Asif pathan

Asif pathan My name is Muhammad Asif Pathan,I am a resident of Bahraich district of Uttar Pradesh.

एक बार एक बहुत ही आलसी राजा था।इतना आलसी कि सुबह उठने में भी उसे एक सेना की ज़रूरत पड़ती थी।उसका वजीर उससे भी ज़्यादा आल...
12/01/2026

एक बार एक बहुत ही आलसी राजा था।
इतना आलसी कि सुबह उठने में भी उसे एक सेना की ज़रूरत पड़ती थी।
उसका वजीर उससे भी ज़्यादा आलसी था,
जो दिन भर बस अपने बिस्तर पर लेटा रहता था।
एक दिन राजा को ख्याल आया कि,
"अगर हम दोनों इतने आलसी हैं,
तो हमारी सल्तनत का क्या होगा?"
उसने अपने वजीर को बुलाया, जो बड़ी मुश्किल से घिसटता हुआ आया।
राजा ने कहा, "वजीर, मुझे एक ऐसा आदमी चाहिए,
जो मुझसे भी ज़्यादा आलसी हो।"
वजीर ने आँखें मींचते हुए कहा, "हुज़ूर, वो क्यों?"
राजा बोला, "ताकि मैं उसे देखकर खुद को कम आलसी महसूस करूँ!"
वजीर ने अपनी गर्दन खुजाई,
"माफ़ करें हुज़ूर, पर मुझे उस आदमी को ढूंढने के लिए
बिस्तर से उठना पड़ेगा...
और सच कहूँ, मुझे इतनी मेहनत करने का मन नहीं कर रहा।"
राजा गुस्से से बोला, "उठो और जाओ, फौरन!"
वजीर ने एक लंबी आह भरी और बोला,
"ठीक है हुज़ूर, पर क्या ऐसा नहीं हो सकता कि
आप ही मुझे बता दें कि वो आदमी कहाँ है,
और मैं यहीं से उसे आवाज़ लगा दूँ?"
राजा ने अपना माथा पीट लिया।
"तुम... तुम ही हो वो आदमी!
बस अब और कुछ मत कहना,
जाओ और मेरे बिस्तर पर ही सो जाओ!"
और वजीर खुशी-खुशी राजा के बिस्तर पर जाकर सो गया,
क्योंकि अपने बिस्तर तक जाने की मेहनत भी बच गई थी।
राजा अब सच में सोचने लगा कि
क्या सच में कोई उससे भी ज़्यादा आलसी हो सकता है? 😆😆😆
और यह रहा उस आलसी राजा और वज़ीर का नज़ारा:



Asif pathan

दास्तान-ए-नूरगढ़: भाग 2 – फर्ज की जंजीरें और जमीर की आवाजशाही अस्तबल में आग लगने की खबर ने नवाब जलालुद्दीन को आग-बबूला क...
12/01/2026

