक्ति मिलेगी। पंडितों के बताये हुए तरीके पर व्रत कराने वाली रात में भगवान श्रीधर ने श्रत्रिय को दर्शन देकर कहा कि तुम्हें ब्रहम हत्या के पाप से मुक्ति मिल गई है।

☀ एकादशी के दिन स्नानादि से पवित्र होने के पश्चात् पूजा का संकल्प लेना चाहिए। इसके बाद श्री विष्णु के विग्रह का पूजन करना चाहिए। संकलन सेवा:वि.रा.भारती। भगवान विष्णु को फूल, फल, तिल, दूध, पंचामृत आदि पदार्थ निवेदित करके, आठों प्रहर निर्जल रहकर विष्णु जी के नाम का स्मरण और संकीर्तन करना चाहिए।

☀ नारदजी ने प्रश्न किया : हे भगवन् ! हे कमलासन ! मैं आपसे यह सुनना चाहता हूँ कि श्रवण के कृष्णपक्ष में जो एकादशी होती है, उसका क्या नाम है? उसके देवता कौन हैं तथा उससे कौन सा पुण्य होता है? प्रभो ! यह सब बताइये ।

☀ ब्रह्माजी ने कहा : नारद ! सुनो । मैं सम्पूर्ण लोकों के हित की इच्छा से तुम्हारे प्रश्न का उत्तर दे रहा हूँ । श्रावण मास में जो कृष्णपक्ष की एकादशी होती है, उसका नाम ‘कामिका’ है । उसके स्मरणमात्र से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है । उस दिन श्रीधर, हरि, विष्णु, माधव और मधुसूदन आदि नामों से भगवान का पूजन करना चाहिए ।

☀ भगवान श्रीकृष्ण के पूजन से जो फल मिलता है, वह गंगा, काशी, नैमिषारण्य तथा पुष्कर क्षेत्र में भी सुलभ नहीं है। सिंह राशि के बृहस्पति होने पर तथा व्यतीपात और दण्डयोग में गोदावरी स्नान से जिस फल की प्राप्ति होती है, वही फल भगवान श्रीकृष्ण के पूजन से भी मिलता है ।

☀ जो समुद्र और वनसहित समूची पृथ्वी का दान करता है तथा जो ‘कामिका एकादशी’ का व्रत करता है, वे दोनों समान फल के भागी माने गये हैं ।

☀ जो ब्यायी हुई गाय को अन्यान्य सामग्रियों सहित दान करता है, उस मनुष्य को जिस फल की प्राप्ति होती है, वही ‘कामिका एकादशी’ का व्रत करनेवाले को मिलता है । जो नरश्रेष्ठ श्रावण मास में भगवान श्रीधर का पूजन करता है, उसके द्वारा गन्धर्वों और नागोंसहित सम्पूर्ण देवताओं की पूजा हो जाती है ।

☀ अत: पापभीरु मनुष्यों को यथाशक्ति पूरा प्रयत्न करके ‘कामिका एकादशी’ के दिन श्रीहरि का पूजन करना चाहिए । जो पापरुपी पंक से भरे हुए संसारसमुद्र में डूब रहे हैं, उनका उद्धार करने के लिए ‘कामिका एकादशी’ का व्रत सबसे उत्तम है । अध्यात्म विधापरायण पुरुषों को जिस फल की प्राप्ति होती है, उससे बहुत अधिक फल ‘कामिका एकादशी’ व्रत का सेवन करनेवालों को मिलता है ।

☀ ‘कामिका एकादशी’ का व्रत करनेवाला मनुष्य रात्रि में जागरण करके न तो कभी भयंकर यमदूत का दर्शन करता है और न कभी दुर्गति में ही पड़ता है ।

☀ लालमणि, मोती, वैदूर्य और मूँगे आदि से पूजित होकर भी भगवान विष्णु वैसे संतुष्ट नहीं होते, जैसे तुलसीदल से पूजित होने पर होते हैं । जिसने तुलसी की मंजरियों से श्रीकेशव का पूजन कर लिया है, उसके जन्मभर का पाप निश्चय ही नष्ट हो जाता है ।

🌼 या दृष्टा निखिलाघसंघशमनी स्पृष्टा वपुष्पावनी
रोगाणामभिवन्दिता निरसनी सिक्तान्तकत्रासिनी ।
प्रत्यासत्तिविधायिनी भगवत: कृष्णस्य संरोपिता
न्यस्ता तच्चरणे विमुक्तिफलदा तस्यै तुलस्यै नम: ॥

