Ashok Mishra Videos

Ashok Mishra Videos Jai Shree Ram

08/09/2026

सहारनपुर में कलेक्ट्रेट परिसर स्थित मस्जिद को गिराने की कार्रवाई निश्चित रूप से गंभीर सार्वजनिक और संवैधानिक बहस का विषय है। लेकिन इसे सीधे “साम्प्रदायिक सरकार की साजिश” या “संवैधानिक व्यवस्था के पूर्ण पतन” का प्रमाण बताना तथ्यों से आगे जाना होगा।

प्रशासन और अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, संरचना को सरकारी जमीन पर अनधिकृत निर्माण माना गया था और मस्जिद प्रबंधन की अपील भी अदालत ने खारिज की। प्रशासन का कहना है कि कार्रवाई कानूनी प्रक्रिया के तहत हुई। दूसरी ओर, मस्जिद प्रबंधन ने उचित प्रक्रिया का पालन नहीं होने का आरोप लगाया है।

इसलिए असली सवाल धर्म नहीं, **कानून का समान और निष्पक्ष अनुपालन** होना चाहिए। यदि प्रक्रिया में कोई कमी हुई है तो उसकी न्यायिक जांच हो और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय हो। लेकिन बिना प्रमाण किसी अधिकारी या राजनीतिक दल को अपराधी घोषित करना भी न्यायसंगत नहीं है।

लोकतंत्र में सरकार की आलोचना जरूरी है, मगर **आरोपों से अधिक महत्वपूर्ण प्रमाण, न्यायिक समीक्षा और निष्पक्ष कानून-व्यवस्था है।**🔥

08/09/2026

गोरखपुर के राजघाट स्थित गुरु गोरक्षनाथ घाट पर गुंबद गिरने से दो अधिवक्ताओं की मौत बेहद गंभीर और दुखद घटना है। लेकिन इस त्रासदी पर राजनीतिक आरोप लगाने से पहले तथ्यों और जांच के निष्कर्ष का इंतजार जरूरी है। प्रारंभिक प्रशासनिक जांच में आकाशीय बिजली को हादसे की संभावित वजह बताया गया है, जबकि निर्माण की गुणवत्ता पर भी सवाल उठे हैं और जिलाधिकारी ने तकनीकी जांच के आदेश दिए हैं।

मामले में निर्माण के समय तैनात सिंचाई विभाग के एई-जेई तथा ठेकेदारों समेत छह लोगों से पुलिस ने पूछताछ की है। इसका अर्थ यह नहीं कि वे दोषी सिद्ध हो चुके हैं।

सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि यदि निर्माण में तकनीकी या गुणवत्ता संबंधी कमी थी, तो उसकी जिम्मेदारी तय हो और दोषियों पर निष्पक्ष कार्रवाई हो। साथ ही एंबुलेंस और चिकित्सा व्यवस्था में कथित लापरवाही की भी जांच होनी चाहिए।

**जनता को राजनीतिक आरोप नहीं, पारदर्शी जांच, जवाबदेही और न्याय चाहिए।**🔥

08/09/2026

यूनिफॉर्म को समानता और अनुशासन का प्रतीक बताना आकर्षक तर्क हो सकता है, लेकिन **यूनिफॉर्म अपने-आप सामाजिक या आर्थिक असमानता खत्म नहीं करती।** भारत के संविधान में समानता का आधार अनुच्छेद 14 है, जबकि सामाजिक न्याय और अवसर की समानता के लिए व्यापक संवैधानिक प्रावधान मौजूद हैं। इसलिए केवल एक जैसा पहनावा समाजवाद या बराबरी की गारंटी नहीं देता।

इसी तरह, किसी यूथ फोर्स को किसी विशेष राजनीतिक विचारधारा से जोड़ना तभी लोकतांत्रिक रूप से उचित माना जा सकता है, जब युवाओं की **स्वतंत्र सोच, असहमति और बहुलतावाद** का सम्मान भी सुनिश्चित हो। भारत का लोकतंत्र किसी एक विचारधारा को नागरिकों पर थोपने के बजाय विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को संवैधानिक संरक्षण देता है।

‘प्रेम, दया, अपनापन’ और ‘बंधुत्व’ निश्चित रूप से सकारात्मक मूल्य हैं, लेकिन **सामाजिक न्याय केवल नारों से नहीं आता।** शिक्षा, रोजगार, कानून का निष्पक्ष पालन, आर्थिक अवसर और भेदभाव के खिलाफ प्रभावी संस्थागत कार्रवाई ही बराबरी को वास्तविक बनाती है।

इसलिए ‘नई सोच’ का अर्थ सिर्फ नई यूनिफॉर्म नहीं, बल्कि **नई जवाबदेही, बेहतर शिक्षा, रोजगार और लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करना** होना चाहिए।

08/09/2026

बच्चे फरारी का वीडियो लेने के लिए फेरारी वाले को डायरेक्शन देते हुए

08/09/2026

विधायक मैथिली ठाकुर क्षेत्र का दौरा करते हुए ❤️

08/09/2026

अभिजीत दीपक पुलिस के आल्हा अधिकारियों को ज्ञान देता हुआ 🔥

08/09/2026

समस्या कितनी भी बड़ी हो अपने बच्चों के लिए मैन किसी भी समस्या से लड़ने को तैयार हो जाती है ❤️

08/09/2026

पप्पू यादव अपना वोट बैंक मजबूत करते हुए

08/09/2026

चंद्रशेखर आजाद अपने भक्तों को सही गलत का ज्ञान देते हुए

08/09/2026

डिंपल यादव समाजवादी पार्टी के भक्तों को सरकार की बातें बताते हुए 🔥

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