दास्तान-ए-नूरगढ़: भाग 2 –

फर्ज की जंजीरें और जमीर की आवाज

शाही अस्तबल में आग लगने की खबर ने नवाब जलालुद्दीन को आग-बबूला कर दिया था। दरबार में उसने गरजते हुए कहा, "कौन है यह परवाना? उसे जिंदा या मुर्दा, मेरे सामने पेश किया जाए!" वजीर बख्तियार ने तुरंत माहौल को भांपते हुए कहा, "हुजूर, यह कोई मामूली लुटेरा होगा। सेनापति इब्राहिम अपनी पूरी फौज लेकर उसे दबोच लेगा।" नवाब ने फौरन सेनापति इब्राहिम को यह जिम्मेदारी सौंप दी।
सेनापति इब्राहिम नूरगढ़ की फौज का सबसे बहादुर और वफादार सिपाही था, लेकिन उसकी वफादारी नवाब से ज्यादा अपने वतन और आवाम से थी। वह अक्सर रात में बेचैन रहता था, यह सोचकर कि वह एक जालिम नवाब की सेवा कर रहा है। उसकी आँखें नूरगढ़ की गलियों में फैले जुल्म को देखती थीं, और उसका जमीर उसे कचोटता था। अस्तबल की घटना ने उसके मन में उठते सवालों को और गहरा कर दिया। उसे यकीन नहीं था कि यह काम कोई मामूली चोर कर सकता है। जिस तरह से यह हमला किया गया था, उसमें एक गहरी सोची-समझी रणनीति दिखती थी, जो सिर्फ एक कुशल योद्धा ही कर सकता है।
इब्राहिम ने भेष बदलकर शहर का मुआयना करना शुरू किया। वह हर उस जगह जाता जहाँ 'परवाना' की चर्चा होती। एक शाम, वह लोहारों की बस्ती से गुजर रहा था। वहाँ उसने आसिफ को देखा, जो अपनी भट्टी पर एक पुरानी और जंग लगी तलवार की धार तेज कर रहा था। आसिफ की कला और हाथों की फुर्ती देखकर इब्राहिम हैरत में पड़ गया। जिस सलीके से वह तलवार को संभाल रहा था, वह किसी आम लोहार का नहीं, बल्कि एक मंझे हुए तलवारबाज का तरीका था। इब्राहिम की अनुभवी आँखों ने उस तलवार में कुछ शाही निशान भी देखे, जिन्हें आसिफ बड़ी सावधानी से छुपा रहा था।
तभी, पास की एक दुकान से चीखने की आवाजें आईं। नवाब के कुछ सिपाही एक गरीब औरत को घसीटते हुए बाहर ला रहे थे और उसके बच्चे को छीनने की कोशिश कर रहे थे। आसिफ के सब्र का बांध टूट गया। उसने वही गरम तलवार उठाई, जिस पर वह काम कर रहा था, और एक झटके में सिपाहियों पर टूट पड़ा। उसकी चालों में वो फुर्ती थी, वो शाही पैंतरे थे, जो इब्राहिम ने सिर्फ अपने गुरु और पुराने सुल्तान को इस्तेमाल करते देखा था। आसिफ ने अकेले तीन सिपाहियों को पलक झपकते ही धूल चटा दी, बाकी दहशत में भाग खड़े हुए।
इब्राहिम तुरंत आसिफ के सामने आ गया, उसकी तलवार आसिफ की गर्दन पर थी। "तुम कौन हो, जवान? यह हुनर तुमने कहाँ से सीखा? तुम्हारी चालें किसी आम आदमी की नहीं हैं।"
आसिफ की आँखों में कोई खौफ नहीं था, सिर्फ एक शांत और गहरी आग थी। उसने अपनी पहचान छुपाने की कोशिश नहीं की, बल्कि एक रहस्यमयी मुस्कान के साथ कहा, "सेनापति, मेरा नाम आसिफ है। और रही बात मेरे हुनर की, तो यह हुनर इस मिट्टी का है, जिसे सालों पहले आप जैसे वफादार लोगों ने खून देकर सींचा था, लेकिन बाद में आप भूल गए।"
इब्राहिम का हाथ कांप गया। आसिफ के चेहरे में उसे मरहूम सुल्तान की झलक दिखाई दी। उसे उस रात की याद आई जब महल पर हमला हुआ था और नन्हे शहजादे को मरा हुआ मान लिया गया था। इब्राहिम को अपनी आँखों पर यकीन नहीं हो रहा था। क्या यह वही शहजादा है? क्या 'परवाना' ही आसिफ खान है? उसके दिमाग में तूफानों का बवंडर चल रहा था—एक तरफ नवाब के प्रति वफादारी का फर्ज, दूसरी तरफ अपने जमीर की आवाज और अपने असली वारिस को पहचानने का एहसास। उसने धीरे से अपनी तलवार हटाई और आसिफ की आँखों में गहरी नजरों से देखा। "आज रात यहीं रहो, कल सुबह मैं तुमसे मिलूंगा।" इतना कहकर इब्राहिम वहाँ से चला गया, उसके कदम भारी थे और दिमाग में सवाल ही सवाल। सस्पेंस अब यह था कि इब्राहिम का अगला कदम क्या होगा? क्या वह नवाब को यह खबर देगा या 'परवाना' का साथ देगा?

