11/05/2026
> “हमने तो हर दर्द हँसकर छुपा लिया,
> लोग समझे कि हमें तकलीफ़ ही नहीं होती…”
> “कुछ ज़ख्म ऐसे होते हैं साहब,
> जो दिखते नहीं… मगर उम्रभर दर्द देते हैं।”
> “जिसे सबसे ज़्यादा चाहा,
> उसी ने सबसे ज़्यादा अकेला छोड़ दिया।”
> “अब शिकायत नहीं किसी से,
> क्योंकि जो अपना था वही समझ नहीं पाया।”
> “दिल तो आज भी करता है बात करने का,
> मगर डर लगता है फिर से टूट जाने का।”
> “कभी-कभी इंसान इतना टूट जाता है,
> कि रोना भी उसे कमजोर लगता है।”
> “हम बुरे नहीं थे साहब,
> बस जिनके लिए अच्छे बने… उन्होंने कदर नहीं की।”
> “वक्त बदलने में वक्त नहीं लगता,
> आज अपने हैं… कल अजनबी भी हो सकते हैं।”
> “मुस्कुराना हमारी मजबूरी बन गई,
> वरना दर्द तो आज भी बेहिसाब है।”
> “दिल में दर्द हो तो लोग कहते हैं संभल जाओ,
> कोई ये नहीं पूछता कि टूटा कैसे…”
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