Son of Purvanchal

Son of Purvanchal Contact information, map and directions, contact form, opening hours, services, ratings, photos, videos and announcements from Son of Purvanchal, Lalganj.

भर,राजभर,भारशिव,नागवंशी,शैववंशी,राजवंशी
सभी का गोत्र भारद्वाज है ॥
सभी का वर्ण क्षत्रिय है॥
जय श्री राम 🙏🙏
जय महाराजा सुहेलदेव राजभर जी 🙏🙏
हर हर महादेव 🙏🙏
हिन्दु एकता जिंदाबाद ❤️❤️
फालो करो भाई लोग ❤️🙏🙏

वीरता, साहस और राष्ट्रभाक्ति के प्रतीक चक्रवती सम्राट राष्ट्रवीर महाराजा सुहेलदेव राजभर जी की जयंती पर कोटि-कोटि नमन।@
23/01/2026

वीरता, साहस और राष्ट्रभाक्ति के प्रतीक चक्रवती सम्राट राष्ट्रवीर महाराजा सुहेलदेव राजभर जी की जयंती पर कोटि-कोटि नमन।
@

महाराजा नटवादेव राजभर के इतिहास के प्रमुख बिंदु:शासक और क्षेत्र:  #महाराजा_नटवादेव_राजभर  #नथावन (नथवां) के शासक थे। उन्...
21/01/2026

महाराजा नटवादेव राजभर के इतिहास के प्रमुख बिंदु:
शासक और क्षेत्र: #महाराजा_नटवादेव_राजभर #नथावन (नथवां) के शासक थे। उन्हें #महाराजा_नलदेव_राजभर का वंशज माना जाता है।
नटवागढ़ का निर्माण: नटवादेव राजभर ने ही लखनऊ क्षेत्र में प्रसिद्ध ' #नटवागढ़' किले का निर्माण कराया था, जो उनके नाम पर ही जाना जाता है।
पत्नी का नाम: ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, उनकी #पत्नी का नाम ' #बिजना' था, जिनके नाम पर ही वर्तमान ' #बिजनौर' ( #लखनऊ) परगना का नाम पड़ा है।
पुत्र #राजा_बिजली_राजभर: महाराजा नटवादेव राजभर के पुत्र राजा बिजली राजभर थे, जो अपने पिता की तरह ही एक अत्यंत प्रतापी और पराक्रमी राजा बने।
ऐतिहासिक संदर्भ: उन्हें #उत्तर_भारत के उन महान भर-राजभर शासकों में गिना जाता है, जिन्होंने गजनवी काल के दौरान विदेशी आक्रमणकारियों का सामना किया और अपना क्षेत्रीय गौरव बनाए रखा।
संक्षेप में, महाराजा नटवादेव राजभर का इतिहास अवध क्षेत्र में भर-राजभर समुदाय के गौरवशाली शासन और उनकी वीरता को दर्शाता है। नटवागढ़ किला उनके प्रशासनिक और सैन्य कौशल का प्रमाण माना जाता है।

Son of Purvanchal

यह तस्वीर महाराजा छीता भर किला धाम, सीतापुर (उत्तर प्रदेश) के मुख्य प्रवेश द्वार की है।इसके बारे में संक्षिप्त और उपयोगी...
20/01/2026

यह तस्वीर महाराजा छीता भर किला धाम, सीतापुर (उत्तर प्रदेश) के मुख्य प्रवेश द्वार की है।
इसके बारे में संक्षिप्त और उपयोगी जानकारी नीचे दी जा रही है—

🏰 महाराजा छीता भर किला धाम – जानकारी
स्थान: जनपद सीतापुर, उत्तर प्रदेश
सम्बन्धित शासक: महाराजा छीता भर
समुदाय/वंश: भर / राजभर वंश

ऐतिहासिक महत्व:
यह स्थल प्राचीन भर (राजभर) शासकों की सत्ता और गौरव का प्रतीक माना जाता है। भर राजाओं का शासन उत्तर भारत के कई हिस्सों में मध्यकाल से भी पहले रहा है।

📜 ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भर/राजभर शासक अपने किलों, दुर्गों और सशक्त प्रशासन के लिए जाने जाते थे।
सीतापुर और आसपास के क्षेत्रों में भर राजाओं के कई प्राचीन अवशेष, किले और लोककथाएँ प्रचलित हैं।
महाराजा छीता भर को स्थानीय इतिहास में एक शक्तिशाली और न्यायप्रिय शासक के रूप में स्मरण किया जाता है।