आगे की कहानी अगले पार्ट में
#परवाना
#नवाब_जलालुद्दीन
#वजीर_बख्तियार
#शहजादा_आसिफ_खान
#इब्राहीम
#वायरल_पोस्ट। #लाइफ
Asif pathan

दास्तान-ए-नूरगढ़: भाग 1 –                                                            राख में दबी शाही चिंगारी. नूरगढ़ की...
12/01/2026

दास्तान-ए-नूरगढ़: भाग 1 –

राख में दबी शाही चिंगारी.
नूरगढ़ की रियासत कभी अपनी खुशहाली और अमन के लिए दूर-दूर तक जानी जाती थी, जहाँ फव्वारों से पानी नहीं, खुशियां बहती थीं। लेकिन अब उस रियासत पर काली घटाएं छा चुकी थीं। नवाब जलालुद्दीन का राज ऐसा था, जैसे सूरज को ग्रहण लग गया हो। उसकी हुकूमत में इंसाफ नहीं, सिर्फ जुल्म की तलवार चलती थी। नवाब का सबसे करीबी और खतरनाक साथी था उसका वजीर, बख्तियार, जिसकी निगाहें हमेशा दौलत और ताकत पर टिकी रहती थीं। बख्तियार की मक्कारी और जलालुद्दीन की क्रूरता ने मिलकर नूरगढ़ को एक डरावना ख्वाब बना दिया था। किसानों की फसलें छीन ली जाती थीं, कारोबारियों को लूटा जाता था और जो भी जुबान खोलता, उसे मौत के घाट उतार दिया जाता था।
शहर की इन्हीं गलियों में, जहां लोग खौफ के साये में जीते थे, एक गुमनाम साया अक्सर घूमता था। यह साया था आसिफ खान का, जो दिन के उजाले में एक मामूली लोहार बनकर भट्टी की आग में लोहा तपाता था, लेकिन रात के अंधेरे में वह 'परवाना' बन जाता। परवाना एक ऐसा रहस्यमय नाम था जो जुल्म के खिलाफ आवाज उठाता, गरीबों की मदद करता और नवाब के सिपाहियों को उन्हीं के अंदाज में जवाब देता था। किसी को कानों-कान खबर नहीं थी कि आसिफ खान कोई मामूली इंसान नहीं, बल्कि नूरगढ़ का असली वारिस, शहजादा है, जिसे पंद्रह साल पहले हुए एक खूनी तख्तापलट से बचाकर चुपचाप बड़ा किया गया था। उसकी रगों में शाही खून दौड़ता था और उसकी आँखों में अपने पुरखों की रियासत को वापस पाने की आग थी।
एक सर्द रात, वजीर बख्तियार के इशारे पर नवाब के सिपाहियों ने एक बेगुनाह बुजुर्ग किसान को लगान न चुका पाने के जुर्म में बेरहमी से पीटना शुरू कर दिया। आसिफ भीड़ में मौजूद था। उसकी मुट्ठियां भींच गईं, लेकिन उसने खुद को रोके रखा। वह जानता था कि यह सिर्फ एक चिंगारी है, जिसे सही वक्त पर आग में बदलना है। उसी रात, नवाब के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले शाही अस्तबल में अचानक आग लग गई। सुबह तक कई कीमती घोड़े जल चुके थे और अस्तबल की दीवार पर कोयले से लिखा था: "जुल्म की राख से ही परवाना उड़ता है।" यह संदेश नवाब के लिए एक खुली चुनौती थी, और लोगों के लिए उम्मीद की एक नई किरण।

पार्ट 2 के लिए करे


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Asif pathan

25/12/2025

Chill vibes to you friends ❤

बहराइंच में गोपाल की हत्या करने वाले को कोर्ट ने फांसी की सज़ा सुनाई है!अब देखना ये है के इस मासूम बच्चे की हत्या करने वा...
13/12/2025

बहराइंच में गोपाल की हत्या करने वाले को कोर्ट ने फांसी की सज़ा सुनाई है!
अब देखना ये है के इस मासूम बच्चे की हत्या करने वाले को भी कोर्ट फांसी की सज़ा सुनाता है या नहीं!
क्योंकि हमनें सुना है के भारत में क़ानून सबके लिए बराबर.....?
वैसे इस से पहले अनेकों मुस्लिम नौजवानों को झूठा इल्जाम लगाकर क़त्ल कर दिया गया लेकिन उनको अभी तक इंसाफ नहीं मिला पाया आखिर क्यों...??