☀ ‘जो दर्शन करने पर सारे पापसमुदाय का नाश कर देती है, स्पर्श करने पर शरीर को पवित्र बनाती है, प्रणाम करने पर रोगों का निवारण करती है, जल से सींचने पर यमराज को भी भय पहुँचाती है, आरोपित करने पर भगवान श्रीकृष्ण के समीप ले जाती है और भगवान के चरणों मे चढ़ाने पर मोक्षरुपी फल प्रदान करती है, उस तुलसी देवी को नमस्कार है।’

☀️ तुलसी दल पूजन का फल चार भार चाँदी और एक भार स्वर्ण के दान के बराबर होता है। संकलन सेवा:वि.रा.भारती। हे नारद! मैं स्वयं भगवान की अतिप्रिय तुलसी को सदैव नमस्कार करता हूँ। तुलसी के पौधे को सींचने से मनुष्य की सब यातनाएँ नष्ट हो जाती हैं। दर्शन मात्र से सब पाप नष्ट हो जाते हैं और स्पर्श से मनुष्य पवित्र हो जाता है।

☀ जो मनुष्य एकादशी को दिन रात दीपदान करता है, उसके पुण्य की संख्या चित्रगुप्त भी नहीं जानते । एकादशी के दिन भगवान श्रीकृष्ण के सम्मुख जिसका दीपक जलता है, उसके पितर स्वर्गलोक में स्थित होकर अमृतपान से तृप्त होते हैं । घी या तिल के तेल से भगवान के सामने दीपक जलाकर मनुष्य देह त्याग के पश्चात् करोड़ो दीपकों से पूजित हो स्वर्गलोक में जाता है ।’

☀ भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं : युधिष्ठिर ! यह तुम्हारे सामने मैंने ‘कामिका एकादशी’ की महिमा का वर्णन किया है । ‘कामिका’ सब पातकों को हरनेवाली है, अत: मानवों को इसका व्रत अवश्य करना चाहिए । यह स्वर्गलोक तथा महान पुण्यफल प्रदान करनेवाली है । जो मनुष्य श्रद्धा के साथ इसका माहात्म्य श्रवण करता है, वह सब पापों से मुक्त हो श्रीविष्णुलोक में जाता है ।
संकलन सेवा🙏: वी.रा.भारती

🌹🌴‼श्रीकृष्ण ‼🌴🌹
༺꧁ Զเधॆ Զเधॆ꧂༻

🔴 भगवान जगदीश्वर जी की आरती 🔴

"ओम जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे !!

जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का, सुख-सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का !!

मात पिता तुम मेरे, शरण गहूँ मैं किसकी, तुम बिन और न दूजा, आस करूँ मैं जिसकी !!

तुम पूरण परमात्मा, तुम अंतर्यामी, पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी !!

तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता, मैं सेवक तुम स्वामी, कृपा करो भर्ता !!

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति, किस विधि मिलूँ दयामय, तुमको मैं कुमति !!

दीनबंधु दुःखहर्ता, तुम रक्षक मेरे, करुणा हस्त बढ़ाओ, द्वार पडा तेरे !!

विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा, श्रद्धा विवेक बढाओ, संतन की सेवा !!

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे

𖡼•┄•𖣥𖣔𖣥•┄•𖡼•═ॐ═•𖡼•┄•𖣥𖣔𖣥•┄•𖡼

सशङ्खचक्रं सकिरीटकुण्डलं सपीतवस्त्रं
सरसीरुहेक्षणम् ।
सहारवक्षस्स्थलशोभिकौस्तुभं नमामि विष्णुं
शिरसा चतुर्भुजम् ॥

●❀┉┅━━┅━❀•ॐ•❀━━┅━┅┉●❀
मंगलम भगवान विष्णु, मंगलम गरुड़ ध्वज।
मंगलम पुण्डरीकाक्ष, मंगलाय तनो हरि।।

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◆ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ◆

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07/25/2026

🛑 मेरे प्रिया प्रियतम श्री राधेश्याम 🪷 जी के आज दिनांक 25-07-2026 के मंगला आरती दर्शन 🪷 जय जय श्री राधेश्याम 🙇‍♂️🌸🌷🪷💐💕🙏

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