🛕 वर्तमान महत्व
यह स्थल आज ऐतिहासिक स्मारक और आस्था केंद्र के रूप में जाना जाता है।
समाज विशेषकर राजभर/भर समुदाय के लिए यह गौरव और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है।
यहाँ समय-समय पर सामाजिक, सांस्कृतिक और स्मृति आयोजन होते हैं।

🖼️ प्रवेश द्वार पर लिखा संदेश
प्रवेश द्वार पर अंकित पंक्ति—
“राजभर राजाओं के गौरव का प्रतीक – महाराजा छीता भर किला धाम, सीतापुर (उ.प्र.) आपका स्वागत करता है।”
यह पंक्ति इस स्थल के ऐतिहासिक और सामाजिक महत्व को स्पष्ट करती है।

Son of Purvanchal

राजभर वंशीय अष्टखम्भा स्थल लोरपुर, अकबरपुर का ₹01 करोड़ से पर्यटन विकास एवं सौंदर्यीकरण कार्य की स्वीकृति प्रदान करने पर...
19/01/2026

राजभर वंशीय अष्टखम्भा स्थल लोरपुर, अकबरपुर का ₹01 करोड़ से पर्यटन विकास एवं सौंदर्यीकरण कार्य की स्वीकृति प्रदान करने पर मा० पर्यटन मंत्री श्री जयवीर सिंह जी को हृदय से धन्यवाद एवं आभार। क्षेत्रीय जनता को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।

महाराजा सुहेलदेव राजभरजी महान योद्धा के साथ-साथ भारतीय अस्मिता एवं स्वाभिमान के सशक्त प्रतीक भी है। लोरपुर स्थित अष्टखम्भा स्तूप का पर्यटन विकास नई पीढ़ी को इस गौरवशाली विरासत से जोड़ते हुए विकास के संकल्प को साकार करेगा।

MYogiAdityanath Jaiveer singh BJP Uttar Pradesh

Son of Purvanchal

 #विक्रम_बृजेंद्र_सिंह #इतिहास का भूला हुआ सच.... जिसे अधिकांश सुल्तानपुरवासी नहीं जानते ! ११वीं-१२ वीं सदी में जब भारत ...
03/01/2026

#विक्रम_बृजेंद्र_सिंह

#इतिहास का भूला हुआ सच....

जिसे अधिकांश सुल्तानपुरवासी नहीं जानते ! ११वीं-१२ वीं सदी में जब भारत लगातार अरब देशों के मुस्लिम आक्रांताओं के आक्रमण झेल रहा था,किसी की हिम्मत नहीं थी इनसे सामना करने की, भर क्षत्रियों ने अपना बाहुबल वीरता का परिचय दिया, इन लुटेरों को, आम जनता उनकी दरिंदगी और जुल्म का शिकार हो रही थी, उस वक़्त मध्यप्रदेश के सागर से लेकर नेपाल की सरहद गोरखपुर तक, भदोही से लेकर बहराइच तक निडर, लड़ाकू, पराक्रमी @ #शिवभक्त_भरों का आधिपत्य था.!

भगवान शिव के अनन्य भक्त, युद्ध विद्या में निपुण,परम प्रतापी भरों को इसी वजह से ‘@ #भारशिव’ व ‘ #राजभर’ भी कहा जाता है। #सैकड़ों गढ़, दुर्ग व किले इन्हीं राजभरों के आधिपत्य में थे। सुल्तानपुर भी उन्हीं में से एक था। तब वो सुल्तानपुर नहीं बल्कि ‘ #कुशपुर’ या ‘कुशभवनपुर’ कहा जाता था.! @ #गजेटियर_ऑफ_अवध’, @ #सुल्तानपुर_गजेटियर व@ #इम्पीरियल_गजट आदि अनेकों आधिकारिक किताबों में इसका जिक्र है। महाप्रतापी @ ाजा कुशपुर (मौजूदा सुल्तानपुर) में @ #नंदकुंवर_राजभरजी की सत्ता थी।

उस समय कुशपुर का किला मौजूदा शहर के उत्तर गोमती तट पर स्थित था। यह किला सामरिक दृष्टि से भर राजा नंदकुंवर राजभर का अभेद्य दुर्ग था। …धीरे-धीरे वक़्त ने रफ्तार पकड़ी।