Asif pathan

शहरों में तो बारुदों का मौसम है।गांव चलो ये अमरुदों का मौसम है।          Asif pathan
13/12/2025

शहरों में तो बारुदों का मौसम है।
गांव चलो ये अमरुदों का मौसम है।


Asif pathan

बहराइच हिंसा मे सजा पाने वाले परिवार वालो की महिलाओं का दर्द सुनिए , जिस दिन मेरे पिताजी नेपाल गए थे उस दिन ये हिंसा हुई...
13/12/2025

बहराइच हिंसा मे सजा पाने वाले परिवार वालो की महिलाओं का दर्द सुनिए , जिस दिन मेरे पिताजी नेपाल गए थे उस दिन ये हिंसा हुई जबकि हमारा मकान हिंसा वाले क्षेत्र से 10 किलोमीटर दूर है , जानबूझकर हमारे परिवार के लोगों को फंसाया गया है , हम कोर्ट के फैसले से संतुष्ट नहीं है ,ओर हमारे भाई और बाप को जानबूझकर फसाया गया कि इलाके में प्रधानी की वजह से हमारे परिवार को फसाया गया ओर हमारे साथ नाइंसाफी हुई क्योंकि हमारे परिवार वाले लोग बाग थोड़े एक्टिव रहते थे इसलिए उनके सबसे पहले फसाया गया ओर हम सरकार से अपील करना चाहते है कि हमें इंसाफ मिले और पुलिस प्रशासन अच्छे से इन्वेस्टिगेशन करे कि मेरे बाप ओर भाई उस दिन गांव में थे ही नहीं जबकि वो तो नेपाल गए हुए थे पोस्ट शेयर करते रहे हैं ताकि सभी भाइयों को इंसाफ मिले सके इस परिवार को आपके पेसो की जरूरत नहीं बल्कि आपकी आवाज की जरूरत है।

#पोस्ट_को_ज्यादा_से_ज्यादा_शेयर_करे

Asif pathan

Mashallah kya masjid hai     Asif pathan
08/12/2025

Mashallah kya masjid hai


Asif pathan

बाबर टोपियां नहीं सिलता था। वह प्रिंस था दर्ज़ी नहीं। मैलाना मैकियावली के मुताबिक़ उसका काम सत्ता पाना, उसे बचाना और फिर...
07/12/2025

बाबर टोपियां नहीं सिलता था। वह प्रिंस था दर्ज़ी नहीं। मैलाना मैकियावली के मुताबिक़ उसका काम सत्ता पाना, उसे बचाना और फिर साम्राज्य में तब्दील करना था। यूं भी उसके ज़माने में एक आने की दो दर्जन टोपियां मिल जाती थीं। टोपी सिलने में समय बरबाद करने की बजाय बाबर अपना वक़्त युद्ध नीति, कूटनीति, और विदेश नीति बनाने में ख़र्च करता था। अगर बाबर ने अपना समय बारूद, शतुरनाल, गजनाल, या ज़ंबूराक के विकास के बदले टोपियां सिलने, या क़ुरान की नक़ल लिखने में ख़र्च किया होता तो हुमायूं को फरग़ना में मुर्ग़ियां बेचनी पड़ जातीं और लाल क़िला बनाने की जगह शाहजहां समरक़ंद में तरबूज़ के ठेले लगाता... टोपी सिलना इज़ एन अटर वेस्टेज ऑफ मिलिट्री टैलेंट एंड एन एडमिनिस्ट्रेटिव स्किल ब्रो। यह ख़ुश होने की बात नहीं है। भाटों के क़िस्सों पर मत बहला कीजिए। इन क़िस्सों में जीने वालों से न एंपायर बनते हैं और न बचते हैं। :)

- Zaigham Murtza

*11 बार विधायक-सांसद रहे आजम खान अब कैदी नंबर 425:* 50 महीने जेल, 55 दिन बेल, फिर जेल; रामपुर के लोग बोले- योगी रहम..Asi...
07/12/2025

*11 बार विधायक-सांसद रहे आजम खान अब कैदी नंबर 425:* 50 महीने जेल, 55 दिन बेल, फिर जेल; रामपुर के लोग बोले- योगी रहम..

