12/01/2026
दास्तान-ए-नूरगढ़: भाग 2 –
फर्ज की जंजीरें और जमीर की आवाज
शाही अस्तबल में आग लगने की खबर ने नवाब जलालुद्दीन को आग-बबूला कर दिया था। दरबार में उसने गरजते हुए कहा, "कौन है यह परवाना? उसे जिंदा या मुर्दा, मेरे सामने पेश किया जाए!" वजीर बख्तियार ने तुरंत माहौल को भांपते हुए कहा, "हुजूर, यह कोई मामूली लुटेरा होगा। सेनापति इब्राहिम अपनी पूरी फौज लेकर उसे दबोच लेगा।" नवाब ने फौरन सेनापति इब्राहिम को यह जिम्मेदारी सौंप दी।
सेनापति इब्राहिम नूरगढ़ की फौज का सबसे बहादुर और वफादार सिपाही था, लेकिन उसकी वफादारी नवाब से ज्यादा अपने वतन और आवाम से थी। वह अक्सर रात में बेचैन रहता था, यह सोचकर कि वह एक जालिम नवाब की सेवा कर रहा है। उसकी आँखें नूरगढ़ की गलियों में फैले जुल्म को देखती थीं, और उसका जमीर उसे कचोटता था। अस्तबल की घटना ने उसके मन में उठते सवालों को और गहरा कर दिया। उसे यकीन नहीं था कि यह काम कोई मामूली चोर कर सकता है। जिस तरह से यह हमला किया गया था, उसमें एक गहरी सोची-समझी रणनीति दिखती थी, जो सिर्फ एक कुशल योद्धा ही कर सकता है।
इब्राहिम ने भेष बदलकर शहर का मुआयना करना शुरू किया। वह हर उस जगह जाता जहाँ 'परवाना' की चर्चा होती। एक शाम, वह लोहारों की बस्ती से गुजर रहा था। वहाँ उसने आसिफ को देखा, जो अपनी भट्टी पर एक पुरानी और जंग लगी तलवार की धार तेज कर रहा था। आसिफ की कला और हाथों की फुर्ती देखकर इब्राहिम हैरत में पड़ गया। जिस सलीके से वह तलवार को संभाल रहा था, वह किसी आम लोहार का नहीं, बल्कि एक मंझे हुए तलवारबाज का तरीका था। इब्राहिम की अनुभवी आँखों ने उस तलवार में कुछ शाही निशान भी देखे, जिन्हें आसिफ बड़ी सावधानी से छुपा रहा था।
तभी, पास की एक दुकान से चीखने की आवाजें आईं। नवाब के कुछ सिपाही एक गरीब औरत को घसीटते हुए बाहर ला रहे थे और उसके बच्चे को छीनने की कोशिश कर रहे थे। आसिफ के सब्र का बांध टूट गया। उसने वही गरम तलवार उठाई, जिस पर वह काम कर रहा था, और एक झटके में सिपाहियों पर टूट पड़ा। उसकी चालों में वो फुर्ती थी, वो शाही पैंतरे थे, जो इब्राहिम ने सिर्फ अपने गुरु और पुराने सुल्तान को इस्तेमाल करते देखा था। आसिफ ने अकेले तीन सिपाहियों को पलक झपकते ही धूल चटा दी, बाकी दहशत में भाग खड़े हुए।
इब्राहिम तुरंत आसिफ के सामने आ गया, उसकी तलवार आसिफ की गर्दन पर थी। "तुम कौन हो, जवान? यह हुनर तुमने कहाँ से सीखा? तुम्हारी चालें किसी आम आदमी की नहीं हैं।"
आसिफ की आँखों में कोई खौफ नहीं था, सिर्फ एक शांत और गहरी आग थी। उसने अपनी पहचान छुपाने की कोशिश नहीं की, बल्कि एक रहस्यमयी मुस्कान के साथ कहा, "सेनापति, मेरा नाम आसिफ है। और रही बात मेरे हुनर की, तो यह हुनर इस मिट्टी का है, जिसे सालों पहले आप जैसे वफादार लोगों ने खून देकर सींचा था, लेकिन बाद में आप भूल गए।"
इब्राहिम का हाथ कांप गया। आसिफ के चेहरे में उसे मरहूम सुल्तान की झलक दिखाई दी। उसे उस रात की याद आई जब महल पर हमला हुआ था और नन्हे शहजादे को मरा हुआ मान लिया गया था। इब्राहिम को अपनी आँखों पर यकीन नहीं हो रहा था। क्या यह वही शहजादा है? क्या 'परवाना' ही आसिफ खान है? उसके दिमाग में तूफानों का बवंडर चल रहा था—एक तरफ नवाब के प्रति वफादारी का फर्ज, दूसरी तरफ अपने जमीर की आवाज और अपने असली वारिस को पहचानने का एहसास। उसने धीरे से अपनी तलवार हटाई और आसिफ की आँखों में गहरी नजरों से देखा। "आज रात यहीं रहो, कल सुबह मैं तुमसे मिलूंगा।" इतना कहकर इब्राहिम वहाँ से चला गया, उसके कदम भारी थे और दिमाग में सवाल ही सवाल। सस्पेंस अब यह था कि इब्राहिम का अगला कदम क्या होगा? क्या वह नवाब को यह खबर देगा या 'परवाना' का साथ देगा?
आगे की कहानी अगले पार्ट में
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Asif pathan