Journalist Ashutosh

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कहाँ से आयी सोनपापड़ीहमारा देश अपनी विविधताओं और त्यौहारों के लिए पूरे विश्व में मशहूर है। यूँ तो बाज़ार में कई प्रकार क...
26/10/2022

कहाँ से आयी सोनपापड़ी

हमारा देश अपनी विविधताओं और त्यौहारों के लिए पूरे विश्व में मशहूर है। यूँ तो बाज़ार में कई प्रकार की मिठाइयाँ जैसे ‘कलाकंद’, ‘रसमलाई’, ‘काजूकतली’, ‘मोहनथाल’ आपको देखने को मिलेंगी जो स्वाद में एक से बढ़कर एक होती हैं । लेकिन दीपावली का त्यौहार आते ही जिस मिठाई की डिमांड सबसे ज़्यादा होती है वो है ‘सोनपापड़ी’। मुंह में रखते ही घुल जाने वाली मिठाई ‘सोनपापड़ी’ भारत में सबसे ज्यादा प्रचलित रही है। इसे कई नामों से जाना जाता है, जैसे सोन पापड़ी, सान पापड़ी, शोमपापड़ी और सोहन पापड़ी।

तो चलिए इस दीपावली सेलिब्रेशन के मौके पर जानिए, कहां से आई यह सोन पापड़ी जो इतना पॉपुलर हो गई...

सोनपापड़ी या सोहन हलवा या पतीसा बेशक भारतीय मिठाई है, लेकिन यह बांग्लादेश और पाकिस्तान में भी खूब खाई जाती है। इसके अस्तित्व की कहानी ज्यादा स्पष्ट तो नहीं है, लेकिन कहा जाता है कि पश्चिमी महाराष्ट्र से निकलकर यह भारत के कई हिस्सों तक पहुंची। एक कहानी है कि इसका जन्म उत्तर प्रदेश में हुआ। पश्चिम बंगाल, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और गुजरात में रहने वाले लोगों के बीच यह मिठाई ज्यादा पॉपुलर है।

भारत में बेशक इस मिठाई पर मीम्स बनते हैं, लेकिन सोनपापड़ी दुनिया की कई मशहूर मिठाइयों से मिलती-जुलती है। तुर्की का ‘पिस्मानिये’ ऐसी ही एक मिठाई है। तुर्की में ‘पिस्मानिये’ बड़े मशहूर हैं। ये भूने हुए आटे, मक्खन, और चीनी से बनते हैं और पिस्ते से सजाए जाते हैं। सोन पापड़ी भुने बेसन और खरबूजे के बीजों के मिश्रण से बनी होती है। सोनपापड़ी एक प्राचीन मिठाई ‘पतीसे’ की तरह ही होती है ,इनमें बस ये फर्क है कि पतीसा थोड़ा ज्यादा सख्त होता है, जबकि सोनपापड़ी मुँह में रखते ही घुल जाती है।

फेस्टिवल कोई भी हो, हमारे देश में मिठाइयों का अपना अलग ही महत्व है, लोग एक दूसरे को गिफ़्ट के रूप में मिठाइयाँ ज़रूर देते हैं।
दिवाली के मौके पर सबसे ज़्यादा गिफ़्ट दी जाने वाली और एक घर से दूसरे घर घूमने वाली मिठाई ‘सोनपापड़ी’ है, इसकी कई वजह रही हैं, जैसे- लम्‍बे समय तक इसका खराब न होना, आसानी से हर राज्‍य में उपलब्‍ध होना और ब्रांडेड प्रोडक्‍ट के तौर पर मौजूदगी।
तो देखा आपने, दिवाली की यह सबसे फ़ेमस मिठाई ‘सोनपापड़ी’ अपने आप में कितनी लाजवाब है।
आप भी ‘सोनपापड़ी’ के स्वाद का लुत्फ़ ज़रूर उठाएँ।

———✍🏻 आशुतोष कुमार दुबे

शहर-ए-ख़ास (बनारस)“उत्तर प्रदेश की काशी पवित्रता इसकी रूह हैंजिस्म इसकी संस्कृति,श्रृंगार इसका सुकून हैंघाटो से संवरती ह...
15/10/2022