Asif pathan

.लखनऊ से कुछ 76 किलोमीटर दूर सीतापुर ज़िले का ऐतिहासिक कस्बा 'खैराबाद' अल्लामा फ़ज़्ल ए हक़ खैराबादी की ज़मीन है.... ये जानकर...
07/12/2025

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लखनऊ से कुछ 76 किलोमीटर दूर सीतापुर ज़िले का ऐतिहासिक कस्बा 'खैराबाद' अल्लामा फ़ज़्ल ए हक़ खैराबादी की ज़मीन है.... ये जानकर एक फख्र सा महसूस होता है कि मेरा बचपन उस ज़मीन पर खेलकर गुज़रा है जिस जमीन से एक आलिम ने 1857 में ज़ालिम अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ जिहाद का फ़तवा दिया था, और तब अंग्रेजों के ख़िलाफ़ अज़ीम क्रांति की शुरुआत हुई थी ... हालांकि मुल्क के अंदरूनी गद्दारों की वजह से अंग्रेज़ों ने उस क्रांति को कुचल दिया और फ़ज़्ल ए हक़ खैराबादी को गिरफ्तार कर काला पानी भेज दिया गया था....!!
अल्लामा फ़ज़्ल ए हक़ के वंशज शेरो शायरी की दुनिया में बहुत मशहूर हुए, मुज़्तर खैराबादी, जांनिसार अख़्तर और जावेद अख़्तर...
... खैराबाद में मेरे बचपन में लखौरी ईंटों के खण्डहर ही खण्डहर मौजूद थे, जिनमें मैं अपने दोस्तों के साथ खेला करता, मगर इतने सारे खण्डहरों की हकीकत बाद में पता चली कि 1857 के गदर में यहां के मुसलमान अंग्रेजों के खिलाफ जंग में कूद पड़े थे, जिनमें से कई शहीद और कई गिरफ्तार हुए, अंग्रेज़ों ने क्रांतिकारियों को सज़ा देने के लिये के खैराबाद मोहल्लों को आग लगा दी थी, जो बाकी लोग खैराबाद मे बचे थे उन्हें इधर उधर जाकर जान बचानी पड़ी...
वो खण्डहर तब की निशानी थे....

आज Shamim Uddin Ansari भाई ने इन पुराने कागज़ात की तस्वीर शेयर की, जो जावेद अख़्तर साहब के परदादा फ़ज़ले हक़ ख़ैराबादी के घर को ज़मींदोज़ करने के लिए 1857 में जारी हुआ सरकारी आदेश है... ये आदेश इसलिये दिया गया था क्योंकि उन्होंने ब्रिटिश सरकार के ख़िलाफ़ विद्रोह का फ़तवा दिया था।... शमीम भाई ने ये काग़ज़ात दिखाए तो हमें याद आया, कि उसी ज़मीदोज़ घर के पास ही तो हमारे दादा का भी घर है, ... कुछ अरसा पहले एक्टर साद बिलग्रामी ने एक इंटरव्यू में बताया था कि जावेद अख्तर साहब का मकान हमारे (साद के) घर के सामने ही है..... साद बिलग्रामी के पुरखे कभी ज़मींदार रहे थे, और उनकी हवेली भी खंडहर हो चुकी थी जिन खंडहरों में ही हम बचपन मे खेला करते थे... और इन्हीं खंडहरों के बारे में हमारे बड़ों ने हमें बताया था कि अंग्रेजों ने इन हवेलियों को आग लगाकर तबाह कर दिया था...
साद के पुरखों की हवेली के एक हिस्से को वापस बनवाकर उनके परदादा, दादा के बाद अब उनके वालिदैन रहते हैं, बाकी हिस्से उन्होंने दूसरे लोगों को बेच दिए, उसी खंडहर के एक हिस्से में हमारे दादा का भी अब घर है... बचपन मे अपने घर से निकल कर साद के घर के सामने से लेकर दूर दूर खंडहरों में हम खेलने जाया करते थे.... यानी अल्लामा फ़ज़्ल ए हक खैराबादी के घर के खंडहरों को हमने ज़रूर ही अपने बचपन में देखा होगा !!

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