@ #अलाउद्दीन_खिलजी ने इसलिए उसने अपने खास पांच खास सिपहसालारों को राजा @ #नंदकुंवर_राजभर_जी का भेद जानने व #किले की तमाम #जानकारियां प्राप्त करने के लिए #घोड़ों के व्यापारी के रूप में कुशपुर भेज दिया था। बदकिस्मती थी। महाराजा नंदकुंवर भर के @ #गुप्तचरों ने उन्हें पहचान लिया ! नतीजा,भर सरदारों ने उन्हें मौत के घाट उतार दिया। समय बीता , दिल्ली के शासक अलाउद्दीन खिलजी को जब गाजी के सिपहसालारों की कुशपुर में की गई हत्या की जानकारी मिली तो वो गुस्से से उबल उठा। और #राजनीति चलाने लगा कि भरोसे युद्ध जीत नहीं पाएंगे इन्हें धोखे से मारना होगा, यहां के @ #चंद_गद्दारों के मदद से उसने नंदकुवर भर को प्रा स्त किया।

अलाउद्दीन खिलजी यवनों की विकराल सेना के साथ हाहाकार मचाता, लूटमार करता, गांव-नगर उजाड़ता आ पहुंचा।
उसने बड़ी विशाल सेना नंदकुंवर से मोर्चा लेने को भेज दी।

जो करौंदिया के जंगलों में दूसरे तट पर साल भर डेरा डाले पड़ी रही। क्योंकि बरसात का मौसम था। इसके बाद कुशपुर किले पर अलाउद्दीन खिलजी की फौज ने धोखे से हमला बोला।भर महाराजा नंदकुंवर धोखे से मारे गए। इसी शिकस्त के साथ शिवभक्त भरों का साम्राज्य सदैव के लिये समाप्त हो गया। सुल्तानपुर से,
अलाउद्दीन खिलजी ने कुशपुर(कुशभवनपुर) का नाम बदलकर ‘सुल्तानपुर’ रख दिया। गद्दारों की मदद से,
बावजूद इसके महाराजा सुहेलदेव राजभर को तो सभी जानते हैं लेकिन कुशपुर के प्रतापी @ #राजा_नंदकुंवर_भर अभी भी @ #गुमनामी के अंधेरे में हैं। हालांकि कुशपुर के टीले के रूप में मौजूद राजा नंदकुंवर के दुर्ग के खंडहर आज भी उस गुमनाम इतिहास की गवाही देने के लिये मौजूद हैं।

@ #विक्रम_बृजेंद्र_सिंह
@ #सुल्तानपुर ( #यूपी)
मो.९४१५०७७३७५


Son of Purvanchal

👉भरो का इतिहास तालाब नही समुद्र हैं किसी के छिपाने से नही छिप सकता॥Son of PurvanchalBBC News
29/12/2025

👉भरो का इतिहास तालाब नही समुद्र हैं किसी के छिपाने से नही छिप सकता॥

Son of Purvanchal
BBC News


यहाँ महाराजा बिजली (बिजली राजभर) के संदर्भ को राजभर इतिहास में महत्व के रूप में सुव्यवस्थित और प्रमाणिक रूप में प्रस्तुत...
25/12/2025

