13/05/2026
महाराष्ट्र के किसान प्रकाश गलधर की यह व्यथा हमारे कृषि प्रधान देश की कड़वी सच्चाई को उजागर करती है। 12 क्विंटल 62 किलो प्याज उगाने के लिए महीनों पसीना बहाने के बाद, जब वे बाजार पहुंचे तो उन्हें मात्र 100 रुपये प्रति क्विंटल का भाव मिला। कुल बिक्री 1262 रुपये की हुई, लेकिन जब खर्चों का हिसाब लगाया गया तो स्थिति और भी भयावह निकली। गाड़ी भाड़ा, बोरी, हमाली, तोलाई और भराई मिलाकर कुल खर्च 1263 रुपये हो गया। यानी फसल बेचने के बाद किसान को लाभ तो दूर, उल्टा अपनी जेब से 1 रुपया चुकाना पड़ा।
यह घटना देश के किसानों की दयनीय आर्थिक स्थिति और बाजार की अनिश्चितता का प्रमाण है। बढ़ती लागत और फसलों के गिरते दाम ने अन्नदाता को कर्ज और मानसिक तनाव की कगार पर खड़ा कर दिया है। आज किसान सवाल पूछ रहा है कि अगर खून-पसीना एक करने के बाद भी उसे अपनी मेहनत का सही दाम नहीं मिलेगा, तो वह खेती क्यों करेगा? यह महज एक किसान की कहानी नहीं, बल्कि उन लाखों परिवारों का दर्द है जो पूरे देश का पेट भरते हैं लेकिन खुद खाली रसीद और आंखों में आंसू लेकर घर लौटते हैं।