23/07/2026
सिद्धू और कान्हू मुर्मू झारखंड के महान आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने 1855-1856 के ऐतिहासिक 'संथाल हूल' (विद्रोह) का नेतृत्व किया।: ब्रिटिश शासन के दौरान साहूकारों और जमींदारों द्वारा आदिवासियों का अत्यधिक आर्थिक शोषण किया जा रहा था। इसके खिलाफ दोनों भाइयों ने जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए क्रांति का बिगुल फूंका।हूल क्रांति की शुरुआत: 30 जून 1855 को भोगनाडीह में एक विशाल सभा हुई, जिसमें नारा दिया गया—‘करो या मरो, अंग्रेजों हमारी माटी छोड़ो’। इसी दिन की याद में हर साल 30 जून को हूल दिवस मनाया जाता है।क्रांतिकारी नेतृत्व: सिद्धू और कान्हू के साथ उनके दो अन्य भाई—चांद और भैरव—भी इस सशस्त्र विद्रोह में कंधे से कंधा मिलाकर लड़े। महिलाओं में उनकी बहनों फूलो और झानो ने भी बढ़-चढ़कर भाग लिया।शहादत: अंग्रेजों ने इस विशाल जन-आंदोलन को दबाने के लिए मार्शल लॉ तक लगा दिया था। विश्वासघात के कारण, जुलाई 1856 में दोनों भाइयों को गिरफ्तार कर लिया गया और अंग्रेजों द्वारा उन्हें फांसी दे दी गई।🙏🙏🙏✍️✍️✍️💪💪💪🎯🎯🎯 @