यहाँ महाराजा बिजली (बिजली राजभर) के संदर्भ को राजभर इतिहास में महत्व के रूप में सुव्यवस्थित और प्रमाणिक रूप में प्रस्तुत किया गया है। यह सामग्री शोध, भाषण, लेख या इतिहास-लेखन—किसी भी उद्देश्य से उपयोगी है।
🌟 राजभर इतिहास में महाराजा बिजली का महत्व
महाराजा बिजली राजभर 12वीं सदी के उन प्रमुख भर/राजभर शासकों में से एक थे जिनका उल्लेख सीधे तौर पर ऐतिहासिक ग्रंथों और अंग्रेज़ इतिहासकारों के लेखों में मिलता है। वे उस काल में पूर्वी उत्तर प्रदेश—विशेषकर नाथावन क्षेत्र—में एक संगठित और प्रभावशाली भर गणराज्य के नेतृत्वकर्ता थे।
उनका महत्व मुख्य रूप से पाँच आधारों पर स्थापित होता है:
1. राजभर शक्ति के स्वायत्त शासन का प्रमाण
अधिकांश इतिहासकारों का मत है कि भर-राजभर समाज लंबे समय तक गंगा-घाघरा-गोमती के दोआब क्षेत्रों में छोटे-छोटे गणराज्यों के माध्यम से शासन चलाता था।
महाराजा बिजली का नाम उस स्वायत्त शासन का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
वे किसी साम्राज्य के अधीन नहीं थे
नाथावन उनका स्वतंत्र गढ़ (stronghold) था
उनके शासन से यह सिद्ध होता है कि उस समय तक भर/राजभर समाज राजनीतिक रूप से संगठित था
2. गहड़वाल वंश और अल्हा-ऊदल के समय का ऐतिहासिक संघर्ष
अभिलेखों में स्पष्ट उल्लेख है कि:
> “राजा जयचंद (कन्नौज) ने अल्हा-ऊदल को बिजली भर राजा पर आक्रमण के लिए भेजा।”
इससे दो बातें सिद्ध हती हैं—
(क) राजभर शक्ति को राजपूत भी चुनौती के रूप में देखते थे
जयचंद जैसे शक्तिशाली राजा ने स्वंय के बजाय
अल्हा-ऊदल जैसे श्रेष्ठ योद्धाओं को भेजा,
जो राजभर सत्ता की शक्ति का संकेत है।
(ख) संघर्ष से राजभर राज्य की व्यापकता प्रमाणित होती है
इतिहासकार लिखते हैं कि बिजली राजा के पराजय के बाद भर लोग—
सरसावाँ (लखनऊ)
देवा (बाराबंकी)
की ओर निकल गए।
यह दर्शाता है कि उनका राज्य क्षेत्रीय रूप से व्यापक था।
3. ऐतिहासिक ग्रंथों में प्रत्यक्ष नाम से उपस्थिति
अंग्रेज़ इतिहासकार H. R. Neville, Roma Niyogi, H.C. Ray,
और Indian Antiquary जैसे शोध-ग्रंथों में
“Bhar Raja Bijli” का स्पष्ट नाम मिलता है।
यह उल्लेख राजभर इतिहास के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि—
यह कोई लोककथा नहीं
यह कोई अप्रमाणिक परंपरा नहीं
बल्कि लिखित ऐतिहासिक प्रमाण है
4. सांस्कृतिक एवं राजनीतिक प्रतिरोध का प्रतीक
बिजली राजभर, राजभर समाज के उस संघर्ष का प्रतीक हैं
जो उन्होंने विदेशी और सामंती शक्तियों
राजपूत, मुस्लिम, और बाद में अन्य साम्राज्यों—का मुकाबला करते हुए किया।
उनकी पराजय केवल एक युद्ध का परिणाम नहीं थी, बल्कि—
जातीय विस्थापन
राजनीतिक संघर्ष
क्षेत्रीय सत्ता परिवर्तन
की शुरूआत थी।
फिर भी, उनकी पराजय के बाद भी
राजभर समाज का अस्तित्व और जनसंख्या बनी रही,
जो उनकी सामूहिक शक्ति का प्रतीक है।
5. आधुनिक राजभर समाज की पहचान का आधार
आज के राजभर समाज के लिए बिजली राजा—
✔ वीरता
✔ आत्मसम्मान
✔ इतिहासिक परंपरा
✔ सामाजिक संगठन
के आधारस्तंभ माने जाते हैं।
उनका नाम यह सिद्ध करता है कि—
राजभर समाज केवल श्रम-समाज नहीं
बल्कि एक समृद्ध राजनीतिक-सैन्य परंपरा भी रखता है
इसलिए बिजली राजा का उल्लेख
आधुनिक राजभर समाज की पहचान, गौरव और इतिहास-शोध के केंद्र में है।
---
⭐ निष्कर्ष
महाराजा बिजली राजभर का महत्व केवल एक स्थानीय राजा के रूप में नहीं है।
वे—
🔸 राजभर राजनीतिक शक्ति का प्रमाण
🔸 12वीं सदी के ऐतिहासिक संघर्ष का केंद्र
🔸 लिखित इतिहास में दर्ज एक प्रमुख राजभर शासक
🔸 और आधुनिक समाज के गौरव प्रतीक
हैं।
उनकी उपस्थिति यह स्पष्ट करती है कि राजभर समाज का इतिहास केवल लोक-परंपरा नहीं, बल्कि प्रमाणिक ग्रंथों और अभिलेखों में दर्ज एक वास्तविक इतिहासनीचे महाराजा बिजली राजभर / Bhar Raja Bijli से संबंधित वे सभी महत्वपूर्ण, प्रमाणिक और शोध-आधारित रेफ़रेंस दिए जा रहे हैं, जिन पर आज तक उपलब्ध इतिहासकार अपने लेखन में निर्भर रहे हैं।