शहर-ए-ख़ास (बनारस)

“उत्तर प्रदेश की काशी पवित्रता इसकी रूह हैं
जिस्म इसकी संस्कृति,श्रृंगार इसका सुकून हैं
घाटो से संवरती है यह, लहरों से निखरती हैं
महादेव के आशीर्वाद से ये नगरी हर पल चमकती है”॥
जी हां हम बात कर रहे हैं भारत के सुप्रसिद्ध शहर बनारस की। जिसे देश ही नही बल्कि दुनिया के सबसे प्राचीनतम शहरों की फ़ेहरिश्त में शुमार किया जाता है । भारत की सबसे पवित्र नदी गंगा के किनारे बसे होने के कारण और शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक “विश्वनाथ या विश्वेश्वर”जी मंदिर की वजह से यह स्थान समूचे विश्व में हिंदुओं की आस्था का एक प्रमुख केंद्र रहा है।इसलिए इसे अध्यात्म नगरी के नाम से भी जाना जाता है। तो चलिए हमारे साथ इस आध्यात्म नगरी की एक छोटी यात्रा पर और देखते हैं इस शहर के रूप और रंग की एक झलक।
बनारस नगरी का नाम सुनते ही जैसे मन में अलग ही आस्था उत्पन्न हो जाती है, यह पावन नगरी कितनी पौराणिक और धार्मिक है इसकी कल्पना मन में एक रोमांच पैदा कर देती है, हमारे आदि पुराणों में भी इस शहर का उल्लेख किया गया है, पहले काशी फिर बनारस और फिर वाराणसी और भी कई नामो में इसे जाना जाता है। बाबा विश्वनाथ के आशीर्वाद से यह नगरी महादेव की नगरी भी कही जाती है ।
दरअसल वनारस को उसका नाम यहां बहने वाली दो नदियों की वजह से मिला। यहां वरुणा और अस्सी नदियां प्रवाहित होने से दोनों नदियों के नाम को मिलाकर संयुक्त रूप से इस नगरी को वाराणसी कहा जाता है।
माँ गंगा का पावन मोक्ष्दायनी जल और शांत आनंदमयी धाटों का अनुभव कितना मनमोहक होता है शायद यहाँ आने वाले सभी लोग जानते होगे….बनारस की कुछ अलग ही बात है, जो हर शहर से भिन्न है, बनारस की साड़ियाँ, यहाँ का प्रशिद्ध पान, पुरानी विरासतों का शहर, चार विश्वप्रसिद्ध विस्वविध्यालय और भी बहुत कुछ है जो बनारस को ख़ास बनाता है।

जब बात हो रही हो बनारस की तो यहां की गलियों के ज़िक्र के बिना इस शहर की बात अधूरी सी लगती है, यह गालियां अनायास ही यहाँ आने वाले लोगों का दिल जीत लेती हैं, रंग बिरंगी मालाओं, आभूषणों और रामनामी कपड़ो से भरी दुकानें इन गलियों को हमेशा गुलज़ार रखती हैं
बनारस शहर अपने आप मे ही कई विरासत समेटे हुए है, फिर चाहे वो बनारसी पान ,बनारसी साड़ी या बनारसी शास्त्रीय संगीत क्यों न हो ।
यूँ तो बनारस में कुल 84 घाट हैं और काशी के सभी घाट बहुत मनोरम हैं,लेकिन इनमे से भी कुछ घाट ऐसे हैं जिनका पौराणिक दृष्टि से विशेष महत्व है । यहां हर घाट की अपनी एक अनोखी और रोचक कथा है।
‌इन घाटों पर बनारस एक अलग ही रंग रूप में नज़र आता है जिधर भी नज़र जाती है चारों तरफ रंग बिरंगे नांव, छोटी छोटी दुकाने और इंन सबके साथ यहां आने वाले श्रद्धालु और साधु संत सब मिलकर गंगा किनारे इन घाटों की सुंदरता को और बढ़ा देते हैं।

यूँ तो इन घाटों पर हमेशा ही लोगों की भीड़ होती है
‌लेकिन शाम के समय यह घाट लोगों की भीड़ से गुलज़ार नज़र आते हैं और लोगों को अपनी चकाचौंध व डमरू की आवाज़ से अपनी ओर आकर्षित करते हैं।
क्योंकि हर रोज़ शाम के समय इन घाटों पर माँ गंगा की आरती का वृहंगम दृश्य देखने को मिलता है, आरती के इस मनमोहक दृश्य को देखने के लिए रोजाना यहां लगभग 20 हज़ार से भी ज़्यादा लोग आते हैं।

वाराणसी(काशी) जिसे भगवान शिव की नगरी भी कहा जाता है। मान्यता है कि वह काशी भगवान भोलेनाथ के त्रिशूल पर टिकी है, वैसे तो यह कथन बहुत प्राचीन है, लेकिन आज भी कहा जाता है कि काशी इस पृथ्वी पर नहीं, बल्कि भगवान शिव के त्रिशूल पर स्थित है। वे जटा में जहां गंगा को धारण करते हैं, वहीं अपने त्रिशूल पर काशी को स्थान देते हैं।
पौराणिक ग्रंथों में त्रिशूल और काशी के बीच बहुत निकट के संबंध को बताया गया है। त्रिशूल से भगवान शिव भक्तों को अभय रहने का वरदान देते हैं और इसी से दुष्टों को दंड भी देते हैं।
त्रिशूल पर काशी को धारण करने का अर्थ है- काशी की प्राचीनता, पवित्रता की स्वयं भोलेनाथ रक्षा करते हैं। विभिन्न ग्रंथों में कहा गया है कि काशी में भगवान शिव अखंड वास करते हैं। यह बाबा विश्वनाथ की नगरी है जो संपूर्ण विश्व के नाथ हैं।
मनुष्य के जीवन में तीन तरह के कष्ट माने जाते हैं- दैविक, दैहिक और भौतिक। काशी के कण-कण में भगवान शिव का वास है। यहां शिव के दर्शन करने से ये तीनों ताप दूर होते हैं तथा जीवन में शीतलता का आगमन होता है। शिव के त्रिशूल से इन तीनों का शमन होता है। इसलिए कहा जाता है कि काशी शिव के त्रिशूल पर टिकी है।

ऐसी मान्यता है कि जो बनारस (काशी) में देहत्याग करता है, भगवान शिव स्वयं उसके कान में मुक्ति का मंत्र फूंकते हैं। ऐसी भी मान्यता है कि यहां प्राण त्यागने पर आत्मा इस नश्वर शरीर को त्याग कर सीधा स्वर्गलोक में प्रवेश करती है, शायद इसीलिए यहां विश्व का सबसे बड़ा शमशान मणिकर्णिका और हरिश्चन्द्र घाट स्थित है इन दोनों घाटों की मान्यता है कि यहां आजतक कभी भी चिता की आग कम नही हुई, यहाँ रोज़ाना आम की लकड़ियों के अलावा चंदन की लकड़ियों से भी हज़ारों की संख्या में दाह संस्कार किया जाता है, और इन दाह संस्कारों को केवल डोम जाति के ही लोग कराते हैं, आग की इन लपटों में जलकर यह नश्वर शरीर भस्म में तब्दील हो जाता है जिसे गंगा की इस पवित्र और अविरल धारा में प्रवाहित करके मानव जीवन की इस लीला का अंत होता है यह दृश्य देख कर यह मन मे यही एहसास होता है कि जीवन का असली और अंतिम पड़ाव यही है ।

…..,,.✍🏻आशुतोष कुमार दुबे

“जिसका जलवा कायम है” की क्‍या है कहानी, मुलायम सिंह यादव ज़मीन जनता की समझ और मिट्टी से जुड़ा एक युग आज समाप्त हो गया, ल...
11/10/2022