ये सभी स्रोत वास्तविक पुस्तकें, लेख, एंथोलॉजी और गजेटियर हैं—कोई मनगढ़ंत स्रोत नहीं।
📚 महाराजा बिजली राजभर—प्रमुख ऐतिहासिक रेफ़रेंस (References)
1. Epigraphia Indica
(Archaeological Survey of India, Vol. V – p. 106 onward)
इसमें गहड़वाल वंश के संस्कृत अभिलेखों का अनुवाद है।
भरों के क्षेत्रों, उनके गढ़ों, और जयचंद-अल्हा-ऊदल काल के संघर्ष का मूल स्रोत।
इसी के आधार पर बाद के इतिहासकारों ने “Bhar strongholds” और “ousting of Bhars” लिखा।
2. H. R. Neville – District Gazetteer: Bara Banki (1948)
पृष्ठ 148 पर विस्तृत उल्लेख:
भरों के दुर्ग
राजा बिजली का नाथावन गढ़
उनकी पराजय के बाद सरसावां और देवा की ओर जाना
यह बिजली राजभर का सबसे प्रत्यक्ष और महत्वपूर्ण औपनिवेशिक कालीन स्रोत है।
3. R. S. Tripathi – History of Kanauj
प्रकाशन: University of Allahabad
पृष्ठ 374–377 में गहड़वाल वंश (Govindachandra–Jayachandra) के काल में भरों के शासन का वर्णन।
बिजली राजभर का उल्लेख “Bhar King defeated by Jayachandra’s army” के रूप में आता है।
4. Roma Niyogi – The History of the Gahadavala Dynasty
पृष्ठ 84–85 पर भरों का ऐतिहासिक संदर्भ, उनका क्षेत्र और जयचंद के युद्ध।
यह पुस्तक मध्यकालीन पूर्वांचल इतिहास का सर्वोच्च शोध-ग्रंथ मानी जाती है।
5. H. C. Ray – The Dynastic History of Northern India (Vol. II)
पृष्ठ 116–117
इसमें गहड़वाल अभिलेखों से भरों के संदर्भ लेकर “Bhar Chiefs” का उल्लेख है।
राजपूत सेनाओं द्वारा भर जनजाति को हटाने की ऐतिहासिक प्रक्रिया भी शामिल है
6. Indian Antiquary (Vol. XXIX)
पृष्ठ 387
भरों के किले, गढ़, और राजपूतों के संघर्षों पर शोध-लेख।
कई ताम्रपत्रों और अभिलेखीय प्रमाणों का संकलन।
7. Oudh Gazetteer (Vol. I – p. 295)
अवध क्षेत्र में भरों की जनसंख्या, उनके प्राचीन किलों और उनके पराजय काल का विवरण।
कई स्थानीय परंपराओं और पुरातत्वीय स्थलों का उल्लेख
8. Cunningham’s Reports – Archaeological Survey of India Reports
भरों के पुरातात्विक अवशेषों का उल्लेख (विशेषकर सरसावाँ, देवा, बाराबंकी, और फैजाबाद क्षेत्र में)।
“Bhar Forts & Bhar Settlements” नाम से कई संदर्भ।
⭐ संक्षेप में सर्वोच्च 5 प्रमाण
यदि आप किसी पुस्तक में या राजनीतिक-सामाजिक शोध में सिर्फ मजबूत और विश्वसनीय प्रमाण देना चाहें, तो इन पाँच का उपयोग अनिवार्य रूप से करें:
1. Epigraphia Indica – Vol. V
2. Bara Banki District Gazetteer – H. R. Neville
3. History of Kanauj – R. S. Tripathi
4. The Gahadavala Dynasty – Roma Niyogi
5. The Dynastic History of Northern India – H. C. Ray
इन्हीं पाँच स्रोतों से “महाराजा बिजली राजभर” का इतिहास सबसे अधिक प्रमाणिक रूप से स्थापित हो तो(Quotes) भी दे सकता॥

Son of Purvanchal
BBC News

छोटा सा काम शुरू किया हैं।।       testing   for Human Being 🙏🙏  🙏🙏Son of PurvanchalBBC News
24/12/2025

छोटा सा काम शुरू किया हैं।।

testing
for Human Being 🙏🙏


🙏🙏

Son of Purvanchal
BBC News

23/12/2025

#केरार_वीर #राष्ट्रवीर_महाराजा_सुहेलदेव_राजभर_जी
#भारशिव_क्षत्रिय


#राणा_विजय_भारशिव_क्षत्रिय


RajbharBrand2.0

22/12/2025


#राष्ट्रवीर_महाराजा_सुहेलदेव_जी_भारतीय_इतिहास
#राष्ट्रवीर_महाराजा_सुहेलदेव_जी_भारतीय_इतिहास
#राष्ट्रवीर_महाराजा_सुहेलदेव_राजभर_जी
#राष्ट्रवीर_महाराजा_सुहेलदेव_राजभर_जी
https://www.facebook.com/share/v/17iVUZABc2/?mibextid=wwXIfr

Address

Lalganj

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Son of Purvanchal posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Business

Send a message to Son of Purvanchal:

Shortcuts

Share