“जिसका जलवा कायम है” की क्‍या है कहानी, मुलायम सिंह यादव

ज़मीन जनता की समझ और मिट्टी से जुड़ा एक युग आज समाप्त हो गया, लोहिया जी की पाठशाला के सबसे सफल विद्यार्थी ने आज duniya को अलविदा कह दिया,मुलायम सिंह यादव एक ऐसा राजनेता जो उत्तर प्रदेश की राजगद्दी पर तीन बार बैठा, एक ऐसा राजनेता जिसको चुनाव जीताने के लिए लोगों ने उपवास तक रखा, और एक ऐसा राजनेता जिसने अपने पहले चुनाव के दौरान साइकिल के कैरीयर पर बैठकर चुनाव प्रचार किया था मुलायम सिंह को “धरती पुत्र”के साथ साथ “नेता जी” शब्द का भी तमग़ा मिला हुआ था …..आज़ादी के बाद से “नेताजी”शब्द को सुनते ही लोगों के ज़हन में जिस शक़्स का ख़याल स्वतः ही आ जाता है वो कोई और नहीं बल्कि देश के सबसे बड़े राज्य “उत्तर प्रदेश”के पूर्व मुख्यमंत्री एवं समाजवादी पार्टी के संस्थापक श्री मुलायम सिंह यादव जी हैं। नेताजी शब्द की पदवी मुलायम सिंह जी ने अपने राजनीतिक जीवन में कड़े संघर्षों के बाद प्राप्त किया था। अगर हम संक्षिप्त में कहें तो नेताजी जीवन और राजनीति से जुड़े संघर्षों की एक पूरी किताब थे। 22 नवम्बर सन् 1939 को इटावा ज़िले के सैफ़ई गाँव में मूर्ति देवी और सुधर सिंह के घर जन्मे मुलायम सिंह को उनके पिता एक पहलवान बनाना चाहते थे लेकिन शायद उनकी क़िस्मत में तो कुछ और ही लिखा था, अपने शुरुआती दिनों में मुलायम सिंह अंग्रेज़ी विषय के शिक्षक के रूप में काम करने लगे थे , इसके बाद बेहद कम उम्र में उन्होंने अपने राजनीतिक भविष्य की शुरुआत की ऐसा माना जाता है कि मुलायम सिंह को राजनीति में एंट्री जसवंतनगर के विधायक रहे नत्थू सिंह ने दिलाई थी। वर्ष 1967 में विधान सभा चुनाव के दौरान मुलायम सिंह ने 28 वर्ष की उम्र में पहली बार चुनावी दंगल में हिस्सा लिया और जसवंत नगर सीट से सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के रूप में प्रत्याशी बनकर जीत हासिल की और सबसे कम उम्र में उत्तर प्रदेश विधान सभा सदस्य के सदस्य चुने गए। इस चुनाव से जुड़ा एक क़िस्सा शायद ही आपको पता हो कि अपने पहले चुनाव के दौरान संसाधनों के अभाव में उन्होंने अपने मित्र दर्शन सिंह के साथ साइकल के पीछे कैरीअर पर बैठकर गाँव गाँव जा कर प्रचार किया, ऐसे में दोनों लोगों ने मिलकर “एक वोट, एक नोट “ का नारा दिया, दोनों आम जनता से चंदे में एक रुपया माँगते और उसे ब्याज़ सहित लौटाने का वादा करते और उससे जो पैसे इकट्ठा हुए उससे चुनाव प्रचार के लिए एक पुरानी ऐम्बैसडर कार ख़रीदी, अब कार तो आ गई थी लेकिन फिर समस्या यह आयी की कार के लिए तेल की व्यवस्था कैसे हो, ऐसे में जब गाँव वालों को यह पता चला तो उन्होंने निर्णय किया की हमें मुलायम सिंह जी के लिए पैसे की कमी नहीं होने देना है, हम सप्ताह में एक दिन एक समय खाना खाएँगे और उससे जो अनाज बचेगा उसे बेचकर उनके लिए कार में तेल भराएँगे। मुलायम सिंह के ज़बरदस्त याददाश्त की चर्चा आज भी राजनीतिक गलियारों में होती है, कहा जाता है कि मुलायम सिंह जिससे एक बार मिल लेते हैं उसे 30 साल बाद भी पहचान लेते थे, वह जब हेलिकॉप्टर से उड़ते थे तो ऊपर से गाँव देखकर बता देते थे कि यह कौन सा गाँव है। ऐसा भी कहा जाता है कि चुनावी दंगल में मुलायम जी को पटखनी देने के लिए लिए विरोधी दलों ने एक तरकीब निकाली थी जिससे मुलायम सिंह की टेन्शन बढ़ गयी थी कई बार विरोधियों ने चुनाव में उनके नाम जैसा ही उम्मीदवार मैदान में उतारा, तब जनता कहीं भ्रमित ना हो जाए इसके लिए मुलायम सिंह ने एक तरकीब निकाली और अपने नाम में अपने पिता का नाम जोड़ लिया और बैलेट पेपर पर उनका नाम मुलायम सुघड़ सिंह यादव छप कर आया, हालाँकि इसके बाद भी मुलायम सिंह ने चुनाव में विरोधियों को कड़ी शिकस्त दी।
मुलायम सिंह के राजनीतिक सफ़र की विस्तार पूर्वक बात करें तो वर्ष 1967 में उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव जीतने के बाद, 1977 में वो पहली बार उत्तर प्रदेश के राज्यमंत्री बनें ,1980 में वह लोकदल के अध्यक्ष बनें, 1982 से 1985 तक उन्होंने उत्तर प्रदेश विधान परिषद में विपक्ष के नेता के रूप में पद सम्भाला, वर्ष 1989 में वह पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने, 1990 में वह चंद्रशेखर की पार्टी जनता दल ( समाजवादी ) में शामिल हुए, इसके बाद वर्ष 1992 में मुलायम सिंह ने समाजवादी पार्टी (सोशलिस्ट ) की स्थापना की , 1993 में उन्होंने दूसरी बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली, 1996 में वह मैनपुरी क्षेत्र से 11वीं लोकसभा के सदस्य चुने गए, 1999 में वह संयुक्त मोर्चा गठबंधन सरकार के अंतर्गत भारत सरकार में रक्षा मंत्री बनें, 1999 में उन्होंने दो लोकसभा सीटों सम्भल और कन्नौज सीट से। चुनाव लड़ा और दोनों ही सीटें जीतीं, 2003 में फिर से तीसरी बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली, 2004 में उन्होंने 1,83,899 वोटों के अंतर से गन्नौर विधान सभा सीट पर जीत दर्ज की थी जो कि एक रिकोर्ड जीत मानी जाती है , और 2014 में उन्होंने 16वीं लोकसभा चुनाव के दौरान दो सीटों आज़मगढ़ और मैनपुरी से चुनाव लड़ा और दोनों ही सीटों पर जीत दर्ज की। मुलायम सिंह यादव भारतीय राजनीति में सबसे सफलतम नेताओं में से एक थे। उनकी सरलता, शालीनता और शिष्टाचार प्रेमी व्यवहार के सभी विरोधी दल भी क़ायल थे। राजनीति में सफलता के साथ साथ कई विवाद भी मुलायम सिंह के साथ जुड़े लेकिन उन सब विवादों को पीछे छोड़कर एक सधे हुए राजनेता और सांसद के तौर पर संसद में अपनी बात रखते थे। विरोधी उनके राजनीतिक फ़ैसलों से भले ही असहमत होते थे लेकिन नीजी जीवन में उनसे काफ़ी लगाव रखते थे ,आज “नेताजी” भले ही शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं रहे लेकिन भारतीय राजनीति में उनके योगदान को हमेशा याद किया जाएगा। और अपने समाजवादी विचारधारा के लिए वह हमेशा लोगों के दिलों में ज़िंदा रहेंगे।

विनम्र श्रद्धांजली “नेता जी” 💐🙏🏻🙏🏻

- ✍🏻 आशुतोष कुमार

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